मैं आँखों के लिए ख़ाब खरीदने निकला सितारों के लिए चाँद ढूँढ़ने निकला दिन अदा किया तब रात नसीब हुई हर सहर पे रात बेचने निकला सुरमई अँखियों वाली जब याद आयी मैं आँसुओं से फ़रियाद सींचने निकला तकिए पे इक ख… more →
तख़लीक़-ए-नज़रAmarjeet Singh wrote 9 months ago: धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो वो सितारा है चमकने दो यूँ … more →
विनय wrote 1 year ago: मैं आँखों के लिए ख़ाब खरीदने निकला सितारों के लिए चाँद ढूँढ़ने निकला दिन अदा किया तब रात नसीब हुई हर … more →
विनय wrote 1 year ago: कितने दिन हुए कोई टूटता सितारा नहीं देखा मेरे हश्र को एक यह बुनियाद और सही… क्या तू अब भी मुझे … more →