दाग़े-शबे-हिज्राँ बुझाये नहीं बुझते आँसू बहते हैं इतना छुपाये नहीं छिपते होता है कभी, शाम आती है चाँद नहीं आता मरासिम हम से यूँ निभाये नहीं निभते ख़ुदा के आस्ताँ पे आज भी सर झुकाये हूँ मगर दाग़े-दिल उ… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 9 months ago: दाग़े-शबे-हिज्राँ बुझाये नहीं बुझते आँसू बहते हैं इतना छुपाये नहीं छिपते होता है कभी, शाम आती है चाँ … more →
विनय wrote 1 year ago: उस्लूब*, उस्लूब, उस्लूब क्या पढ़ने वाले इनको समझते हैं वज़नी हो सीने पर गर ज़ख़्म उसे पढ़ने वाले दर्द … more →
विनय wrote 1 year ago: वज़नी साँसों में पिस रहा है दिन सारा मुझे आज भी है इन्तिज़ार तुम्हारा नम है नफ़स-नफ़स मेरे सीने में क्यो … more →
विनय wrote 1 year ago: वह मौसम इक बार फिर सजा दे प्यार करने की मुझको सज़ा दे दीवानों की तरह तुझको देखे जाऊँ हाथों की लकीरों … more →
विनय wrote 1 year ago: धीरे-धीरे उतरती है साँस सीने में यह दर्द बड़ा बेदर्द है सीने में लुत्फ़ जीने क सब ख़त्म हो गया … more →
विनय wrote 2 years ago: इक मौक़ा दो तुम मुझे कि बता सकूँ कितना टूटकर प्यार करता हूँ तुमसे तुम्हें जो चाहिए सब दूँगा मैं प्यार … more →