फूल पत्थर से उगेगा सोचता है आदमी, पर्वतों पिघलोगे इकदिन, सोचता है आदमी. चाँद पर तो घुमने हम कई बार आ चुके हैं, चाँद के आगे है क्या फिर, सोचता है आदमी. शम्मां के हिस्से में आए परवाने देखो कई हैं, परवान… more →
यह भी खूब रहीअजीत कुमार मिश्रा wrote 8 months ago: Please read…no money required…. ……just a few moments of yours and wide publi … more →
pryas wrote 1 year ago: फूल पत्थर से उगेगा सोचता है आदमी, पर्वतों पिघलोगे इकदिन, सोचता है आदमी. चाँद पर तो घुमने हम कई बार आ … more →