नै१ बुलबुले-चमन न गुले-नौदमीदा२ हूँ मैं मौसमे-बहार में शाख़े-बरीदा३ हूँ गिरियाँ न शक्ले-शीशा व ख़ंदा न तर्ज़े-जाम४ इस मैकदे के बीच अबस५ आफ़रीदा६ हूँ तू आपसे७ ज़बाँज़दे-आलम८ है वरना मैं इक हर्फ़े-आरज़ू… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 4 months ago: नै१ बुलबुले-चमन न गुले-नौदमीदा२ हूँ मैं मौसमे-बहार में शाख़े-बरीदा३ हूँ गिरियाँ न शक्ले-शीशा व ख़ंदा … more →
विनय wrote 10 months ago: निकल न चौखट से घर की प्यारे जो पट के ओझल ठिटक रहा है सिमट के घट से तिरे दरस को नयन में जी आ, अटक रहा … more →
विनय wrote 10 months ago: ख़त आ चुका, मुझसे है वही ढंग अब तलक वैसा ही मिरे नाम से है नंग1 अब तलक देखे है मुझको अपनी गली में तो … more →
विनय wrote 1 year ago: जी तक तो लेके दूँ कि तू हो कारगर कहीं ऐ आह! क्या करूँ, नहीं बिकता असर कहीं होती नहीं है सुब्ह’ … more →
विनय wrote 1 year ago: हर मिज़ा१ पर तेरे लख़्ते-दिल२ है इस रंजूर३ का ख़ून है सो दार४ पर साबित मिरे मंसूर का पोंछ्ते ही पोंछ् … more →
विनय wrote 1 year ago: मक़दूर१ नहीं उस तज्जली२ के बयाँ का जूँ-शमा३ सरापा हो अगर सर्फ़४ ज़बाँ का पर्दे को तअय्युन५ के दरे-दिल स … more →
विनय wrote 1 year ago: टूटे तिरी निगह से अगर दिल हुबाब१ का पानी भी फिर पियें तो मज़ा है शराब का कहता है आईना कि समझ तरबियत२ … more →
विनय wrote 2 years ago: पाया वो हम इस बाग़ में जो काम न आया कुछ अपने लिए जुज़-समरे-ख़ाम१ न आया ऐ ज़मज़मापरदाज़े-चमन२, नाला हमारा … more →
विनय wrote 2 years ago: याँ न ज़र्रा ही झमकता है फ़क़त१ गर्द के साथ जल्वागर नूर है ख़ुरशीद२ का हर फ़र्द३ के साथ ज़ख़्म की तरह ज़मा … more →
विनय wrote 2 years ago: अक़्ल उस नादाँ में क्या जो तेरा दीवाना नहीं नूर१ पर तेरे मगस२ है वो जो परवाना नहीं अपनी तौबा ज़ाहिदा ज … more →