निकल न चौखट से घर की प्यारे जो पट के ओझल ठिटक रहा है सिमट के घट से तिरे दरस को नयन में जी आ, अटक रहा है अगन ने तेरी बिरह की जब से झुलस दिया है मिरा कलेजा हिया की धड़कन में क्या बताऊँ, ये कोयला-सा चटक … more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 5 months ago: निकल न चौखट से घर की प्यारे जो पट के ओझल ठिटक रहा है सिमट के घट से तिरे दरस को नयन में जी आ, अटक रहा … more →
विनय wrote 5 months ago: ख़त आ चुका, मुझसे है वही ढंग अब तलक वैसा ही मिरे नाम से है नंग1 अब तलक देखे है मुझको अपनी गली में तो … more →
दीपक भारतदीप wrote 11 months ago: घर भरा है समंदर की तरह दुनियां भर की चीजों से नहीं है घर मे पांव रखने की जगह फिर भी इंसान बेचैन है … more →