महफ़िले-उश्शाक़ में आशिक़ हम-सा न पाओगे बेकार की बातें हैं सभी दिल को कब तक जलाओगे सहर में शुआ शाम को माह बनके निकलते हो जिगर में बस गये हो जी को कब तक दुखाओगे आँखों से हाल बयाँ करना माशूक़ की अदा होती है… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: महफ़िले-उश्शाक़ में आशिक़ हम-सा न पाओगे बेकार की बातें हैं सभी दिल को कब तक जलाओगे सहर में शुआ शाम को म … more →