लुढ़कता पत्थर शिखर से, क्यों हमें लुढ़का न देगा क्रेन पर ऊँचा चढ़ा कर, चैन उसकी तोड़ दी लोभ का दर्शन बना, मझधार नैया छोड़ दी ऋण-यन्त्र से मन्दी बढ़ी, पोखर में डॉलर बह लिया अर्थ की सरिता में भोंडे नाच से मोह… more →
हरिहर झाHarihar Jha हरिहर झा wrote 2 months ago: लुढ़कता पत्थर शिखर से, क्यों हमें लुढ़का न देगा क्रेन पर ऊँचा चढ़ा कर, चैन उसकी तोड़ दी लोभ का दर्शन बना … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 9 months ago: मुझे अपना जैसा बनाने के नाम पर मेरा स्वत्व छिन कर ले गये बेडि़यां उतारने के बहाने कुछ नई बेडियां जोड़ … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 1 year ago: एक युग था कवि कविता क्या लिखता था ! भावों को व्यक्त करता था संवेदनशील मन से पीड़ा को मथता तब गंगोत्री … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 1 year ago: सोंचा था ईश्वर ने दुनियां हो रंगीन ना रहे कोई एकाकी जानवर तो जानवर फिर नर क्यों अकेला? जैसे हाथी और … more →