Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 weeks ago: बेतुका है जीवन अज्ञान के घुप्प अंधेरे में व्यवस्था भी ऐसी कि हड्डियों के ढेर पर फिसलते मांस के लोथड़ … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 4 months ago: मुझे अपना जैसा बनाने के नाम पर मेरा स्वत्व छिन कर ले गये बेडि़यां उतारने के बहाने कुछ नई बेडियां जोड़ … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 10 months ago: एक युग था कवि कविता क्या लिखता था ! भावों को व्यक्त करता था संवेदनशील मन से पीड़ा को मथता तब गंगोत्री … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 1 year ago: सोंचा था ईश्वर ने दुनियां हो रंगीन ना रहे कोई एकाकी जानवर तो जानवर फिर नर क्यों अकेला? जैसे हाथी और … more →