हर पल लोगों के सामने अपना कद बढाने की कोशिश हर बार समाज में सम्मान पाने की कोशिश आदमी को बांधे रहती है ऐसे बंधनों में जो उसे लाचार बनाते ऐसे कायदों पर चलने की कोशिश जो सर्वशक्तिमान के बनाए बताये जाते… more →
**दीपक भारतदीप की हिंदी साहित्य-पत्रिका** ***Deepak Bharatdeep ki Hindi Patrika***प्रवीण wrote 1 week ago: आज की मायावादी दुनिया में, कुछ मायावादी है… आसमान पर थूकते है. और भूल जाते है, यह स्वतंत्र आसम … more →
प्रवीण wrote 1 week ago: पक्ष: चुनाव हुआ. नयी सरकार बनी. सरकार धर्मनिरपेक्ष है. आरक्षण के पक्ष में है, गरीबो के बारे में … more →
प्रवीण wrote 1 week ago: प्यार क्या है! वो नहीं जानते … हर मुस्कुराहट को ख़ुशी समझे लेते है ! प्यार क्या है! हम नहीं ज … more →
प्रवीण wrote 2 weeks ago: आपकी याद में दिन गुजर जाता है पर इस रात का क्या करे… जो आ कर रुक सी जाती है! ये आपका चाँद … more →
प्रवीण wrote 2 weeks ago: चाँदनी रात है और … मेरी तन्हाई है ! जिंदिगी क्या है! मैं अनगिनत तारो में खोज रहा हू! हर तारा आ … more →
प्रवीण wrote 2 weeks ago: उनको अच्छा लगता है !मेरा गुन गुनाना… मेरा लिखना … क्या लिखों मैं उनकी याद में… जब … more →
दीपक भारतदीप wrote 3 weeks ago: भारत का शिक्षित वर्ग हमेशा ही मानसिक द्वंद्व में फंसा दिखता है जो पश्चात्य सभ्यता के समर्थन और विरो … more →
दीपक भारतदीप wrote 5 months ago: बना लिया है पूरी दुनिया को उन्होंने अपना एक बड़ा बाजार चला रहे सभी जगह अपना व्यापार पर टुकड़ों में ब … more →
दीपक भारतदीप wrote 7 months ago: कहीं लगी आग है कहीं बरसती बहार कहीं है खुशी खेलती कहीं गम करते प्रहार शोक मनाओ मूंह फेर जाओ जीवन के … more →
दीपक भारतदीप wrote 10 months ago: चिल्ला चिल्ला कर वह करते हैं एक साथ होने का दावा यह केवल है छलावा मन में हैं ढेर सारे सवाल जिनका जव … more →
दीपक भारतदीप wrote 11 months ago: बहुत दिन बाद ऑफिस में आये कर्मचारी ने पुराना कपडा उठाया और टेबल-कुर्सी और अलमारी पर धूल हटाने के लिए … more →
दीपक भारतदीप wrote 11 months ago: जब भी हम ढूढ़ते हैं अपने लिए प्यार पर मिलती है सब जगह से दुत्कार खुद करो चाहे किसी से भी तुम मांगो … more →
दीपक भारतदीप wrote 11 months ago: वफा अब मुफ्त में नहीं मिलती अगर दाम देने की ताकत हो पास तो बेचने वाले सौदागरो की भीड़ दिखती ओ बाजार … more →
दीपक भारतदीप wrote 11 months ago: इस सप्ताह मैंने कोई ऐसा पाठ या रचना नहीं लिखी जिसकी चर्चा की जा सके। वजह यह रही कि बरसात के मौसम में … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: आज से यह पत्रिका प्रत्येक शनिवार को नियमित रूप से प्रकाशित होगी। इसका लेखन एवं संपादन एक स्वयंसेवी … more →
gulkand wrote 1 year ago: खेल ये है अपनी पसंद का, खेलतें ही जाएंगे। चाहें धोका लाख खाए, प्यार लुटाते जाएंगे। भुल अपनी भुलने को … more →
gulkand wrote 1 year ago: सुबह से शाम तक गुनगुनाता रहुगा। मै तेरे प्यार के गीत गाता रहुगा। दुनिया ये चाहें रहे ना रहेगी, मैं त … more →
gulkand wrote 1 year ago: क्या बताऊं यार के, कयामत मेरे साथ हुई। एकबार मुस्कुराकर वो मेरे मौत का सामान कर गई। वो मुझे देखकर भी … more →
gulkand wrote 1 year ago: देख के हमें क्यूं, मूंह फेर लिया सितमगर, तेरी मुस्कान के अलावा कुछ और, मांगा तो नही था। देख के उखड ज … more →