दाग़े-शबे-हिज्राँ बुझाये नहीं बुझते आँसू बहते हैं इतना छुपाये नहीं छिपते होता है कभी, शाम आती है चाँद नहीं आता मरासिम हम से यूँ निभाये नहीं निभते ख़ुदा के आस्ताँ पे आज भी सर झुकाये हूँ मगर दाग़े-दिल उ… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 4 months ago: दाग़े-शबे-हिज्राँ बुझाये नहीं बुझते आँसू बहते हैं इतना छुपाये नहीं छिपते होता है कभी, शाम आती है चाँ … more →