पिचकारी खेले ससुरी ऐसे रंग फेंक कर के मचलती कैसे बौछार तीर की निकलती ज्वाला चमकार बिजली की झूमती बाला लुभायमान लगती रंग से भरी वो लम्बी छरहरी लगती परी वो हुडदंग के बीच बेखबर हो घूमती आंचल में रंग… more →
हरिहर झाHarihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: पिचकारी खेले ससुरी ऐसे रंग फेंक कर के मचलती कैसे बौछार तीर की निकलती ज्वाला चमकार बिजली की झूमती … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: रंग फेका लाल गुलाबी वो वेवलेन्थ की बात करने लगा बुद्धु नादान सैयां आइन्स्टीन को मात करने लगा मैंने छ … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: सर्दी आई तो सिकुड़ गये प्राण छीन गई हृदय की उष्मा जिसमे पंखुड़ियां खिल खिल जाती थी अबोध चिड़िया मीठे … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: पत्नी के इरादे सी पाषाण बस, नाराज हो कर देती कंपकंपी बेरुखी ऐसी जैसे निश्चल हवा का स्पर्श – … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: मित्र ! हम तो चले थे उस नकली और मशीनटाइप जिन्दगी से दूर बाइसिकल उठाये सैर … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: निकल कन्दराओं से मैने लिखे वेदउपनिषद वात्स्यायन के कामसूत्र सूरतुलसी मीरा के पद सोंच रहा नवनीत ज्ञान … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: नजरों से गश आया साकी मदिरा ढलने पर क्या होगा। प्यास बुझाने पानी मांगा अमृत की अब चाह नहीं नन्हा दीपक … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: मन मे पीड़ा जब सताती, बन कविता मुस्कुराती दुख बने दो तट अधर के प्यार की वाचा निकलती थपेड़ों मे बन गई प … more →