अश्लीलता और श्लीतता में अंतर कितना रह गया है बस छह इंच के कपड़े का। क्यों इतना रोज छोड़ मचता है खत्म कर दो हर कायदा कोई पहने या न पहने लगा दो एक नारा चौराहे पर अपनी इज्जत की रक्षा खुद करें दूसरे में तब … more →
***दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका*** ***Deepak Bharatdeep ki Hindi patrika***दीपक भारतदीप wrote 19 hours ago: अश्लीलता और श्लीतता में अंतर कितना रह गया है बस छह इंच के कपड़े का। क्यों इतना रोज छोड़ मचता है खत्म क … more →
दीपक भारतदीप wrote 4 days ago: कभी गम तो कभी खुशी कभी दर्द तो कभी हँसी के साथ कविता लिखने का ख्याल किया तब भाषा सज … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 week ago: सभी लोग हमेशा दूसरे के सुख देखकर मन में अपने लिये उसकी कमी का विचार करते हुए अपने को दुःख देते हैं। … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: निरापद रहने की कोशिश निष्क्रिय बना देती है बाहर जलती आग पर दिल को ठंडा रखने की सोच घर को राख बना देत … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: सूखी मन गयी दिवाली क्योंकि जेब थी खाली, ज़माने में अपना रुआब दिखाने के लिए सबसे कह रहे हैं”हैप … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: शोर कर रही भीड़ में शांति कराने के लिये बहुत तेज आवाज में शोर मचाओगे तो तुम भी शांति के मसीहा हो जाओग … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: जिंदगी की इस धारा में किस किसकी नाव पार लगाओगे। समंदर से गहरी है इसकी धारा लहरे इतनी ऊंची कि आकाश का … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: अक्सर सोचते हैं कि कहीं कोई अपना मिल जाए अपने से हमदर्दी दिखाए मिलते भी हैं खूब लोग यहाँ पर इंसान और … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: अपना दर्द यूं जमाने को न दिखाओ दवा देकर इलाज करने वाले हर जगह नहीं मिलते हैं। जो अल्फाजों की जादूगरी … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: हमने देखा था उगता सूरज उन्होने देखा डूबता हुआ वह कर रहे थे चंद्रमा की रौशनी में जश्न मनाने की तैयारी … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: चेहरे पर रोज नया मुखौटा लगाकर वह सामने चले आते उनकी बहादुरी पर क्या भरोसा करें जो अपने पहचाने जाने क … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: जमींदौज या राख हो चुके इंसानों के राहों पर छपे कदमों को चूम कर उसके निशान जमाने को दिखाते हैं। गुजरत … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: माशुका अब आशिक के लिये हो गयी है मिस काल। वह घंटी बजाकर बंद करती है फिर करता है आशिक उसे काल। वह भी … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: आशिक ने माशुका को समझाया ‘‘मोबाईल पर इतनी बात मत करो मैं नहीं उठा सकता खर्चा हर हफ्ते कपड़े भी न मांग … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: बेटे ने मां से कहा ‘‘मां, मुझे पैसा दो तो कार खरीद कर लाऊं कालिज उससे जाकर अपनी छबि बनाऊं पापा, नोटो … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: कवि ने टीवी एंकर से कहा ‘यह मेरे साक्षात्कार का बेकार नाटक रचाया। तुम सवाल करते हुए जवाब भी बताकर उस … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: हम दोनों तूफान में फंसे थे उनको सोने की दीवारों का सहारा मिला हम ताश के पतों की तरह ढह गये। अब गुजरत … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: बरसात की बूंदें जैसे ही आकाश से जमीन पर आई। अकाल राहत सहायता समिति के सदस्यों के चेहरे पर चिंता घिर … more →
दीपक भारतदीप wrote 3 months ago: कभी शब्द नहीं बनता अकेला शब्द कभी भाषा नहीं बनता। कई मिलकर बनाते हैं एक भाव समूह जिससे उनका निज परिच … more →