गम भुलाकर दिमाग खुश होना चाहता है ये दुखी दिल जी भर के अब रोना चाहता है ढो लिये चाँद-तारे आकाश उकता गया अब बावला रे ! तु चैन से सोना चाहता है कैद हैं सब टेन्शन टकराते मेरे भीतर तेज जलता चिराग अब बुझना… more →
हरिहर झाHarihar Jha हरिहर झा wrote 2 weeks ago: गम भुलाकर दिमाग खुश होना चाहता है ये दुखी दिल जी भर के अब रोना चाहता है ढो लिये चाँद-तारे आकाश उकता … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 1 month ago: कितना अजीब है ! मिलना निमन्त्रण भूतपूर्व पत्नी की शादी पर !! जैसे कि याद दिला दिया उसने कैसे कैसे स् … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 months ago: लुढ़कता पत्थर शिखर से, क्यों हमें लुढ़का न देगा क्रेन पर ऊँचा चढ़ा कर, चैन उसकी तोड़ दी लोभ का दर्शन बना … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 4 months ago: क्यों पोत रही तुम मेरी सूखी हड्डियों पर इन्द्रधनुषी रंग उतर कर मेरे आंगन में ! क्यों जम्हाई लेने के … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 4 months ago: झगड़ा हुआ नेताजी और पत्रकार में मंहगाई की मार से बावले हुये पत्रकार ने मला सिर पर बाम लगाया नेताजी प … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 5 months ago: मत फेंको जूता यह है शिष्टाचार के खिलाफ़ और कानून के विरुद्ध । तुम क्षमा कर दो उन्हे जो हत्या में लिप् … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 7 months ago: सामने खड़ी अनुज की मौत ! वह भी कुछ कायर लोगों के हाथों जो मांस नोचना जानते हैं मानवता उन्हे कैसे समझा … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 8 months ago: मौत का एहसास पलपल देह में अनुनाद कलकल धमनियां फैली शीरा में काल की गुर्राहटें भी देह बुनता लाल चादर … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 8 months ago: मुझे अपना जैसा बनाने के नाम पर मेरा स्वत्व छिन कर ले गये बेडि़यां उतारने के बहाने कुछ नई बेडियां जोड़ … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 9 months ago: यौवन के घनेरे बालों की खुशबू तिस पर ऐसा मोहक अनुरोध अनमोल है यह पल इस निराले उन्माद में यह रूठना मन … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 9 months ago: केवल उंगलियां देख कर घबराती ग्वालिन देख रही अपनी ’मौसी’ का चेहरा - आग-बबूला पहाड़ से लुढ़कते पत्त्थर स … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 10 months ago: मैं प्रोफेसर मेरे कुछ उसूल हैं भले हो विद्यार्थिनी कुछ पक्षपात नहीं करता मेरे घर का दरवाजा पढ़ने के … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 10 months ago: परिन्दे कभी आकाश में नहीं ढूँढते नीड़ बसेरा असुविधाओं पर गुस्साते नहीं दिल में हावी होते हवा पर और पु … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 10 months ago: रो पड़ा सुन कर कहानी गहन यह संवेदना दिल नहीं पत्थर हो वे ना समझ सकते वेदना भेद खुलवाने को शठ का निहत् … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 11 months ago: एक गहन अन्धेरी गुफा से अपना जीवन चुरा कर चक्रव्यूह में फंस गया हूं रोता रहा रात भर बचाओ ! बचाओ! वर्ज … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 1 year ago: लावारिस हवाओं की थपेड़े खाती गर्द में लोटपोट होता बेशर्म मौसम का सरकता पल्लु अब विलुप्त हुआ लजाती दुल … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 1 year ago: घुटन है दिल में बहुत, नाराज दोनो रब जहाँ प्रश्न तो सुलझा नहीं, तू कौन है और है कहां ? पी गया आंसू, ज … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 1 year ago: एक युग था कवि कविता क्या लिखता था ! भावों को व्यक्त करता था संवेदनशील मन से पीड़ा को मथता तब गंगोत्री … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 1 year ago: भीग गया मन प्रेम पगा हो़ बुझ गये सब अंगारे खुशियों की बौछार भले बाजी जीते या हारे सांकल स्वर्ग द्वार … more →