Harihar Jha हरिहर झा wrote 1 week ago: बेतुका है जीवन अज्ञान के घुप्प अंधेरे में व्यवस्था भी ऐसी कि हड्डियों के ढेर पर फिसलते मांस के लोथड़ … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 3 weeks ago: मत फेंको जूता यह है शिष्टाचार के खिलाफ़ और कानून के विरुद्ध । तुम क्षमा कर दो उन्हे जो हत्या में लिप् … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 months ago: सामने खड़ी अनुज की मौत ! वह भी कुछ कायर लोगों के हाथों जो मांस नोचना जानते हैं मानवता उन्हे कैसे समझा … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 3 months ago: मौत का एहसास पलपल देह में अनुनाद कलकल धमनियां फैली शीरा में काल की गुर्राहटें भी देह बुनता लाल चादर … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 3 months ago: मुझे अपना जैसा बनाने के नाम पर मेरा स्वत्व छिन कर ले गये बेडि़यां उतारने के बहाने कुछ नई बेडियां जोड़ … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 4 months ago: यौवन के घनेरे बालों की खुशबू तिस पर ऐसा मोहक अनुरोध अनमोल है यह पल इस निराले उन्माद में यह रूठना म … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 5 months ago: मैं प्रोफेसर मेरे कुछ उसूल हैं भले हो विद्यार्थिनी कुछ पक्षपात नहीं करता मेरे घर का दरवाजा पढ़ने … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 5 months ago: परिन्दे कभी आकाश में नहीं ढूँढते नीड़ बसेरा असुविधाओं पर गुस्साते नहीं दिल में हावी होते हवा पर और पु … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 6 months ago: एक गहन अन्धेरी गुफा से अपना जीवन चुरा कर चक्रव्यूह में फंस गया हूं रोता रहा रात भर बचाओ ! बचाओ! वर्ज … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 9 months ago: लावारिस हवाओं की थपेड़े खाती गर्द में लोटपोट होता बेशर्म मौसम का सरकता पल्लु अब विलुप्त हुआ लजाती दुल … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 9 months ago: घुटन है दिल में बहुत, नाराज दोनो रब जहाँ प्रश्न तो सुलझा नहीं, तू कौन है और है कहां ? पी गया आंसू, ज … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 10 months ago: एक युग था कवि कविता क्या लिखता था ! भावों को व्यक्त करता था संवेदनशील मन से पीड़ा को मथता तब गंगोत्री … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 10 months ago: भीग गया मन प्रेम पगा हो़ बुझ गये सब अंगारे खुशियों की बौछार भले बाजी जीते या हारे सांकल स्वर्ग द्वार … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 11 months ago: प्रपंच किया कुछ सिरफिरों ने रजनी को दिया नाम उषा किताबी फूलों से भर ली मंजूषा जिसमें कौओं ने कांव का … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 1 year ago: हिमालय ! तू बह जा इमारत ! तू ढह जा गंगे ! तू बह जा ऐसे ही पांच सात अटपटे चटपटे रसीले मधुभरे वाक्य मि … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 1 year ago: सनक गई सकून मिला अन्धेरे से उजाले तक दावा नहीं दया पहुंची जीगर के छाले तक लेपटोप पंहुच गये गांव में … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 1 year ago: मन्त्रीजी स्वर्ग सिधारे ( नरक के बदले ) शायद चित्रगुप्त की भूल या खिलाया कम्प्यूटर ने गुल नकली दया द … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 1 year ago: ( पिछ्ली कविता का शेष ) चित्रगुप्त ने जवाब दिया हँसते हुये - “कैसा स्वर्ग मत्रींजी ! याद कीजिये आपने … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 1 year ago: संयत देह के भीतर कैसी धधक रही है ज्वाला आँच नियन्त्रण से बाहर हो कर ना दे मुंह काला मूरत देखी खजुराह … more →