हम भी पागल थे ग़ैरों को अपना जानते थे रुसवा किये जायेंगे इस क़दर यह न जानते थे बेवफ़ा गर वह होता दर्द शायद कम होता उसकी वफ़ा का भेद यूँ खुलेगा यह न जानते थे एक-एक साँस से दबके हूक पत्थर हो गयी संगे-शरर से… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: हम भी पागल थे ग़ैरों को अपना जानते थे रुसवा किये जायेंगे इस क़दर यह न जानते थे बेवफ़ा गर वह होता दर्द श … more →