रोज़ ही होता है होंठों तक बात आते-आते रह जाती है मेरी इक कमी तेरे रू-ब-रू मुझे लब खोलने नहीं देती कितना मुश्किल है ख़ुद ही ग़लत होने का एहसास! शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’ लेखन वर्ष: २००४ … more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 7 months ago: रोज़ ही होता है होंठों तक बात आते-आते रह जाती है मेरी इक कमी तेरे रू-ब-रू मुझे लब खोलने नहीं देती कित … more →
विनय wrote 1 year ago: जीज़स से पूछेंगे तुमको बनाया कैसे कम्प्यूटर से रचा या बनाया हाथ से कुछ न कुछ बात तो सभी में थी पर हसी … more →