क़तरा क़तरा पिघल रहा हूँ तेरी आँच में मै जल रहा हूँ सहमा सहमा और धीरे धीरे बर्फ़ की मानिंद गल रहा हूँ अब चलना सीखा है थोड़ा थोड़ा लगी थी ठोकर, संभल रहा हूँ तू साथ आये तो बात क्या हो अभी तो तन्हा ही चल रहा … more →
इक शायर अंजाना सा...विनय wrote 1 year ago: क्यों? बेशर्म क़तरा-क़तरा ज़हन नहीं ढलता क्यों? मुझे बेक़रारियों से क़रार नहीं मिलता क्यों? ढल रहा हूँ दि … more →
विनय wrote 1 year ago: बिन तुम्हारे मैं क्या हूँ तुम न समझोगे आप तन्हाई की सदा हूँ तुम न समझोगे तुम्हारे ग़मे-इश्क़ में जो च … more →
विनय wrote 1 year ago: कुछ यूँ क़त्ल हुआ यह वक़्त कि क़तराए-ख़ूँ तक न गिरा अबकि हारे तो टूट जाये ‘नज़र’ मेरे दिलसित … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: क़तरा क़तरा पिघल रहा हूँ तेरी आँच में मै जल रहा हूँ सहमा सहमा और धीरे धीरे बर्फ़ की मानिंद गल रहा हूँ अ … more →
विनय wrote 1 year ago: शीशाए-अश्क आते रहे क़तरा-क़तरा लहू रुलाते रहे हम दीवानों की ख़ैर भला कौन पूछे लोग आते-जाते रहे हम रखते … more →
विनय wrote 2 years ago: आज महसूस किया मैंने गर तुम्हें किसी और के साथ देखूँ तो मेरे दिल पे क्या गुज़रेगी कैसा महसूस करूँगा बा … more →