क्यों? बेशर्म क़तरा-क़तरा ज़हन नहीं ढलता क्यों? मुझे बेक़रारियों से क़रार नहीं मि… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 4 months ago: क्यों? बेशर्म क़तरा-क़तरा ज़हन नहीं ढलता … more →
Rohit Jain wrote 7 months ago: ज़रा पास ना आओ मुझे क़रार आ जाये ज़रा लटों … more →
विनय wrote 8 months ago: तुम मेरी ज़िन्दगी मेरा क़रार हो गया मुझक … more →
विनय wrote 8 months ago: पहली बार देखा तुमको जाने क्या हुआ दिल … more →
विनय wrote 1 year ago: एक मुलाक़ात की इल्तजा है उससे दुआ है वह … more →