दिल के दाग़ सभी ज़ख़्म हुए वह ख़फ़ा हुआ हम ख़त्म हुए कोसूँ क्या अपनी क़िस्मत को हमें भी कुछ नये इल्म हुए हम गुलशने-रूह थे कभी बिग़ैर जानाँ के ज़ोफ़ जिस्म हुए नशात ज़मीं देखी सावन में अब अधूरी एक नज़्म हुए फ़ुरस… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: दिल के दाग़ सभी ज़ख़्म हुए वह ख़फ़ा हुआ हम ख़त्म हुए कोसूँ क्या अपनी क़िस्मत को हमें भी कुछ नये इल्म हुए … more →