मेरी ज़बां से मेरा ही अफ़साना बिखरा ढ़ूँढ़ो कहां जाने ये दिल दीवाना बिखरा नाकाम मै है इस से भी ग़ारत नहीं ग़म टूटा जो दिल ये मेरा तो मैखाना बिखरा जो था खुदा वो कितना है मायूस देखो वो बिखरी मस्जिद ये बुतखाना… more →
इक शायर अंजाना सा...Rohit Jain wrote 1 year ago: मेरी ज़बां से मेरा ही अफ़साना बिखरा ढ़ूँढ़ो कहां जाने ये दिल दीवाना बिखरा नाकाम मै है इस से भी ग़ारत नहीं … more →