ज़हराब में बुझाते हैं तीर क्यूँ शिकार की अदा मैं भी जानता हूँ कितना मन मुकद्दर था उसका यह राज़े-निहाँ मैं भी जानता हूँ ‘नज़र’ को जो ताबीज़ दी है उसमें कौन-सी आयत है मैं भी जानता हूँ वह हार जाय… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: ज़हराब में बुझाते हैं तीर क्यूँ शिकार की अदा मैं भी जानता हूँ कितना मन मुकद्दर था उसका यह राज़े-निहाँ … more →