विनय wrote 1 year ago: वज़नी साँसों में पिस रहा है दिन सारा मुझे आज भी है इन्तिज़ार तुम्हारा नम है नफ़स-नफ़स मेरे सीने में क्यो … more →
विनय wrote 1 year ago: ख़लिश को जगह न दो दिल में नासूर बन जायेगी मरहम भी न लगा पाओगे साँस घुट के मर जायेगी ज़ीस्त अलग है, ज़ी … more →
विनय wrote 1 year ago: जो होता है भले के लिए होता है ख़ुद को समझने के लिए होता है इंसान की आदत है बदल जाना कि वह बदलने के ल … more →
विनय wrote 1 year ago: राहें क्या-क्या न आयेंगी इस दौरे-बदनामी में है अपना ही मज़ा घुटके मरने का ग़ुमनामी में मुझको गले से लग … more →
विनय wrote 1 year ago: कोंपलें हर शाख़ बनी पत्तियाँ अब दामने-ग़म में लौट गयी ख़िज़ाँ अब देखो उस रात पर शिगाफ़ आने लग गये असरका … more →
विनय wrote 1 year ago: नज़र बचते बचाते लड़ ही गयी मय उन आँखों की हमें चढ़ ही गयी पूछो ज़रा गुलपोश से वह कहाँ है आज … more →
विनय wrote 2 years ago: रूह बहुत बेक़रार’ बहुत बेकल है इस जिस्म से छुटकारा चाहती है अगर तुम न मिली मुझको… यह बेक़र … more →