मेरी बाइसे-ज़ीस्त, तुमको इक नज़र देखने के बाद मैं क्यों मुदाम तुम्हारी जानिब खिंचता रहता हूँ? क्यों इक कशिश मुझको बारहा तुम्हारे तस्व्वुर के दाम में बाँध लेती है? क्यों तुम शबो-रोज़ कभी ख़्यालों की भीड़ … more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: मेरी बाइसे-ज़ीस्त, तुमको इक नज़र देखने के बाद मैं क्यों मुदाम तुम्हारी जानिब खिंचता रहता हूँ? क्यों इक … more →