तीन कविताएं(१) मेरी आंखों में उमडते हुए समंदर की हरएक बुंद में तेरी तस्वीर बंद है . तेरी हरएक तस्वीर को मैं झांका करता हूं चोरी-चोरी, चूपके-चूपके । मेरे होठों पर कई दिनों से तितली बैठने नहीं आयी । मेर… more →
विजयकुमार दवे / Vijaykumar Davevijaykumardave wrote 2 years ago: तीन कविताएं(१) मेरी आंखों में उमडते हुए समंदर की हरएक बुंद में तेरी तस्वीर बंद है . तेरी हरएक तस्वीर … more →
vijaykumardave wrote 2 years ago: क्षणिकायें चार विचार, चार क्षणिकाओँ में हमसफ़र नश्वर दुनिया को छोडकर चले जायें हम किसी शाश्वत सत्य की … more →
vijaykumardave wrote 2 years ago: मेरे ब्लोग के गुजराती मुलाकातियों के लिये मैं यहां मेरे मार्गदर्शक मित्र कविवर श्री सुरेन्द्र कडिया … more →