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	<title>02-अयोध्या-काण्ड &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/02-अयोध्या-काण्ड/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "02-अयोध्या-काण्ड"</description>
	<pubDate>Mon, 07 Jul 2008 12:05:22 +0000</pubDate>

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<item>
<title><![CDATA[अयोध्या काण्ड]]></title>
<link>http://ramayan.wordpress.com/2006/07/24/ayodhyakand/</link>
<pubDate>Mon, 24 Jul 2006 07:15:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>jitu9968</dc:creator>
<guid>http://ramayan.wordpress.com/2006/07/24/ayodhyakand/</guid>
<description><![CDATA[         श्रीगणेशायनमः
      श्रीजानकीवल्लभो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>         श्रीगणेशायनमः<br />
      श्रीजानकीवल्लभो विजयते<br />
         श्रीरामचरितमानस<br />
          द्वितीय सोपान<br />
         अयोध्या-काण्ड<!--more--><br />
            श्लोक<br />
यस्याङ्के च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके<br />
भाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि व्यालराट्।<br />
सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवरः सर्वाधिपः सर्वदा<br />
शर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिभः श्रीशङ्करः पातु माम्।।1।।<br />
प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवासदुःखतः।<br />
मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मञ्जुलमंगलप्रदा।।2।।<br />
नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं सीतासमारोपितवामभागम्।<br />
पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम्।।3।।<br />
दो0-श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि।<br />
    बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि।।<br />
जब तें रामु ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए।।<br />
भुवन चारिदस भूधर भारी। सुकृत मेघ बरषहि सुख बारी।।</p>
<p>रिधि सिधि संपति नदीं सुहाई। उमगि अवध अंबुधि कहुँ आई।।<br />
मनिगन पुर नर नारि सुजाती। सुचि अमोल सुंदर सब भाँती।।<br />
कहि न जाइ कछु नगर बिभूती। जनु एतनिअ बिरंचि करतूती।।<br />
सब बिधि सब पुर लोग सुखारी। रामचंद मुख चंदु निहारी।।<br />
मुदित मातु सब सखीं सहेली। फलित बिलोकि मनोरथ बेली।।<br />
राम रूपु गुनसीलु सुभाऊ। प्रमुदित होइ देखि सुनि राऊ।।<br />
दो0-सब कें उर अभिलाषु अस कहहिं मनाइ महेसु।<br />
   आप अछत जुबराज पद रामहि देउ नरेसु।।1।।<br />
 --*--*--<br />
एक समय सब सहित समाजा। राजसभाँ रघुराजु बिराजा।।<br />
सकल सुकृत मूरति नरनाहू। राम सुजसु सुनि अतिहि उछाहू।।<br />
नृप सब रहहिं कृपा अभिलाषें। लोकप करहिं प्रीति रुख राखें।।<br />
तिभुवन तीनि काल जग माहीं। भूरि भाग दसरथ सम नाहीं।।<br />
मंगलमूल रामु सुत जासू। जो कछु कहिज थोर सबु तासू।।<br />
रायँ सुभायँ मुकुरु कर लीन्हा। बदनु बिलोकि मुकुट सम कीन्हा।।<br />
श्रवन समीप भए सित केसा। मनहुँ जरठपनु अस उपदेसा।।<br />
नृप जुबराज राम कहुँ देहू। जीवन जनम लाहु किन लेहू।।<br />
दो0-यह बिचारु उर आनि नृप सुदिनु सुअवसरु पाइ।<br />
   प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरहि सुनायउ जाइ।।2।।<br />
 --*--*--<br />
कहइ भुआलु सुनिअ मुनिनायक। भए राम सब बिधि सब लायक।।<br />
सेवक सचिव सकल पुरबासी। जे हमारे अरि मित्र उदासी।।<br />
सबहि रामु प्रिय जेहि बिधि मोही। प्रभु असीस जनु तनु धरि सोही।।<br />
बिप्र सहित परिवार गोसाईं। करहिं छोहु सब रौरिहि नाई।।<br />
जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं। ते जनु सकल बिभव बस करहीं।।<br />
मोहि सम यहु अनुभयउ न दूजें। सबु पायउँ रज पावनि पूजें।।<br />
अब अभिलाषु एकु मन मोरें। पूजहि नाथ अनुग्रह तोरें।।<br />
मुनि प्रसन्न लखि सहज सनेहू। कहेउ नरेस रजायसु देहू।।<br />
दो0-राजन राउर नामु जसु सब अभिमत दातार।<br />
   फल अनुगामी महिप मनि मन अभिलाषु तुम्हार।।3।।<br />
 --*--*--<br />
सब बिधि गुरु प्रसन्न जियँ जानी। बोलेउ राउ रहँसि मृदु बानी।।<br />
नाथ रामु करिअहिं जुबराजू। कहिअ कृपा करि करिअ समाजू।।<br />
मोहि अछत यहु होइ उछाहू। लहहिं लोग सब लोचन लाहू।।<br />
प्रभु प्रसाद सिव सबइ निबाहीं। यह लालसा एक मन माहीं।।<br />
पुनि न सोच तनु रहउ कि जाऊ। जेहिं न होइ पाछें पछिताऊ।।<br />
सुनि मुनि दसरथ बचन सुहाए। मंगल मोद मूल मन भाए।।<br />
सुनु नृप जासु बिमुख पछिताहीं। जासु भजन बिनु जरनि न जाहीं।।<br />
भयउ तुम्हार तनय सोइ स्वामी। रामु पुनीत प्रेम अनुगामी।।<br />
दो0-बेगि बिलंबु न करिअ नृप साजिअ सबुइ समाजु।<br />
   सुदिन सुमंगलु तबहिं जब रामु होहिं जुबराजु।।4।।<br />
 --*--*--<br />
मुदित महिपति मंदिर आए। सेवक सचिव सुमंत्रु बोलाए।।<br />
कहि जयजीव सीस तिन्ह नाए। भूप सुमंगल बचन सुनाए।।<br />
जौं पाँचहि मत लागै नीका। करहु हरषि हियँ रामहि टीका।।<br />
मंत्री मुदित सुनत प्रिय बानी। अभिमत बिरवँ परेउ जनु पानी।।<br />
बिनती सचिव करहि कर जोरी। जिअहु जगतपति बरिस करोरी।।<br />
जग मंगल भल काजु बिचारा। बेगिअ नाथ न लाइअ बारा।।<br />
नृपहि मोदु सुनि सचिव सुभाषा। बढ़त बौंड़ जनु लही सुसाखा।।<br />
दो0-कहेउ भूप मुनिराज कर जोइ जोइ आयसु होइ।<br />
   राम राज अभिषेक हित बेगि करहु सोइ सोइ।।5।।<br />
 --*--*--<br />
हरषि मुनीस कहेउ मृदु बानी। आनहु सकल सुतीरथ पानी।।<br />
औषध मूल फूल फल पाना। कहे नाम गनि मंगल नाना।।<br />
चामर चरम बसन बहु भाँती। रोम पाट पट अगनित जाती।।<br />
मनिगन मंगल बस्तु अनेका। जो जग जोगु भूप अभिषेका।।<br />
बेद बिदित कहि सकल बिधाना। कहेउ रचहु पुर बिबिध बिताना।।<br />
सफल रसाल पूगफल केरा। रोपहु बीथिन्ह पुर चहुँ फेरा।।<br />
रचहु मंजु मनि चौकें चारू। कहहु बनावन बेगि बजारू।।<br />
पूजहु गनपति गुर कुलदेवा। सब बिधि करहु भूमिसुर सेवा।।<br />
दो0-ध्वज पताक तोरन कलस सजहु तुरग रथ नाग।<br />
   सिर धरि मुनिबर बचन सबु निज निज काजहिं लाग।।6।।<br />
 --*--*--<br />
जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा। सो तेहिं काजु प्रथम जनु कीन्हा।।<br />
बिप्र साधु सुर पूजत राजा। करत राम हित मंगल काजा।।<br />
सुनत राम अभिषेक सुहावा। बाज गहागह अवध बधावा।।<br />
राम सीय तन सगुन जनाए। फरकहिं मंगल अंग सुहाए।।<br />
पुलकि सप्रेम परसपर कहहीं। भरत आगमनु सूचक अहहीं।।<br />
भए बहुत दिन अति अवसेरी। सगुन प्रतीति भेंट प्रिय केरी।।<br />
भरत सरिस प्रिय को जग माहीं। इहइ सगुन फलु दूसर नाहीं।।<br />
रामहि बंधु सोच दिन राती। अंडन्हि कमठ ह्रदउ जेहि भाँती।।<br />
दो0-एहि अवसर मंगलु परम सुनि रहँसेउ रनिवासु।<br />
    सोभत लखि बिधु बढ़त जनु बारिधि बीचि बिलासु।।7।।<br />
 --*--*--<br />
प्रथम जाइ जिन्ह बचन सुनाए। भूषन बसन भूरि तिन्ह पाए।।<br />
प्रेम पुलकि तन मन अनुरागीं। मंगल कलस सजन सब लागीं।।<br />
चौकें चारु सुमित्राँ पुरी। मनिमय बिबिध भाँति अति रुरी।।<br />
आनँद मगन राम महतारी। दिए दान बहु बिप्र हँकारी।।<br />
पूजीं ग्रामदेबि सुर नागा। कहेउ बहोरि देन बलिभागा।।<br />
जेहि बिधि होइ राम कल्यानू। देहु दया करि सो बरदानू।।<br />
गावहिं मंगल कोकिलबयनीं। बिधुबदनीं मृगसावकनयनीं।।<br />
दो0-राम राज अभिषेकु सुनि हियँ हरषे नर नारि।<br />
    लगे सुमंगल सजन सब बिधि अनुकूल बिचारि।।8।।<br />
 --*--*--<br />
तब नरनाहँ बसिष्ठु बोलाए। रामधाम सिख देन पठाए।।<br />
गुर आगमनु सुनत रघुनाथा। द्वार आइ पद नायउ माथा।।<br />
सादर अरघ देइ घर आने। सोरह भाँति पूजि सनमाने।।<br />
गहे चरन सिय सहित बहोरी। बोले रामु कमल कर जोरी।।<br />
सेवक सदन स्वामि आगमनू। मंगल मूल अमंगल दमनू।।<br />
तदपि उचित जनु बोलि सप्रीती। पठइअ काज नाथ असि नीती।।<br />
प्रभुता तजि प्रभु कीन्ह सनेहू। भयउ पुनीत आजु यहु गेहू।।<br />
आयसु होइ सो करौं गोसाई। सेवक लहइ स्वामि सेवकाई।।<br />
दो0-सुनि सनेह साने बचन मुनि रघुबरहि प्रसंस।<br />
    राम कस न तुम्ह कहहु अस हंस बंस अवतंस।।9।।<br />
 --*--*--<br />
बरनि राम गुन सीलु सुभाऊ। बोले प्रेम पुलकि मुनिराऊ।।<br />
भूप सजेउ अभिषेक समाजू। चाहत देन तुम्हहि जुबराजू।।<br />
राम करहु सब संजम आजू। जौं बिधि कुसल निबाहै काजू।।<br />
गुरु सिख देइ राय पहिं गयउ। राम हृदयँ अस बिसमउ भयऊ।।<br />
जनमे एक संग सब भाई। भोजन सयन केलि लरिकाई।।<br />
करनबेध उपबीत बिआहा। संग संग सब भए उछाहा।।<br />
बिमल बंस यहु अनुचित एकू। बंधु बिहाइ बड़ेहि अभिषेकू।।<br />
प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई। हरउ भगत मन कै कुटिलाई।।<br />
दो0-तेहि अवसर आए लखन मगन प्रेम आनंद।<br />
    सनमाने प्रिय बचन कहि रघुकुल कैरव चंद।।10।।<br />
 --*--*--<br />
बाजहिं बाजने बिबिध बिधाना। पुर प्रमोदु नहिं जाइ बखाना।।<br />
भरत आगमनु सकल मनावहिं। आवहुँ बेगि नयन फलु पावहिं।।<br />
हाट बाट घर गलीं अथाई। कहहिं परसपर लोग लोगाई।।<br />
कालि लगन भलि केतिक बारा। पूजिहि बिधि अभिलाषु हमारा।।<br />
कनक सिंघासन सीय समेता। बैठहिं रामु होइ चित चेता।।<br />
सकल कहहिं कब होइहि काली। बिघन मनावहिं देव कुचाली।।<br />
तिन्हहि सोहाइ न अवध बधावा। चोरहि चंदिनि राति न भावा।।<br />
सारद बोलि बिनय सुर करहीं। बारहिं बार पाय लै परहीं।।<br />
दो0-बिपति हमारि बिलोकि बड़ि मातु करिअ सोइ आजु।<br />
    रामु जाहिं बन राजु तजि होइ सकल सुरकाजु।।11।।<br />
 --*--*--<br />
सुनि सुर बिनय ठाढ़ि पछिताती। भइउँ सरोज बिपिन हिमराती।।<br />
देखि देव पुनि कहहिं निहोरी। मातु तोहि नहिं थोरिउ खोरी।।<br />
बिसमय हरष रहित रघुराऊ। तुम्ह जानहु सब राम प्रभाऊ।।<br />
जीव करम बस सुख दुख भागी। जाइअ अवध देव हित लागी।।<br />
बार बार गहि चरन सँकोचौ। चली बिचारि बिबुध मति पोची।।<br />
ऊँच निवासु नीचि करतूती। देखि न सकहिं पराइ बिभूती।।<br />
आगिल काजु बिचारि बहोरी। करहहिं चाह कुसल कबि मोरी।।<br />
हरषि हृदयँ दसरथ पुर आई। जनु ग्रह दसा दुसह दुखदाई।।<br />
दो0-नामु मंथरा मंदमति चेरी कैकेइ केरि।<br />
   अजस पेटारी ताहि करि गई गिरा मति फेरि।।12।।<br />
 --*--*--<br />
दीख मंथरा नगरु बनावा। मंजुल मंगल बाज बधावा।।<br />
पूछेसि लोगन्ह काह उछाहू। राम तिलकु सुनि भा उर दाहू।।<br />
करइ बिचारु कुबुद्धि कुजाती। होइ अकाजु कवनि बिधि राती।।<br />
देखि लागि मधु कुटिल किराती। जिमि गवँ तकइ लेउँ केहि भाँती।।<br />
भरत मातु पहिं गइ बिलखानी। का अनमनि हसि कह हँसि रानी।।<br />
ऊतरु देइ न लेइ उसासू। नारि चरित करि ढारइ आँसू।।<br />
हँसि कह रानि गालु बड़ तोरें। दीन्ह लखन सिख अस मन मोरें।।<br />
तबहुँ न बोल चेरि बड़ि पापिनि। छाड़इ स्वास कारि जनु साँपिनि।।<br />
दो0-सभय रानि कह कहसि किन कुसल रामु महिपालु।<br />
   लखनु भरतु रिपुदमनु सुनि भा कुबरी उर सालु।।13।।<br />
 --*--*--<br />
कत सिख देइ हमहि कोउ माई। गालु करब केहि कर बलु पाई।।<br />
रामहि छाड़ि कुसल केहि आजू। जेहि जनेसु देइ जुबराजू।।<br />
भयउ कौसिलहि बिधि अति दाहिन। देखत गरब रहत उर नाहिन।।<br />
देखेहु कस न जाइ सब सोभा। जो अवलोकि मोर मनु छोभा।।<br />
पूतु बिदेस न सोचु तुम्हारें। जानति हहु बस नाहु हमारें।।<br />
नीद बहुत प्रिय सेज तुराई। लखहु न भूप कपट चतुराई।।<br />
सुनि प्रिय बचन मलिन मनु जानी। झुकी रानि अब रहु अरगानी।।<br />
पुनि अस कबहुँ कहसि घरफोरी। तब धरि जीभ कढ़ावउँ तोरी।।<br />
दो0-काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि।<br />
   तिय बिसेषि पुनि चेरि कहि भरतमातु मुसुकानि।।14।।<br />
 --*--*--<br />
प्रियबादिनि सिख दीन्हिउँ तोही। सपनेहुँ तो पर कोपु न मोही।।<br />
सुदिनु सुमंगल दायकु सोई। तोर कहा फुर जेहि दिन होई।।<br />
जेठ स्वामि सेवक लघु भाई। यह दिनकर कुल रीति सुहाई।।<br />
राम तिलकु जौं साँचेहुँ काली। देउँ मागु मन भावत आली।।<br />
कौसल्या सम सब महतारी। रामहि सहज सुभायँ पिआरी।।<br />
मो पर करहिं सनेहु बिसेषी। मैं करि प्रीति परीछा देखी।।<br />
जौं बिधि जनमु देइ करि छोहू। होहुँ राम सिय पूत पुतोहू।।<br />
प्रान तें अधिक रामु प्रिय मोरें। तिन्ह कें तिलक छोभु कस तोरें।।<br />
दो0-भरत सपथ तोहि सत्य कहु परिहरि कपट दुराउ।<br />
   हरष समय बिसमउ करसि कारन मोहि सुनाउ।।15।।<br />
 --*--*--<br />
एकहिं बार आस सब पूजी। अब कछु कहब जीभ करि दूजी।।<br />
फोरै जोगु कपारु अभागा। भलेउ कहत दुख रउरेहि लागा।।<br />
कहहिं झूठि फुरि बात बनाई। ते प्रिय तुम्हहि करुइ मैं माई।।<br />
हमहुँ कहबि अब ठकुरसोहाती। नाहिं त मौन रहब दिनु राती।।<br />
करि कुरूप बिधि परबस कीन्हा। बवा सो लुनिअ लहिअ जो दीन्हा।।<br />
कोउ नृप होउ हमहि का हानी। चेरि छाड़ि अब होब कि रानी।।<br />
जारै जोगु सुभाउ हमारा। अनभल देखि न जाइ तुम्हारा।।<br />
तातें कछुक बात अनुसारी। छमिअ देबि बड़ि चूक हमारी।।<br />
दो0-गूढ़ कपट प्रिय बचन सुनि तीय अधरबुधि रानि।<br />
   सुरमाया बस बैरिनिहि सुह्द जानि पतिआनि।।16।।<br />
 --*--*--<br />
सादर पुनि पुनि पूँछति ओही। सबरी गान मृगी जनु मोही।।<br />
तसि मति फिरी अहइ जसि भाबी। रहसी चेरि घात जनु फाबी।।<br />
तुम्ह पूँछहु मैं कहत डेराऊँ। धरेउ मोर घरफोरी नाऊँ।।<br />
सजि प्रतीति बहुबिधि गढ़ि छोली। अवध साढ़साती तब बोली।।<br />
प्रिय सिय रामु कहा तुम्ह रानी। रामहि तुम्ह प्रिय सो फुरि बानी।।<br />
रहा प्रथम अब ते दिन बीते। समउ फिरें रिपु होहिं पिंरीते।।<br />
भानु कमल कुल पोषनिहारा। बिनु जल जारि करइ सोइ छारा।।<br />
जरि तुम्हारि चह सवति उखारी। रूँधहु करि उपाउ बर बारी।।<br />
दो0-तुम्हहि न सोचु सोहाग बल निज बस जानहु राउ।<br />
    मन मलीन मुह मीठ नृप राउर सरल सुभाउ।।17।।<br />
 --*--*--<br />
चतुर गँभीर राम महतारी। बीचु पाइ निज बात सँवारी।।<br />
पठए भरतु भूप ननिअउरें। राम मातु मत जानव रउरें।।<br />
सेवहिं सकल सवति मोहि नीकें। गरबित भरत मातु बल पी कें।।<br />
सालु तुम्हार कौसिलहि माई। कपट चतुर नहिं होइ जनाई।।<br />
राजहि तुम्ह पर प्रेमु बिसेषी। सवति सुभाउ सकइ नहिं देखी।।<br />
रची प्रंपचु भूपहि अपनाई। राम तिलक हित लगन धराई।।<br />
यह कुल उचित राम कहुँ टीका। सबहि सोहाइ मोहि सुठि नीका।।<br />
आगिलि बात समुझि डरु मोही। देउ दैउ फिरि सो फलु ओही।।<br />
दो0-रचि पचि कोटिक कुटिलपन कीन्हेसि कपट प्रबोधु।।<br />
   कहिसि कथा सत सवति कै जेहि बिधि बाढ़ बिरोधु।।18।।<br />
 --*--*--<br />
भावी बस प्रतीति उर आई। पूँछ रानि पुनि सपथ देवाई।।<br />
का पूछहुँ तुम्ह अबहुँ न जाना। निज हित अनहित पसु पहिचाना।।<br />
भयउ पाखु दिन सजत समाजू। तुम्ह पाई सुधि मोहि सन आजू।।<br />
खाइअ पहिरिअ राज तुम्हारें। सत्य कहें नहिं दोषु हमारें।।<br />
जौं असत्य कछु कहब बनाई। तौ बिधि देइहि हमहि सजाई।।<br />
रामहि तिलक कालि जौं भयऊ।þ तुम्ह कहुँ बिपति बीजु बिधि बयऊ।।<br />
रेख खँचाइ कहउँ बलु भाषी। भामिनि भइहु दूध कइ माखी।।<br />
जौं सुत सहित करहु सेवकाई। तौ घर रहहु न आन उपाई।।<br />
दो0-कद्रूँ बिनतहि दीन्ह दुखु तुम्हहि कौसिलाँ देब।<br />
    भरतु बंदिगृह सेइहहिं लखनु राम के नेब।।19।।<br />
 --*--*--<br />
कैकयसुता सुनत कटु बानी। कहि न सकइ कछु सहमि सुखानी।।<br />
तन पसेउ कदली जिमि काँपी। कुबरीं दसन जीभ तब चाँपी।।<br />
कहि कहि कोटिक कपट कहानी। धीरजु धरहु प्रबोधिसि रानी।।<br />
फिरा करमु प्रिय लागि कुचाली। बकिहि सराहइ मानि मराली।।<br />
सुनु मंथरा बात फुरि तोरी। दहिनि आँखि नित फरकइ मोरी।।<br />
दिन प्रति देखउँ राति कुसपने। कहउँ न तोहि मोह बस अपने।।<br />
काह करौ सखि सूध सुभाऊ। दाहिन बाम न जानउँ काऊ।।<br />
दो0-अपने चलत न आजु लगि अनभल काहुक कीन्ह।<br />
    केहिं अघ एकहि बार मोहि दैअँ दुसह दुखु दीन्ह।।20।।<br />
 --*--*--<br />
नैहर जनमु भरब बरु जाइ। जिअत न करबि सवति सेवकाई।।<br />
अरि बस दैउ जिआवत जाही। मरनु नीक तेहि जीवन चाही।।<br />
दीन बचन कह बहुबिधि रानी। सुनि कुबरीं तियमाया ठानी।।<br />
अस कस कहहु मानि मन ऊना। सुखु सोहागु तुम्ह कहुँ दिन दूना।।<br />
जेहिं राउर अति अनभल ताका। सोइ पाइहि यहु फलु परिपाका।।<br />
जब तें कुमत सुना मैं स्वामिनि। भूख न बासर नींद न जामिनि।।<br />
पूँछेउ गुनिन्ह रेख तिन्ह खाँची। भरत भुआल होहिं यह साँची।।<br />
भामिनि करहु त कहौं उपाऊ। है तुम्हरीं सेवा बस राऊ।।<br />
दो0-परउँ कूप तुअ बचन पर सकउँ पूत पति त्यागि।<br />
   कहसि मोर दुखु देखि बड़ कस न करब हित लागि।।21।।<br />
 --*--*--<br />
कुबरीं करि कबुली कैकेई। कपट छुरी उर पाहन टेई।।<br />
लखइ न रानि निकट दुखु कैंसे। चरइ हरित तिन बलिपसु जैसें।।<br />
सुनत बात मृदु अंत कठोरी। देति मनहुँ मधु माहुर घोरी।।<br />
कहइ चेरि सुधि अहइ कि नाही। स्वामिनि कहिहु कथा मोहि पाहीं।।<br />
दुइ बरदान भूप सन थाती। मागहु आजु जुड़ावहु छाती।।<br />
सुतहि राजु रामहि बनवासू। देहु लेहु सब सवति हुलासु।।<br />
भूपति राम सपथ जब करई। तब मागेहु जेहिं बचनु न टरई।।<br />
होइ अकाजु आजु निसि बीतें। बचनु मोर प्रिय मानेहु जी तें।।<br />
दो0-बड़ कुघातु करि पातकिनि कहेसि कोपगृहँ जाहु।<br />
   काजु सँवारेहु सजग सबु सहसा जनि पतिआहु।।22।।<br />
 --*--*--<br />
कुबरिहि रानि प्रानप्रिय जानी। बार बार बड़ि बुद्धि बखानी।।<br />
तोहि सम हित न मोर संसारा। बहे जात कइ भइसि अधारा।।<br />
जौं बिधि पुरब मनोरथु काली। करौं तोहि चख पूतरि आली।।<br />
बहुबिधि चेरिहि आदरु देई। कोपभवन गवनि कैकेई।।<br />
बिपति बीजु बरषा रितु चेरी। भुइँ भइ कुमति कैकेई केरी।।<br />
पाइ कपट जलु अंकुर जामा। बर दोउ दल दुख फल परिनामा।।<br />
कोप समाजु साजि सबु सोई। राजु करत निज कुमति बिगोई।।<br />
राउर नगर कोलाहलु होई। यह कुचालि कछु जान न कोई।।<br />
दो0-प्रमुदित पुर नर नारि। सब सजहिं सुमंगलचार।<br />
   एक प्रबिसहिं एक निर्गमहिं भीर भूप दरबार।।23।।<br />
 --*--*--<br />
बाल सखा सुन हियँ हरषाहीं। मिलि दस पाँच राम पहिं जाहीं।।<br />
प्रभु आदरहिं प्रेमु पहिचानी। पूँछहिं कुसल खेम मृदु बानी।।<br />
फिरहिं भवन प्रिय आयसु पाई। करत परसपर राम बड़ाई।।<br />
को रघुबीर सरिस संसारा। सीलु सनेह निबाहनिहारा।<br />
जेंहि जेंहि जोनि करम बस भ्रमहीं। तहँ तहँ ईसु देउ यह हमहीं।।<br />
सेवक हम स्वामी सियनाहू। होउ नात यह ओर निबाहू।।<br />
अस अभिलाषु नगर सब काहू। कैकयसुता ह्दयँ अति दाहू।।<br />
को न कुसंगति पाइ नसाई। रहइ न नीच मतें चतुराई।।<br />
दो0-साँस समय सानंद नृपु गयउ कैकेई गेहँ।<br />
   गवनु निठुरता निकट किय जनु धरि देह सनेहँ।।24।।<br />
 --*--*--<br />
कोपभवन सुनि सकुचेउ राउ। भय बस अगहुड़ परइ न पाऊ।।<br />
सुरपति बसइ बाहँबल जाके। नरपति सकल रहहिं रुख ताकें।।<br />
सो सुनि तिय रिस गयउ सुखाई। देखहु काम प्रताप बड़ाई।।<br />
सूल कुलिस असि अँगवनिहारे। ते रतिनाथ सुमन सर मारे।।<br />
सभय नरेसु प्रिया पहिं गयऊ। देखि दसा दुखु दारुन भयऊ।।<br />
भूमि सयन पटु मोट पुराना। दिए डारि तन भूषण नाना।।<br />
कुमतिहि कसि कुबेषता फाबी। अन अहिवातु सूच जनु भाबी।।<br />
जाइ निकट नृपु कह मृदु बानी। प्रानप्रिया केहि हेतु रिसानी।।<br />
छं0-केहि हेतु रानि रिसानि परसत पानि पतिहि नेवारई।<br />
   मानहुँ सरोष भुअंग भामिनि बिषम भाँति निहारई।।<br />
   दोउ बासना रसना दसन बर मरम ठाहरु देखई।<br />
   तुलसी नृपति भवतब्यता बस काम कौतुक लेखई।।<br />
सो0-बार बार कह राउ सुमुखि सुलोचिनि पिकबचनि।<br />
   कारन मोहि सुनाउ गजगामिनि निज कोप कर।।25।।<br />
अनहित तोर प्रिया केइँ कीन्हा। केहि दुइ सिर केहि जमु चह लीन्हा।।<br />
कहु केहि रंकहि करौ नरेसू। कहु केहि नृपहि निकासौं देसू।।<br />
सकउँ तोर अरि अमरउ मारी। काह कीट बपुरे नर नारी।।<br />
जानसि मोर सुभाउ बरोरू। मनु तव आनन चंद चकोरू।।<br />
प्रिया प्रान सुत सरबसु मोरें। परिजन प्रजा सकल बस तोरें।।<br />
जौं कछु कहौ कपटु करि तोही। भामिनि राम सपथ सत मोही।।<br />
बिहसि मागु मनभावति बाता। भूषन सजहि मनोहर गाता।।<br />
घरी कुघरी समुझि जियँ देखू। बेगि प्रिया परिहरहि कुबेषू।।<br />
दो0-यह सुनि मन गुनि सपथ बड़ि बिहसि उठी मतिमंद।<br />
   भूषन सजति बिलोकि मृगु मनहुँ किरातिनि फंद।।26।।<br />
 --*--*--<br />
पुनि कह राउ सुह्रद जियँ जानी। प्रेम पुलकि मृदु मंजुल बानी।।<br />
भामिनि भयउ तोर मनभावा। घर घर नगर अनंद बधावा।।<br />
रामहि देउँ कालि जुबराजू। सजहि सुलोचनि मंगल साजू।।<br />
दलकि उठेउ सुनि ह्रदउ कठोरू। जनु छुइ गयउ पाक बरतोरू।।<br />
ऐसिउ पीर बिहसि तेहि गोई। चोर नारि जिमि प्रगटि न रोई।।<br />
लखहिं न भूप कपट चतुराई। कोटि कुटिल मनि गुरू पढ़ाई।।<br />
जद्यपि नीति निपुन नरनाहू। नारिचरित जलनिधि अवगाहू।।<br />
कपट सनेहु बढ़ाइ बहोरी। बोली बिहसि नयन मुहु मोरी।।<br />
दो0-मागु मागु पै कहहु पिय कबहुँ न देहु न लेहु।<br />
   देन कहेहु बरदान दुइ तेउ पावत संदेहु।।27।।<br />
 --*--*--<br />
जानेउँ मरमु राउ हँसि कहई। तुम्हहि कोहाब परम प्रिय अहई।।<br />
थाति राखि न मागिहु काऊ। बिसरि गयउ मोहि भोर सुभाऊ।।<br />
झूठेहुँ हमहि दोषु जनि देहू। दुइ कै चारि मागि मकु लेहू।।<br />
रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई।।<br />
नहिं असत्य सम पातक पुंजा। गिरि सम होहिं कि कोटिक गुंजा।।<br />
सत्यमूल सब सुकृत सुहाए। बेद पुरान बिदित मनु गाए।।<br />
तेहि पर राम सपथ करि आई। सुकृत सनेह अवधि रघुराई।।<br />
बात दृढ़ाइ कुमति हँसि बोली। कुमत कुबिहग कुलह जनु खोली।।<br />
दो0-भूप मनोरथ सुभग बनु सुख सुबिहंग समाजु।<br />
   भिल्लनि जिमि छाड़न चहति बचनु भयंकरु बाजु।।28।।<br />
            मासपारायण, तेरहवाँ विश्राम<br />
 --*--*--<br />
सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का। देहु एक बर भरतहि टीका।।<br />
मागउँ दूसर बर कर जोरी। पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी।।<br />
तापस बेष बिसेषि उदासी। चौदह बरिस रामु बनबासी।।<br />
सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू। ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू।।<br />
गयउ सहमि नहिं कछु कहि आवा। जनु सचान बन झपटेउ लावा।।<br />
बिबरन भयउ निपट नरपालू। दामिनि हनेउ मनहुँ तरु तालू।।<br />
माथे हाथ मूदि दोउ लोचन। तनु धरि सोचु लाग जनु सोचन।।<br />
मोर मनोरथु सुरतरु फूला। फरत करिनि जिमि हतेउ समूला।।<br />
अवध उजारि कीन्हि कैकेईं। दीन्हसि अचल बिपति कै नेईं।।<br />
दो0-कवनें अवसर का भयउ गयउँ नारि बिस्वास।<br />
   जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अबिद्या नास।।29।।<br />
 --*--*--<br />
एहि बिधि राउ मनहिं मन झाँखा। देखि कुभाँति कुमति मन माखा।।<br />
भरतु कि राउर पूत न होहीं। आनेहु मोल बेसाहि कि मोही।।<br />
जो सुनि सरु अस लाग तुम्हारें। काहे न बोलहु बचनु सँभारे।।<br />
देहु उतरु अनु करहु कि नाहीं। सत्यसंध तुम्ह रघुकुल माहीं।।<br />
देन कहेहु अब जनि बरु देहू। तजहुँ सत्य जग अपजसु लेहू।।<br />
सत्य सराहि कहेहु बरु देना। जानेहु लेइहि मागि चबेना।।<br />
सिबि दधीचि बलि जो कछु भाषा। तनु धनु तजेउ बचन पनु राखा।।<br />
अति कटु बचन कहति कैकेई। मानहुँ लोन जरे पर देई।।<br />
दो0-धरम धुरंधर धीर धरि नयन उघारे रायँ।<br />
   सिरु धुनि लीन्हि उसास असि मारेसि मोहि कुठायँ।।30।।<br />
 --*--*--<br />
आगें दीखि जरत रिस भारी। मनहुँ रोष तरवारि उघारी।।<br />
मूठि कुबुद्धि धार निठुराई। धरी कूबरीं सान बनाई।।<br />
लखी महीप कराल कठोरा। सत्य कि जीवनु लेइहि मोरा।।<br />
बोले राउ कठिन करि छाती। बानी सबिनय तासु सोहाती।।<br />
प्रिया बचन कस कहसि कुभाँती। भीर प्रतीति प्रीति करि हाँती।।<br />
मोरें भरतु रामु दुइ आँखी। सत्य कहउँ करि संकरू साखी।।<br />
अवसि दूतु मैं पठइब प्राता। ऐहहिं बेगि सुनत दोउ भ्राता।।<br />
सुदिन सोधि सबु साजु सजाई। देउँ भरत कहुँ राजु बजाई।।<br />
दो0- लोभु न रामहि राजु कर बहुत भरत पर प्रीति।<br />
   मैं बड़ छोट बिचारि जियँ करत रहेउँ नृपनीति।।31।।<br />
 --*--*--<br />
राम सपथ सत कहुउँ सुभाऊ। राममातु कछु कहेउ न काऊ।।<br />
मैं सबु कीन्ह तोहि बिनु पूँछें। तेहि तें परेउ मनोरथु छूछें।।<br />
रिस परिहरू अब मंगल साजू। कछु दिन गएँ भरत जुबराजू।।<br />
एकहि बात मोहि दुखु लागा। बर दूसर असमंजस मागा।।<br />
अजहुँ हृदय जरत तेहि आँचा। रिस परिहास कि साँचेहुँ साँचा।।<br />
कहु तजि रोषु राम अपराधू। सबु कोउ कहइ रामु सुठि साधू।।<br />
तुहूँ सराहसि करसि सनेहू। अब सुनि मोहि भयउ संदेहू।।<br />
जासु सुभाउ अरिहि अनुकूला। सो किमि करिहि मातु प्रतिकूला।।<br />
दो0- प्रिया हास रिस परिहरहि मागु बिचारि बिबेकु।<br />
    जेहिं देखाँ अब नयन भरि भरत राज अभिषेकु।।32।।<br />
 --*--*--<br />
जिऐ मीन बरू बारि बिहीना। मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना।।<br />
कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं। जीवनु मोर राम बिनु नाहीं।।<br />
समुझि देखु जियँ प्रिया प्रबीना। जीवनु राम दरस आधीना।।<br />
सुनि म्रदु बचन कुमति अति जरई। मनहुँ अनल आहुति घृत परई।।<br />
कहइ करहु किन कोटि उपाया। इहाँ न लागिहि राउरि माया।।<br />
देहु कि लेहु अजसु करि नाहीं। मोहि न बहुत प्रपंच सोहाहीं।<br />
रामु साधु तुम्ह साधु सयाने। राममातु भलि सब पहिचाने।।<br />
जस कौसिलाँ मोर भल ताका। तस फलु उन्हहि देउँ करि साका।।<br />
दो0-होत प्रात मुनिबेष धरि जौं न रामु बन जाहिं।<br />
   मोर मरनु राउर अजस नृप समुझिअ मन माहिं।।33।।<br />
 --*--*--<br />
अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी।।<br />
पाप पहार प्रगट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई।।<br />
दोउ बर कूल कठिन हठ धारा। भवँर कूबरी बचन प्रचारा।।<br />
ढाहत भूपरूप तरु मूला। चली बिपति बारिधि अनुकूला।।<br />
लखी नरेस बात फुरि साँची। तिय मिस मीचु सीस पर नाची।।<br />
गहि पद बिनय कीन्ह बैठारी। जनि दिनकर कुल होसि कुठारी।।<br />
मागु माथ अबहीं देउँ तोही। राम बिरहँ जनि मारसि मोही।।<br />
राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती। नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती।।<br />
दो0-देखी ब्याधि असाध नृपु परेउ धरनि धुनि माथ।<br />
   कहत परम आरत बचन राम राम रघुनाथ।।34।।<br />
 --*--*--<br />
ब्याकुल राउ सिथिल सब गाता। करिनि कलपतरु मनहुँ निपाता।।<br />
कंठु सूख मुख आव न बानी। जनु पाठीनु दीन बिनु पानी।।<br />
पुनि कह कटु कठोर कैकेई। मनहुँ घाय महुँ माहुर देई।।<br />
जौं अंतहुँ अस करतबु रहेऊ। मागु मागु तुम्ह केहिं बल कहेऊ।।<br />
दुइ कि होइ एक समय भुआला। हँसब ठठाइ फुलाउब गाला।।<br />
दानि कहाउब अरु कृपनाई। होइ कि खेम कुसल रौताई।।<br />
छाड़हु बचनु कि धीरजु धरहू। जनि अबला जिमि करुना करहू।।<br />
तनु तिय तनय धामु धनु धरनी। सत्यसंध कहुँ तृन सम बरनी।।<br />
दो0-मरम बचन सुनि राउ कह कहु कछु दोषु न तोर।<br />
   लागेउ तोहि पिसाच जिमि कालु कहावत मोर।।35।।û<br />
 --*--*--<br />
चहत न भरत भूपतहि भोरें। बिधि बस कुमति बसी जिय तोरें।।<br />
सो सबु मोर पाप परिनामू। भयउ कुठाहर जेहिं बिधि बामू।।<br />
सुबस बसिहि फिरि अवध सुहाई। सब गुन धाम राम प्रभुताई।।<br />
करिहहिं भाइ सकल सेवकाई। होइहि तिहुँ पुर राम बड़ाई।।<br />
तोर कलंकु मोर पछिताऊ। मुएहुँ न मिटहि न जाइहि काऊ।।<br />
अब तोहि नीक लाग करु सोई। लोचन ओट बैठु मुहु गोई।।<br />
जब लगि जिऔं कहउँ कर जोरी। तब लगि जनि कछु कहसि बहोरी।।<br />
फिरि पछितैहसि अंत अभागी। मारसि गाइ नहारु लागी।।<br />
दो0-परेउ राउ कहि कोटि बिधि काहे करसि निदानु।<br />
   कपट सयानि न कहति कछु जागति मनहुँ मसानु।।36।।<br />
 --*--*--<br />
राम राम रट बिकल भुआलू। जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू।।<br />
हृदयँ मनाव भोरु जनि होई। रामहि जाइ कहै जनि कोई।।<br />
उदउ करहु जनि रबि रघुकुल गुर। अवध बिलोकि सूल होइहि उर।।<br />
भूप प्रीति कैकइ कठिनाई। उभय अवधि बिधि रची बनाई।।<br />
बिलपत नृपहि भयउ भिनुसारा। बीना बेनु संख धुनि द्वारा।।<br />
पढ़हिं भाट गुन गावहिं गायक। सुनत नृपहि जनु लागहिं सायक।।<br />
मंगल सकल सोहाहिं न कैसें। सहगामिनिहि बिभूषन जैसें।।<br />
तेहिं निसि नीद परी नहि काहू। राम दरस लालसा उछाहू।।<br />
दो0-द्वार भीर सेवक सचिव कहहिं उदित रबि देखि।<br />
   जागेउ अजहुँ न अवधपति कारनु कवनु बिसेषि।।37।।<br />
 --*--*--<br />
पछिले पहर भूपु नित जागा। आजु हमहि बड़ अचरजु लागा।।<br />
जाहु सुमंत्र जगावहु जाई। कीजिअ काजु रजायसु पाई।।<br />
गए सुमंत्रु तब राउर माही। देखि भयावन जात डेराहीं।।<br />
धाइ खाइ जनु जाइ न हेरा। मानहुँ बिपति बिषाद बसेरा।।<br />
पूछें कोउ न ऊतरु देई। गए जेंहिं भवन भूप कैकैई।।<br />
कहि जयजीव बैठ सिरु नाई। दैखि भूप गति गयउ सुखाई।।<br />
सोच बिकल बिबरन महि परेऊ। मानहुँ कमल मूलु परिहरेऊ।।<br />
सचिउ सभीत सकइ नहिं पूँछी। बोली असुभ भरी सुभ छूछी।।<br />
दो0-परी न राजहि नीद निसि हेतु जान जगदीसु।<br />
    रामु रामु रटि भोरु किय कहइ न मरमु महीसु।।38।।<br />
 --*--*--<br />
आनहु रामहि बेगि बोलाई। समाचार तब पूँछेहु आई।।<br />
चलेउ सुमंत्र राय रूख जानी। लखी कुचालि कीन्हि कछु रानी।।<br />
सोच बिकल मग परइ न पाऊ। रामहि बोलि कहिहि का राऊ।।<br />
उर धरि धीरजु गयउ दुआरें। पूछँहिं सकल देखि मनु मारें।।<br />
समाधानु करि सो सबही का। गयउ जहाँ दिनकर कुल टीका।।<br />
रामु सुमंत्रहि आवत देखा। आदरु कीन्ह पिता सम लेखा।।<br />
निरखि बदनु कहि भूप रजाई। रघुकुलदीपहि चलेउ लेवाई।।<br />
रामु कुभाँति सचिव सँग जाहीं। देखि लोग जहँ तहँ बिलखाहीं।।<br />
दो0-जाइ दीख रघुबंसमनि नरपति निपट कुसाजु।।<br />
    सहमि परेउ लखि सिंघिनिहि मनहुँ बृद्ध गजराजु।।39।।<br />
 --*--*--<br />
सूखहिं अधर जरइ सबु अंगू। मनहुँ दीन मनिहीन भुअंगू।।<br />
सरुष समीप दीखि कैकेई। मानहुँ मीचु घरी गनि लेई।।<br />
करुनामय मृदु राम सुभाऊ। प्रथम दीख दुखु सुना न काऊ।।<br />
तदपि धीर धरि समउ बिचारी। पूँछी मधुर बचन महतारी।।<br />
मोहि कहु मातु तात दुख कारन। करिअ जतन जेहिं होइ निवारन।।<br />
सुनहु राम सबु कारन एहू। राजहि तुम पर बहुत सनेहू।।<br />
देन कहेन्हि मोहि दुइ बरदाना। मागेउँ जो कछु मोहि सोहाना।<br />
सो सुनि भयउ भूप उर सोचू। छाड़ि न सकहिं तुम्हार सँकोचू।।<br />
दो0-सुत सनेह इत बचनु उत संकट परेउ नरेसु।<br />
    सकहु न आयसु धरहु सिर मेटहु कठिन कलेसु।।40।।<br />
 --*--*--<br />
निधरक बैठि कहइ कटु बानी। सुनत कठिनता अति अकुलानी।।<br />
जीभ कमान बचन सर नाना। मनहुँ महिप मृदु लच्छ समाना।।<br />
जनु कठोरपनु धरें सरीरू। सिखइ धनुषबिद्या बर बीरू।।<br />
सब प्रसंगु रघुपतिहि सुनाई। बैठि मनहुँ तनु धरि निठुराई।।<br />
मन मुसकाइ भानुकुल भानु। रामु सहज आनंद निधानू।।<br />
बोले बचन बिगत सब दूषन। मृदु मंजुल जनु बाग बिभूषन।।<br />
सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी। जो पितु मातु बचन अनुरागी।।<br />
तनय मातु पितु तोषनिहारा। दुर्लभ जननि सकल संसारा।।<br />
दो0-मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति हित मोर।<br />
    तेहि महँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर।।41।।<br />
 --*--*--<br />
भरत प्रानप्रिय पावहिं राजू। बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजु।<br />
जों न जाउँ बन ऐसेहु काजा। प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा।।<br />
सेवहिं अरँडु कलपतरु त्यागी। परिहरि अमृत लेहिं बिषु मागी।।<br />
तेउ न पाइ अस समउ चुकाहीं। देखु बिचारि मातु मन माहीं।।<br />
अंब एक दुखु मोहि बिसेषी। निपट बिकल नरनायकु देखी।।<br />
थोरिहिं बात पितहि दुख भारी। होति प्रतीति न मोहि महतारी।।<br />
राउ धीर गुन उदधि अगाधू। भा मोहि ते कछु बड़ अपराधू।।<br />
जातें मोहि न कहत कछु राऊ। मोरि सपथ तोहि कहु सतिभाऊ।।<br />
दो0-सहज सरल रघुबर बचन कुमति कुटिल करि जान।<br />
   चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान।।42।।<br />
 --*--*--<br />
रहसी रानि राम रुख पाई। बोली कपट सनेहु जनाई।।<br />
सपथ तुम्हार भरत कै आना। हेतु न दूसर मै कछु जाना।।<br />
तुम्ह अपराध जोगु नहिं ताता। जननी जनक बंधु सुखदाता।।<br />
राम सत्य सबु जो कछु कहहू। तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू।।<br />
पितहि बुझाइ कहहु बलि सोई। चौथेंपन जेहिं अजसु न होई।।<br />
तुम्ह सम सुअन सुकृत जेहिं दीन्हे। उचित न तासु निरादरु कीन्हे।।<br />
लागहिं कुमुख बचन सुभ कैसे। मगहँ गयादिक तीरथ जैसे।।<br />
रामहि मातु बचन सब भाए। जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए।।<br />
दो0-गइ मुरुछा रामहि सुमिरि नृप फिरि करवट लीन्ह।<br />
   सचिव राम आगमन कहि बिनय समय सम कीन्ह।।43।।<br />
 --*--*--<br />
अवनिप अकनि रामु पगु धारे। धरि धीरजु तब नयन उघारे।।<br />
सचिवँ सँभारि राउ बैठारे। चरन परत नृप रामु निहारे।।<br />
लिए सनेह बिकल उर लाई। गै मनि मनहुँ फनिक फिरि पाई।।<br />
रामहि चितइ रहेउ नरनाहू। चला बिलोचन बारि प्रबाहू।।<br />
सोक बिबस कछु कहै न पारा। हृदयँ लगावत बारहिं बारा।।<br />
बिधिहि मनाव राउ मन माहीं। जेहिं रघुनाथ न कानन जाहीं।।<br />
सुमिरि महेसहि कहइ निहोरी। बिनती सुनहु सदासिव मोरी।।<br />
आसुतोष तुम्ह अवढर दानी। आरति हरहु दीन जनु जानी।।<br />
दो0-तुम्ह प्रेरक सब के हृदयँ सो मति रामहि देहु।<br />
   बचनु मोर तजि रहहि घर परिहरि सीलु सनेहु।।44।।<br />
 --*--*--<br />
अजसु होउ जग सुजसु नसाऊ। नरक परौ बरु सुरपुरु जाऊ।।<br />
सब दुख दुसह सहावहु मोही। लोचन ओट रामु जनि होंही।।<br />
अस मन गुनइ राउ नहिं बोला। पीपर पात सरिस मनु डोला।।<br />
रघुपति पितहि प्रेमबस जानी। पुनि कछु कहिहि मातु अनुमानी।।<br />
देस काल अवसर अनुसारी। बोले बचन बिनीत बिचारी।।<br />
तात कहउँ कछु करउँ ढिठाई। अनुचितु छमब जानि लरिकाई।।<br />
अति लघु बात लागि दुखु पावा। काहुँ न मोहि कहि प्रथम जनावा।।<br />
देखि गोसाइँहि पूँछिउँ माता। सुनि प्रसंगु भए सीतल गाता।।<br />
दो0-मंगल समय सनेह बस सोच परिहरिअ तात।<br />
   आयसु देइअ हरषि हियँ कहि पुलके प्रभु गात।।45।।<br />
 --*--*--<br />
धन्य जनमु जगतीतल तासू। पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू।।<br />
चारि पदारथ करतल ताकें। प्रिय पितु मातु प्रान सम जाकें।।<br />
आयसु पालि जनम फलु पाई। ऐहउँ बेगिहिं होउ रजाई।।<br />
बिदा मातु सन आवउँ मागी। चलिहउँ बनहि बहुरि पग लागी।।<br />
अस कहि राम गवनु तब कीन्हा। भूप सोक बसु उतरु न दीन्हा।।<br />
नगर ब्यापि गइ बात सुतीछी। छुअत चढ़ी जनु सब तन बीछी।।<br />
सुनि भए बिकल सकल नर नारी। बेलि बिटप जिमि देखि दवारी।।<br />
जो जहँ सुनइ धुनइ सिरु सोई। बड़ बिषादु नहिं धीरजु होई।।<br />
दो0-मुख सुखाहिं लोचन स्त्रवहि सोकु न हृदयँ समाइ।<br />
   मनहुँ ०करुन रस कटकई उतरी अवध बजाइ।।46।।<br />
 --*--*--<br />
मिलेहि माझ बिधि बात बेगारी। जहँ तहँ देहिं कैकेइहि गारी।।<br />
एहि पापिनिहि बूझि का परेऊ। छाइ भवन पर पावकु धरेऊ।।<br />
निज कर नयन काढ़ि चह दीखा। डारि सुधा बिषु चाहत चीखा।।<br />
कुटिल कठोर कुबुद्धि अभागी। भइ रघुबंस बेनु बन आगी।।<br />
पालव बैठि पेड़ु एहिं काटा। सुख महुँ सोक ठाटु धरि ठाटा।।<br />
सदा रामु एहि प्रान समाना। कारन कवन कुटिलपनु ठाना।।<br />
सत्य कहहिं कबि नारि सुभाऊ। सब बिधि अगहु अगाध दुराऊ।।<br />
निज प्रतिबिंबु बरुकु गहि जाई। जानि न जाइ नारि गति भाई।।<br />
दो0-काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ।<br />
   का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ।।47।।<br />
 --*--*--<br />
का सुनाइ बिधि काह सुनावा। का देखाइ चह काह देखावा।।<br />
एक कहहिं भल भूप न कीन्हा। बरु बिचारि नहिं कुमतिहि दीन्हा।।<br />
जो हठि भयउ सकल दुख भाजनु। अबला बिबस ग्यानु गुनु गा जनु।।<br />
एक धरम परमिति पहिचाने। नृपहि दोसु नहिं देहिं सयाने।।<br />
सिबि दधीचि हरिचंद कहानी। एक एक सन कहहिं बखानी।।<br />
एक भरत कर संमत कहहीं। एक उदास भायँ सुनि रहहीं।।<br />
कान मूदि कर रद गहि जीहा। एक कहहिं यह बात अलीहा।।<br />
सुकृत जाहिं अस कहत तुम्हारे। रामु भरत कहुँ प्रानपिआरे।।<br />
दो0-चंदु चवै बरु अनल कन सुधा होइ बिषतूल।<br />
   सपनेहुँ कबहुँ न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल।।48।।<br />
 --*--*--<br />
एक बिधातहिं दूषनु देंहीं। सुधा देखाइ दीन्ह बिषु जेहीं।।<br />
खरभरु नगर सोचु सब काहू। दुसह दाहु उर मिटा उछाहू।।<br />
बिप्रबधू कुलमान्य जठेरी। जे प्रिय परम कैकेई केरी।।<br />
लगीं देन सिख सीलु सराही। बचन बानसम लागहिं ताही।।<br />
भरतु न मोहि प्रिय राम समाना। सदा कहहु यहु सबु जगु जाना।।<br />
करहु राम पर सहज सनेहू। केहिं अपराध आजु बनु देहू।।<br />
कबहुँ न कियहु सवति आरेसू। प्रीति प्रतीति जान सबु देसू।।<br />
कौसल्याँ अब काह बिगारा। तुम्ह जेहि लागि बज्र पुर पारा।।<br />
दो0-सीय कि पिय सँगु परिहरिहि लखनु कि रहिहहिं धाम।<br />
   राजु कि भूँजब भरत पुर नृपु कि जिइहि बिनु राम।।49।।<br />
 --*--*--<br />
अस बिचारि उर छाड़हु कोहू। सोक कलंक कोठि जनि होहू।।<br />
भरतहि अवसि देहु जुबराजू। कानन काह राम कर काजू।।<br />
नाहिन रामु राज के भूखे। धरम धुरीन बिषय रस रूखे।।<br />
गुर गृह बसहुँ रामु तजि गेहू। नृप सन अस बरु दूसर लेहू।।<br />
जौं नहिं लगिहहु कहें हमारे। नहिं लागिहि कछु हाथ तुम्हारे।।<br />
जौं परिहास कीन्हि कछु होई। तौ कहि प्रगट जनावहु सोई।।<br />
राम सरिस सुत कानन जोगू। काह कहिहि सुनि तुम्ह कहुँ लोगू।।<br />
उठहु बेगि सोइ करहु उपाई। जेहि बिधि सोकु कलंकु नसाई।।<br />
छं0-जेहि भाँति सोकु कलंकु जाइ उपाय करि कुल पालही।<br />
   हठि फेरु रामहि जात बन जनि बात दूसरि चालही।।<br />
   जिमि भानु बिनु दिनु प्रान बिनु तनु चंद बिनु जिमि जामिनी।<br />
   तिमि अवध तुलसीदास प्रभु बिनु समुझि धौं जियँ भामिनी।।<br />
सो0-सखिन्ह सिखावनु दीन्ह सुनत मधुर परिनाम हित।<br />
    तेइँ कछु कान न कीन्ह कुटिल प्रबोधी कूबरी।।50।।<br />
उतरु न देइ दुसह रिस रूखी। मृगिन्ह चितव जनु बाघिनि भूखी।।<br />
ब्याधि असाधि जानि तिन्ह त्यागी। चलीं कहत मतिमंद अभागी।।<br />
राजु करत यह दैअँ बिगोई। कीन्हेसि अस जस करइ न कोई।।<br />
एहि बिधि बिलपहिं पुर नर नारीं। देहिं कुचालिहि कोटिक गारीं।।<br />
जरहिं बिषम जर लेहिं उसासा। कवनि राम बिनु जीवन आसा।।<br />
बिपुल बियोग प्रजा अकुलानी। जनु जलचर गन सूखत पानी।।<br />
अति बिषाद बस लोग लोगाई। गए मातु पहिं रामु गोसाई।।<br />
मुख प्रसन्न चित चौगुन चाऊ। मिटा सोचु जनि राखै राऊ।।<br />
दो-नव गयंदु रघुबीर मनु राजु अलान समान।<br />
   छूट जानि बन गवनु सुनि उर अनंदु अधिकान।।51।।<br />
रघुकुलतिलक जोरि दोउ हाथा। मुदित मातु पद नायउ माथा।।<br />
दीन्हि असीस लाइ उर लीन्हे। भूषन बसन निछावरि कीन्हे।।<br />
बार बार मुख चुंबति माता। नयन नेह जलु पुलकित गाता।।<br />
गोद राखि पुनि हृदयँ लगाए। स्त्रवत प्रेनरस पयद सुहाए।।<br />
प्रेमु प्रमोदु न कछु कहि जाई। रंक धनद पदबी जनु पाई।।<br />
सादर सुंदर बदनु निहारी। बोली मधुर बचन महतारी।।<br />
कहहु तात जननी बलिहारी। कबहिं लगन मुद मंगलकारी।।<br />
सुकृत सील सुख सीवँ सुहाई। जनम लाभ कइ अवधि अघाई।।<br />
दो0- जेहि चाहत नर नारि सब अति आरत एहि भाँति।<br />
     जिमि चातक चातकि तृषित बृष्टि सरद रितु स्वाति।।52।।<br />
 --*--*--<br />
तात जाउँ बलि बेगि नहाहू। जो मन भाव मधुर कछु खाहू।।<br />
पितु समीप तब जाएहु भैआ। भइ बड़ि बार जाइ बलि मैआ।।<br />
मातु बचन सुनि अति अनुकूला। जनु सनेह सुरतरु के फूला।।<br />
सुख मकरंद भरे श्रियमूला। निरखि राम मनु भवरुँ न भूला।।<br />
धरम धुरीन धरम गति जानी। कहेउ मातु सन अति मृदु बानी।।<br />
पिताँ दीन्ह मोहि कानन राजू। जहँ सब भाँति मोर बड़ काजू।।<br />
आयसु देहि मुदित मन माता। जेहिं मुद मंगल कानन जाता।।<br />
जनि सनेह बस डरपसि भोरें। आनँदु अंब अनुग्रह तोरें।।<br />
दो0-बरष चारिदस बिपिन बसि करि पितु बचन प्रमान।<br />
    आइ पाय पुनि देखिहउँ मनु जनि करसि मलान।।53।।<br />
 --*--*--<br />
बचन बिनीत मधुर रघुबर के। सर सम लगे मातु उर करके।।<br />
सहमि सूखि सुनि सीतलि बानी। जिमि जवास परें पावस पानी।।<br />
कहि न जाइ कछु हृदय बिषादू। मनहुँ मृगी सुनि केहरि नादू।।<br />
नयन सजल तन थर थर काँपी। माजहि खाइ मीन जनु मापी।।<br />
धरि धीरजु सुत बदनु निहारी। गदगद बचन कहति महतारी।।<br />
तात पितहि तुम्ह प्रानपिआरे। देखि मुदित नित चरित तुम्हारे।।<br />
राजु देन कहुँ सुभ दिन साधा। कहेउ जान बन केहिं अपराधा।।<br />
तात सुनावहु मोहि निदानू। को दिनकर कुल भयउ कृसानू।।<br />
दो0-निरखि राम रुख सचिवसुत कारनु कहेउ बुझाइ।<br />
   सुनि प्रसंगु रहि मूक जिमि दसा बरनि नहिं जाइ।।54।।<br />
 --*--*--<br />
राखि न सकइ न कहि सक जाहू। दुहूँ भाँति उर दारुन दाहू।।<br />
लिखत सुधाकर गा लिखि राहू। बिधि गति बाम सदा सब काहू।।<br />
धरम सनेह उभयँ मति घेरी। भइ गति साँप छुछुंदरि केरी।।<br />
राखउँ सुतहि करउँ अनुरोधू। धरमु जाइ अरु बंधु बिरोधू।।<br />
कहउँ जान बन तौ बड़ि हानी। संकट सोच बिबस भइ रानी।।<br />
बहुरि समुझि तिय धरमु सयानी। रामु भरतु दोउ सुत सम जानी।।<br />
सरल सुभाउ राम महतारी। बोली बचन धीर धरि भारी।।<br />
तात जाउँ बलि कीन्हेहु नीका। पितु आयसु सब धरमक टीका।।<br />
दो0-राजु देन कहि दीन्ह बनु मोहि न सो दुख लेसु।<br />
    तुम्ह बिनु भरतहि भूपतिहि प्रजहि प्रचंड कलेसु।।55।।<br />
 --*--*--<br />
जौं केवल पितु आयसु ताता। तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता।।<br />
जौं पितु मातु कहेउ बन जाना। तौं कानन सत अवध समाना।।<br />
पितु बनदेव मातु बनदेवी। खग मृग चरन सरोरुह सेवी।।<br />
अंतहुँ उचित नृपहि बनबासू। बय बिलोकि हियँ होइ हराँसू।।<br />
बड़भागी बनु अवध अभागी। जो रघुबंसतिलक तुम्ह त्यागी।।<br />
जौं सुत कहौ संग मोहि लेहू। तुम्हरे हृदयँ होइ संदेहू।।<br />
पूत परम प्रिय तुम्ह सबही के। प्रान प्रान के जीवन जी के।।<br />
ते तुम्ह कहहु मातु बन जाऊँ। मैं सुनि बचन बैठि पछिताऊँ।।<br />
दो0-यह बिचारि नहिं करउँ हठ झूठ सनेहु बढ़ाइ।<br />
   मानि मातु कर नात बलि सुरति बिसरि जनि जाइ।।56।।<br />
 --*--*--<br />
देव पितर सब तुन्हहि गोसाई। राखहुँ पलक नयन की नाई।।<br />
अवधि अंबु प्रिय परिजन मीना। तुम्ह करुनाकर धरम धुरीना।।<br />
अस बिचारि सोइ करहु उपाई। सबहि जिअत जेहिं भेंटेहु आई।।<br />
जाहु सुखेन बनहि बलि जाऊँ। करि अनाथ जन परिजन गाऊँ।।<br />
सब कर आजु सुकृत फल बीता। भयउ कराल कालु बिपरीता।।<br />
बहुबिधि बिलपि चरन लपटानी। परम अभागिनि आपुहि जानी।।<br />
दारुन दुसह दाहु उर ब्यापा। बरनि न जाहिं बिलाप कलापा।।<br />
राम उठाइ मातु उर लाई। कहि मृदु बचन बहुरि समुझाई।।<br />
दो0-समाचार तेहि समय सुनि सीय उठी अकुलाइ।<br />
   जाइ सासु पद कमल जुग बंदि बैठि सिरु नाइ।।57।।<br />
 --*--*--<br />
दीन्हि असीस सासु मृदु बानी। अति सुकुमारि देखि अकुलानी।।<br />
बैठि नमितमुख सोचति सीता। रूप रासि पति प्रेम पुनीता।।<br />
चलन चहत बन जीवननाथू। केहि सुकृती सन होइहि साथू।।<br />
की तनु प्रान कि केवल प्राना। बिधि करतबु कछु जाइ न जाना।।<br />
चारु चरन नख लेखति धरनी। नूपुर मुखर मधुर कबि बरनी।।<br />
मनहुँ प्रेम बस बिनती करहीं। हमहि सीय पद जनि परिहरहीं।।<br />
मंजु बिलोचन मोचति बारी। बोली देखि राम महतारी।।<br />
तात सुनहु सिय अति सुकुमारी। सासु ससुर परिजनहि पिआरी।।<br />
दो0-पिता जनक भूपाल मनि ससुर भानुकुल भानु।<br />
   पति रबिकुल कैरव बिपिन बिधु गुन रूप निधानु।।58।।<br />
 --*--*--<br />
मैं पुनि पुत्रबधू प्रिय पाई। रूप रासि गुन सील सुहाई।।<br />
नयन पुतरि करि प्रीति बढ़ाई। राखेउँ प्रान जानिकिहिं लाई।।<br />
कलपबेलि जिमि बहुबिधि लाली। सींचि सनेह सलिल प्रतिपाली।।<br />
फूलत फलत भयउ बिधि बामा। जानि न जाइ काह परिनामा।।<br />
पलँग पीठ तजि गोद हिंड़ोरा। सियँ न दीन्ह पगु अवनि कठोरा।।<br />
जिअनमूरि जिमि जोगवत रहऊँ। दीप बाति नहिं टारन कहऊँ।।<br />
सोइ सिय चलन चहति बन साथा। आयसु काह होइ रघुनाथा।<br />
चंद किरन रस रसिक चकोरी। रबि रुख नयन सकइ किमि जोरी।।<br />
दो0-करि केहरि निसिचर चरहिं दुष्ट जंतु बन भूरि।<br />
    बिष बाटिकाँ कि सोह सुत सुभग सजीवनि मूरि।।59।।<br />
 --*--*--<br />
बन हित कोल किरात किसोरी। रचीं बिरंचि बिषय सुख भोरी।।<br />
पाइन कृमि जिमि कठिन सुभाऊ। तिन्हहि कलेसु न कानन काऊ।।<br />
कै तापस तिय कानन जोगू। जिन्ह तप हेतु तजा सब भोगू।।<br />
सिय बन बसिहि तात केहि भाँती। चित्रलिखित कपि देखि डेराती।।<br />
सुरसर सुभग बनज बन चारी। डाबर जोगु कि हंसकुमारी।।<br />
अस बिचारि जस आयसु होई। मैं सिख देउँ जानकिहि सोई।।<br />
जौं सिय भवन रहै कह अंबा। मोहि कहँ होइ बहुत अवलंबा।।<br />
सुनि रघुबीर मातु प्रिय बानी। सील सनेह सुधाँ जनु सानी।।<br />
दो0-कहि प्रिय बचन बिबेकमय कीन्हि मातु परितोष।<br />
   लगे प्रबोधन जानकिहि प्रगटि बिपिन गुन दोष।।60।।<br />
          मासपारायण, चौदहवाँ विश्राम<br />
 --*--*--<br />
मातु समीप कहत सकुचाहीं। बोले समउ समुझि मन माहीं।।<br />
राजकुमारि सिखावन सुनहू। आन भाँति जियँ जनि कछु गुनहू।।<br />
आपन मोर नीक जौं चहहू। बचनु हमार मानि गृह रहहू।।<br />
आयसु मोर सासु सेवकाई। सब बिधि भामिनि भवन भलाई।।<br />
एहि ते अधिक धरमु नहिं दूजा। सादर सासु ससुर पद पूजा।।<br />
जब जब मातु करिहि सुधि मोरी। होइहि प्रेम बिकल मति भोरी।।<br />
तब तब तुम्ह कहि कथा पुरानी। सुंदरि समुझाएहु मृदु बानी।।<br />
कहउँ सुभायँ सपथ सत मोही। सुमुखि मातु हित राखउँ तोही।।<br />
दो0-गुर श्रुति संमत धरम फलु पाइअ बिनहिं कलेस।<br />
    हठ बस सब संकट सहे गालव नहुष नरेस।।61।।<br />
 --*--*--<br />
मैं पुनि करि प्रवान पितु बानी। बेगि फिरब सुनु सुमुखि सयानी।।<br />
दिवस जात नहिं लागिहि बारा। सुंदरि सिखवनु सुनहु हमारा।।<br />
जौ हठ करहु प्रेम बस बामा। तौ तुम्ह दुखु पाउब परिनामा।।<br />
काननु कठिन भयंकरु भारी। घोर घामु हिम बारि बयारी।।<br />
कुस कंटक मग काँकर नाना। चलब पयादेहिं बिनु पदत्राना।।<br />
चरन कमल मुदु मंजु तुम्हारे। मारग अगम भूमिधर भारे।।<br />
कंदर खोह नदीं नद नारे। अगम अगाध न जाहिं निहारे।।<br />
भालु बाघ बृक केहरि नागा। करहिं नाद सुनि धीरजु भागा।।<br />
दो0-भूमि सयन बलकल बसन असनु कंद फल मूल।<br />
   ते कि सदा सब दिन मिलिहिं सबुइ समय अनुकूल।।62।।<br />
 --*--*--<br />
नर अहार रजनीचर चरहीं। कपट बेष बिधि कोटिक करहीं।।<br />
लागइ अति पहार कर पानी। बिपिन बिपति नहिं जाइ बखानी।।<br />
ब्याल कराल बिहग बन घोरा। निसिचर निकर नारि नर चोरा।।<br />
डरपहिं धीर गहन सुधि आएँ। मृगलोचनि तुम्ह भीरु सुभाएँ।।<br />
हंसगवनि तुम्ह नहिं बन जोगू। सुनि अपजसु मोहि देइहि लोगू।।<br />
मानस सलिल सुधाँ प्रतिपाली। जिअइ कि लवन पयोधि मराली।।<br />
नव रसाल बन बिहरनसीला। सोह कि कोकिल बिपिन करीला।।<br />
रहहु भवन अस हृदयँ बिचारी। चंदबदनि दुखु कानन भारी।।<br />
दो0-सहज सुह्द गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि।।<br />
    सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि।।63।।<br />
 --*--*--<br />
सुनि मृदु बचन मनोहर पिय के। लोचन ललित भरे जल सिय के।।<br />
सीतल सिख दाहक भइ कैंसें। चकइहि सरद चंद निसि जैंसें।।<br />
उतरु न आव बिकल बैदेही। तजन चहत सुचि स्वामि सनेही।।<br />
बरबस रोकि बिलोचन बारी। धरि धीरजु उर अवनिकुमारी।।<br />
लागि सासु पग कह कर जोरी। छमबि देबि बड़ि अबिनय मोरी।।<br />
दीन्हि प्रानपति मोहि सिख सोई। जेहि बिधि मोर परम हित होई।।<br />
मैं पुनि समुझि दीखि मन माहीं। पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं।।<br />
दो0- प्राननाथ करुनायतन सुंदर सुखद सुजान।<br />
    तुम्ह बिनु रघुकुल कुमुद बिधु सुरपुर नरक समान।।64।।<br />
 --*--*--<br />
मातु पिता भगिनी प्रिय भाई। प्रिय परिवारु सुह्रद समुदाई।।<br />
सासु ससुर गुर सजन सहाई। सुत सुंदर सुसील सुखदाई।।<br />
जहँ लगि नाथ नेह अरु नाते। पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते।।<br />
तनु धनु धामु धरनि पुर राजू। पति बिहीन सबु सोक समाजू।।<br />
भोग रोगसम भूषन भारू। जम जातना सरिस संसारू।।<br />
प्राननाथ तुम्ह बिनु जग माहीं। मो कहुँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं।।<br />
जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी।।<br />
नाथ सकल सुख साथ तुम्हारें। सरद बिमल बिधु बदनु निहारें।।<br />
दो0-खग मृग परिजन नगरु बनु बलकल बिमल दुकूल।<br />
    नाथ साथ सुरसदन सम परनसाल सुख मूल।।65।।<br />
 --*--*--<br />
बनदेवीं बनदेव उदारा। करिहहिं सासु ससुर सम सारा।।<br />
कुस किसलय साथरी सुहाई। प्रभु सँग मंजु मनोज तुराई।।<br />
कंद मूल फल अमिअ अहारू। अवध सौध सत सरिस पहारू।।<br />
छिनु छिनु प्रभु पद कमल बिलोकि। रहिहउँ मुदित दिवस जिमि कोकी।।<br />
बन दुख नाथ कहे बहुतेरे। भय बिषाद परिताप घनेरे।।<br />
प्रभु बियोग लवलेस समाना। सब मिलि होहिं न कृपानिधाना।।<br />
अस जियँ जानि सुजान सिरोमनि। लेइअ संग मोहि छाड़िअ जनि।।<br />
बिनती बहुत करौं का स्वामी। करुनामय उर अंतरजामी।।<br />
दो0-राखिअ अवध जो अवधि लगि रहत न जनिअहिं प्रान।<br />
   दीनबंधु संदर सुखद सील सनेह निधान।।66।।<br />
 --*--*--<br />
मोहि मग चलत न होइहि हारी। छिनु छिनु चरन सरोज निहारी।।<br />
सबहि भाँति पिय सेवा करिहौं। मारग जनित सकल श्रम हरिहौं।।<br />
पाय पखारी बैठि तरु छाहीं। करिहउँ बाउ मुदित मन माहीं।।<br />
श्रम कन सहित स्याम तनु देखें। कहँ दुख समउ प्रानपति पेखें।।<br />
सम महि तृन तरुपल्लव डासी। पाग पलोटिहि सब निसि दासी।।<br />
बारबार मृदु मूरति जोही। लागहि तात बयारि न मोही।<br />
को प्रभु सँग मोहि चितवनिहारा। सिंघबधुहि जिमि ससक सिआरा।।<br />
मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू। तुम्हहि उचित तप मो कहुँ भोगू।।<br />
दो0-ऐसेउ बचन कठोर सुनि जौं न ह्रदउ बिलगान।<br />
   तौ प्रभु बिषम बियोग दुख सहिहहिं पावँर प्रान।।67।।<br />
 --*--*-- </p>
<p>अस कहि सीय बिकल भइ भारी। बचन बियोगु न सकी सँभारी।।<br />
देखि दसा रघुपति जियँ जाना। हठि राखें नहिं राखिहि प्राना।।<br />
कहेउ कृपाल भानुकुलनाथा। परिहरि सोचु चलहु बन साथा।।<br />
नहिं बिषाद कर अवसरु आजू। बेगि करहु बन गवन समाजू।।<br />
कहि प्रिय बचन प्रिया समुझाई। लगे मातु पद आसिष पाई।।<br />
बेगि प्रजा दुख मेटब आई। जननी निठुर बिसरि जनि जाई।।<br />
फिरहि दसा बिधि बहुरि कि मोरी। देखिहउँ नयन मनोहर जोरी।।<br />
सुदिन सुघरी तात कब होइहि। जननी जिअत बदन बिधु जोइहि।।<br />
दो0-बहुरि बच्छ कहि लालु कहि रघुपति रघुबर तात।<br />
    कबहिं बोलाइ लगाइ हियँ हरषि निरखिहउँ गात।।68।।<br />
 --*--*--<br />
लखि सनेह कातरि महतारी। बचनु न आव बिकल भइ भारी।।<br />
राम प्रबोधु कीन्ह बिधि नाना। समउ सनेहु न जाइ बखाना।।<br />
तब जानकी सासु पग लागी। सुनिअ माय मैं परम अभागी।।<br />
सेवा समय दैअँ बनु दीन्हा। मोर मनोरथु सफल न कीन्हा।।<br />
तजब छोभु जनि छाड़िअ छोहू। करमु कठिन कछु दोसु न मोहू।।<br />
सुनि सिय बचन सासु अकुलानी। दसा कवनि बिधि कहौं बखानी।।<br />
बारहि बार लाइ उर लीन्ही। धरि धीरजु सिख आसिष दीन्ही।।<br />
अचल होउ अहिवातु तुम्हारा। जब लगि गंग जमुन जल धारा।।<br />
 दो0-सीतहि सासु असीस सिख दीन्हि अनेक प्रकार।<br />
     चली नाइ पद पदुम सिरु अति हित बारहिं बार।।69।।<br />
 --*--*--<br />
समाचार जब लछिमन पाए। ब्याकुल बिलख बदन उठि धाए।।<br />
कंप पुलक तन नयन सनीरा। गहे चरन अति प्रेम अधीरा।।<br />
कहि न सकत कछु चितवत ठाढ़े। मीनु दीन जनु जल तें काढ़े।।<br />
सोचु हृदयँ बिधि का होनिहारा। सबु सुखु सुकृत सिरान हमारा।।<br />
मो कहुँ काह कहब रघुनाथा। रखिहहिं भवन कि लेहहिं साथा।।<br />
राम बिलोकि बंधु कर जोरें। देह गेह सब सन तृनु तोरें।।<br />
बोले बचनु राम नय नागर। सील सनेह सरल सुख सागर।।<br />
तात प्रेम बस जनि कदराहू। समुझि हृदयँ परिनाम उछाहू।।<br />
दो0-मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहि सुभायँ।<br />
   लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरु जनमु जग जायँ।।70।।<br />
 --*--*--<br />
अस जियँ जानि सुनहु सिख भाई। करहु मातु पितु पद सेवकाई।।<br />
भवन भरतु रिपुसूदन नाहीं। राउ बृद्ध मम दुखु मन माहीं।।<br />
मैं बन जाउँ तुम्हहि लेइ साथा। होइ सबहि बिधि अवध अनाथा।।<br />
गुरु पितु मातु प्रजा परिवारू। सब कहुँ परइ दुसह दुख भारू।।<br />
रहहु करहु सब कर परितोषू। नतरु तात होइहि बड़ दोषू।।<br />
जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृपु अवसि नरक अधिकारी।।<br />
रहहु तात असि नीति बिचारी। सुनत लखनु भए ब्याकुल भारी।।<br />
सिअरें बचन सूखि गए कैंसें। परसत तुहिन तामरसु जैसें।।<br />
दो0-उतरु न आवत प्रेम बस गहे चरन अकुलाइ।<br />
   नाथ दासु मैं स्वामि तुम्ह तजहु त काह बसाइ।।71।।<br />
 --*--*--<br />
दीन्हि मोहि सिख नीकि गोसाईं। लागि अगम अपनी कदराईं।।<br />
नरबर धीर धरम धुर धारी। निगम नीति कहुँ ते अधिकारी।।<br />
मैं सिसु प्रभु सनेहँ प्रतिपाला। मंदरु मेरु कि लेहिं मराला।।<br />
गुर पितु मातु न जानउँ काहू। कहउँ सुभाउ नाथ पतिआहू।।<br />
जहँ लगि जगत सनेह सगाई। प्रीति प्रतीति निगम निजु गाई।।<br />
मोरें सबइ एक तुम्ह स्वामी। दीनबंधु उर अंतरजामी।।<br />
धरम नीति उपदेसिअ ताही। कीरति भूति सुगति प्रिय जाही।।<br />
मन क्रम बचन चरन रत होई। कृपासिंधु परिहरिअ कि सोई।।<br />
दो0-करुनासिंधु सुबंध के सुनि मृदु बचन बिनीत।<br />
    समुझाए उर लाइ प्रभु जानि सनेहँ सभीत।।72।।<br />
 --*--*--<br />
मागहु बिदा मातु सन जाई। आवहु बेगि चलहु बन भाई।।<br />
मुदित भए सुनि रघुबर बानी। भयउ लाभ बड़ गइ बड़ि हानी।।<br />
हरषित ह्दयँ मातु पहिं आए। मनहुँ अंध फिरि लोचन पाए।<br />
जाइ जननि पग नायउ माथा। मनु रघुनंदन जानकि साथा।।<br />
पूँछे मातु मलिन मन देखी। लखन कही सब कथा बिसेषी।।<br />
गई सहमि सुनि बचन कठोरा। मृगी देखि दव जनु चहु ओरा।।<br />
लखन लखेउ भा अनरथ आजू। एहिं सनेह बस करब अकाजू।।<br />
मागत बिदा सभय सकुचाहीं। जाइ संग बिधि कहिहि कि नाही।।<br />
दो0-समुझि सुमित्राँ राम सिय रूप सुसीलु सुभाउ।<br />
   नृप सनेहु लखि धुनेउ सिरु पापिनि दीन्ह कुदाउ।।73।।<br />
 --*--*--<br />
धीरजु धरेउ कुअवसर जानी। सहज सुह्द बोली मृदु बानी।।<br />
तात तुम्हारि मातु बैदेही। पिता रामु सब भाँति सनेही।।<br />
अवध तहाँ जहँ राम निवासू। तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू।।<br />
जौ पै सीय रामु बन जाहीं। अवध तुम्हार काजु कछु नाहिं।।<br />
गुर पितु मातु बंधु सुर साई। सेइअहिं सकल प्रान की नाईं।।<br />
रामु प्रानप्रिय जीवन जी के। स्वारथ रहित सखा सबही कै।।<br />
पूजनीय प्रिय परम जहाँ तें। सब मानिअहिं राम के नातें।।<br />
अस जियँ जानि संग बन जाहू। लेहु तात जग जीवन लाहू।।<br />
दो0-भूरि भाग भाजनु भयहु मोहि समेत बलि जाउँ।<br />
    जौम तुम्हरें मन छाड़ि छलु कीन्ह राम पद ठाउँ।।74।।<br />
 --*--*--<br />
पुत्रवती जुबती जग सोई। रघुपति भगतु जासु सुतु होई।।<br />
नतरु बाँझ भलि बादि बिआनी। राम बिमुख सुत तें हित जानी।।<br />
तुम्हरेहिं भाग रामु बन जाहीं। दूसर हेतु तात कछु नाहीं।।<br />
सकल सुकृत कर बड़ फलु एहू। राम सीय पद सहज सनेहू।।<br />
राग रोषु इरिषा मदु मोहू। जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू।।<br />
सकल प्रकार बिकार बिहाई। मन क्रम बचन करेहु सेवकाई।।<br />
तुम्ह कहुँ बन सब भाँति सुपासू। सँग पितु मातु रामु सिय जासू।।<br />
जेहिं न रामु बन लहहिं कलेसू। सुत सोइ करेहु इहइ उपदेसू।।<br />
छं0-उपदेसु यहु जेहिं तात तुम्हरे राम सिय सुख पावहीं।<br />
   पितु मातु प्रिय परिवार पुर सुख सुरति बन बिसरावहीं।<br />
   तुलसी प्रभुहि सिख देइ आयसु दीन्ह पुनि आसिष दई।<br />
   रति होउ अबिरल अमल सिय रघुबीर पद नित नित नई।।<br />
सो0-मातु चरन सिरु नाइ चले तुरत संकित हृदयँ।<br />
    बागुर बिषम तोराइ मनहुँ भाग मृगु भाग बस।।75।।<br />
गए लखनु जहँ जानकिनाथू। भे मन मुदित पाइ प्रिय साथू।।<br />
बंदि राम सिय चरन सुहाए। चले संग नृपमंदिर आए।।<br />
कहहिं परसपर पुर नर नारी। भलि बनाइ बिधि बात बिगारी।।<br />
तन कृस दुखु बदन मलीने। बिकल मनहुँ माखी मधु छीने।।<br />
कर मीजहिं सिरु धुनि पछिताहीं। जनु बिन पंख बिहग अकुलाहीं।।<br />
भइ बड़ि भीर भूप दरबारा। बरनि न जाइ बिषादु अपारा।।<br />
सचिवँ उठाइ राउ बैठारे। कहि प्रिय बचन रामु पगु धारे।।<br />
सिय समेत दोउ तनय निहारी। ब्याकुल भयउ भूमिपति भारी।।<br />
दो0-सीय सहित सुत सुभग दोउ देखि देखि अकुलाइ।<br />
   बारहिं बार सनेह बस राउ लेइ उर लाइ।।76।।<br />
 --*--*--<br />
सकइ न बोलि बिकल नरनाहू। सोक जनित उर दारुन दाहू।।<br />
नाइ सीसु पद अति अनुरागा। उठि रघुबीर बिदा तब मागा।।<br />
पितु असीस आयसु मोहि दीजै। हरष समय बिसमउ कत कीजै।।<br />
तात किएँ प्रिय प्रेम प्रमादू। जसु जग जाइ होइ अपबादू।।<br />
सुनि सनेह बस उठि नरनाहाँ। बैठारे रघुपति गहि बाहाँ।।<br />
सुनहु तात तुम्ह कहुँ मुनि कहहीं। रामु चराचर नायक अहहीं।।<br />
सुभ अरु असुभ करम अनुहारी। ईस देइ फलु ह्दयँ बिचारी।।<br />
करइ जो करम पाव फल सोई। निगम नीति असि कह सबु कोई।।<br />
दो0--औरु करै अपराधु कोउ और पाव फल भोगु।<br />
    अति बिचित्र भगवंत गति को जग जानै जोगु।।77।।<br />
 --*--*--<br />
रायँ राम राखन हित लागी। बहुत उपाय किए छलु त्यागी।।<br />
लखी राम रुख रहत न जाने। धरम धुरंधर धीर सयाने।।<br />
तब नृप सीय लाइ उर लीन्ही। अति हित बहुत भाँति सिख दीन्ही।।<br />
कहि बन के दुख दुसह सुनाए। सासु ससुर पितु सुख समुझाए।।<br />
सिय मनु राम चरन अनुरागा। घरु न सुगमु बनु बिषमु न लागा।।<br />
औरउ सबहिं सीय समुझाई। कहि कहि बिपिन बिपति अधिकाई।।<br />
सचिव नारि गुर नारि सयानी। सहित सनेह कहहिं मृदु बानी।।<br />
तुम्ह कहुँ तौ न दीन्ह बनबासू। करहु जो कहहिं ससुर गुर सासू।।<br />
दो0--सिख सीतलि हित मधुर मृदु सुनि सीतहि न सोहानि।<br />
     सरद चंद चंदनि लगत जनु चकई अकुलानि।।78।।<br />
 --*--*--<br />
सीय सकुच बस उतरु न देई। सो सुनि तमकि उठी कैकेई।।<br />
मुनि पट भूषन भाजन आनी। आगें धरि बोली मृदु बानी।।<br />
नृपहि प्रान प्रिय तुम्ह रघुबीरा। सील सनेह न छाड़िहि भीरा।।<br />
सुकृत सुजसु परलोकु नसाऊ। तुम्हहि जान बन कहिहि न काऊ।।<br />
अस बिचारि सोइ करहु जो भावा। राम जननि सिख सुनि सुखु पावा।।<br />
भूपहि बचन बानसम लागे। करहिं न प्रान पयान अभागे।।<br />
लोग बिकल मुरुछित नरनाहू। काह करिअ कछु सूझ न काहू।।<br />
रामु तुरत मुनि बेषु बनाई। चले जनक जननिहि सिरु नाई।।<br />
दो0-सजि बन साजु समाजु सबु बनिता बंधु समेत।<br />
    बंदि बिप्र गुर चरन प्रभु चले करि सबहि अचेत।।79।।<br />
 --*--*--<br />
निकसि बसिष्ठ द्वार भए ठाढ़े। देखे लोग बिरह दव दाढ़े।।<br />
कहि प्रिय बचन सकल समुझाए। बिप्र बृंद रघुबीर बोलाए।।<br />
गुर सन कहि बरषासन दीन्हे। आदर दान बिनय बस कीन्हे।।<br />
जाचक दान मान संतोषे। मीत पुनीत प्रेम परितोषे।।<br />
दासीं दास बोलाइ बहोरी। गुरहि सौंपि बोले कर जोरी।।<br />
सब कै सार सँभार गोसाईं। करबि जनक जननी की नाई।।<br />
बारहिं बार जोरि जुग पानी। कहत रामु सब सन मृदु बानी।।<br />
सोइ सब भाँति मोर हितकारी। जेहि तें रहै भुआल सुखारी।।<br />
दो0-मातु सकल मोरे बिरहँ जेहिं न होहिं दुख दीन।<br />
    सोइ उपाउ तुम्ह करेहु सब पुर जन परम प्रबीन।।80।।<br />
 --*--*--<br />
एहि बिधि राम सबहि समुझावा। गुर पद पदुम हरषि सिरु नावा।<br />
गनपती गौरि गिरीसु मनाई। चले असीस पाइ रघुराई।।<br />
राम चलत अति भयउ बिषादू। सुनि न जाइ पुर आरत नादू।।<br />
कुसगुन लंक अवध अति सोकू। हहरष बिषाद बिबस सुरलोकू।।<br />
गइ मुरुछा तब भूपति जागे। बोलि सुमंत्रु कहन अस लागे।।<br />
रामु चले बन प्रान न जाहीं। केहि सुख लागि रहत तन माहीं।<br />
एहि तें कवन ब्यथा बलवाना। जो दुखु पाइ तजहिं तनु प्राना।।<br />
पुनि धरि धीर कहइ नरनाहू। लै रथु संग सखा तुम्ह जाहू।।<br />
दो0--सुठि सुकुमार कुमार दोउ जनकसुता सुकुमारि।<br />
     रथ चढ़ाइ देखराइ बनु फिरेहु गएँ दिन चारि।।81।।<br />
 --*--*--<br />
जौ नहिं फिरहिं धीर दोउ भाई। सत्यसंध दृढ़ब्रत रघुराई।।<br />
तौ तुम्ह बिनय करेहु कर जोरी। फेरिअ प्रभु मिथिलेसकिसोरी।।<br />
जब सिय कानन देखि डेराई। कहेहु मोरि सिख अवसरु पाई।।<br />
सासु ससुर अस कहेउ सँदेसू। पुत्रि फिरिअ बन बहुत कलेसू।।<br />
पितृगृह कबहुँ कबहुँ ससुरारी। रहेहु जहाँ रुचि होइ तुम्हारी।।<br />
एहि बिधि करेहु उपाय कदंबा। फिरइ त होइ प्रान अवलंबा।।<br />
नाहिं त मोर मरनु परिनामा। कछु न बसाइ भएँ बिधि बामा।।<br />
अस कहि मुरुछि परा महि राऊ। रामु लखनु सिय आनि देखाऊ।।<br />
दो0--पाइ रजायसु नाइ सिरु रथु अति बेग बनाइ।<br />
     गयउ जहाँ बाहेर नगर सीय सहित दोउ भाइ।।82।।<br />
 --*--*--<br />
तब सुमंत्र नृप बचन सुनाए। करि बिनती रथ रामु चढ़ाए।।<br />
चढ़ि रथ सीय सहित दोउ भाई। चले हृदयँ अवधहि सिरु नाई।।<br />
चलत रामु लखि अवध अनाथा। बिकल लोग सब लागे साथा।।<br />
कृपासिंधु बहुबिधि समुझावहिं। फिरहिं प्रेम बस पुनि फिरि आवहिं।।<br />
लागति अवध भयावनि भारी। मानहुँ कालराति अँधिआरी।।<br />
घोर जंतु सम पुर नर नारी। डरपहिं एकहि एक निहारी।।<br />
घर मसान परिजन जनु भूता। सुत हित मीत मनहुँ जमदूता।।<br />
बागन्ह बिटप बेलि कुम्हिलाहीं। सरित सरोवर देखि न जाहीं।।<br />
दो0-हय गय कोटिन्ह केलिमृग पुरपसु चातक मोर।<br />
    पिक रथांग सुक सारिका सारस हंस चकोर।।83।।<br />
 --*--*--<br />
राम बियोग बिकल सब ठाढ़े। जहँ तहँ मनहुँ चित्र लिखि काढ़े।।<br />
नगरु सफल बनु गहबर भारी। खग मृग बिपुल सकल नर नारी।।<br />
बिधि कैकेई किरातिनि कीन्ही। जेंहि दव दुसह दसहुँ दिसि दीन्ही।।<br />
सहि न सके रघुबर बिरहागी। चले लोग सब ब्याकुल भागी।।<br />
सबहिं बिचार कीन्ह मन माहीं। राम लखन सिय बिनु सुखु नाहीं।।<br />
जहाँ रामु तहँ सबुइ समाजू। बिनु रघुबीर अवध नहिं काजू।।<br />
चले साथ अस मंत्रु दृढ़ाई। सुर दुर्लभ सुख सदन बिहाई।।<br />
राम चरन पंकज प्रिय जिन्हही। बिषय भोग बस करहिं कि तिन्हही।।<br />
दो0-बालक बृद्ध बिहाइ गृँह लगे लोग सब साथ।<br />
   तमसा तीर निवासु किय प्रथम दिवस रघुनाथ।।84।।<br />
 --*--*--<br />
रघुपति प्रजा प्रेमबस देखी। सदय हृदयँ दुखु भयउ बिसेषी।।<br />
करुनामय रघुनाथ गोसाँई। बेगि पाइअहिं पीर पराई।।<br />
कहि सप्रेम मृदु बचन सुहाए। बहुबिधि राम लोग समुझाए।।<br />
किए धरम उपदेस घनेरे। लोग प्रेम बस फिरहिं न फेरे।।<br />
सीलु सनेहु छाड़ि नहिं जाई। असमंजस बस भे रघुराई।।<br />
लोग सोग श्रम बस गए सोई। कछुक देवमायाँ मति मोई।।<br />
जबहिं जाम जुग जामिनि बीती। राम सचिव सन कहेउ सप्रीती।।<br />
खोज मारि रथु हाँकहु ताता। आन उपायँ बनिहि नहिं बाता।।<br />
दो0-राम लखन सुय जान चढ़ि संभु चरन सिरु नाइ।।<br />
    सचिवँ चलायउ तुरत रथु इत उत खोज दुराइ।।85।।<br />
 --*--*--<br />
जागे सकल लोग भएँ भोरू। गे रघुनाथ भयउ अति सोरू।।<br />
रथ कर खोज कतहहुँ नहिं पावहिं। राम राम कहि चहु दिसि धावहिं।।<br />
मनहुँ बारिनिधि बूड़ जहाजू। भयउ बिकल बड़ बनिक समाजू।।<br />
एकहि एक देंहिं उपदेसू। तजे राम हम जानि कलेसू।।<br />
निंदहिं आपु सराहहिं मीना। धिग जीवनु रघुबीर बिहीना।।<br />
जौं पै प्रिय बियोगु बिधि कीन्हा। तौ कस मरनु न मागें दीन्हा।।<br />
एहि बिधि करत प्रलाप कलापा। आए अवध भरे परितापा।।<br />
बिषम बियोगु न जाइ बखाना। अवधि आस सब राखहिं प्राना।।<br />
दो0-राम दरस हित नेम ब्रत लगे करन नर नारि।<br />
    मनहुँ कोक कोकी कमल दीन बिहीन तमारि।।86।।<br />
 --*--*--<br />
सीता सचिव सहित दोउ भाई। सृंगबेरपुर पहुँचे जाई।।<br />
उतरे राम देवसरि देखी। कीन्ह दंडवत हरषु बिसेषी।।<br />
लखन सचिवँ सियँ किए प्रनामा। सबहि सहित सुखु पायउ रामा।।<br />
गंग सकल मुद मंगल मूला। सब सुख करनि हरनि सब सूला।।<br />
कहि कहि कोटिक कथा प्रसंगा। रामु बिलोकहिं गंग तरंगा।।<br />
सचिवहि अनुजहि प्रियहि सुनाई। बिबुध नदी महिमा अधिकाई।।<br />
मज्जनु कीन्ह पंथ श्रम गयऊ। सुचि जलु पिअत मुदित मन भयऊ।।<br />
सुमिरत जाहि मिटइ श्रम भारू। तेहि श्रम यह लौकिक ब्यवहारू।।<br />
दो0-सुध्द सचिदानंदमय कंद भानुकुल केतु।<br />
   चरित करत नर अनुहरत संसृति सागर सेतु।।87।।<br />
 --*--*--<br />
यह सुधि गुहँ निषाद जब पाई। मुदित लिए प्रिय बंधु बोलाई।।<br />
लिए फल मूल भेंट भरि भारा। मिलन चलेउ हिँयँ हरषु अपारा।।<br />
करि दंडवत भेंट धरि आगें। प्रभुहि बिलोकत अति अनुरागें।।<br />
सहज सनेह बिबस रघुराई। पूँछी कुसल निकट बैठाई।।<br />
नाथ कुसल पद पंकज देखें। भयउँ भागभाजन जन लेखें।।<br />
देव धरनि धनु धामु तुम्हारा। मैं जनु नीचु सहित परिवारा।।<br />
कृपा करिअ पुर धारिअ पाऊ। थापिय जनु सबु लोगु सिहाऊ।।<br />
कहेहु सत्य सबु सखा सुजाना। मोहि दीन्ह पितु आयसु आना।।<br />
दो0-बरष चारिदस बासु बन मुनि ब्रत बेषु अहारु।<br />
    ग्राम बासु नहिं उचित सुनि गुहहि भयउ दुखु भारु।।88।।<br />
 --*--*--<br />
राम लखन सिय रूप निहारी। कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी।।<br />
ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे।।<br />
एक कहहिं भल भूपति कीन्हा। लोयन लाहु हमहि बिधि दीन्हा।।<br />
तब निषादपति उर अनुमाना। तरु सिंसुपा मनोहर जाना।।<br />
लै रघुनाथहि ठाउँ देखावा। कहेउ राम सब भाँति सुहावा।।<br />
पुरजन करि जोहारु घर आए। रघुबर संध्या करन सिधाए।।<br />
गुहँ सँवारि साँथरी डसाई। कुस किसलयमय मृदुल सुहाई।।<br />
सुचि फल मूल मधुर मृदु जानी। दोना भरि भरि राखेसि पानी।।<br />
दो0-सिय सुमंत्र भ्राता सहित कंद मूल फल खाइ।<br />
    सयन कीन्ह रघुबंसमनि पाय पलोटत भाइ।।89।।<br />
 --*--*--<br />
उठे लखनु प्रभु सोवत जानी। कहि सचिवहि सोवन मृदु बानी।।<br />
कछुक दूर सजि बान सरासन। जागन लगे बैठि बीरासन।।<br />
गुँह बोलाइ पाहरू प्रतीती। ठावँ ठाँव राखे अति प्रीती।।<br />
आपु लखन पहिं बैठेउ जाई। कटि भाथी सर चाप चढ़ाई।।<br />
सोवत प्रभुहि निहारि निषादू। भयउ प्रेम बस ह्दयँ बिषादू।।<br />
तनु पुलकित जलु लोचन बहई। बचन सप्रेम लखन सन कहई।।<br />
भूपति भवन सुभायँ सुहावा। सुरपति सदनु न पटतर पावा।।<br />
मनिमय रचित चारु चौबारे। जनु रतिपति निज हाथ सँवारे।।<br />
दो0-सुचि सुबिचित्र सुभोगमय सुमन सुगंध सुबास।<br />
    पलँग मंजु मनिदीप जहँ सब बिधि सकल सुपास।।90।।<br />
 --*--*--<br />
बिबिध बसन उपधान तुराई। छीर फेन मृदु बिसद सुहाई।।<br />
