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	<title>03-अरण्य-काण्ड &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/03-अरण्य-काण्ड/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "03-अरण्य-काण्ड"</description>
	<pubDate>Mon, 07 Jul 2008 12:02:42 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[अरण्य काण्ड]]></title>
<link>http://ramayan.wordpress.com/2006/07/24/aranyakand/</link>
<pubDate>Mon, 24 Jul 2006 07:14:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>jitu9968</dc:creator>
<guid>http://ramayan.wordpress.com/2006/07/24/aranyakand/</guid>
<description><![CDATA[           श्री गणेशाय नमः
        श्री जानकीवल्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>           श्री गणेशाय नमः<br />
        श्री जानकीवल्लभो विजयते<br />
          श्री रामचरितमानस<br />
            ----------<br />
            तृतीय सोपान<br />
           (अरण्यकाण्ड)<!--more--><br />
              श्लोक<br />
   मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददं<br />
   वैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम्।<br />
   मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्वःसम्भवं शङ्करं<br />
   वन्दे ब्रह्मकुलं कलंकशमनं श्रीरामभूपप्रियम्।।1।।<br />
   सान्द्रानन्दपयोदसौभगतनुं पीताम्बरं सुन्दरं<br />
   पाणौ बाणशरासनं कटिलसत्तूणीरभारं वरम्<br />
   राजीवायतलोचनं धृतजटाजूटेन संशोभितं<br />
   सीतालक्ष्मणसंयुतं पथिगतं रामाभिरामं भजे।।2।।<br />
सो0-उमा राम गुन गूढ़ पंडित मुनि पावहिं बिरति।<br />
    पावहिं मोह बिमूढ़ जे हरि बिमुख न धर्म रति।।<br />
पुर नर भरत प्रीति मैं गाई। मति अनुरूप अनूप सुहाई।।<br />
अब प्रभु चरित सुनहु अति पावन। करत जे बन सुर नर मुनि भावन।।<br />
एक बार चुनि कुसुम सुहाए। निज कर भूषन राम बनाए।।<br />
सीतहि पहिराए प्रभु सादर। बैठे फटिक सिला पर सुंदर।।<br />
सुरपति सुत धरि बायस बेषा। सठ चाहत रघुपति बल देखा।।<br />
जिमि पिपीलिका सागर थाहा। महा मंदमति पावन चाहा।।<br />
सीता चरन चौंच हति भागा। मूढ़ मंदमति कारन कागा।।<br />
चला रुधिर रघुनायक जाना। सींक धनुष सायक संधाना।।<br />
दो0-अति कृपाल रघुनायक सदा दीन पर नेह।<br />
   ता सन आइ कीन्ह छलु मूरख अवगुन गेह।।1।।<br />
प्रेरित मंत्र ब्रह्मसर धावा। चला भाजि बायस भय पावा।।<br />
धरि निज रुप गयउ पितु पाहीं। राम बिमुख राखा तेहि नाहीं।।<br />
भा निरास उपजी मन त्रासा। जथा चक्र भय रिषि दुर्बासा।।<br />
ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका। फिरा श्रमित ब्याकुल भय सोका।।<br />
काहूँ बैठन कहा न ओही। राखि को सकइ राम कर द्रोही।।<br />
मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होइ बिष सुनु हरिजाना।।<br />
मित्र करइ सत रिपु कै करनी। ता कहँ बिबुधनदी बैतरनी।।<br />
सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता।।<br />
नारद देखा बिकल जयंता। लागि दया कोमल चित संता।।<br />
पठवा तुरत राम पहिं ताही। कहेसि पुकारि प्रनत हित पाही।।<br />
आतुर सभय गहेसि पद जाई। त्राहि त्राहि दयाल रघुराई।।<br />
अतुलित बल अतुलित प्रभुताई। मैं मतिमंद जानि नहिं पाई।।<br />
निज कृत कर्म जनित फल पायउँ। अब प्रभु पाहि सरन तकि आयउँ।।<br />
सुनि कृपाल अति आरत बानी। एकनयन करि तजा भवानी।।<br />
सो0-कीन्ह मोह बस द्रोह जद्यपि तेहि कर बध उचित।<br />
   प्रभु छाड़ेउ करि छोह को कृपाल रघुबीर सम।।2।।<br />
रघुपति चित्रकूट बसि नाना। चरित किए श्रुति सुधा समाना।।<br />
बहुरि राम अस मन अनुमाना। होइहि भीर सबहिं मोहि जाना।।<br />
सकल मुनिन्ह सन बिदा कराई। सीता सहित चले द्वौ भाई।।<br />
अत्रि के आश्रम जब प्रभु गयऊ। सुनत महामुनि हरषित भयऊ।।<br />
पुलकित गात अत्रि उठि धाए। देखि रामु आतुर चलि आए।।<br />
करत दंडवत मुनि उर लाए। प्रेम बारि द्वौ जन अन्हवाए।।<br />
देखि राम छबि नयन जुड़ाने। सादर निज आश्रम तब आने।।<br />
करि पूजा कहि बचन सुहाए। दिए मूल फल प्रभु मन भाए।।<br />
सो0-प्रभु आसन आसीन भरि लोचन सोभा निरखि।<br />
   मुनिबर परम प्रबीन जोरि पानि अस्तुति करत।।3।।<br />
छं0-नमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं।।<br />
   भजामि ते पदांबुजं। अकामिनां स्वधामदं।।<br />
   निकाम श्याम सुंदरं। भवाम्बुनाथ मंदरं।।<br />
   प्रफुल्ल कंज लोचनं। मदादि दोष मोचनं।।<br />
   प्रलंब बाहु विक्रमं। प्रभोऽप्रमेय वैभवं।।<br />
   निषंग चाप सायकं। धरं त्रिलोक नायकं।।<br />
   दिनेश वंश मंडनं। महेश चाप खंडनं।।<br />
   मुनींद्र संत रंजनं। सुरारि वृंद भंजनं।।<br />
   मनोज  वैरि वंदितं। अजादि देव सेवितं।।<br />
   विशुद्ध बोध विग्रहं। समस्त दूषणापहं।।<br />
   नमामि इंदिरा पतिं। सुखाकरं सतां गतिं।।<br />
   भजे सशक्ति सानुजं। शची पतिं प्रियानुजं।।<br />
   त्वदंघ्रि मूल ये नराः। भजंति हीन मत्सरा।।<br />
   पतंति नो भवार्णवे। वितर्क वीचि संकुले।।<br />
   विविक्त वासिनः सदा। भजंति मुक्तये मुदा।।<br />
   निरस्य इंद्रियादिकं। प्रयांति ते गतिं स्वकं।।<br />
   तमेकमभ्दुतं प्रभुं। निरीहमीश्वरं विभुं।।<br />
   जगद्गुरुं च शाश्वतं। तुरीयमेव केवलं।।<br />
   भजामि भाव वल्लभं। कुयोगिनां सुदुर्लभं।।<br />
   स्वभक्त कल्प पादपं। समं सुसेव्यमन्वहं।।<br />
   अनूप रूप भूपतिं। नतोऽहमुर्विजा पतिं।।<br />
   प्रसीद मे नमामि ते। पदाब्ज भक्ति देहि मे।।<br />
   पठंति ये स्तवं इदं। नरादरेण ते पदं।।<br />
   व्रजंति नात्र संशयं। त्वदीय भक्ति संयुता।।<br />
दो0-बिनती करि मुनि नाइ सिरु कह कर जोरि बहोरि।<br />
   चरन सरोरुह नाथ जनि कबहुँ तजै मति मोरि।।4।।<br />
--*--*--<br />
अनुसुइया के पद गहि सीता। मिली बहोरि सुसील बिनीता।।<br />
रिषिपतिनी मन सुख अधिकाई। आसिष देइ निकट बैठाई।।<br />
दिब्य बसन भूषन पहिराए। जे नित नूतन अमल सुहाए।।<br />
कह रिषिबधू सरस मृदु बानी। नारिधर्म कछु ब्याज बखानी।।<br />
मातु पिता भ्राता हितकारी। मितप्रद सब सुनु राजकुमारी।।<br />
अमित दानि भर्ता बयदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेही।।<br />
धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी।।<br />
बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अधं बधिर क्रोधी अति दीना।।<br />
ऐसेहु पति कर किएँ अपमाना। नारि पाव जमपुर दुख नाना।।<br />
एकइ धर्म  एक ब्रत  नेमा। कायँ बचन मन पति पद प्रेमा।।<br />
जग पति ब्रता चारि बिधि अहहिं। बेद पुरान संत सब कहहिं।।<br />
उत्तम के अस बस मन माहीं। सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं।।<br />
मध्यम परपति देखइ कैसें। भ्राता पिता पुत्र निज जैंसें।।<br />
धर्म बिचारि समुझि कुल रहई। सो निकिष्ट त्रिय श्रुति अस कहई।।<br />
बिनु अवसर भय तें रह जोई। जानेहु अधम नारि जग सोई।।<br />
पति बंचक परपति रति करई। रौरव नरक कल्प सत परई।।<br />
छन सुख लागि जनम सत कोटि। दुख न समुझ तेहि सम को खोटी।।<br />
बिनु श्रम नारि परम गति लहई। पतिब्रत धर्म छाड़ि छल गहई।।<br />
पति प्रतिकुल जनम जहँ जाई। बिधवा होई पाई तरुनाई।।<br />
सो0-सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ।<br />
    जसु गावत श्रुति चारि अजहु तुलसिका हरिहि प्रिय।।5क।।<br />
    सनु सीता तव नाम सुमिर नारि पतिब्रत करहि।<br />
    तोहि प्रानप्रिय राम कहिउँ कथा संसार हित।।5ख।।<br />
सुनि जानकीं परम सुखु पावा। सादर तासु चरन सिरु नावा।।<br />
तब मुनि सन कह कृपानिधाना। आयसु होइ जाउँ बन आना।।<br />
संतत मो पर कृपा करेहू। सेवक जानि तजेहु जनि नेहू।।<br />
धर्म धुरंधर प्रभु कै बानी। सुनि सप्रेम बोले मुनि ग्यानी।।<br />
जासु कृपा अज सिव सनकादी। चहत सकल परमारथ बादी।।<br />
ते तुम्ह राम अकाम पिआरे। दीन बंधु मृदु बचन उचारे।।<br />
अब जानी मैं श्री चतुराई। भजी तुम्हहि सब देव बिहाई।।<br />
जेहि समान अतिसय नहिं कोई। ता कर सील कस न अस होई।।<br />
केहि बिधि कहौं जाहु अब स्वामी। कहहु नाथ तुम्ह अंतरजामी।।<br />
अस कहि प्रभु बिलोकि मुनि धीरा। लोचन जल बह पुलक सरीरा।।<br />
छं0-तन पुलक निर्भर प्रेम पुरन नयन मुख पंकज दिए।<br />
    मन ग्यान गुन गोतीत प्रभु मैं दीख जप तप का किए।।<br />
    जप जोग धर्म समूह तें नर भगति अनुपम पावई।<br />
    रधुबीर चरित पुनीत निसि दिन दास तुलसी गावई।।<br />
दो0- कलिमल समन दमन मन राम सुजस सुखमूल।<br />
     सादर सुनहि जे तिन्ह पर राम रहहिं अनुकूल।।6(क)।।<br />
सो0-कठिन काल मल कोस धर्म न ग्यान न जोग जप।<br />
    परिहरि सकल भरोस रामहि भजहिं ते चतुर नर।।6(ख)।।<br />
 --*--*--<br />
मुनि पद कमल नाइ करि सीसा। चले बनहि सुर नर मुनि ईसा।।<br />
आगे राम अनुज पुनि पाछें। मुनि बर बेष बने अति काछें।।<br />
उमय बीच श्री सोहइ कैसी। ब्रह्म जीव बिच माया जैसी।।<br />
सरिता बन गिरि अवघट घाटा। पति पहिचानी देहिं बर बाटा।।<br />
जहँ जहँ जाहि देव रघुराया। करहिं मेध तहँ तहँ नभ छाया।।<br />
मिला असुर बिराध मग जाता। आवतहीं रघुवीर निपाता।।<br />
तुरतहिं रुचिर रूप तेहिं पावा। देखि दुखी निज धाम पठावा।।<br />
पुनि आए जहँ मुनि सरभंगा। सुंदर अनुज जानकी संगा।।<br />
दो0-देखी राम मुख पंकज मुनिबर लोचन भृंग।<br />
   सादर पान करत अति धन्य जन्म सरभंग।।7।।<br />
 --*--*--<br />
कह मुनि सुनु रघुबीर कृपाला। संकर मानस राजमराला।।<br />
जात रहेउँ बिरंचि के धामा। सुनेउँ श्रवन बन ऐहहिं रामा।।<br />
चितवत पंथ रहेउँ दिन राती। अब प्रभु देखि जुड़ानी छाती।।<br />
नाथ सकल साधन मैं हीना। कीन्ही कृपा जानि जन दीना।।<br />
सो कछु देव न मोहि निहोरा। निज पन राखेउ जन मन चोरा।।<br />
तब लगि रहहु दीन हित लागी। जब लगि मिलौं तुम्हहि तनु त्यागी।।<br />
जोग जग्य जप तप ब्रत कीन्हा। प्रभु कहँ देइ भगति बर लीन्हा।।<br />
एहि बिधि सर रचि मुनि सरभंगा। बैठे हृदयँ छाड़ि सब संगा।।<br />
दो0-सीता अनुज समेत प्रभु नील जलद तनु स्याम।<br />
    मम हियँ बसहु निरंतर सगुनरुप श्रीराम।।8।।<br />
 --*--*--<br />
अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। राम कृपाँ बैकुंठ सिधारा।।<br />
ताते मुनि हरि लीन न भयऊ। प्रथमहिं भेद भगति बर लयऊ।।<br />
रिषि निकाय मुनिबर गति देखि। सुखी भए निज हृदयँ बिसेषी।।<br />
अस्तुति करहिं सकल मुनि बृंदा। जयति प्रनत हित करुना कंदा।।<br />
पुनि रघुनाथ चले बन आगे। मुनिबर बृंद बिपुल सँग लागे।।<br />
अस्थि समूह देखि रघुराया। पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया।।<br />
जानतहुँ पूछिअ कस स्वामी। सबदरसी तुम्ह अंतरजामी।।<br />
निसिचर निकर सकल मुनि खाए। सुनि रघुबीर नयन जल छाए।।<br />
दो0-निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।<br />
    सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह।।9।।<br />
 --*--*--<br />
मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना। नाम सुतीछन रति भगवाना।।<br />
मन क्रम बचन राम पद सेवक। सपनेहुँ आन भरोस न देवक।।<br />
प्रभु आगवनु श्रवन सुनि पावा। करत मनोरथ आतुर धावा।।<br />
हे बिधि दीनबंधु रघुराया। मो से सठ पर करिहहिं दाया।।<br />
सहित अनुज मोहि राम गोसाई। मिलिहहिं निज सेवक की नाई।।<br />
मोरे जियँ भरोस दृढ़ नाहीं। भगति बिरति न ग्यान मन माहीं।।<br />
नहिं सतसंग जोग जप जागा। नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा।।<br />
एक बानि करुनानिधान की। सो प्रिय जाकें गति न आन की।।<br />
होइहैं सुफल आजु मम लोचन। देखि बदन पंकज भव मोचन।।<br />
निर्भर प्रेम मगन मुनि ग्यानी। कहि न जाइ सो दसा भवानी।।<br />
दिसि अरु बिदिसि पंथ नहिं सूझा। को मैं चलेउँ कहाँ नहिं बूझा।।<br />
कबहुँक फिरि पाछें पुनि जाई। कबहुँक नृत्य करइ गुन गाई।।<br />
अबिरल प्रेम भगति मुनि पाई। प्रभु देखैं तरु ओट लुकाई।।<br />
अतिसय प्रीति देखि रघुबीरा। प्रगटे हृदयँ हरन भव भीरा।।<br />
मुनि मग माझ अचल होइ बैसा। पुलक सरीर पनस फल जैसा।।<br />
तब रघुनाथ निकट चलि आए। देखि दसा निज जन मन भाए।।<br />
मुनिहि राम बहु भाँति जगावा। जाग न ध्यानजनित सुख पावा।।<br />
भूप रूप तब राम दुरावा। हृदयँ चतुर्भुज रूप देखावा।।<br />
मुनि अकुलाइ उठा तब कैसें। बिकल हीन मनि फनि बर जैसें।।<br />
आगें देखि राम तन स्यामा। सीता अनुज सहित सुख धामा।।<br />
परेउ लकुट इव चरनन्हि लागी। प्रेम मगन मुनिबर बड़भागी।।<br />
भुज बिसाल गहि लिए उठाई। परम प्रीति राखे उर लाई।।<br />
मुनिहि मिलत अस सोह कृपाला। कनक तरुहि जनु भेंट तमाला।।<br />
राम बदनु बिलोक मुनि ठाढ़ा। मानहुँ चित्र माझ लिखि काढ़ा।।<br />
दो0-तब मुनि हृदयँ धीर धीर गहि पद बारहिं बार।<br />
   निज आश्रम प्रभु आनि करि पूजा बिबिध प्रकार।।10।।<br />
 --*--*--<br />
कह मुनि प्रभु सुनु बिनती मोरी। अस्तुति करौं कवन बिधि तोरी।।<br />
महिमा अमित मोरि मति थोरी। रबि सन्मुख खद्योत अँजोरी।।<br />
श्याम तामरस दाम शरीरं। जटा मुकुट परिधन मुनिचीरं।।<br />
पाणि चाप शर कटि तूणीरं। नौमि निरंतर श्रीरघुवीरं।।<br />
मोह विपिन घन दहन कृशानुः। संत सरोरुह कानन भानुः।।<br />
निशिचर करि वरूथ मृगराजः। त्रातु सदा नो भव खग बाजः।।<br />
अरुण नयन राजीव सुवेशं। सीता नयन चकोर निशेशं।।<br />
हर ह्रदि मानस बाल मरालं। नौमि राम उर बाहु विशालं।।<br />
संशय सर्प ग्रसन उरगादः। शमन सुकर्कश तर्क विषादः।।<br />
भव भंजन रंजन सुर यूथः। त्रातु सदा नो कृपा वरूथः।।<br />
निर्गुण सगुण विषम सम रूपं। ज्ञान गिरा गोतीतमनूपं।।<br />
अमलमखिलमनवद्यमपारं। नौमि राम भंजन महि भारं।।<br />
भक्त कल्पपादप आरामः। तर्जन क्रोध लोभ मद कामः।।<br />
अति नागर भव सागर सेतुः। त्रातु सदा दिनकर कुल केतुः।।<br />
अतुलित भुज प्रताप बल धामः। कलि मल विपुल विभंजन नामः।।<br />
धर्म वर्म नर्मद गुण ग्रामः। संतत शं तनोतु मम रामः।।<br />
जदपि बिरज ब्यापक अबिनासी। सब के हृदयँ निरंतर बासी।।<br />
तदपि अनुज श्री सहित खरारी। बसतु मनसि मम काननचारी।।<br />
जे जानहिं ते जानहुँ स्वामी। सगुन अगुन उर अंतरजामी।।<br />
जो कोसल पति राजिव नयना। करउ सो राम हृदय मम अयना।<br />
अस अभिमान जाइ जनि भोरे। मैं सेवक रघुपति पति मोरे।।<br />
सुनि मुनि बचन राम मन भाए। बहुरि हरषि मुनिबर उर लाए।।<br />
परम प्रसन्न जानु मुनि मोही। जो बर मागहु देउ सो तोही।।<br />
मुनि कह मै बर कबहुँ न जाचा। समुझि न परइ झूठ का साचा।।<br />
तुम्हहि नीक लागै रघुराई। सो मोहि देहु दास सुखदाई।।<br />
अबिरल भगति बिरति बिग्याना। होहु सकल गुन ग्यान निधाना।।<br />
प्रभु जो दीन्ह सो बरु मैं पावा। अब सो देहु मोहि जो भावा।।<br />
दो0-अनुज जानकी सहित प्रभु चाप बान धर राम।<br />
   मम हिय गगन इंदु इव बसहु सदा निहकाम।।11।।<br />
 --*--*--<br />
एवमस्तु करि रमानिवासा। हरषि चले कुभंज रिषि पासा।।<br />
बहुत दिवस गुर दरसन पाएँ। भए मोहि एहिं आश्रम आएँ।।<br />
अब प्रभु संग जाउँ गुर पाहीं। तुम्ह कहँ नाथ निहोरा नाहीं।।<br />
देखि कृपानिधि मुनि चतुराई। लिए संग बिहसै द्वौ भाई।।<br />
पंथ कहत निज भगति अनूपा। मुनि आश्रम पहुँचे सुरभूपा।।<br />
तुरत सुतीछन गुर पहिं गयऊ। करि दंडवत कहत अस भयऊ।।<br />
नाथ कौसलाधीस कुमारा। आए मिलन जगत आधारा।।<br />
राम अनुज समेत बैदेही। निसि दिनु देव जपत हहु जेही।।<br />
सुनत अगस्ति तुरत उठि धाए। हरि बिलोकि लोचन जल छाए।।<br />
मुनि पद कमल परे द्वौ भाई। रिषि अति प्रीति लिए उर लाई।।<br />
सादर कुसल पूछि मुनि ग्यानी। आसन बर बैठारे आनी।।<br />
पुनि करि बहु प्रकार प्रभु पूजा। मोहि सम भाग्यवंत नहिं दूजा।।<br />
जहँ लगि रहे अपर मुनि बृंदा। हरषे सब बिलोकि सुखकंदा।।<br />
दो0-मुनि समूह महँ बैठे सन्मुख सब की ओर।<br />
    सरद इंदु तन चितवत मानहुँ निकर चकोर।।12।।<br />
 --*--*--<br />
तब रघुबीर कहा मुनि पाहीं। तुम्ह सन प्रभु दुराव कछु नाही।।<br />
तुम्ह जानहु जेहि कारन आयउँ। ताते तात न कहि समुझायउँ।।<br />
अब सो मंत्र देहु प्रभु मोही। जेहि प्रकार मारौं मुनिद्रोही।।<br />
मुनि मुसकाने सुनि प्रभु बानी। पूछेहु नाथ मोहि का जानी।।<br />
तुम्हरेइँ भजन प्रभाव अघारी। जानउँ महिमा कछुक तुम्हारी।।<br />
ऊमरि तरु बिसाल तव माया। फल ब्रह्मांड अनेक निकाया।।<br />
जीव चराचर जंतु समाना। भीतर बसहि न जानहिं आना।।<br />
ते फल भच्छक कठिन कराला। तव भयँ डरत सदा सोउ काला।।<br />
ते तुम्ह सकल लोकपति साईं। पूँछेहु मोहि मनुज की नाईं।।<br />
यह बर मागउँ कृपानिकेता। बसहु हृदयँ श्री अनुज समेता।।<br />
अबिरल भगति बिरति सतसंगा। चरन सरोरुह प्रीति अभंगा।।<br />
जद्यपि ब्रह्म अखंड अनंता। अनुभव गम्य भजहिं जेहि संता।।<br />
अस तव रूप बखानउँ जानउँ। फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानउँ।।<br />
संतत दासन्ह देहु बड़ाई। तातें मोहि पूँछेहु रघुराई।।<br />
है प्रभु परम मनोहर ठाऊँ। पावन पंचबटी तेहि नाऊँ।।<br />
दंडक बन पुनीत प्रभु करहू। उग्र साप मुनिबर कर हरहू।।<br />
बास करहु तहँ रघुकुल राया। कीजे सकल मुनिन्ह पर दाया।।<br />
चले राम मुनि आयसु पाई। तुरतहिं पंचबटी निअराई।।<br />
दो0-गीधराज सैं भैंट भइ बहु बिधि प्रीति बढ़ाइ।।<br />
   गोदावरी निकट प्रभु रहे परन गृह छाइ।।13।।<br />
 --*--*--<br />
जब ते राम कीन्ह तहँ बासा। सुखी भए मुनि बीती त्रासा।।<br />
गिरि बन नदीं ताल छबि छाए। दिन दिन प्रति अति हौहिं सुहाए।।<br />
खग मृग बृंद अनंदित रहहीं। मधुप मधुर गंजत छबि लहहीं।।<br />
सो बन बरनि न सक अहिराजा। जहाँ प्रगट रघुबीर बिराजा।।<br />
एक बार प्रभु सुख आसीना। लछिमन बचन कहे छलहीना।।<br />
सुर नर मुनि सचराचर साईं। मैं पूछउँ निज प्रभु की नाई।।<br />
मोहि समुझाइ कहहु सोइ देवा। सब तजि करौं चरन रज सेवा।।<br />
कहहु ग्यान बिराग अरु माया। कहहु सो भगति करहु जेहिं दाया।।<br />
दो0- ईस्वर जीव भेद प्रभु सकल कहौ समुझाइ।।<br />
     जातें होइ चरन रति सोक मोह भ्रम जाइ।।14।।<br />
 --*--*--<br />
थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई। सुनहु तात मति मन चित लाई।।<br />
मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया।।<br />
गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई।।<br />
तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ। बिद्या अपर अबिद्या दोऊ।।<br />
एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा। जा बस जीव परा भवकूपा।।<br />
एक रचइ जग गुन बस जाकें। प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें।।<br />
ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं। देख ब्रह्म समान सब माही।।<br />
कहिअ तात सो परम बिरागी। तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी।।<br />
दो0-माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव।<br />
   बंध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव।।15।।<br />
 --*--*--<br />
धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना।।<br />
जातें बेगि द्रवउँ मैं भाई। सो मम भगति भगत सुखदाई।।<br />
सो सुतंत्र अवलंब न आना। तेहि आधीन ग्यान बिग्याना।।<br />
भगति तात अनुपम सुखमूला। मिलइ जो संत होइँ अनुकूला।।<br />
भगति कि साधन कहउँ बखानी। सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी।।<br />
प्रथमहिं बिप्र चरन अति प्रीती। निज निज कर्म निरत श्रुति रीती।।<br />
एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा। तब मम धर्म उपज अनुरागा।।<br />
श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़ाहीं। मम लीला रति अति मन माहीं।।<br />
संत चरन पंकज अति प्रेमा। मन क्रम बचन भजन दृढ़ नेमा।।<br />
गुरु पितु मातु बंधु पति देवा। सब मोहि कहँ जाने दृढ़ सेवा।।<br />
मम गुन गावत पुलक सरीरा। गदगद गिरा नयन बह नीरा।।<br />
काम आदि मद दंभ न जाकें। तात निरंतर बस मैं ताकें।।<br />
दो0-बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम।।<br />
   तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम।।16।।<br />
 --*--*--<br />
भगति जोग सुनि अति सुख पावा। लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नावा।।<br />
एहि बिधि गए कछुक दिन बीती। कहत बिराग ग्यान गुन नीती।।<br />
सूपनखा रावन कै बहिनी। दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी।।<br />
पंचबटी सो गइ एक बारा। देखि बिकल भइ जुगल कुमारा।।<br />
भ्राता पिता पुत्र उरगारी। पुरुष मनोहर निरखत नारी।।<br />
होइ बिकल सक मनहि न रोकी। जिमि रबिमनि द्रव रबिहि बिलोकी।।<br />
रुचिर रुप धरि प्रभु पहिं जाई। बोली बचन बहुत मुसुकाई।।<br />
तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी। यह सँजोग बिधि रचा बिचारी।।<br />
मम अनुरूप पुरुष जग माहीं। देखेउँ खोजि लोक तिहु नाहीं।।<br />
ताते अब लगि रहिउँ कुमारी। मनु माना कछु तुम्हहि निहारी।।<br />
सीतहि चितइ कही प्रभु बाता। अहइ कुआर मोर लघु भ्राता।।<br />
गइ लछिमन रिपु भगिनी जानी। प्रभु बिलोकि बोले मृदु बानी।।<br />
सुंदरि सुनु मैं उन्ह कर दासा। पराधीन नहिं तोर सुपासा।।<br />
प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा। जो कछु करहिं उनहि सब छाजा।।<br />
सेवक सुख चह मान भिखारी। ब्यसनी धन सुभ गति बिभिचारी।।<br />
लोभी जसु चह चार गुमानी। नभ दुहि दूध चहत ए प्रानी।।<br />
पुनि फिरि राम निकट सो आई। प्रभु लछिमन पहिं बहुरि पठाई।।<br />
लछिमन कहा तोहि सो बरई। जो तृन तोरि लाज परिहरई।।<br />
तब खिसिआनि राम पहिं गई। रूप भयंकर प्रगटत भई।।<br />
सीतहि सभय देखि रघुराई। कहा अनुज सन सयन बुझाई।।<br />
दो0-लछिमन अति लाघवँ सो नाक कान बिनु कीन्हि।<br />
     ताके कर रावन कहँ मनौ चुनौती दीन्हि।।17।।<br />
 --*--*--<br />
नाक कान बिनु भइ बिकरारा। जनु स्त्रव सैल गैरु कै धारा।।<br />
खर दूषन पहिं गइ बिलपाता। धिग धिग तव पौरुष बल भ्राता।।<br />
तेहि पूछा सब कहेसि बुझाई। जातुधान सुनि सेन बनाई।।<br />
धाए निसिचर निकर बरूथा। जनु सपच्छ कज्जल गिरि जूथा।।<br />
नाना बाहन नानाकारा। नानायुध धर घोर अपारा।।<br />
सुपनखा आगें करि लीनी। असुभ रूप श्रुति नासा हीनी।।<br />
असगुन अमित होहिं भयकारी। गनहिं न मृत्यु बिबस सब झारी।।<br />
गर्जहि तर्जहिं गगन उड़ाहीं। देखि कटकु भट अति हरषाहीं।।<br />
कोउ कह जिअत धरहु द्वौ भाई। धरि मारहु तिय लेहु छड़ाई।।<br />
धूरि पूरि नभ मंडल रहा। राम बोलाइ अनुज सन कहा।।<br />
लै जानकिहि जाहु गिरि कंदर। आवा निसिचर कटकु भयंकर।।<br />
रहेहु सजग सुनि प्रभु कै बानी। चले सहित श्री सर धनु पानी।।<br />
देखि राम रिपुदल चलि आवा। बिहसि कठिन कोदंड चढ़ावा।।<br />
छं0-कोदंड कठिन चढ़ाइ सिर जट जूट बाँधत सोह क्यों।<br />
   मरकत सयल पर लरत दामिनि कोटि सों जुग भुजग ज्यों।।<br />
   कटि कसि निषंग बिसाल भुज गहि चाप बिसिख सुधारि कै।।<br />
   चितवत मनहुँ मृगराज प्रभु गजराज घटा निहारि कै।।<br />
सो0-आइ गए बगमेल धरहु धरहु धावत सुभट।<br />
    जथा बिलोकि अकेल बाल रबिहि घेरत दनुज।।18।।<br />
प्रभु बिलोकि सर सकहिं न डारी। थकित भई रजनीचर धारी।।<br />
सचिव बोलि बोले खर दूषन। यह कोउ नृपबालक नर भूषन।।<br />
नाग असुर सुर नर मुनि जेते। देखे जिते हते हम केते।।<br />
हम भरि जन्म सुनहु सब भाई। देखी नहिं असि सुंदरताई।।<br />
जद्यपि भगिनी कीन्ह कुरूपा। बध लायक नहिं पुरुष अनूपा।।<br />
देहु तुरत निज नारि दुराई। जीअत भवन जाहु द्वौ भाई।।<br />
मोर कहा तुम्ह ताहि सुनावहु। तासु बचन सुनि आतुर आवहु।।<br />
दूतन्ह कहा राम सन जाई। सुनत राम बोले मुसकाई।।<br />
हम छत्री मृगया बन करहीं। तुम्ह से खल मृग खौजत फिरहीं।।<br />
रिपु बलवंत देखि नहिं डरहीं। एक बार कालहु सन लरहीं।।<br />
जद्यपि मनुज दनुज कुल घालक। मुनि पालक खल सालक बालक।।<br />
जौं न होइ बल घर फिरि जाहू। समर बिमुख मैं हतउँ न काहू।।<br />
रन चढ़ि करिअ कपट चतुराई। रिपु पर कृपा परम कदराई।।<br />
दूतन्ह जाइ तुरत सब कहेऊ। सुनि खर दूषन उर अति दहेऊ।।<br />
छं-उर दहेउ कहेउ कि धरहु धाए बिकट भट रजनीचरा।<br />
  सर चाप तोमर सक्ति सूल कृपान परिघ परसु धरा।।<br />
  प्रभु कीन्ह धनुष टकोर प्रथम कठोर घोर भयावहा।<br />
  भए बधिर ब्याकुल जातुधान न ग्यान तेहि अवसर रहा।।<br />
दो0-सावधान होइ धाए जानि सबल आराति।<br />
    लागे बरषन राम पर अस्त्र सस्त्र बहु भाँति।।19(क)।।<br />
    तिन्ह के आयुध तिल सम करि काटे रघुबीर।<br />
    तानि सरासन श्रवन लगि पुनि छाँड़े निज तीर।।19(ख)।।<br />
 --*--*--<br />
छं0-तब चले जान बबान कराल। फुंकरत जनु बहु ब्याल।।<br />
    कोपेउ समर श्रीराम। चले बिसिख निसित निकाम।।<br />
    अवलोकि खरतर तीर। मुरि चले निसिचर बीर।।<br />
    भए क्रुद्ध तीनिउ भाइ। जो भागि रन ते जाइ।।<br />
    तेहि बधब हम निज पानि। फिरे मरन मन महुँ ठानि।।<br />
    आयुध अनेक प्रकार। सनमुख ते करहिं प्रहार।।<br />
    रिपु परम कोपे जानि। प्रभु धनुष सर संधानि।।<br />
    छाँड़े बिपुल नाराच। लगे कटन बिकट पिसाच।।<br />
    उर सीस भुज कर चरन। जहँ तहँ लगे महि परन।।<br />
    चिक्करत लागत बान। धर परत कुधर समान।।<br />
    भट कटत तन सत खंड। पुनि उठत करि पाषंड।।<br />
    नभ उड़त बहु भुज मुंड। बिनु मौलि धावत रुंड।।<br />
    खग कंक काक सृगाल। कटकटहिं कठिन कराल।।<br />
छं0-कटकटहिं ज़ंबुक भूत प्रेत पिसाच खर्पर संचहीं।<br />
   बेताल बीर कपाल ताल बजाइ जोगिनि नंचहीं।।<br />
   रघुबीर बान प्रचंड खंडहिं भटन्ह के उर भुज सिरा।<br />
   जहँ तहँ परहिं उठि लरहिं धर धरु धरु करहिं भयकर गिरा।।<br />
   अंतावरीं गहि उड़त गीध पिसाच कर गहि धावहीं।।<br />
   संग्राम पुर बासी मनहुँ बहु बाल गुड़ी उड़ावहीं।।<br />
   मारे पछारे उर बिदारे बिपुल भट कहँरत परे।<br />
   अवलोकि निज दल बिकल भट तिसिरादि खर दूषन फिरे।।<br />
   सर सक्ति तोमर परसु सूल कृपान एकहि बारहीं।<br />
   करि कोप श्रीरघुबीर पर अगनित निसाचर डारहीं।।<br />
   प्रभु निमिष महुँ रिपु सर निवारि पचारि डारे सायका।<br />
   दस दस बिसिख उर माझ मारे सकल निसिचर नायका।।<br />
   महि परत उठि भट भिरत मरत न करत माया अति घनी।<br />
   सुर डरत चौदह सहस प्रेत बिलोकि एक अवध धनी।।<br />
   सुर मुनि सभय प्रभु देखि मायानाथ अति कौतुक कर् यो।<br />
   देखहि परसपर राम करि संग्राम रिपुदल लरि मर् यो।।<br />
दो0-राम राम कहि तनु तजहिं पावहिं पद निर्बान।<br />
   करि उपाय रिपु मारे छन महुँ कृपानिधान।।20(क)।।<br />
   हरषित बरषहिं सुमन सुर बाजहिं गगन निसान।<br />
   अस्तुति करि करि सब चले सोभित बिबिध बिमान।।20(ख)।।<br />
 --*--*--<br />
जब रघुनाथ समर रिपु जीते। सुर नर मुनि सब के भय बीते।।<br />
तब लछिमन सीतहि लै आए। प्रभु पद परत हरषि उर लाए।<br />
सीता चितव स्याम मृदु गाता। परम प्रेम लोचन न अघाता।।<br />
पंचवटीं बसि श्रीरघुनायक। करत चरित सुर मुनि सुखदायक।।<br />
धुआँ देखि खरदूषन केरा। जाइ सुपनखाँ रावन प्रेरा।।<br />
बोलि बचन क्रोध करि भारी। देस कोस कै सुरति बिसारी।।<br />
करसि पान सोवसि दिनु राती। सुधि नहिं तव सिर पर आराती।।<br />
राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा। हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा।।<br />
बिद्या बिनु बिबेक उपजाएँ। श्रम फल पढ़े किएँ अरु पाएँ।।<br />
संग ते जती कुमंत्र ते राजा। मान ते ग्यान पान तें लाजा।।<br />
प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी। नासहि बेगि नीति अस सुनी।।<br />
सो0-रिपु रुज पावक पाप प्रभु अहि गनिअ न छोट करि।<br />
    अस कहि बिबिध बिलाप करि लागी रोदन करन।।21(क)।।<br />
दो0-सभा माझ परि ब्याकुल बहु प्रकार कह रोइ।<br />
   तोहि जिअत दसकंधर मोरि कि असि गति होइ।।21(ख)।।<br />
 --*--*--<br />
सुनत सभासद उठे अकुलाई। समुझाई गहि बाहँ उठाई।।<br />
कह लंकेस कहसि निज बाता। केँइँ तव नासा कान निपाता।।<br />
अवध नृपति दसरथ के जाए। पुरुष सिंघ बन खेलन आए।।<br />
समुझि परी मोहि उन्ह कै करनी। रहित निसाचर करिहहिं धरनी।।<br />
जिन्ह कर भुजबल पाइ दसानन। अभय भए बिचरत मुनि कानन।।<br />
देखत बालक काल समाना। परम धीर धन्वी गुन नाना।।<br />
अतुलित बल प्रताप द्वौ भ्राता। खल बध रत सुर मुनि सुखदाता।।<br />
सोभाधाम राम अस नामा। तिन्ह के संग नारि एक स्यामा।।<br />
रुप रासि बिधि नारि सँवारी। रति सत कोटि तासु बलिहारी।।<br />
तासु अनुज काटे श्रुति नासा। सुनि तव भगिनि करहिं परिहासा।।<br />
खर दूषन सुनि लगे पुकारा। छन महुँ सकल कटक उन्ह मारा।।<br />
खर दूषन तिसिरा कर घाता। सुनि दससीस जरे सब गाता।।<br />
दो0-सुपनखहि समुझाइ करि बल बोलेसि बहु भाँति।<br />
    गयउ भवन अति सोचबस नीद परइ नहिं राति।।22।।<br />
 --*--*--<br />
सुर नर असुर नाग खग माहीं। मोरे अनुचर कहँ कोउ नाहीं।।<br />
खर दूषन मोहि सम बलवंता। तिन्हहि को मारइ बिनु भगवंता।।<br />
सुर रंजन भंजन महि भारा। जौं भगवंत लीन्ह अवतारा।।<br />
तौ मै जाइ बैरु हठि करऊँ। प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ।।<br />
होइहि भजनु न तामस देहा। मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा।।<br />
जौं नररुप भूपसुत कोऊ। हरिहउँ नारि जीति रन दोऊ।।<br />
चला अकेल जान चढि तहवाँ। बस मारीच सिंधु तट जहवाँ।।<br />
इहाँ राम जसि जुगुति बनाई। सुनहु उमा सो कथा सुहाई।।<br />
दो0-लछिमन गए बनहिं जब लेन मूल फल कंद।<br />
   जनकसुता सन बोले बिहसि कृपा सुख बृंद।। 23।।<br />
 --*--*--<br />
सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला।।<br />
तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा। जौ लगि करौं निसाचर नासा।।<br />
जबहिं राम सब कहा बखानी। प्रभु पद धरि हियँ अनल समानी।।<br />
निज प्रतिबिंब राखि तहँ सीता। तैसइ सील रुप सुबिनीता।।<br />
लछिमनहूँ यह मरमु न जाना। जो कछु चरित रचा भगवाना।।<br />
दसमुख गयउ जहाँ मारीचा। नाइ माथ स्वारथ रत नीचा।।<br />
नवनि नीच कै अति दुखदाई। जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई।।<br />
भयदायक खल कै प्रिय बानी। जिमि अकाल के कुसुम भवानी।।<br />
दो0-करि पूजा मारीच तब सादर पूछी बात।<br />
   कवन हेतु मन ब्यग्र अति अकसर आयहु तात।।24।।<br />
 --*--*--<br />
दसमुख सकल कथा तेहि आगें। कही सहित अभिमान अभागें।।<br />
होहु कपट मृग तुम्ह छलकारी। जेहि बिधि हरि आनौ नृपनारी।।<br />
तेहिं पुनि कहा सुनहु दससीसा। ते नररुप चराचर ईसा।।<br />
तासों तात बयरु नहिं कीजे। मारें मरिअ जिआएँ जीजै।।<br />
मुनि मख राखन गयउ कुमारा। बिनु फर सर रघुपति मोहि मारा।।<br />
सत जोजन आयउँ छन माहीं। तिन्ह सन बयरु किएँ भल नाहीं।।<br />
भइ मम कीट भृंग की नाई। जहँ तहँ मैं देखउँ दोउ भाई।।<br />
जौं नर तात तदपि अति सूरा। तिन्हहि बिरोधि न आइहि पूरा।।<br />
दो0-जेहिं ताड़का सुबाहु हति खंडेउ हर कोदंड।।<br />
   खर दूषन तिसिरा बधेउ मनुज कि अस बरिबंड।।25।।<br />
 --*--*--<br />
जाहु भवन कुल कुसल बिचारी। सुनत जरा दीन्हिसि बहु गारी।।<br />
गुरु जिमि मूढ़ करसि मम बोधा। कहु जग मोहि समान को जोधा।।<br />
तब मारीच हृदयँ अनुमाना। नवहि बिरोधें नहिं कल्याना।।<br />
सस्त्री मर्मी प्रभु सठ धनी। बैद बंदि कबि भानस गुनी।।<br />
उभय भाँति देखा निज मरना। तब ताकिसि रघुनायक सरना।।<br />
उतरु देत मोहि बधब अभागें। कस न मरौं रघुपति सर लागें।।<br />
अस जियँ जानि दसानन संगा। चला राम पद प्रेम अभंगा।।<br />
मन अति हरष जनाव न तेही। आजु देखिहउँ परम सनेही।।<br />
छं0- निज परम प्रीतम देखि लोचन सुफल करि सुख पाइहौं।<br />
    श्री सहित अनुज समेत कृपानिकेत पद मन लाइहौं।।<br />
    निर्बान दायक क्रोध जा कर भगति अबसहि बसकरी।<br />
    निज पानि सर संधानि सो मोहि बधिहि सुखसागर हरी।।<br />
दो0-मम पाछें धर धावत धरें सरासन बान।<br />
   फिरि फिरि प्रभुहि बिलोकिहउँ धन्य न मो सम आन।।26।।<br />
 --*--*--<br />
तेहि बन निकट दसानन गयऊ। तब मारीच कपटमृग भयऊ।।<br />
अति बिचित्र कछु बरनि न जाई। कनक देह मनि रचित बनाई।।<br />
सीता परम रुचिर मृग देखा। अंग अंग सुमनोहर बेषा।।<br />
सुनहु देव रघुबीर कृपाला। एहि मृग कर अति सुंदर छाला।।<br />
सत्यसंध प्रभु बधि करि एही। आनहु चर्म कहति बैदेही।।<br />
तब रघुपति जानत सब कारन। उठे हरषि सुर काजु सँवारन।।<br />
मृग बिलोकि कटि परिकर बाँधा। करतल चाप रुचिर सर साँधा।।<br />
प्रभु लछिमनिहि कहा समुझाई। फिरत बिपिन निसिचर बहु भाई।।<br />
सीता केरि करेहु रखवारी। बुधि बिबेक बल समय बिचारी।।<br />
प्रभुहि बिलोकि चला मृग भाजी। धाए रामु सरासन साजी।।<br />
निगम नेति सिव ध्यान न पावा। मायामृग पाछें सो धावा।।<br />
कबहुँ निकट पुनि दूरि पराई। कबहुँक प्रगटइ कबहुँ छपाई।।<br />
प्रगटत दुरत करत छल भूरी। एहि बिधि प्रभुहि गयउ लै दूरी।।<br />
तब तकि राम कठिन सर मारा। धरनि परेउ करि घोर पुकारा।।<br />
लछिमन कर प्रथमहिं लै नामा। पाछें सुमिरेसि मन महुँ रामा।।<br />
प्रान तजत प्रगटेसि निज देहा। सुमिरेसि रामु समेत सनेहा।।<br />
अंतर प्रेम तासु पहिचाना। मुनि दुर्लभ गति दीन्हि सुजाना।।<br />
दो0-बिपुल सुमन सुर बरषहिं गावहिं प्रभु गुन गाथ।<br />
   निज पद दीन्ह असुर कहुँ दीनबंधु रघुनाथ।।27।।<br />
 --*--*--<br />
खल बधि तुरत फिरे रघुबीरा। सोह चाप कर कटि तूनीरा।।<br />
आरत गिरा सुनी जब सीता। कह लछिमन सन परम सभीता।।<br />
जाहु बेगि संकट अति भ्राता। लछिमन बिहसि कहा सुनु माता।।<br />
भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई। सपनेहुँ संकट परइ कि सोई।।<br />
मरम बचन जब सीता बोला। हरि प्रेरित लछिमन मन डोला।।<br />
बन दिसि देव सौंपि सब काहू। चले जहाँ रावन ससि राहू।।<br />
सून बीच दसकंधर देखा। आवा निकट जती कें बेषा।।<br />
जाकें डर सुर असुर डेराहीं। निसि न नीद दिन अन्न न खाहीं।।<br />
सो दससीस स्वान की नाई। इत उत चितइ चला भड़िहाई।।<br />
इमि कुपंथ पग देत खगेसा। रह न तेज बुधि बल लेसा।।<br />
नाना बिधि करि कथा सुहाई। राजनीति भय प्रीति देखाई।।<br />
कह सीता सुनु जती गोसाईं। बोलेहु बचन दुष्ट की नाईं।।<br />
तब रावन निज रूप देखावा। भई सभय जब नाम सुनावा।।<br />
कह सीता धरि धीरजु गाढ़ा। आइ गयउ प्रभु रहु खल ठाढ़ा।।<br />
जिमि हरिबधुहि छुद्र सस चाहा। भएसि कालबस निसिचर नाहा।।<br />
सुनत बचन दससीस रिसाना। मन महुँ चरन बंदि सुख माना।।<br />
दो0-क्रोधवंत तब रावन लीन्हिसि रथ बैठाइ।<br />
   चला गगनपथ आतुर भयँ रथ हाँकि न जाइ।।28।।<br />
 --*--*--<br />
हा जग एक बीर रघुराया। केहिं अपराध बिसारेहु दाया।।<br />
आरति हरन सरन सुखदायक। हा रघुकुल सरोज दिननायक।।<br />
हा लछिमन तुम्हार नहिं दोसा। सो फलु पायउँ कीन्हेउँ रोसा।।<br />
बिबिध बिलाप करति बैदेही। भूरि कृपा प्रभु दूरि सनेही।।<br />
बिपति मोरि को प्रभुहि सुनावा। पुरोडास चह रासभ खावा।।<br />
सीता कै बिलाप सुनि भारी। भए चराचर जीव दुखारी।।<br />
गीधराज सुनि आरत बानी। रघुकुलतिलक नारि पहिचानी।।<br />
अधम निसाचर लीन्हे जाई। जिमि मलेछ बस कपिला गाई।।<br />
सीते पुत्रि करसि जनि त्रासा। करिहउँ जातुधान कर नासा।।<br />
धावा क्रोधवंत खग कैसें। छूटइ पबि परबत कहुँ जैसे।।<br />
रे रे दुष्ट ठाढ़ किन होही। निर्भय चलेसि न जानेहि मोही।।<br />
आवत देखि कृतांत समाना। फिरि दसकंधर कर अनुमाना।।<br />
की मैनाक कि खगपति होई। मम बल जान सहित पति सोई।।<br />
जाना जरठ जटायू एहा। मम कर तीरथ छाँड़िहि देहा।।<br />
सुनत गीध क्रोधातुर धावा। कह सुनु रावन मोर सिखावा।।<br />
तजि जानकिहि कुसल गृह जाहू। नाहिं त अस होइहि बहुबाहू।।<br />
राम रोष पावक अति घोरा। होइहि सकल सलभ कुल तोरा।।<br />
उतरु न देत दसानन जोधा। तबहिं गीध धावा करि क्रोधा।।<br />
धरि कच बिरथ कीन्ह महि गिरा। सीतहि राखि गीध पुनि फिरा।।<br />
चौचन्ह मारि बिदारेसि देही। दंड एक भइ मुरुछा तेही।।<br />
तब सक्रोध निसिचर खिसिआना। काढ़ेसि परम कराल कृपाना।।<br />
काटेसि पंख परा खग धरनी। सुमिरि राम करि अदभुत करनी।।<br />
सीतहि जानि चढ़ाइ बहोरी। चला उताइल त्रास न थोरी।।<br />
करति बिलाप जाति नभ सीता। ब्याध बिबस जनु मृगी सभीता।।<br />
गिरि पर बैठे कपिन्ह निहारी। कहि हरि नाम दीन्ह पट डारी।।<br />
एहि बिधि सीतहि सो लै गयऊ। बन असोक महँ राखत भयऊ।।<br />
दो0-हारि परा खल बहु बिधि भय अरु प्रीति देखाइ।<br />
    तब असोक पादप तर राखिसि जतन कराइ।।29(क)।।<br />
           नवान्हपारायण, छठा विश्राम<br />
    जेहि बिधि कपट कुरंग सँग धाइ चले श्रीराम।<br />
    सो छबि सीता राखि उर रटति रहति हरिनाम।।29(ख)।।<br />
 --*--*--<br />
रघुपति अनुजहि आवत देखी। बाहिज चिंता कीन्हि बिसेषी।।<br />
जनकसुता परिहरिहु अकेली। आयहु तात बचन मम पेली।।<br />
निसिचर निकर फिरहिं बन माहीं। मम मन सीता आश्रम नाहीं।।<br />
गहि पद कमल अनुज कर जोरी। कहेउ नाथ कछु मोहि न खोरी।।<br />
अनुज समेत गए प्रभु तहवाँ। गोदावरि तट आश्रम जहवाँ।।<br />
आश्रम देखि जानकी हीना। भए बिकल जस प्राकृत दीना।।<br />
हा गुन खानि जानकी सीता। रूप सील ब्रत नेम पुनीता।।<br />
लछिमन समुझाए बहु भाँती। पूछत चले लता तरु पाँती।।<br />
हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी।।<br />
खंजन सुक कपोत मृग मीना। मधुप निकर कोकिला प्रबीना।।<br />
कुंद कली दाड़िम दामिनी। कमल सरद ससि अहिभामिनी।।<br />
बरुन पास मनोज धनु हंसा। गज केहरि निज सुनत प्रसंसा।।<br />
श्रीफल कनक कदलि हरषाहीं। नेकु न संक सकुच मन माहीं।।<br />
सुनु जानकी तोहि बिनु आजू। हरषे सकल पाइ जनु राजू।।<br />
किमि सहि जात अनख तोहि पाहीं । प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाहीं।।<br />
एहि बिधि खौजत बिलपत स्वामी। मनहुँ महा बिरही अति कामी।।<br />
पूरनकाम राम सुख रासी। मनुज चरित कर अज अबिनासी।।<br />
आगे परा गीधपति देखा। सुमिरत राम चरन जिन्ह रेखा।।<br />
दो0-कर सरोज सिर परसेउ कृपासिंधु रधुबीर।।<br />
   निरखि राम छबि धाम मुख बिगत भई सब पीर।।30।।<br />
 --*--*--<br />
तब कह गीध बचन धरि धीरा । सुनहु राम भंजन भव भीरा।।<br />
नाथ दसानन यह गति कीन्ही। तेहि खल जनकसुता हरि लीन्ही।।<br />
लै दच्छिन दिसि गयउ गोसाई। बिलपति अति कुररी की नाई।।<br />
दरस लागी प्रभु राखेंउँ प्राना। चलन चहत अब कृपानिधाना।।<br />
राम कहा तनु राखहु ताता। मुख मुसकाइ कही तेहिं बाता।।<br />
जा कर नाम मरत मुख आवा। अधमउ मुकुत होई श्रुति गावा।।<br />
सो मम लोचन गोचर आगें। राखौं देह नाथ केहि खाँगेँ।।<br />
जल भरि नयन कहहिँ रघुराई। तात कर्म निज ते गतिं पाई।।<br />
परहित बस जिन्ह के मन माहीँ। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीँ।।<br />
तनु तजि तात जाहु मम धामा। देउँ काह तुम्ह पूरनकामा।।<br />
दो0-सीता हरन तात जनि कहहु पिता सन जाइ।।<br />
    जौँ मैँ राम त कुल सहित कहिहि दसानन आइ।।31।।<br />
 --*--*--<br />
गीध देह तजि धरि हरि रुपा। भूषन बहु पट पीत अनूपा।।<br />
स्याम गात बिसाल भुज चारी। अस्तुति करत नयन भरि बारी।।<br />
छं0-जय राम रूप अनूप निर्गुन सगुन गुन प्रेरक सही।<br />
   दससीस बाहु प्रचंड खंडन चंड सर मंडन मही।।<br />
   पाथोद गात सरोज मुख राजीव आयत लोचनं।<br />
   नित नौमि रामु कृपाल बाहु बिसाल भव भय मोचनं।।1।।<br />
   बलमप्रमेयमनादिमजमब्यक्तमेकमगोचरं।<br />
   गोबिंद गोपर द्वंद्वहर बिग्यानघन धरनीधरं।।<br />
   जे राम मंत्र जपंत संत अनंत जन मन रंजनं।<br />
   नित नौमि राम अकाम प्रिय कामादि खल दल गंजनं।।2।<br />
   जेहि श्रुति निरंजन ब्रह्म ब्यापक बिरज अज कहि गावहीं।।<br />
   करि ध्यान ग्यान बिराग जोग अनेक मुनि जेहि पावहीं।।<br />
   सो प्रगट करुना कंद सोभा बृंद अग जग मोहई।<br />
   मम हृदय पंकज भृंग अंग अनंग बहु छबि सोहई।।3।।<br />
   जो अगम सुगम सुभाव निर्मल असम सम सीतल सदा।<br />
   पस्यंति जं जोगी जतन करि करत मन गो बस सदा।।<br />
   सो राम रमा निवास संतत दास बस त्रिभुवन धनी।<br />
   मम उर बसउ सो समन संसृति जासु कीरति पावनी।।4।।<br />
दो0-अबिरल भगति मागि बर गीध गयउ हरिधाम।<br />
   तेहि की क्रिया जथोचित निज कर कीन्ही राम।।32।।<br />
 --*--*--<br />
कोमल चित अति दीनदयाला। कारन बिनु रघुनाथ कृपाला।।<br />
गीध अधम खग आमिष भोगी। गति दीन्हि जो जाचत जोगी।।<br />
सुनहु उमा ते लोग अभागी। हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी।।<br />
पुनि सीतहि खोजत द्वौ भाई। चले बिलोकत बन बहुताई।।<br />
संकुल लता बिटप घन कानन। बहु खग मृग तहँ गज पंचानन।।<br />
आवत पंथ कबंध निपाता। तेहिं सब कही साप कै बाता।।<br />
दुरबासा मोहि दीन्ही सापा। प्रभु पद पेखि मिटा सो पापा।।<br />
सुनु गंधर्ब कहउँ मै तोही। मोहि न सोहाइ ब्रह्मकुल द्रोही।।<br />
दो0-मन क्रम बचन कपट तजि जो कर भूसुर सेव।<br />
   मोहि समेत बिरंचि सिव बस ताकें सब देव।।33।।<br />
 --*--*--<br />
सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता।।<br />
पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।।<br />
कहि निज धर्म ताहि समुझावा। निज पद प्रीति देखि मन भावा।।<br />
रघुपति चरन कमल सिरु नाई। गयउ गगन आपनि गति पाई।।<br />
ताहि देइ गति राम उदारा। सबरी कें आश्रम पगु धारा।।<br />
सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए।।<br />
सरसिज लोचन बाहु बिसाला। जटा मुकुट सिर उर बनमाला।।<br />
स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। सबरी परी चरन लपटाई।।<br />
प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा।।<br />
सादर जल लै चरन पखारे। पुनि सुंदर आसन बैठारे।।<br />
दो0-कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि।<br />
   प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि।।34।।<br />
 --*--*--<br />
पानि जोरि आगें भइ ठाढ़ी। प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी।।<br />
केहि बिधि अस्तुति करौ तुम्हारी। अधम जाति मैं जड़मति भारी।।<br />
अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी।।<br />
कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता।।<br />
जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई।।<br />
भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा।।<br />
नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं।।<br />
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।।<br />
दो0-गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।<br />
   चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान।।35।।<br />
 --*--*--<br />
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा।।<br />
छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा।।<br />
सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा।।<br />
आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा।।<br />
नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना।।<br />
नव महुँ एकउ जिन्ह के होई। नारि पुरुष सचराचर कोई।।<br />
सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरे। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें।।<br />
जोगि बृंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई।।<br />
मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज सरूपा।।<br />
जनकसुता कइ सुधि भामिनी। जानहि कहु करिबरगामिनी।।<br />
पंपा सरहि जाहु रघुराई। तहँ होइहि सुग्रीव मिताई।।<br />
सो सब कहिहि देव रघुबीरा। जानतहूँ पूछहु मतिधीरा।।<br />
बार बार प्रभु पद सिरु नाई। प्रेम सहित सब कथा सुनाई।।<br />
छं0-कहि कथा सकल बिलोकि हरि मुख हृदयँ पद पंकज धरे।<br />
   तजि जोग पावक देह हरि पद लीन भइ जहँ नहिं फिरे।।<br />
   नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू।<br />
   बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागहू।।<br />
दो0-जाति हीन अघ जन्म महि मुक्त कीन्हि असि नारि।<br />
   महामंद मन सुख चहसि ऐसे प्रभुहि बिसारि।।36।।<br />
 --*--*--<br />
चले राम त्यागा बन सोऊ। अतुलित बल नर केहरि दोऊ।।<br />
बिरही इव प्रभु करत बिषादा। कहत कथा अनेक संबादा।।<br />
लछिमन देखु बिपिन कइ सोभा। देखत केहि कर मन नहिं छोभा।।<br />
नारि सहित सब खग मृग बृंदा। मानहुँ मोरि करत हहिं निंदा।।<br />
हमहि देखि मृग निकर पराहीं। मृगीं कहहिं तुम्ह कहँ भय नाहीं।।<br />
तुम्ह आनंद करहु मृग जाए। कंचन मृग खोजन ए आए।।<br />
संग लाइ करिनीं करि लेहीं। मानहुँ मोहि सिखावनु देहीं।।<br />
सास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ। भूप सुसेवित बस नहिं लेखिअ।।<br />
राखिअ नारि जदपि उर माहीं। जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं।।<br />
देखहु तात बसंत सुहावा। प्रिया हीन मोहि भय उपजावा।।<br />
दो0-बिरह बिकल बलहीन मोहि जानेसि निपट अकेल।<br />
   सहित बिपिन मधुकर खग मदन कीन्ह बगमेल।।37(क)।।<br />
   देखि गयउ भ्राता सहित तासु दूत सुनि बात।<br />
   डेरा कीन्हेउ मनहुँ तब कटकु हटकि मनजात।।37(ख)।।<br />
 --*--*--<br />
बिटप बिसाल लता अरुझानी। बिबिध बितान दिए जनु तानी।।<br />
कदलि ताल बर धुजा पताका। दैखि न मोह धीर मन जाका।।<br />
बिबिध भाँति फूले तरु नाना। जनु बानैत बने बहु बाना।।<br />
कहुँ कहुँ सुन्दर बिटप सुहाए। जनु भट बिलग बिलग होइ छाए।।<br />
कूजत पिक मानहुँ गज माते। ढेक महोख ऊँट बिसराते।।<br />
मोर चकोर कीर बर बाजी। पारावत मराल सब ताजी।।<br />
तीतिर लावक पदचर जूथा। बरनि न जाइ मनोज बरुथा।।<br />
रथ गिरि सिला दुंदुभी झरना। चातक बंदी गुन गन बरना।।<br />
मधुकर मुखर भेरि सहनाई। त्रिबिध बयारि बसीठीं आई।।<br />
चतुरंगिनी सेन सँग लीन्हें। बिचरत सबहि चुनौती दीन्हें।।<br />
लछिमन देखत काम अनीका। रहहिं धीर तिन्ह कै जग लीका।।<br />
एहि कें एक परम बल नारी। तेहि तें उबर सुभट सोइ भारी।।<br />
दो0-तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ।<br />
   मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महुँ छोभ।।38(क)।।<br />
   लोभ कें इच्छा दंभ बल काम कें केवल नारि।<br />
   क्रोध के परुष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि।।38(ख)।।<br />
 --*--*--<br />
गुनातीत सचराचर स्वामी। राम उमा सब अंतरजामी।।<br />
कामिन्ह कै दीनता देखाई। धीरन्ह कें मन बिरति दृढ़ाई।।<br />
क्रोध मनोज लोभ मद माया। छूटहिं सकल राम कीं दाया।।<br />
सो नर इंद्रजाल नहिं भूला। जा पर होइ सो नट अनुकूला।।<br />
उमा कहउँ मैं अनुभव अपना। सत हरि भजनु जगत सब सपना।।<br />
पुनि प्रभु गए सरोबर तीरा। पंपा नाम सुभग गंभीरा।।<br />
संत हृदय जस निर्मल बारी। बाँधे घाट मनोहर चारी।।<br />
जहँ तहँ पिअहिं बिबिध मृग नीरा। जनु उदार गृह जाचक भीरा।।<br />
दो0-पुरइनि सबन ओट जल बेगि न पाइअ मर्म।<br />
    मायाछन्न न देखिऐ जैसे निर्गुन ब्रह्म।।39(क)।।<br />
    सुखि मीन सब एकरस अति अगाध जल माहिं।<br />
    जथा धर्मसीलन्ह के दिन सुख संजुत जाहिं।।39(ख)।।<br />
 --*--*--<br />
बिकसे सरसिज नाना रंगा। मधुर मुखर गुंजत बहु भृंगा।।<br />
बोलत जलकुक्कुट कलहंसा। प्रभु बिलोकि जनु करत प्रसंसा।।<br />
चक्रवाक बक खग समुदाई। देखत बनइ बरनि नहिं जाई।।<br />
सुन्दर खग गन गिरा सुहाई। जात पथिक जनु लेत बोलाई।।<br />
ताल समीप मुनिन्ह गृह छाए। चहु दिसि कानन बिटप सुहाए।।<br />
चंपक बकुल कदंब तमाला। पाटल पनस परास रसाला।।<br />
नव पल्लव कुसुमित तरु नाना। चंचरीक पटली कर गाना।।<br />
सीतल मंद सुगंध सुभाऊ। संतत बहइ मनोहर बाऊ।।<br />
कुहू कुहू कोकिल धुनि करहीं। सुनि रव सरस ध्यान मुनि टरहीं।।<br />
दो0-फल भारन नमि बिटप सब रहे भूमि निअराइ।<br />
   पर उपकारी पुरुष जिमि नवहिं सुसंपति पाइ।।40।।<br />
 --*--*--<br />
देखि राम अति रुचिर तलावा। मज्जनु कीन्ह परम सुख पावा।।<br />
देखी सुंदर तरुबर छाया। बैठे अनुज सहित रघुराया।।<br />
तहँ पुनि सकल देव मुनि आए। अस्तुति करि निज धाम सिधाए।।<br />
बैठे परम प्रसन्न कृपाला। कहत अनुज सन कथा रसाला।।<br />
बिरहवंत भगवंतहि देखी। नारद मन भा सोच बिसेषी।।<br />
मोर साप करि अंगीकारा। सहत राम नाना दुख भारा।।<br />
ऐसे प्रभुहि बिलोकउँ जाई। पुनि न बनिहि अस अवसरु आई।।<br />
यह बिचारि नारद कर बीना। गए जहाँ प्रभु सुख आसीना।।<br />
गावत राम चरित मृदु बानी। प्रेम सहित बहु भाँति बखानी।।<br />
करत दंडवत लिए उठाई। राखे बहुत बार उर लाई।।<br />
स्वागत पूँछि निकट बैठारे। लछिमन सादर चरन पखारे।।<br />
दो0- नाना बिधि बिनती करि प्रभु प्रसन्न जियँ जानि।<br />
    नारद बोले बचन तब जोरि सरोरुह पानि।।41।।<br />
 --*--*--<br />
सुनहु उदार सहज रघुनायक। सुंदर अगम सुगम बर दायक।।<br />
देहु एक बर मागउँ स्वामी। जद्यपि जानत अंतरजामी।।<br />
जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ। जन सन कबहुँ कि करउँ दुराऊ।।<br />
कवन बस्तु असि प्रिय मोहि लागी। जो मुनिबर न सकहु तुम्ह मागी।।<br />
जन कहुँ कछु अदेय नहिं मोरें। अस बिस्वास तजहु जनि भोरें।।<br />
तब नारद बोले हरषाई । अस बर मागउँ करउँ ढिठाई।।<br />
जद्यपि प्रभु के नाम अनेका। श्रुति कह अधिक एक तें एका।।<br />
राम सकल नामन्ह ते अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका।।<br />
दो0-राका रजनी भगति तव राम नाम सोइ सोम।<br />
   अपर नाम उडगन बिमल बसुहुँ भगत उर ब्योम।।42(क)।।<br />
   एवमस्तु मुनि सन कहेउ कृपासिंधु रघुनाथ।<br />
   तब नारद मन हरष अति प्रभु पद नायउ माथ।।42(ख)।।<br />
 --*--*--<br />
अति प्रसन्न रघुनाथहि जानी। पुनि नारद बोले मृदु बानी।।<br />
राम जबहिं प्रेरेउ निज माया। मोहेहु मोहि सुनहु रघुराया।।<br />
तब बिबाह मैं चाहउँ कीन्हा। प्रभु केहि कारन करै न दीन्हा।।<br />
सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा। भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा।।<br />
करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी। जिमि बालक राखइ महतारी।।<br />
गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई। तहँ राखइ जननी अरगाई।।<br />
प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता। प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता।।<br />
मोरे प्रौढ़ तनय सम ग्यानी। बालक सुत सम दास अमानी।।<br />
जनहि मोर बल निज बल ताही। दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही।।<br />
यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं। पाएहुँ ग्यान भगति नहिं तजहीं।।<br />
दो0-काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि।<br />
   तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि।।43।।<br />
 --*--*--<br />
सुनि मुनि कह पुरान श्रुति संता। मोह बिपिन कहुँ नारि बसंता।।<br />
जप तप नेम जलाश्रय झारी। होइ ग्रीषम सोषइ सब नारी।।<br />
काम क्रोध मद मत्सर भेका। इन्हहि हरषप्रद बरषा एका।।<br />
दुर्बासना कुमुद समुदाई। तिन्ह कहँ सरद सदा सुखदाई।।<br />
धर्म सकल सरसीरुह बृंदा। होइ हिम तिन्हहि दहइ सुख मंदा।।<br />
पुनि ममता जवास बहुताई। पलुहइ नारि सिसिर रितु पाई।।<br />
पाप उलूक निकर सुखकारी। नारि निबिड़ रजनी अँधिआरी।।<br />
बुधि बल सील सत्य सब मीना। बनसी सम त्रिय कहहिं प्रबीना।।<br />
दो0-अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि।<br />
    ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि।।44।।<br />
 --*--*--<br />
सुनि रघुपति के बचन सुहाए। मुनि तन पुलक नयन भरि आए।।<br />
कहहु कवन प्रभु कै असि रीती। सेवक पर ममता अरु प्रीती।।<br />
जे न भजहिं अस प्रभु भ्रम त्यागी। ग्यान रंक नर मंद अभागी।।<br />
पुनि सादर बोले मुनि नारद। सुनहु राम बिग्यान बिसारद।।<br />
संतन्ह के लच्छन रघुबीरा। कहहु नाथ भव भंजन भीरा।।<br />
सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ। जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ।।<br />
षट बिकार जित अनघ अकामा। अचल अकिंचन सुचि सुखधामा।।<br />
अमितबोध अनीह मितभोगी। सत्यसार कबि कोबिद जोगी।।<br />
सावधान मानद मदहीना। धीर धर्म गति परम प्रबीना।।<br />
दो0-गुनागार संसार दुख रहित बिगत संदेह।।<br />
   तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहुँ देह न गेह।।45।।<br />
 --*--*--<br />
निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं। पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं।।<br />
सम सीतल नहिं त्यागहिं नीती। सरल सुभाउ सबहिं सन प्रीती।।<br />
जप तप ब्रत दम संजम नेमा। गुरु गोबिंद बिप्र पद प्रेमा।।<br />
श्रद्धा छमा मयत्री दाया। मुदिता मम पद प्रीति अमाया।।<br />
बिरति बिबेक बिनय बिग्याना। बोध जथारथ बेद पुराना।।<br />
दंभ मान मद करहिं न काऊ। भूलि न देहिं कुमारग पाऊ।।<br />
गावहिं सुनहिं सदा मम लीला। हेतु रहित परहित रत सीला।।<br />
मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते। कहि न सकहिं सारद श्रुति तेते।।<br />
छं0-कहि सक न सारद सेष नारद सुनत पद पंकज गहे।<br />
   अस दीनबंधु कृपाल अपने भगत गुन निज मुख कहे।।<br />
   सिरु नाह बारहिं बार चरनन्हि ब्रह्मपुर नारद गए।।<br />
   ते धन्य तुलसीदास आस बिहाइ जे हरि रँग रँए।।<br />
दो0-रावनारि जसु पावन गावहिं सुनहिं जे लोग।<br />
   राम भगति दृढ़ पावहिं बिनु बिराग जप जोग।।46(क)।।<br />
   दीप सिखा सम जुबति तन मन जनि होसि पतंग।<br />
   भजहि राम तजि काम मद करहि सदा सतसंग।।46(ख)।।<br />
         मासपारायण, बाईसवाँ विश्राम<br />
             ~~~~~~~~~~<br />
   इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने<br />
          तृतीयः सोपानः समाप्तः।<br />
           (अरण्यकाण्ड समाप्त)<br />
               ~~~~~~~<br />
 --*--*-- </p>
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