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	<title>04-किष्किन्धा-काण्ड &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "04-किष्किन्धा-काण्ड"</description>
	<pubDate>Mon, 07 Jul 2008 12:04:10 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[किष्किन्धा काण्ड]]></title>
<link>http://ramayan.wordpress.com/2006/07/24/%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a7%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a5%8d%e0%a4%a1/</link>
<pubDate>Mon, 24 Jul 2006 07:04:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>jitu9968</dc:creator>
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<description><![CDATA[ ।।राम।।
               श्रीगणेशाय नमः
           श्र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p> ।।राम।।<br />
               श्रीगणेशाय नमः<br />
           श्रीजानकीवल्लभो विजयते<br />
              श्रीरामचरितमानस<br />
               चतुर्थ सोपान<br />
            ( किष्किन्धाकाण्ड)<br />
                 श्लोक<br />
    कुन्देन्दीवरसुन्दरावतिबलौ विज्ञानधामावुभौ<br />
    शोभाढ्यौ वरधन्विनौ श्रुतिनुतौ गोविप्रवृन्दप्रियौ।<br />
    मायामानुषरूपिणौ रघुवरौ सद्धर्मवर्मौं हितौ<br />
    सीतान्वेषणतत्परौ पथिगतौ भक्तिप्रदौ तौ हि नः।।1।।<br />
    ब्रह्माम्भोधिसमुद्भवं कलिमलप्रध्वंसनं चाव्ययं<br />
    श्रीमच्छम्भुमुखेन्दुसुन्दरवरे संशोभितं सर्वदा।<br />
    संसारामयभेषजं सुखकरं श्रीजानकीजीवनं<br />
    धन्यास्ते कृतिनः पिबन्ति सततं श्रीरामनामामृतम्।।2।।<br />
सो0-मुक्ति जन्म महि जानि ग्यान खानि अघ हानि कर<br />
    जहँ बस संभु भवानि सो कासी सेइअ कस न।।<br />
    जरत सकल सुर बृंद बिषम गरल जेहिं पान किय।<br />
    तेहि न भजसि मन मंद को कृपाल संकर सरिस।।<br />
आगें चले बहुरि रघुराया। रिष्यमूक परवत निअराया।।<br />
तहँ रह सचिव सहित सुग्रीवा। आवत देखि अतुल बल सींवा।।<br />
अति सभीत कह सुनु हनुमाना। पुरुष जुगल बल रूप निधाना।।<br />
धरि बटु रूप देखु तैं जाई। कहेसु जानि जियँ सयन बुझाई।।<br />
पठए बालि होहिं मन मैला। भागौं तुरत तजौं यह सैला।।<br />
बिप्र रूप धरि कपि तहँ गयऊ। माथ नाइ पूछत अस भयऊ।।<br />
को तुम्ह स्यामल गौर सरीरा। छत्री रूप फिरहु बन बीरा।।<br />
कठिन भूमि कोमल पद गामी। कवन हेतु बिचरहु बन स्वामी।।<br />
मृदुल मनोहर सुंदर गाता। सहत दुसह बन आतप बाता।।<br />
की तुम्ह तीनि देव महँ कोऊ। नर नारायन की तुम्ह दोऊ।।<br />
दो0-जग कारन तारन भव भंजन धरनी भार।<br />
    की तुम्ह अकिल भुवन पति लीन्ह मनुज अवतार।।1।।<br />
 --*--*--<br />
कोसलेस दसरथ के जाए । हम पितु बचन मानि बन आए।।<br />
नाम राम लछिमन दौउ भाई। संग नारि सुकुमारि सुहाई।।<br />
इहाँ हरि निसिचर बैदेही। बिप्र फिरहिं हम खोजत तेही।।<br />
आपन चरित कहा हम गाई। कहहु बिप्र निज कथा बुझाई।।<br />
प्रभु पहिचानि परेउ गहि चरना। सो सुख उमा नहिं बरना।।<br />
पुलकित तन मुख आव न बचना। देखत रुचिर बेष कै रचना।।<br />
पुनि धीरजु धरि अस्तुति कीन्ही। हरष हृदयँ निज नाथहि चीन्ही।।<br />
मोर न्याउ मैं पूछा साईं। तुम्ह पूछहु कस नर की नाईं।।<br />
तव माया बस फिरउँ भुलाना। ता ते मैं नहिं प्रभु पहिचाना।।<br />
दो0-एकु मैं मंद मोहबस कुटिल हृदय अग्यान।<br />
   पुनि प्रभु मोहि बिसारेउ दीनबंधु भगवान।।2।।<br />
 --*--*--<br />
जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें। सेवक प्रभुहि परै जनि भोरें।।<br />
नाथ जीव तव मायाँ मोहा। सो निस्तरइ तुम्हारेहिं छोहा।।<br />
ता पर मैं रघुबीर दोहाई। जानउँ नहिं कछु भजन उपाई।।<br />
सेवक सुत पति मातु भरोसें। रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें।।<br />
अस कहि परेउ चरन अकुलाई। निज तनु प्रगटि प्रीति उर छाई।।<br />
तब रघुपति उठाइ उर लावा। निज लोचन जल सींचि जुड़ावा।।<br />
सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना। तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना।।<br />
समदरसी मोहि कह सब कोऊ। सेवक प्रिय अनन्यगति सोऊ।।<br />
दो0-सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत।<br />
    मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत।।3।।<br />
 --*--*--<br />
देखि पवन सुत पति अनुकूला। हृदयँ हरष बीती सब सूला।।<br />
नाथ सैल पर कपिपति रहई। सो सुग्रीव दास तव अहई।।<br />
तेहि सन नाथ मयत्री कीजे। दीन जानि तेहि अभय करीजे।।<br />
सो सीता कर खोज कराइहि। जहँ तहँ मरकट कोटि पठाइहि।।<br />
एहि बिधि सकल कथा समुझाई। लिए दुऔ जन पीठि चढ़ाई।।<br />
जब सुग्रीवँ राम कहुँ देखा। अतिसय जन्म धन्य करि लेखा।।<br />
सादर मिलेउ नाइ पद माथा। भैंटेउ अनुज सहित रघुनाथा।।<br />
कपि कर मन बिचार एहि रीती। करिहहिं बिधि मो सन ए प्रीती।।<br />
दो0-तब हनुमंत उभय दिसि की सब कथा सुनाइ।।<br />
    पावक साखी देइ करि जोरी प्रीती दृढ़ाइ।।4।।<br />
 --*--*--<br />
कीन्ही प्रीति कछु बीच न राखा। लछमिन राम चरित सब भाषा।।<br />
कह सुग्रीव नयन भरि बारी। मिलिहि नाथ मिथिलेसकुमारी।।<br />
मंत्रिन्ह सहित इहाँ एक बारा। बैठ रहेउँ मैं करत बिचारा।।<br />
गगन पंथ देखी मैं जाता। परबस परी बहुत बिलपाता।।<br />
राम राम हा राम पुकारी। हमहि देखि दीन्हेउ पट डारी।।<br />
मागा राम तुरत तेहिं दीन्हा। पट उर लाइ सोच अति कीन्हा।।<br />
कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। तजहु सोच मन आनहु धीरा।।<br />
सब प्रकार करिहउँ सेवकाई। जेहि बिधि मिलिहि जानकी आई।।<br />
दो0-सखा बचन सुनि हरषे कृपासिधु बलसींव।<br />
   कारन कवन बसहु बन मोहि कहहु सुग्रीव ।।5।।<br />
 --*--*--<br />
नात बालि अरु मैं द्वौ भाई। प्रीति रही कछु बरनि न जाई।।<br />
मय सुत मायावी तेहि नाऊँ। आवा सो प्रभु हमरें गाऊँ।।<br />
अर्ध राति पुर द्वार पुकारा। बाली रिपु बल सहै न पारा।।<br />
धावा बालि देखि सो भागा। मैं पुनि गयउँ बंधु सँग लागा।।<br />
गिरिबर गुहाँ पैठ सो जाई। तब बालीं मोहि कहा बुझाई।।<br />
परिखेसु मोहि एक पखवारा। नहिं आवौं तब जानेसु मारा।।<br />
मास दिवस तहँ रहेउँ खरारी। निसरी रुधिर धार तहँ भारी।।<br />
बालि हतेसि मोहि मारिहि आई। सिला देइ तहँ चलेउँ पराई।।<br />
मंत्रिन्ह पुर देखा बिनु साईं। दीन्हेउ मोहि राज बरिआई।।<br />
बालि ताहि मारि गृह आवा। देखि मोहि जियँ भेद बढ़ावा।।<br />
रिपु सम मोहि मारेसि अति भारी। हरि लीन्हेसि सर्बसु अरु नारी।।<br />
ताकें भय रघुबीर कृपाला। सकल भुवन मैं फिरेउँ बिहाला।।<br />
इहाँ साप बस आवत नाहीं। तदपि सभीत रहउँ मन माहीँ।।<br />
सुनि सेवक दुख दीनदयाला। फरकि उठीं द्वै भुजा बिसाला।।<br />
दो0- सुनु सुग्रीव मारिहउँ बालिहि एकहिं बान।<br />
    ब्रम्ह रुद्र सरनागत गएँ न उबरिहिं प्रान।।6।।<br />
 --*--*--<br />
जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी।।<br />
निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना।।<br />
जिन्ह कें असि मति सहज न आई। ते सठ कत हठि करत मिताई।।<br />
कुपथ निवारि सुपंथ चलावा। गुन प्रगटे अवगुनन्हि दुरावा।।<br />
देत लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई।।<br />
बिपति काल कर सतगुन नेहा। श्रुति कह संत मित्र गुन एहा।।<br />
आगें कह मृदु बचन बनाई। पाछें अनहित मन कुटिलाई।।<br />
जा कर चित अहि गति सम भाई। अस कुमित्र परिहरेहि भलाई।।<br />
सेवक सठ नृप कृपन कुनारी। कपटी मित्र सूल सम चारी।।<br />
सखा सोच त्यागहु बल मोरें। सब बिधि घटब काज मैं तोरें।।<br />
कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। बालि महाबल अति रनधीरा।।<br />
दुंदुभी अस्थि ताल देखराए। बिनु प्रयास रघुनाथ ढहाए।।<br />
देखि अमित बल बाढ़ी प्रीती। बालि बधब इन्ह भइ परतीती।।<br />
बार बार नावइ पद सीसा। प्रभुहि जानि मन हरष कपीसा।।<br />
उपजा ग्यान बचन तब बोला। नाथ कृपाँ मन भयउ अलोला।।<br />
सुख संपति परिवार बड़ाई। सब परिहरि करिहउँ सेवकाई।।<br />
ए सब  रामभगति के बाधक। कहहिं संत तब पद अवराधक।।<br />
सत्रु मित्र सुख दुख जग माहीं। माया कृत परमारथ नाहीं।।<br />
बालि परम हित जासु प्रसादा। मिलेहु राम तुम्ह समन बिषादा।।<br />
सपनें जेहि सन होइ लराई। जागें समुझत मन सकुचाई।।<br />
अब प्रभु कृपा करहु एहि भाँती। सब तजि भजनु करौं दिन राती।।<br />
सुनि बिराग संजुत कपि बानी। बोले बिहँसि रामु धनुपानी।।<br />
जो कछु कहेहु सत्य सब सोई। सखा बचन मम मृषा न होई।।<br />
नट मरकट इव सबहि नचावत। रामु खगेस बेद अस गावत।।<br />
लै सुग्रीव संग रघुनाथा। चले चाप सायक गहि हाथा।।<br />
तब रघुपति सुग्रीव पठावा। गर्जेसि जाइ निकट बल पावा।।<br />
सुनत बालि क्रोधातुर धावा। गहि कर चरन नारि समुझावा।।<br />
सुनु पति जिन्हहि मिलेउ सुग्रीवा। ते द्वौ बंधु तेज बल सींवा।।<br />
कोसलेस सुत लछिमन रामा। कालहु जीति सकहिं संग्रामा।।<br />
दो0-कह बालि सुनु भीरु प्रिय समदरसी रघुनाथ।<br />
    जौं कदाचि मोहि मारहिं तौ पुनि होउँ सनाथ।।7।।<br />
 --*--*--<br />
अस कहि चला महा अभिमानी। तृन समान सुग्रीवहि जानी।।<br />
भिरे उभौ बाली अति तर्जा । मुठिका मारि महाधुनि गर्जा।।<br />
तब सुग्रीव बिकल होइ भागा। मुष्टि प्रहार बज्र सम लागा।।<br />
मैं जो कहा रघुबीर कृपाला। बंधु न होइ मोर यह काला।।<br />
एकरूप तुम्ह भ्राता दोऊ। तेहि भ्रम तें नहिं मारेउँ सोऊ।।<br />
कर परसा सुग्रीव सरीरा। तनु भा कुलिस गई सब पीरा।।<br />
मेली कंठ सुमन कै माला। पठवा पुनि बल देइ बिसाला।।<br />
पुनि नाना बिधि भई लराई। बिटप ओट देखहिं रघुराई।।<br />
दो0-बहु छल बल सुग्रीव कर हियँ हारा भय मानि।<br />
    मारा बालि राम तब हृदय माझ सर तानि।।8।।<br />
 --*--*--<br />
परा बिकल महि सर के लागें। पुनि उठि बैठ देखि प्रभु आगें।।<br />
स्याम गात सिर जटा बनाएँ। अरुन नयन सर चाप चढ़ाएँ।।<br />
पुनि पुनि चितइ चरन चित दीन्हा। सुफल जन्म माना प्रभु चीन्हा।।<br />
हृदयँ प्रीति मुख बचन कठोरा। बोला चितइ राम की ओरा।।<br />
धर्म हेतु अवतरेहु गोसाई। मारेहु मोहि ब्याध की नाई।।<br />
मैं बैरी सुग्रीव पिआरा। अवगुन कबन नाथ मोहि मारा।।<br />
अनुज बधू भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी।।<br />
इन्हहि कुद्दष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई।।<br />
मुढ़ तोहि अतिसय अभिमाना। नारि सिखावन करसि न काना।।<br />
मम भुज बल आश्रित तेहि जानी। मारा चहसि अधम अभिमानी।।<br />
दो0-सुनहु राम स्वामी सन चल न चातुरी मोरि।<br />
    प्रभु अजहूँ मैं पापी अंतकाल गति तोरि।।9।।<br />
 --*--*--<br />
सुनत राम अति कोमल बानी। बालि सीस परसेउ निज पानी।।<br />
अचल करौं तनु राखहु प्राना। बालि कहा सुनु कृपानिधाना।।<br />
जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं। अंत राम कहि आवत नाहीं।।<br />
जासु नाम बल संकर कासी। देत सबहि सम गति अविनासी।।<br />
मम लोचन गोचर सोइ आवा। बहुरि कि प्रभु अस बनिहि बनावा।।<br />
छं0-सो नयन गोचर जासु गुन नित नेति कहि श्रुति गावहीं।<br />
    जिति पवन मन गो निरस करि मुनि ध्यान कबहुँक पावहीं।।<br />
    मोहि जानि अति अभिमान बस प्रभु कहेउ राखु सरीरही।<br />
    अस कवन सठ हठि काटि सुरतरु बारि करिहि बबूरही।।1।।<br />
    अब नाथ करि करुना बिलोकहु देहु जो बर मागऊँ।<br />
    जेहिं जोनि जन्मौं कर्म बस तहँ राम पद अनुरागऊँ।।<br />
    यह तनय मम सम बिनय बल कल्यानप्रद प्रभु लीजिऐ।<br />
    गहि बाहँ सुर नर नाह आपन दास अंगद कीजिऐ।।2।।<br />
दो0-राम चरन दृढ़ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग।<br />
    सुमन माल जिमि कंठ ते गिरत न जानइ नाग।।10।।<br />
 --*--*--<br />
राम बालि निज धाम पठावा। नगर लोग सब ब्याकुल धावा।।<br />
नाना बिधि बिलाप कर तारा। छूटे केस न देह सँभारा।।<br />
तारा बिकल देखि रघुराया । दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया।।<br />
छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा।।<br />
प्रगट सो तनु तव आगें सोवा। जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा।।<br />
उपजा ग्यान चरन तब लागी। लीन्हेसि परम भगति बर मागी।।<br />
उमा दारु जोषित की नाई। सबहि नचावत रामु गोसाई।।<br />
तब सुग्रीवहि आयसु दीन्हा। मृतक कर्म बिधिबत सब कीन्हा।।<br />
राम कहा अनुजहि समुझाई। राज देहु सुग्रीवहि जाई।।<br />
रघुपति चरन नाइ करि माथा। चले सकल प्रेरित रघुनाथा।।<br />
दो0-लछिमन तुरत बोलाए पुरजन बिप्र समाज।<br />
   राजु दीन्ह सुग्रीव कहँ अंगद कहँ जुबराज।।11।।<br />
 --*--*--<br />
उमा राम सम हित जग माहीं। गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं।।<br />
सुर नर मुनि सब कै यह रीती। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।।<br />
बालि त्रास ब्याकुल दिन राती। तन बहु ब्रन चिंताँ जर छाती।।<br />
सोइ सुग्रीव कीन्ह कपिराऊ। अति कृपाल रघुबीर सुभाऊ।।<br />
जानतहुँ अस प्रभु परिहरहीं। काहे न बिपति जाल नर परहीं।।<br />
पुनि सुग्रीवहि लीन्ह बोलाई। बहु प्रकार नृपनीति सिखाई।।<br />
कह प्रभु सुनु सुग्रीव हरीसा। पुर न जाउँ दस चारि बरीसा।।<br />
गत ग्रीषम बरषा रितु आई। रहिहउँ निकट सैल पर छाई।।<br />
अंगद सहित करहु तुम्ह राजू। संतत हृदय धरेहु मम काजू।।<br />
जब सुग्रीव भवन फिरि आए। रामु प्रबरषन गिरि पर छाए।।<br />
दो0-प्रथमहिं देवन्ह गिरि गुहा राखेउ रुचिर बनाइ।<br />
   राम कृपानिधि कछु दिन बास करहिंगे आइ।।12।।<br />
 --*--*--<br />
सुंदर बन कुसुमित अति सोभा। गुंजत मधुप निकर मधु लोभा।।<br />
कंद मूल फल पत्र सुहाए। भए बहुत जब ते प्रभु आए ।।<br />
देखि मनोहर सैल अनूपा। रहे तहँ अनुज सहित सुरभूपा।।<br />
मधुकर खग मृग तनु धरि देवा। करहिं सिद्ध मुनि प्रभु कै सेवा।।<br />
मंगलरुप भयउ बन तब ते । कीन्ह निवास रमापति जब ते।।<br />
फटिक सिला अति सुभ्र सुहाई। सुख आसीन तहाँ द्वौ भाई।।<br />
कहत अनुज सन कथा अनेका। भगति बिरति नृपनीति बिबेका।।<br />
बरषा काल मेघ नभ छाए। गरजत लागत परम सुहाए।।<br />
दो0- लछिमन देखु मोर गन नाचत बारिद पैखि।<br />
    गृही बिरति रत हरष जस बिष्नु भगत कहुँ देखि।।13।।<br />
 --*--*--<br />
घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा।।<br />
दामिनि दमक रह न घन माहीं। खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं।।<br />
बरषहिं जलद भूमि निअराएँ। जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ।।<br />
बूँद अघात सहहिं गिरि कैंसें । खल के बचन संत सह जैसें।।<br />
छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई।।<br />
भूमि परत भा ढाबर पानी। जनु जीवहि माया लपटानी।।<br />
समिटि समिटि जल भरहिं तलावा। जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा।।<br />
सरिता जल जलनिधि महुँ जाई। होई अचल जिमि जिव हरि पाई।।<br />
दो0- हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ।<br />
    जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ।।14।।<br />
 --*--*--<br />
दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई।।<br />
नव पल्लव भए बिटप अनेका। साधक मन जस मिलें बिबेका।।<br />
अर्क जबास पात बिनु भयऊ। जस सुराज खल उद्यम गयऊ।।<br />
खोजत कतहुँ मिलइ नहिं धूरी। करइ क्रोध जिमि धरमहि दूरी।।<br />
ससि संपन्न सोह महि कैसी। उपकारी कै संपति जैसी।।<br />
निसि तम घन खद्योत बिराजा। जनु दंभिन्ह कर मिला समाजा।।<br />
महाबृष्टि चलि फूटि किआरीं । जिमि सुतंत्र भएँ बिगरहिं नारीं।।<br />
कृषी निरावहिं चतुर किसाना। जिमि बुध तजहिं मोह मद माना।।<br />
देखिअत चक्रबाक खग नाहीं। कलिहि पाइ जिमि धर्म पराहीं।।<br />
ऊषर बरषइ तृन नहिं जामा। जिमि हरिजन हियँ उपज न कामा।।<br />
बिबिध जंतु संकुल महि भ्राजा। प्रजा बाढ़ जिमि पाइ सुराजा।।<br />
जहँ तहँ रहे पथिक थकि नाना। जिमि इंद्रिय गन उपजें ग्याना।।<br />
दो0-कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं।<br />
   जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं।।15(क)।।<br />
   कबहुँ दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग।<br />
   बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग।।15(ख)।।<br />
 --*--*--<br />
बरषा बिगत सरद रितु आई। लछिमन देखहु परम सुहाई।।<br />
फूलें कास सकल महि छाई। जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई।।<br />
उदित अगस्ति पंथ जल सोषा। जिमि लोभहि सोषइ संतोषा।।<br />
सरिता सर निर्मल जल सोहा। संत हृदय जस गत मद मोहा।।<br />
रस रस सूख सरित सर पानी। ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी।।<br />
जानि सरद रितु खंजन आए। पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए।।<br />
पंक न रेनु सोह असि धरनी। नीति निपुन नृप कै जसि करनी।।<br />
जल संकोच बिकल भइँ मीना। अबुध कुटुंबी जिमि धनहीना।।<br />
बिनु धन निर्मल सोह अकासा। हरिजन इव परिहरि सब आसा।।<br />
कहुँ कहुँ बृष्टि सारदी थोरी। कोउ एक पाव भगति जिमि मोरी।।<br />
दो0-चले हरषि तजि नगर नृप तापस बनिक भिखारि।<br />
   जिमि हरिभगत पाइ श्रम तजहि आश्रमी चारि।।16।।<br />
 --*--*--<br />
सुखी मीन जे नीर अगाधा। जिमि हरि सरन न एकउ बाधा।।<br />
फूलें कमल सोह सर कैसा। निर्गुन ब्रम्ह सगुन भएँ जैसा।।<br />
गुंजत मधुकर मुखर अनूपा। सुंदर खग रव नाना रूपा।।<br />
चक्रबाक मन दुख निसि पैखी। जिमि दुर्जन पर संपति देखी।।<br />
चातक रटत तृषा अति ओही। जिमि सुख लहइ न संकरद्रोही।।<br />
सरदातप निसि ससि अपहरई। संत दरस जिमि पातक टरई।।<br />
देखि इंदु चकोर समुदाई। चितवतहिं जिमि हरिजन हरि पाई।।<br />
मसक दंस बीते हिम त्रासा। जिमि द्विज द्रोह किएँ कुल नासा।।<br />
दो0-भूमि जीव संकुल रहे गए सरद रितु पाइ।<br />
    सदगुर मिले जाहिं जिमि संसय भ्रम समुदाइ।।17।।<br />
 --*--*--<br />
बरषा गत निर्मल रितु आई। सुधि न तात सीता कै पाई।।<br />
एक बार कैसेहुँ सुधि जानौं। कालहु जीत निमिष महुँ आनौं।।<br />
कतहुँ रहउ जौं जीवति होई। तात जतन करि आनेउँ सोई।।<br />
सुग्रीवहुँ सुधि मोरि बिसारी। पावा राज कोस पुर नारी।।<br />
जेहिं सायक मारा मैं बाली। तेहिं सर हतौं मूढ़ कहँ काली।।<br />
जासु कृपाँ छूटहीं मद मोहा। ता कहुँ उमा कि सपनेहुँ कोहा।।<br />
जानहिं यह चरित्र मुनि ग्यानी। जिन्ह रघुबीर चरन रति मानी।।<br />
लछिमन क्रोधवंत प्रभु जाना। धनुष चढ़ाइ गहे कर बाना।।<br />
दो0-तब अनुजहि समुझावा रघुपति करुना सींव।।<br />
   भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव।।18।।<br />
 --*--*--<br />
इहाँ पवनसुत हृदयँ बिचारा। राम काजु सुग्रीवँ बिसारा।।<br />
निकट जाइ चरनन्हि सिरु नावा। चारिहु बिधि तेहि कहि समुझावा।।<br />
सुनि सुग्रीवँ परम भय माना। बिषयँ मोर हरि लीन्हेउ ग्याना।।<br />
अब मारुतसुत दूत समूहा। पठवहु जहँ तहँ बानर जूहा।।<br />
कहहु पाख महुँ आव न जोई। मोरें कर ता कर बध होई।।<br />
तब हनुमंत बोलाए दूता। सब कर करि सनमान बहूता।।<br />
भय अरु प्रीति नीति देखाई। चले सकल चरनन्हि सिर नाई।।<br />
एहि अवसर लछिमन पुर आए। क्रोध देखि जहँ तहँ कपि धाए।।<br />
दो0-धनुष चढ़ाइ कहा तब जारि करउँ पुर छार।<br />
   ब्याकुल नगर देखि तब आयउ बालिकुमार।।19।।<br />
 --*--*--<br />
चरन नाइ सिरु बिनती कीन्ही। लछिमन अभय बाँह तेहि दीन्ही।।<br />
क्रोधवंत लछिमन सुनि काना। कह कपीस अति भयँ अकुलाना।।<br />
सुनु हनुमंत संग लै तारा। करि बिनती समुझाउ कुमारा।।<br />
तारा सहित जाइ हनुमाना। चरन बंदि प्रभु सुजस बखाना।।<br />
करि बिनती मंदिर लै आए। चरन पखारि पलँग बैठाए।।<br />
तब कपीस चरनन्हि सिरु नावा। गहि भुज लछिमन कंठ लगावा।।<br />
नाथ बिषय सम मद कछु नाहीं। मुनि मन मोह करइ छन माहीं।।<br />
सुनत बिनीत बचन सुख पावा। लछिमन तेहि बहु बिधि समुझावा।।<br />
पवन तनय सब कथा सुनाई। जेहि बिधि गए दूत समुदाई।।<br />
दो0-हरषि चले सुग्रीव तब अंगदादि कपि साथ।<br />
   रामानुज आगें करि आए जहँ रघुनाथ।।20।।<br />
 --*--*--<br />
नाइ चरन सिरु कह कर जोरी। नाथ मोहि कछु नाहिन खोरी।।<br />
अतिसय प्रबल देव तब माया। छूटइ राम करहु जौं दाया।।<br />
बिषय बस्य सुर नर मुनि स्वामी। मैं पावँर पसु कपि अति कामी।।<br />
नारि नयन सर जाहि न लागा। घोर क्रोध तम निसि जो जागा।।<br />
लोभ पाँस जेहिं गर न बँधाया। सो नर तुम्ह समान रघुराया।।<br />
यह गुन साधन तें नहिं होई। तुम्हरी कृपाँ पाव कोइ कोई।।<br />
तब रघुपति बोले मुसकाई। तुम्ह प्रिय मोहि भरत जिमि भाई।।<br />
अब सोइ  जतनु करहु मन लाई। जेहि बिधि सीता कै सुधि पाई।।<br />
दो0- एहि बिधि होत बतकही आए बानर जूथ।<br />
    नाना बरन सकल दिसि देखिअ कीस बरुथ।।21।।<br />
 --*--*--<br />
बानर कटक उमा में देखा। सो मूरुख जो करन चह लेखा।।<br />
आइ राम पद नावहिं माथा। निरखि बदनु सब होहिं सनाथा।।<br />
अस कपि एक न सेना माहीं। राम कुसल जेहि पूछी नाहीं।।<br />
यह कछु नहिं प्रभु कइ अधिकाई। बिस्वरूप ब्यापक रघुराई।।<br />
ठाढ़े जहँ तहँ आयसु पाई। कह सुग्रीव सबहि समुझाई।।<br />
राम काजु अरु मोर निहोरा। बानर जूथ जाहु चहुँ ओरा।।<br />
जनकसुता कहुँ खोजहु जाई। मास दिवस महँ आएहु भाई।।<br />
अवधि मेटि जो बिनु सुधि पाएँ। आवइ बनिहि सो मोहि मराएँ।।<br />
दो0- बचन सुनत सब बानर जहँ तहँ चले तुरंत ।<br />
     तब सुग्रीवँ बोलाए अंगद नल हनुमंत।।22।।<br />
 --*--*--<br />
सुनहु नील अंगद हनुमाना। जामवंत मतिधीर सुजाना।।<br />
सकल सुभट मिलि दच्छिन जाहू। सीता सुधि पूँछेउ सब काहू।।<br />
मन क्रम बचन सो जतन बिचारेहु। रामचंद्र कर काजु सँवारेहु।।<br />
भानु पीठि सेइअ उर आगी। स्वामिहि सर्ब भाव छल त्यागी।।<br />
तजि माया सेइअ परलोका। मिटहिं सकल भव संभव सोका।।<br />
देह धरे कर यह फलु भाई। भजिअ राम सब काम बिहाई।।<br />
सोइ गुनग्य सोई बड़भागी । जो रघुबीर चरन अनुरागी।।<br />
आयसु मागि चरन सिरु नाई। चले हरषि सुमिरत रघुराई।।<br />
पाछें पवन तनय सिरु नावा। जानि काज प्रभु निकट बोलावा।।<br />
परसा सीस सरोरुह पानी। करमुद्रिका दीन्हि जन जानी।।<br />
बहु प्रकार सीतहि समुझाएहु। कहि बल बिरह बेगि तुम्ह आएहु।।<br />
हनुमत जन्म सुफल करि माना। चलेउ हृदयँ धरि कृपानिधाना।।<br />
जद्यपि प्रभु जानत सब बाता। राजनीति राखत सुरत्राता।।<br />
दो0-चले सकल बन खोजत सरिता सर गिरि खोह।<br />
   राम काज लयलीन मन बिसरा तन कर छोह।।23।।<br />
 --*--*--<br />
कतहुँ होइ निसिचर सैं भेटा। प्रान लेहिं एक एक चपेटा।।<br />
बहु प्रकार गिरि कानन हेरहिं। कोउ मुनि मिलत ताहि सब घेरहिं।।<br />
लागि तृषा अतिसय अकुलाने। मिलइ न जल घन गहन भुलाने।।<br />
मन हनुमान कीन्ह अनुमाना। मरन चहत सब बिनु जल पाना।।<br />
चढ़ि गिरि सिखर चहूँ दिसि देखा। भूमि बिबिर एक कौतुक पेखा।।<br />
चक्रबाक बक हंस उड़ाहीं। बहुतक खग प्रबिसहिं तेहि माहीं।।<br />
गिरि ते उतरि पवनसुत आवा। सब कहुँ लै सोइ बिबर देखावा।।<br />
आगें कै हनुमंतहि लीन्हा। पैठे बिबर बिलंबु न कीन्हा।।<br />
दो0-दीख जाइ उपवन बर सर बिगसित बहु कंज।<br />
   मंदिर एक रुचिर तहँ बैठि नारि तप पुंज।।24।।<br />
 --*--*--<br />
दूरि ते ताहि सबन्हि सिर नावा। पूछें निज बृत्तांत सुनावा।।<br />
तेहिं तब कहा करहु जल पाना। खाहु सुरस सुंदर फल नाना।।<br />
मज्जनु कीन्ह मधुर फल खाए। तासु निकट पुनि सब चलि आए।।<br />
तेहिं सब आपनि कथा सुनाई। मैं अब जाब जहाँ रघुराई।।<br />
मूदहु नयन बिबर तजि जाहू। पैहहु सीतहि जनि पछिताहू।।<br />
नयन मूदि पुनि देखहिं बीरा। ठाढ़े सकल सिंधु कें तीरा।।<br />
सो पुनि गई जहाँ रघुनाथा। जाइ कमल पद नाएसि माथा।।<br />
नाना भाँति बिनय तेहिं कीन्ही। अनपायनी भगति प्रभु दीन्ही।।<br />
दो0-बदरीबन कहुँ सो गई प्रभु अग्या धरि सीस ।<br />
   उर धरि राम चरन जुग जे बंदत अज ईस।।25।।<br />
 --*--*--<br />
इहाँ बिचारहिं कपि मन माहीं। बीती अवधि काज कछु नाहीं।।<br />
सब मिलि कहहिं परस्पर बाता। बिनु सुधि लएँ करब का भ्राता।।<br />
कह अंगद लोचन भरि बारी। दुहुँ प्रकार भइ मृत्यु हमारी।।<br />
इहाँ न सुधि सीता कै पाई। उहाँ गएँ मारिहि कपिराई।।<br />
पिता बधे पर मारत मोही। राखा राम निहोर न ओही।।<br />
पुनि पुनि अंगद कह सब पाहीं। मरन भयउ कछु संसय नाहीं।।<br />
अंगद बचन सुनत कपि बीरा। बोलि न सकहिं नयन बह नीरा।।<br />
छन एक सोच मगन होइ रहे। पुनि अस वचन कहत सब भए।।<br />
हम सीता कै सुधि लिन्हें बिना। नहिं जैंहैं जुबराज प्रबीना।।<br />
अस कहि लवन सिंधु तट जाई। बैठे कपि सब दर्भ डसाई।।<br />
जामवंत अंगद दुख देखी। कहिं कथा उपदेस बिसेषी।।<br />
तात राम कहुँ नर जनि मानहु। निर्गुन ब्रम्ह अजित अज जानहु।।<br />
दो0-निज इच्छा प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि।<br />
   सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोच्छ सब त्यागि।।26।।<br />
 --*--*--<br />
एहि बिधि कथा कहहि बहु भाँती गिरि कंदराँ सुनी संपाती।।<br />
बाहेर होइ देखि बहु कीसा। मोहि अहार दीन्ह जगदीसा।।<br />
आजु सबहि कहँ भच्छन करऊँ। दिन बहु चले अहार बिनु मरऊँ।।<br />
कबहुँ न मिल भरि उदर अहारा। आजु दीन्ह बिधि एकहिं बारा।।<br />
डरपे गीध बचन सुनि काना। अब भा मरन सत्य हम जाना।।<br />
कपि सब उठे गीध कहँ देखी। जामवंत मन सोच बिसेषी।।<br />
कह अंगद बिचारि मन माहीं। धन्य जटायू सम कोउ नाहीं।।<br />
राम काज कारन तनु त्यागी । हरि पुर गयउ परम बड़ भागी।।<br />
सुनि खग हरष सोक जुत बानी । आवा निकट कपिन्ह भय मानी।।<br />
तिन्हहि अभय करि पूछेसि जाई। कथा सकल तिन्ह ताहि सुनाई।।<br />
सुनि संपाति बंधु कै करनी। रघुपति महिमा बधुबिधि बरनी।।<br />
दो0- मोहि लै जाहु सिंधुतट देउँ तिलांजलि ताहि ।<br />
     बचन सहाइ करवि मैं पैहहु खोजहु जाहि ।।27।।<br />
 --*--*--<br />
अनुज क्रिया करि सागर तीरा। कहि निज कथा सुनहु कपि बीरा।।<br />
हम द्वौ बंधु प्रथम तरुनाई । गगन गए रबि निकट उडाई।।<br />
तेज न सहि सक सो फिरि आवा । मै अभिमानी रबि निअरावा ।।<br />
जरे पंख अति तेज अपारा । परेउँ भूमि करि घोर चिकारा ।।<br />
मुनि एक नाम चंद्रमा ओही। लागी दया देखी करि मोही।।<br />
बहु प्रकार तेंहि ग्यान सुनावा । देहि जनित अभिमानी छड़ावा ।।<br />
त्रेताँ ब्रह्म मनुज तनु धरिही। तासु नारि निसिचर पति हरिही।।<br />
तासु खोज पठइहि प्रभू दूता। तिन्हहि मिलें तैं होब पुनीता।।<br />
जमिहहिं पंख करसि जनि चिंता । तिन्हहि देखाइ देहेसु तैं सीता।।<br />
मुनि कइ गिरा सत्य भइ आजू । सुनि मम बचन करहु प्रभु काजू।।<br />
गिरि त्रिकूट ऊपर बस लंका । तहँ रह रावन सहज असंका ।।<br />
तहँ असोक उपबन जहँ रहई ।। सीता बैठि सोच रत अहई।।<br />
दो-मैं देखउँ तुम्ह नाहि गीघहि दष्टि अपार।।<br />
  बूढ भयउँ न त करतेउँ कछुक सहाय तुम्हार।।28।।<br />
जो नाघइ सत जोजन सागर । करइ सो राम काज मति आगर ।।<br />
मोहि बिलोकि धरहु मन धीरा । राम कृपाँ कस भयउ सरीरा।।<br />
पापिउ जा कर नाम सुमिरहीं। अति अपार भवसागर तरहीं।।<br />
तासु दूत तुम्ह तजि कदराई। राम हृदयँ धरि करहु उपाई।।<br />
अस कहि गरुड़ गीध जब गयऊ। तिन्ह कें मन अति बिसमय भयऊ।।<br />
निज निज बल सब काहूँ भाषा। पार जाइ कर संसय राखा।।<br />
जरठ भयउँ अब कहइ रिछेसा। नहिं तन रहा प्रथम बल लेसा।।<br />
जबहिं त्रिबिक्रम भए खरारी। तब मैं तरुन रहेउँ बल भारी।।<br />
दो0-बलि बाँधत प्रभु बाढेउ सो तनु बरनि न जाई।<br />
   उभय धरी महँ दीन्ही सात प्रदच्छिन धाइ।।29।।<br />
 --*--*--<br />
अंगद कहइ जाउँ मैं पारा। जियँ संसय कछु फिरती बारा।।<br />
जामवंत कह तुम्ह सब लायक। पठइअ किमि सब ही कर नायक।।<br />
कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना।।<br />
पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना।।<br />
कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं।।<br />
राम काज लगि तब अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्वताकारा।।<br />
कनक बरन तन तेज बिराजा। मानहु अपर गिरिन्ह कर राजा।।<br />
सिंहनाद करि बारहिं बारा। लीलहीं नाषउँ जलनिधि खारा।।<br />
सहित सहाय रावनहि मारी। आनउँ इहाँ त्रिकूट उपारी।।<br />
जामवंत मैं पूँछउँ तोही। उचित सिखावनु दीजहु मोही।।<br />
एतना करहु तात तुम्ह जाई। सीतहि देखि कहहु सुधि आई।।<br />
तब निज भुज बल राजिव नैना। कौतुक लागि संग कपि सेना।।<br />
छं0--कपि सेन संग सँघारि निसिचर रामु सीतहि आनिहैं।<br />
    त्रैलोक पावन सुजसु सुर मुनि नारदादि बखानिहैं।।<br />
    जो सुनत गावत कहत समुझत परम पद नर पावई।<br />
    रघुबीर पद पाथोज मधुकर दास तुलसी गावई।।<br />
दो0-भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहि जे नर अरु नारि।<br />
    तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करिहि त्रिसिरारि।।30(क)।।<br />
सो0-नीलोत्पल तन स्याम काम कोटि सोभा अधिक।<br />
    सुनिअ तासु गुन ग्राम जासु नाम अघ खग बधिक।।30(ख)।।<br />
          मासपारायण, तेईसवाँ विश्राम<br />
            ----------------<br />
     इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने<br />
          चतुर्थ सोपानः समाप्तः।<br />
          (किष्किन्धाकाण्ड समाप्त)</p>
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