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	<title>06-लंका-काण्ड &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/06-लंका-काण्ड/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "06-लंका-काण्ड"</description>
	<pubDate>Wed, 09 Jul 2008 16:36:37 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[लंका काण्ड]]></title>
<link>http://ramayan.wordpress.com/2006/07/24/lankakand/</link>
<pubDate>Mon, 24 Jul 2006 07:13:51 +0000</pubDate>
<dc:creator>jitu9968</dc:creator>
<guid>http://ramayan.wordpress.com/2006/07/24/lankakand/</guid>
<description><![CDATA[           श्री गणेशाय नमः
        श्री जानकीवल्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>           श्री गणेशाय नमः<br />
        श्री जानकीवल्लभो विजयते<br />
          श्री रामचरितमानस<br />
            षष्ठ सोपान<br />
            (लंकाकाण्ड)<!--more--><br />
              श्लोक<br />
   रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं<br />
   योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम्।<br />
   मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्मवृन्दैकदेवं<br />
   वन्दे कन्दावदातं सरसिजनयनं देवमुर्वीशरूपम्।।1।।<br />
   शंखेन्द्वाभमतीवसुन्दरतनुं शार्दूलचर्माम्बरं<br />
   कालव्यालकरालभूषणधरं गंगाशशांकप्रियम्।<br />
   काशीशं कलिकल्मषौघशमनं कल्याणकल्पद्रुमं<br />
   नौमीड्यं गिरिजापतिं गुणनिधिं कन्दर्पहं शङ्करम्।।2।।<br />
   यो ददाति सतां शम्भुः कैवल्यमपि दुर्लभम्।<br />
   खलानां दण्डकृद्योऽसौ शङ्करः शं तनोतु मे।।3।।<br />
दो0-लव निमेष परमानु जुग बरष कलप सर चंड।<br />
   भजसि न मन तेहि राम को कालु जासु कोदंड।।<br />
 --*--*--<br />
सो0-सिंधु बचन सुनि राम सचिव बोलि प्रभु अस कहेउ।<br />
   अब बिलंबु केहि काम करहु सेतु उतरै कटकु।।<br />
   सुनहु भानुकुल केतु जामवंत कर जोरि कह।<br />
   नाथ नाम तव सेतु नर चढ़ि भव सागर तरिहिं।।<br />
यह लघु जलधि तरत कति बारा। अस सुनि पुनि कह पवनकुमारा।।<br />
प्रभु प्रताप बड़वानल भारी। सोषेउ प्रथम पयोनिधि बारी।।<br />
तब रिपु नारी रुदन जल धारा। भरेउ बहोरि भयउ तेहिं खारा।।<br />
सुनि अति उकुति पवनसुत केरी। हरषे कपि रघुपति तन हेरी।।<br />
जामवंत बोले दोउ भाई। नल नीलहि सब कथा सुनाई।।<br />
राम प्रताप सुमिरि मन माहीं। करहु सेतु प्रयास कछु नाहीं।।<br />
बोलि लिए कपि निकर बहोरी। सकल सुनहु बिनती कछु मोरी।।<br />
राम चरन पंकज उर धरहू। कौतुक एक भालु कपि करहू।।<br />
धावहु मर्कट बिकट बरूथा। आनहु बिटप गिरिन्ह के जूथा।।<br />
सुनि कपि भालु चले करि हूहा। जय रघुबीर प्रताप समूहा।।<br />
दो0-अति उतंग गिरि पादप लीलहिं लेहिं उठाइ।<br />
   आनि देहिं नल नीलहि रचहिं ते सेतु बनाइ।।1।।<br />
 --*--*--<br />
सैल बिसाल आनि कपि देहीं। कंदुक इव नल नील ते लेहीं।।<br />
देखि सेतु अति सुंदर रचना। बिहसि कृपानिधि बोले बचना।।<br />
परम रम्य उत्तम यह धरनी। महिमा अमित जाइ नहिं बरनी।।<br />
करिहउँ इहाँ संभु थापना। मोरे हृदयँ परम कलपना।।<br />
सुनि कपीस बहु दूत पठाए। मुनिबर सकल बोलि लै आए।।<br />
लिंग थापि बिधिवत करि पूजा। सिव समान प्रिय मोहि न दूजा।।<br />
सिव द्रोही मम भगत कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा।।<br />
संकर बिमुख भगति चह मोरी। सो नारकी मूढ़ मति थोरी।।<br />
दो0-संकर प्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास।<br />
   ते नर करहि कलप भरि धोर नरक महुँ बास।।2।।<br />
 --*--*--<br />
जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं। ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं।।<br />
जो गंगाजलु आनि चढ़ाइहि। सो साजुज्य मुक्ति नर पाइहि।।<br />
होइ अकाम जो छल तजि सेइहि। भगति मोरि तेहि संकर देइहि।।<br />
मम कृत सेतु जो दरसनु करिही। सो बिनु श्रम भवसागर तरिही।।<br />
राम बचन सब के जिय भाए। मुनिबर निज निज आश्रम आए।।<br />
गिरिजा रघुपति कै यह रीती। संतत करहिं प्रनत पर प्रीती।।<br />
बाँधा सेतु नील नल नागर। राम कृपाँ जसु भयउ उजागर।।<br />
बूड़हिं आनहि बोरहिं जेई। भए उपल बोहित सम तेई।।<br />
महिमा यह न जलधि कइ बरनी। पाहन गुन न कपिन्ह कइ करनी।।<br />
दो0=श्री रघुबीर प्रताप ते सिंधु तरे पाषान।<br />
  ते मतिमंद जे राम तजि भजहिं जाइ प्रभु आन।।3।।<br />
 --*--*--<br />
बाँधि सेतु अति सुदृढ़ बनावा। देखि कृपानिधि के मन भावा।।<br />
चली सेन कछु बरनि न जाई। गर्जहिं मर्कट भट समुदाई।।<br />
सेतुबंध ढिग चढ़ि रघुराई। चितव कृपाल सिंधु बहुताई।।<br />
देखन कहुँ प्रभु करुना कंदा। प्रगट भए सब जलचर बृंदा।।<br />
मकर नक्र नाना झष ब्याला। सत जोजन तन परम बिसाला।।<br />
अइसेउ एक तिन्हहि जे खाहीं। एकन्ह कें डर तेपि डेराहीं।।<br />
प्रभुहि बिलोकहिं टरहिं न टारे। मन हरषित सब भए सुखारे।।<br />
तिन्ह की ओट न देखिअ बारी। मगन भए हरि रूप निहारी।।<br />
चला कटकु प्रभु आयसु पाई। को कहि सक कपि दल बिपुलाई।।<br />
दो0-सेतुबंध भइ भीर अति कपि नभ पंथ उड़ाहिं।<br />
   अपर जलचरन्हि ऊपर चढ़ि चढ़ि पारहि जाहिं।।4।।<br />
 --*--*--<br />
अस कौतुक बिलोकि द्वौ भाई। बिहँसि चले कृपाल रघुराई।।<br />
सेन सहित उतरे रघुबीरा। कहि न जाइ कपि जूथप भीरा।।<br />
सिंधु पार प्रभु डेरा कीन्हा। सकल कपिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा।।<br />
खाहु जाइ फल मूल सुहाए। सुनत भालु कपि जहँ तहँ धाए।।<br />
सब तरु फरे राम हित लागी। रितु अरु कुरितु काल गति त्यागी।।<br />
खाहिं मधुर फल बटप हलावहिं। लंका सन्मुख सिखर चलावहिं।।<br />
जहँ कहुँ फिरत निसाचर पावहिं। घेरि सकल बहु नाच नचावहिं।।<br />
दसनन्हि काटि नासिका काना। कहि प्रभु सुजसु देहिं तब जाना।।<br />
जिन्ह कर नासा कान निपाता। तिन्ह रावनहि कही सब बाता।।<br />
सुनत श्रवन बारिधि बंधाना। दस मुख बोलि उठा अकुलाना।।<br />
दो0-बांध्यो बननिधि नीरनिधि जलधि सिंधु बारीस।<br />
   सत्य तोयनिधि कंपति उदधि पयोधि नदीस।।5।।<br />
 --*--*--<br />
निज बिकलता बिचारि बहोरी। बिहँसि गयउ ग्रह करि भय भोरी।।<br />
मंदोदरीं सुन्यो प्रभु आयो। कौतुकहीं पाथोधि बँधायो।।<br />
कर गहि पतिहि भवन निज आनी। बोली परम मनोहर बानी।।<br />
चरन नाइ सिरु अंचलु रोपा। सुनहु बचन पिय परिहरि कोपा।।<br />
नाथ बयरु कीजे ताही सों। बुधि बल सकिअ जीति जाही सों।।<br />
तुम्हहि रघुपतिहि अंतर कैसा। खलु खद्योत दिनकरहि जैसा।।<br />
अतिबल मधु कैटभ जेहिं मारे। महाबीर दितिसुत संघारे।।<br />
जेहिं बलि बाँधि सहजभुज मारा। सोइ अवतरेउ हरन महि भारा।।<br />
तासु बिरोध न कीजिअ नाथा। काल करम जिव जाकें हाथा।।<br />
दो0-रामहि सौपि जानकी नाइ कमल पद माथ।<br />
   सुत कहुँ राज समर्पि बन जाइ भजिअ रघुनाथ।।6।।<br />
 --*--*--<br />
नाथ दीनदयाल रघुराई। बाघउ सनमुख गएँ न खाई।।<br />
चाहिअ करन सो सब करि बीते। तुम्ह सुर असुर चराचर जीते।।<br />
संत कहहिं असि नीति दसानन। चौथेंपन जाइहि नृप कानन।।<br />
तासु भजन कीजिअ तहँ भर्ता। जो कर्ता पालक संहर्ता।।<br />
सोइ रघुवीर प्रनत अनुरागी। भजहु नाथ ममता सब त्यागी।।<br />
मुनिबर जतनु करहिं जेहि लागी। भूप राजु तजि होहिं बिरागी।।<br />
सोइ कोसलधीस रघुराया। आयउ करन तोहि पर दाया।।<br />
जौं पिय मानहु मोर सिखावन। सुजसु होइ तिहुँ पुर अति पावन।।<br />
दो0-अस कहि नयन नीर भरि गहि पद कंपित गात।<br />
   नाथ भजहु रघुनाथहि अचल होइ अहिवात।।7।।<br />
 --*--*--<br />
तब रावन मयसुता उठाई। कहै लाग खल निज प्रभुताई।।<br />
सुनु तै प्रिया बृथा भय माना। जग जोधा को मोहि समाना।।<br />
बरुन कुबेर पवन जम काला। भुज बल जितेउँ सकल दिगपाला।।<br />
देव दनुज नर सब बस मोरें। कवन हेतु उपजा भय तोरें।।<br />
नाना बिधि तेहि कहेसि बुझाई। सभाँ बहोरि बैठ सो जाई।।<br />
मंदोदरीं हदयँ अस जाना। काल बस्य उपजा अभिमाना।।<br />
सभाँ आइ मंत्रिन्ह तेंहि बूझा। करब कवन बिधि रिपु सैं जूझा।।<br />
कहहिं सचिव सुनु निसिचर नाहा। बार बार प्रभु पूछहु काहा।।<br />
कहहु कवन भय करिअ बिचारा। नर कपि भालु अहार हमारा।।<br />
दो0-सब के बचन श्रवन सुनि कह प्रहस्त कर जोरि।<br />
   निति बिरोध न करिअ प्रभु मत्रिंन्ह मति अति थोरि।।8।।<br />
 --*--*--<br />
कहहिं सचिव सठ ठकुरसोहाती। नाथ न पूर आव एहि भाँती।।<br />
बारिधि नाघि एक कपि आवा। तासु चरित मन महुँ सबु गावा।।<br />
छुधा न रही तुम्हहि तब काहू। जारत नगरु कस न धरि खाहू।।<br />
सुनत नीक आगें दुख पावा। सचिवन अस मत प्रभुहि सुनावा।।<br />
जेहिं बारीस बँधायउ हेला। उतरेउ सेन समेत सुबेला।।<br />
सो भनु मनुज खाब हम भाई। बचन कहहिं सब गाल फुलाई।।<br />
तात बचन मम सुनु अति आदर। जनि मन गुनहु मोहि करि कादर।।<br />
प्रिय बानी जे सुनहिं जे कहहीं। ऐसे नर निकाय जग अहहीं।।<br />
बचन परम हित सुनत कठोरे। सुनहिं जे कहहिं ते नर प्रभु थोरे।।<br />
प्रथम बसीठ पठउ सुनु नीती। सीता देइ करहु पुनि प्रीती।।<br />
दो0-नारि पाइ फिरि जाहिं जौं तौ न बढ़ाइअ रारि।<br />
   नाहिं त सन्मुख समर महि तात करिअ हठि मारि।।9।।<br />
 --*--*--<br />
यह मत जौं मानहु प्रभु मोरा। उभय प्रकार सुजसु जग तोरा।।<br />
सुत सन कह दसकंठ रिसाई। असि मति सठ केहिं तोहि सिखाई।।<br />
अबहीं ते उर संसय होई। बेनुमूल सुत भयहु घमोई।।<br />
सुनि पितु गिरा परुष अति घोरा। चला भवन कहि बचन कठोरा।।<br />
हित मत तोहि न लागत कैसें। काल बिबस कहुँ भेषज जैसें।।<br />
संध्या समय जानि दससीसा। भवन चलेउ निरखत भुज बीसा।।<br />
लंका सिखर उपर आगारा। अति बिचित्र तहँ होइ अखारा।।<br />
बैठ जाइ तेही मंदिर रावन। लागे किंनर गुन गन गावन।।<br />
बाजहिं ताल पखाउज बीना। नृत्य करहिं अपछरा प्रबीना।।<br />
दो0-सुनासीर सत सरिस सो संतत करइ बिलास।<br />
    परम प्रबल रिपु सीस पर तद्यपि सोच न त्रास।।10।।<br />
 --*--*--<br />
इहाँ सुबेल सैल रघुबीरा। उतरे सेन सहित अति भीरा।।<br />
सिखर एक उतंग अति देखी। परम रम्य सम सुभ्र बिसेषी।।<br />
तहँ तरु किसलय सुमन सुहाए। लछिमन रचि निज हाथ डसाए।।<br />
ता पर रूचिर मृदुल मृगछाला। तेहीं आसान आसीन कृपाला।।<br />
प्रभु कृत सीस कपीस उछंगा। बाम दहिन दिसि चाप निषंगा।।<br />
दुहुँ कर कमल सुधारत बाना। कह लंकेस मंत्र लगि काना।।<br />
बड़भागी अंगद हनुमाना। चरन कमल चापत बिधि नाना।।<br />
प्रभु पाछें लछिमन बीरासन। कटि निषंग कर बान सरासन।।<br />
दो0-एहि बिधि कृपा रूप गुन धाम रामु आसीन।<br />
    धन्य ते नर एहिं ध्यान जे रहत सदा लयलीन।।11(क)।।<br />
    पूरब दिसा बिलोकि प्रभु देखा उदित मंयक।<br />
    कहत सबहि देखहु ससिहि मृगपति सरिस असंक।।11(ख)।।<br />
 --*--*--<br />
पूरब दिसि गिरिगुहा निवासी। परम प्रताप तेज बल रासी।।<br />
मत्त नाग तम कुंभ बिदारी। ससि केसरी गगन बन चारी।।<br />
बिथुरे नभ मुकुताहल तारा। निसि सुंदरी केर सिंगारा।।<br />
कह  प्रभु ससि महुँ मेचकताई। कहहु काह निज निज मति भाई।।<br />
कह सुग़ीव सुनहु रघुराई। ससि महुँ प्रगट भूमि कै झाँई।।<br />
मारेउ राहु ससिहि कह कोई। उर महँ परी स्यामता सोई।।<br />
कोउ कह जब बिधि रति मुख कीन्हा। सार भाग ससि कर हरि लीन्हा।।<br />
छिद्र सो प्रगट इंदु उर माहीं। तेहि मग देखिअ नभ परिछाहीं।।<br />
प्रभु कह गरल बंधु ससि केरा। अति प्रिय निज उर दीन्ह बसेरा।।<br />
बिष संजुत कर निकर पसारी। जारत बिरहवंत नर नारी।।<br />
दो0-कह हनुमंत सुनहु प्रभु ससि तुम्हारा प्रिय दास।<br />
    तव मूरति बिधु उर बसति सोइ स्यामता अभास।।12(क)।।<br />
           नवान्हपारायण।। सातवाँ विश्राम<br />
     पवन तनय के बचन सुनि बिहँसे रामु सुजान।<br />
     दच्छिन दिसि अवलोकि प्रभु बोले कृपा निधान।।12(ख)।।<br />
 --*--*--<br />
देखु बिभीषन दच्छिन आसा। घन घंमड दामिनि बिलासा।।<br />
मधुर मधुर गरजइ घन घोरा। होइ बृष्टि जनि उपल कठोरा।।<br />
कहत बिभीषन सुनहु कृपाला। होइ न तड़ित न बारिद माला।।<br />
लंका सिखर उपर आगारा। तहँ दसकंघर देख अखारा।।<br />
छत्र मेघडंबर सिर धारी। सोइ जनु जलद घटा अति कारी।।<br />
मंदोदरी श्रवन ताटंका। सोइ प्रभु जनु दामिनी दमंका।।<br />
बाजहिं ताल मृदंग अनूपा। सोइ रव मधुर सुनहु सुरभूपा।।<br />
प्रभु मुसुकान समुझि अभिमाना। चाप चढ़ाइ बान संधाना।।<br />
दो0-छत्र मुकुट ताटंक तब हते एकहीं बान।<br />
   सबकें देखत महि परे मरमु न कोऊ जान।।13(क)।।<br />
   अस कौतुक करि राम सर प्रबिसेउ आइ निषंग।<br />
   रावन सभा ससंक सब देखि महा रसभंग।।13(ख)।।<br />
 --*--*--<br />
कंप न भूमि न मरुत बिसेषा। अस्त्र सस्त्र कछु नयन न देखा।।<br />
सोचहिं सब निज हृदय मझारी। असगुन भयउ भयंकर भारी।।<br />
दसमुख देखि सभा भय पाई। बिहसि बचन कह जुगुति बनाई।।<br />
सिरउ गिरे संतत सुभ जाही। मुकुट परे कस असगुन ताही।।<br />
सयन करहु निज निज गृह जाई। गवने भवन सकल सिर नाई।।<br />
मंदोदरी सोच उर बसेऊ। जब ते श्रवनपूर महि खसेऊ।।<br />
सजल नयन कह जुग कर जोरी। सुनहु प्रानपति बिनती मोरी।।<br />
कंत राम बिरोध परिहरहू। जानि मनुज जनि हठ मन धरहू।।<br />
दो0-बिस्वरुप रघुबंस मनि करहु बचन बिस्वासु।<br />
    लोक कल्पना बेद कर अंग अंग प्रति जासु।।14।।<br />
 --*--*--<br />
पद पाताल सीस अज धामा। अपर लोक अँग अँग बिश्रामा।।<br />
भृकुटि बिलास भयंकर काला। नयन दिवाकर कच घन माला।।<br />
जासु घ्रान अस्विनीकुमारा। निसि अरु दिवस निमेष अपारा।।<br />
श्रवन दिसा दस बेद बखानी। मारुत स्वास निगम निज बानी।।<br />
अधर लोभ जम दसन कराला। माया हास बाहु दिगपाला।।<br />
आनन अनल अंबुपति जीहा। उतपति पालन प्रलय समीहा।।<br />
रोम राजि अष्टादस भारा। अस्थि सैल सरिता नस जारा।।<br />
उदर उदधि अधगो जातना। जगमय प्रभु का बहु कलपना।।<br />
दो0-अहंकार सिव बुद्धि अज मन ससि चित्त महान।<br />
   मनुज बास सचराचर रुप राम भगवान।।15 क।।<br />
   अस बिचारि सुनु प्रानपति प्रभु सन बयरु बिहाइ।<br />
   प्रीति करहु रघुबीर पद मम अहिवात न जाइ।।15 ख।।<br />
 --*--*--<br />
बिहँसा नारि बचन सुनि काना। अहो मोह महिमा बलवाना।।<br />
नारि सुभाउ सत्य सब कहहीं। अवगुन आठ सदा उर रहहीं।।<br />
साहस अनृत चपलता माया। भय अबिबेक असौच अदाया।।<br />
रिपु कर रुप सकल तैं गावा। अति बिसाल भय मोहि सुनावा।।<br />
सो सब प्रिया सहज बस मोरें। समुझि परा प्रसाद अब तोरें।।<br />
जानिउँ प्रिया तोरि चतुराई। एहि बिधि कहहु मोरि प्रभुताई।।<br />
तव बतकही गूढ़ मृगलोचनि। समुझत सुखद सुनत भय मोचनि।।<br />
मंदोदरि मन महुँ अस ठयऊ। पियहि काल बस मतिभ्रम भयऊ।।<br />
दो0-एहि बिधि करत बिनोद बहु प्रात प्रगट दसकंध।<br />
   सहज असंक लंकपति सभाँ गयउ मद अंध।।16(क)।।<br />
सो0-फूलह फरइ न बेत जदपि सुधा बरषहिं जलद।<br />
   मूरुख हृदयँ न चेत जौं गुर मिलहिं बिरंचि सम।।16(ख)।।<br />
 --*--*--<br />
इहाँ प्रात जागे रघुराई। पूछा मत सब सचिव बोलाई।।<br />
कहहु बेगि का करिअ उपाई। जामवंत कह पद सिरु नाई।।<br />
सुनु सर्बग्य सकल उर बासी। बुधि बल तेज धर्म गुन रासी।।<br />
मंत्र कहउँ निज मति अनुसारा। दूत पठाइअ बालिकुमारा।।<br />
नीक मंत्र सब के मन माना। अंगद सन कह कृपानिधाना।।<br />
बालितनय बुधि बल गुन धामा। लंका जाहु तात मम कामा।।<br />
बहुत बुझाइ तुम्हहि का कहऊँ। परम चतुर मैं जानत अहऊँ।।<br />
काजु हमार तासु हित होई। रिपु सन करेहु बतकही सोई।।<br />
सो0-प्रभु अग्या धरि सीस चरन बंदि अंगद उठेउ।<br />
   सोइ गुन सागर ईस राम कृपा जा पर करहु।।17(क)।।<br />
   स्वयं सिद्ध सब काज नाथ मोहि आदरु दियउ।<br />
   अस बिचारि जुबराज तन पुलकित हरषित हियउ।।17(ख)।।<br />
बंदि चरन उर धरि प्रभुताई। अंगद चलेउ सबहि सिरु नाई।।<br />
प्रभु प्रताप उर सहज असंका। रन बाँकुरा बालिसुत बंका।।<br />
पुर पैठत रावन कर बेटा। खेलत रहा सो होइ गै भैंटा।।<br />
बातहिं बात करष बढ़ि आई। जुगल अतुल बल पुनि तरुनाई।।<br />
तेहि अंगद कहुँ लात उठाई। गहि पद पटकेउ भूमि भवाँई।।<br />
निसिचर निकर देखि भट भारी। जहँ तहँ चले न सकहिं पुकारी।।<br />
एक एक सन मरमु न कहहीं। समुझि तासु बध चुप करि रहहीं।।<br />
भयउ कोलाहल नगर मझारी। आवा कपि लंका जेहीं जारी।।<br />
अब धौं कहा करिहि करतारा। अति सभीत सब करहिं बिचारा।।<br />
बिनु पूछें मगु देहिं दिखाई। जेहि बिलोक सोइ जाइ सुखाई।।<br />
 दो0-गयउ सभा दरबार तब सुमिरि राम पद कंज।<br />
     सिंह ठवनि इत उत चितव धीर बीर बल पुंज।।18।।<br />
 --*--*--<br />
तुरत निसाचर एक पठावा। समाचार रावनहि जनावा।।<br />
सुनत बिहँसि बोला दससीसा। आनहु बोलि कहाँ कर कीसा।।<br />
आयसु पाइ दूत बहु धाए। कपिकुंजरहि बोलि लै आए।।<br />
अंगद दीख दसानन बैंसें। सहित प्रान कज्जलगिरि जैसें।।<br />
भुजा बिटप सिर सृंग समाना। रोमावली लता जनु नाना।।<br />
मुख नासिका नयन अरु काना। गिरि कंदरा खोह अनुमाना।।<br />
गयउ सभाँ मन नेकु न मुरा। बालितनय अतिबल बाँकुरा।।<br />
उठे सभासद कपि कहुँ देखी। रावन उर भा क्रौध बिसेषी।।<br />
दो0-जथा मत्त गज जूथ महुँ पंचानन चलि जाइ।<br />
    राम प्रताप सुमिरि मन बैठ सभाँ सिरु नाइ।।19।।<br />
 --*--*--<br />
कह दसकंठ कवन तैं बंदर। मैं रघुबीर दूत दसकंधर।।<br />
मम जनकहि तोहि रही मिताई। तव हित कारन आयउँ भाई।।<br />
उत्तम कुल पुलस्ति कर नाती। सिव बिरंचि पूजेहु बहु भाँती।।<br />
बर पायहु कीन्हेहु सब काजा। जीतेहु लोकपाल सब राजा।।<br />
नृप अभिमान मोह बस किंबा। हरि आनिहु सीता जगदंबा।।<br />
अब सुभ कहा सुनहु तुम्ह मोरा। सब अपराध छमिहि प्रभु तोरा।।<br />
दसन गहहु तृन कंठ कुठारी। परिजन सहित संग निज नारी।।<br />
सादर जनकसुता करि आगें। एहि बिधि चलहु सकल भय त्यागें।।<br />
दो0-प्रनतपाल रघुबंसमनि त्राहि त्राहि अब मोहि।<br />
    आरत गिरा सुनत प्रभु अभय करैगो तोहि।।20।।<br />
 --*--*--<br />
रे कपिपोत बोलु संभारी। मूढ़ न जानेहि मोहि सुरारी।।<br />
कहु निज नाम जनक कर भाई। केहि नातें मानिऐ मिताई।।<br />
अंगद नाम बालि कर बेटा। तासों कबहुँ भई ही भेटा।।<br />
अंगद बचन सुनत सकुचाना। रहा बालि बानर मैं जाना।।<br />
अंगद तहीं बालि कर बालक। उपजेहु बंस अनल कुल घालक।।<br />
गर्भ न गयहु ब्यर्थ तुम्ह जायहु। निज मुख तापस दूत कहायहु।।<br />
अब कहु कुसल बालि कहँ अहई। बिहँसि बचन तब अंगद कहई।।<br />
दिन दस गएँ बालि पहिं जाई। बूझेहु कुसल सखा उर लाई।।<br />
राम बिरोध कुसल जसि होई। सो सब तोहि सुनाइहि सोई।।<br />
सुनु सठ भेद होइ मन ताकें। श्रीरघुबीर हृदय नहिं जाकें।।<br />
दो0-हम कुल घालक सत्य तुम्ह कुल पालक दससीस।<br />
    अंधउ बधिर न अस कहहिं नयन कान तव बीस।।21।<br />
 --*--*--<br />
सिव बिरंचि सुर मुनि समुदाई। चाहत जासु चरन सेवकाई।।<br />
तासु दूत होइ हम कुल बोरा। अइसिहुँ मति उर बिहर न तोरा।।<br />
सुनि कठोर बानी कपि केरी। कहत दसानन नयन तरेरी।।<br />
खल तव कठिन बचन सब सहऊँ। नीति धर्म मैं जानत अहऊँ।।<br />
कह कपि धर्मसीलता तोरी। हमहुँ सुनी कृत पर त्रिय चोरी।।<br />
देखी नयन दूत रखवारी। बूड़ि न मरहु धर्म ब्रतधारी।।<br />
कान नाक बिनु भगिनि निहारी। छमा कीन्हि तुम्ह धर्म बिचारी।।<br />
धर्मसीलता तव जग जागी। पावा दरसु हमहुँ बड़भागी।।<br />
दो0-जनि जल्पसि जड़ जंतु कपि सठ बिलोकु मम बाहु।<br />
    लोकपाल बल बिपुल ससि ग्रसन हेतु सब राहु।।22(क)।।<br />
    पुनि नभ सर मम कर निकर कमलन्हि पर करि बास।<br />
    सोभत भयउ मराल इव संभु सहित कैलास।।22(ख)।।<br />
 --*--*--<br />
तुम्हरे कटक माझ सुनु अंगद। मो सन भिरिहि कवन जोधा बद।।<br />
तव प्रभु नारि बिरहँ बलहीना। अनुज तासु दुख दुखी मलीना।।<br />
तुम्ह सुग्रीव कूलद्रुम दोऊ। अनुज हमार भीरु अति सोऊ।।<br />
जामवंत मंत्री अति बूढ़ा। सो कि होइ अब समरारूढ़ा।।<br />
सिल्पि कर्म जानहिं नल नीला। है कपि एक महा बलसीला।।<br />
आवा प्रथम नगरु जेंहिं जारा। सुनत बचन कह बालिकुमारा।।<br />
सत्य बचन कहु निसिचर नाहा। साँचेहुँ कीस कीन्ह पुर दाहा।।<br />
रावन नगर अल्प कपि दहई। सुनि अस बचन सत्य को कहई।।<br />
जो अति सुभट सराहेहु रावन। सो सुग्रीव केर लघु धावन।।<br />
चलइ बहुत सो बीर न होई। पठवा खबरि लेन हम सोई।।<br />
दो0-सत्य नगरु कपि जारेउ बिनु प्रभु आयसु पाइ।<br />
    फिरि न गयउ सुग्रीव पहिं तेहिं भय रहा लुकाइ।।23(क)।।<br />
    सत्य कहहि दसकंठ सब मोहि न सुनि कछु कोह।<br />
    कोउ न हमारें कटक अस तो सन लरत जो सोह।।23(ख)।।<br />
    प्रीति बिरोध समान सन करिअ नीति असि आहि।<br />
    जौं मृगपति बध मेड़ुकन्हि भल कि कहइ कोउ ताहि।।23(ग)।।<br />
    जद्यपि लघुता राम कहुँ तोहि बधें बड़ दोष।<br />
    तदपि कठिन दसकंठ सुनु छत्र जाति कर रोष।।23(घ)।।<br />
    बक्र उक्ति धनु बचन सर हृदय दहेउ रिपु कीस।<br />
    प्रतिउत्तर सड़सिन्ह मनहुँ काढ़त भट दससीस।।23(ङ)।।<br />
    हँसि बोलेउ दसमौलि तब कपि कर बड़ गुन एक।<br />
    जो प्रतिपालइ तासु हित करइ उपाय अनेक।।23(छ)।।<br />
 --*--*--<br />
धन्य कीस जो निज प्रभु काजा। जहँ तहँ नाचइ परिहरि लाजा।।<br />
नाचि कूदि करि लोग रिझाई। पति हित करइ धर्म निपुनाई।।<br />
अंगद स्वामिभक्त तव जाती। प्रभु गुन कस न कहसि एहि भाँती।।<br />
मैं गुन गाहक परम सुजाना। तव कटु रटनि करउँ नहिं काना।।<br />
कह कपि तव गुन गाहकताई। सत्य पवनसुत मोहि सुनाई।।<br />
बन बिधंसि सुत बधि पुर जारा। तदपि न तेहिं कछु कृत अपकारा।।<br />
सोइ बिचारि तव प्रकृति सुहाई। दसकंधर मैं कीन्हि ढिठाई।।<br />
देखेउँ आइ जो कछु कपि भाषा। तुम्हरें लाज न रोष न माखा।।<br />
जौं असि मति पितु खाए कीसा। कहि अस बचन हँसा दससीसा।।<br />
पितहि खाइ खातेउँ पुनि तोही। अबहीं समुझि परा कछु मोही।।<br />
बालि बिमल जस भाजन जानी। हतउँ न तोहि अधम अभिमानी।।<br />
कहु रावन रावन जग केते। मैं निज श्रवन सुने सुनु जेते।।<br />
बलिहि जितन एक गयउ पताला। राखेउ बाँधि सिसुन्ह हयसाला।।<br />
खेलहिं बालक मारहिं जाई। दया लागि बलि दीन्ह छोड़ाई।।<br />
एक बहोरि सहसभुज देखा। धाइ धरा जिमि जंतु बिसेषा।।<br />
कौतुक लागि भवन लै आवा। सो पुलस्ति मुनि जाइ छोड़ावा।।<br />
दो0-एक कहत मोहि सकुच अति रहा बालि की काँख।<br />
    इन्ह महुँ रावन तैं कवन सत्य बदहि तजि माख।।24।।<br />
 --*--*--<br />
सुनु सठ सोइ रावन बलसीला। हरगिरि जान जासु भुज लीला।।<br />
जान उमापति जासु सुराई। पूजेउँ जेहि सिर सुमन चढ़ाई।।<br />
सिर सरोज निज करन्हि उतारी। पूजेउँ अमित बार त्रिपुरारी।।<br />
भुज बिक्रम जानहिं दिगपाला। सठ अजहूँ जिन्ह कें उर साला।।<br />
जानहिं दिग्गज उर कठिनाई। जब जब भिरउँ जाइ बरिआई।।<br />
जिन्ह के दसन कराल न फूटे। उर लागत मूलक इव टूटे।।<br />
जासु चलत डोलति इमि धरनी। चढ़त मत्त गज जिमि लघु तरनी।।<br />
सोइ रावन जग बिदित प्रतापी। सुनेहि न श्रवन अलीक प्रलापी।।<br />
दो0-तेहि रावन कहँ लघु कहसि नर कर करसि बखान।<br />
    रे कपि बर्बर खर्ब खल अब जाना तव ग्यान।।25।।<br />
 --*--*--<br />
सुनि अंगद सकोप कह बानी। बोलु सँभारि अधम अभिमानी।।<br />
सहसबाहु भुज गहन अपारा। दहन अनल सम जासु कुठारा।।<br />
जासु परसु सागर खर धारा। बूड़े नृप अगनित बहु बारा।।<br />
तासु गर्ब जेहि देखत भागा। सो नर क्यों दससीस अभागा।।<br />
राम मनुज कस रे सठ बंगा। धन्वी कामु नदी पुनि गंगा।।<br />
पसु सुरधेनु कल्पतरु रूखा। अन्न दान अरु रस पीयूषा।।<br />
बैनतेय खग अहि सहसानन। चिंतामनि पुनि उपल दसानन।।<br />
सुनु मतिमंद लोक बैकुंठा। लाभ कि रघुपति भगति अकुंठा।।<br />
दो0-सेन सहित तब मान मथि बन उजारि पुर जारि।।<br />
    कस रे सठ हनुमान कपि गयउ जो तव सुत मारि।।26।।<br />
 --*--*--<br />
सुनु रावन परिहरि चतुराई। भजसि न कृपासिंधु रघुराई।।<br />
जौ खल भएसि राम कर द्रोही। ब्रह्म रुद्र सक राखि न तोही।।<br />
मूढ़ बृथा जनि मारसि गाला। राम बयर अस होइहि हाला।।<br />
तव सिर निकर कपिन्ह के आगें। परिहहिं धरनि राम सर लागें।।<br />
ते तव सिर कंदुक सम नाना। खेलहहिं भालु कीस चौगाना।।<br />
जबहिं समर कोपहि रघुनायक। छुटिहहिं अति कराल बहु सायक।।<br />
तब कि चलिहि अस गाल तुम्हारा। अस बिचारि भजु राम उदारा।।<br />
सुनत बचन रावन परजरा। जरत महानल जनु घृत परा।।<br />
दो0-कुंभकरन अस बंधु मम सुत प्रसिद्ध सक्रारि।<br />
    मोर पराक्रम नहिं सुनेहि जितेउँ चराचर झारि।।27।।<br />
 --*--*--<br />
सठ साखामृग जोरि सहाई। बाँधा सिंधु इहइ प्रभुताई।।<br />
नाघहिं खग अनेक बारीसा। सूर न होहिं ते सुनु सब कीसा।।<br />
मम भुज सागर बल जल पूरा। जहँ बूड़े बहु सुर नर सूरा।।<br />
बीस पयोधि अगाध अपारा। को अस बीर जो पाइहि पारा।।<br />
दिगपालन्ह मैं नीर भरावा। भूप सुजस खल मोहि सुनावा।।<br />
जौं पै समर सुभट तव नाथा। पुनि पुनि कहसि जासु गुन गाथा।।<br />
तौ बसीठ पठवत केहि काजा। रिपु सन प्रीति करत नहिं लाजा।।<br />
हरगिरि मथन निरखु मम बाहू। पुनि सठ कपि निज प्रभुहि सराहू।।<br />
दो0-सूर कवन रावन सरिस स्वकर काटि जेहिं सीस।<br />
    हुने अनल अति हरष बहु बार साखि गौरीस।।28।।<br />
 --*--*--<br />
जरत बिलोकेउँ जबहिं कपाला। बिधि के लिखे अंक निज भाला।।<br />
नर कें कर आपन बध बाँची। हसेउँ जानि बिधि गिरा असाँची।।<br />
सोउ मन समुझि त्रास नहिं मोरें। लिखा बिरंचि जरठ मति भोरें।।<br />
आन बीर बल सठ मम आगें। पुनि पुनि कहसि लाज पति त्यागे।।<br />
कह अंगद सलज्ज जग माहीं। रावन तोहि समान कोउ नाहीं।।<br />
लाजवंत तव सहज सुभाऊ। निज मुख निज गुन कहसि न काऊ।।<br />
सिर अरु सैल कथा चित रही। ताते बार बीस तैं कही।।<br />
सो भुजबल राखेउ उर घाली। जीतेहु सहसबाहु बलि बाली।।<br />
सुनु मतिमंद देहि अब पूरा। काटें सीस कि होइअ सूरा।।<br />
इंद्रजालि कहु कहिअ न बीरा। काटइ निज कर सकल सरीरा।।<br />
दो0-जरहिं पतंग मोह बस भार बहहिं खर बृंद।<br />
    ते नहिं सूर कहावहिं समुझि देखु मतिमंद।।29।।<br />
 --*--*--<br />
अब जनि बतबढ़ाव खल करही। सुनु मम बचन मान परिहरही।।<br />
दसमुख मैं न बसीठीं आयउँ। अस बिचारि रघुबीष पठायउँ।।<br />
बार बार अस कहइ कृपाला। नहिं गजारि जसु बधें सृकाला।।<br />
मन महुँ समुझि बचन प्रभु केरे। सहेउँ कठोर बचन सठ तेरे।।<br />
नाहिं त करि मुख भंजन तोरा। लै जातेउँ सीतहि बरजोरा।।<br />
जानेउँ तव बल अधम सुरारी। सूनें हरि आनिहि परनारी।।<br />
तैं निसिचर पति गर्ब बहूता। मैं रघुपति सेवक कर दूता।।<br />
जौं न राम अपमानहि डरउँ। तोहि देखत अस कौतुक करऊँ।।<br />
दो0-तोहि पटकि महि सेन हति चौपट करि तव गाउँ।<br />
   तव जुबतिन्ह समेत सठ जनकसुतहि लै जाउँ।।30।।<br />
 --*--*--<br />
जौ अस करौं तदपि न बड़ाई। मुएहि बधें नहिं कछु मनुसाई।।<br />
कौल कामबस कृपिन बिमूढ़ा। अति दरिद्र अजसी अति बूढ़ा।।<br />
सदा रोगबस संतत क्रोधी। बिष्नु बिमूख श्रुति संत बिरोधी।।<br />
तनु पोषक निंदक अघ खानी। जीवन सव सम चौदह प्रानी।।<br />
अस बिचारि खल बधउँ न तोही। अब जनि रिस उपजावसि मोही।।<br />
सुनि सकोप कह निसिचर नाथा। अधर दसन दसि मीजत हाथा।।<br />
रे कपि अधम मरन अब चहसी। छोटे बदन बात बड़ि कहसी।।<br />
कटु जल्पसि जड़ कपि बल जाकें। बल प्रताप बुधि तेज न ताकें।।<br />
 दो0-अगुन अमान जानि तेहि दीन्ह पिता बनबास।<br />
     सो दुख अरु जुबती बिरह पुनि निसि दिन मम त्रास।।31(क)।।<br />
     जिन्ह के बल कर गर्ब तोहि अइसे मनुज अनेक।<br />
     खाहीं निसाचर दिवस निसि मूढ़ समुझु तजि टेक।।31(ख)।।<br />
 --*--*--<br />
जब तेहिं कीन्ह राम कै निंदा। क्रोधवंत अति भयउ कपिंदा।।<br />
हरि हर निंदा सुनइ जो काना। होइ पाप गोघात समाना।।<br />
कटकटान कपिकुंजर भारी। दुहु भुजदंड तमकि महि मारी।।<br />
डोलत धरनि सभासद खसे। चले भाजि भय मारुत ग्रसे।।<br />
गिरत सँभारि उठा दसकंधर। भूतल परे मुकुट अति सुंदर।।<br />
कछु तेहिं लै निज सिरन्हि सँवारे। कछु अंगद प्रभु पास पबारे।।<br />
आवत मुकुट देखि कपि भागे। दिनहीं लूक परन बिधि लागे।।<br />
की रावन करि कोप चलाए। कुलिस चारि आवत अति धाए।।<br />
कह प्रभु हँसि जनि हृदयँ डेराहू। लूक न असनि केतु नहिं राहू।।<br />
ए किरीट दसकंधर केरे। आवत बालितनय के प्रेरे।।<br />
दो0-तरकि पवनसुत कर गहे आनि धरे प्रभु पास।<br />
   कौतुक देखहिं भालु कपि दिनकर सरिस प्रकास।।32(क)।।<br />
   उहाँ सकोपि दसानन सब सन कहत रिसाइ।<br />
   धरहु कपिहि धरि मारहु सुनि अंगद मुसुकाइ।।32(ख)।।<br />
 --*--*--<br />
एहि बिधि बेगि सूभट सब धावहु। खाहु भालु कपि जहँ जहँ पावहु।।<br />
मर्कटहीन करहु महि जाई। जिअत धरहु तापस द्वौ भाई।।<br />
पुनि सकोप बोलेउ जुबराजा। गाल बजावत तोहि न लाजा।।<br />
मरु गर काटि निलज कुलघाती। बल बिलोकि बिहरति नहिं छाती।।<br />
रे त्रिय चोर कुमारग गामी। खल मल रासि मंदमति कामी।।<br />
सन्यपात जल्पसि दुर्बादा। भएसि कालबस खल मनुजादा।।<br />
याको फलु  पावहिगो आगें। बानर भालु चपेटन्हि लागें।।<br />
रामु मनुज बोलत असि बानी। गिरहिं न तव रसना अभिमानी।।<br />
गिरिहहिं रसना संसय नाहीं। सिरन्हि समेत समर महि माहीं।।<br />
सो0-सो नर क्यों दसकंध बालि बध्यो जेहिं एक सर।<br />
    बीसहुँ लोचन अंध धिग तव जन्म कुजाति जड़।।33(क)।।<br />
    तब सोनित की प्यास तृषित राम सायक निकर।<br />
    तजउँ तोहि तेहि त्रास कटु जल्पक निसिचर अधम।।33(ख)।।<br />
मै तव दसन तोरिबे लायक। आयसु मोहि न दीन्ह रघुनायक।।<br />
असि रिस होति दसउ मुख तोरौं। लंका गहि समुद्र महँ बोरौं।।<br />
गूलरि फल समान तव लंका। बसहु मध्य तुम्ह जंतु असंका।।<br />
मैं बानर फल खात न बारा। आयसु दीन्ह न राम उदारा।।<br />
जुगति सुनत रावन मुसुकाई। मूढ़ सिखिहि कहँ बहुत झुठाई।।<br />
बालि न कबहुँ गाल अस मारा। मिलि तपसिन्ह तैं भएसि लबारा।।<br />
साँचेहुँ मैं लबार भुज बीहा। जौं न उपारिउँ तव दस जीहा।।<br />
समुझि राम प्रताप कपि कोपा। सभा माझ पन करि पद रोपा।।<br />
जौं मम चरन सकसि सठ टारी। फिरहिं रामु सीता मैं हारी।।<br />
सुनहु सुभट सब कह दससीसा। पद गहि धरनि पछारहु कीसा।।<br />
इंद्रजीत आदिक बलवाना। हरषि उठे जहँ तहँ भट नाना।।<br />
झपटहिं करि बल बिपुल उपाई। पद न टरइ बैठहिं सिरु नाई।।<br />
पुनि उठि झपटहीं सुर आराती। टरइ न कीस चरन एहि भाँती।।<br />
पुरुष कुजोगी जिमि उरगारी। मोह बिटप नहिं सकहिं उपारी।।<br />
दो0-कोटिन्ह मेघनाद सम सुभट उठे हरषाइ।<br />
   झपटहिं टरै न कपि चरन पुनि बैठहिं सिर नाइ।।34(क)।।<br />
   भूमि न छाँडत कपि चरन देखत रिपु मद भाग।।<br />
   कोटि बिघ्न ते संत कर मन जिमि नीति न त्याग।।34(ख)।।<br />
 --*--*--<br />
कपि बल देखि सकल हियँ हारे। उठा आपु कपि कें परचारे।।<br />
गहत चरन कह बालिकुमारा। मम पद गहें न तोर उबारा।।<br />
गहसि न राम चरन सठ जाई। सुनत फिरा मन अति सकुचाई।।<br />
भयउ तेजहत श्री सब गई। मध्य दिवस जिमि ससि सोहई।।<br />
सिंघासन बैठेउ सिर नाई। मानहुँ संपति सकल गँवाई।।<br />
जगदातमा प्रानपति रामा। तासु बिमुख किमि लह बिश्रामा।।<br />
उमा राम की भृकुटि बिलासा। होइ बिस्व पुनि पावइ नासा।।<br />
तृन ते कुलिस कुलिस तृन करई। तासु दूत पन कहु किमि टरई।।<br />
पुनि कपि कही नीति बिधि नाना। मान न ताहि कालु निअराना।।<br />
रिपु मद मथि प्रभु सुजसु सुनायो। यह कहि चल्यो बालि नृप जायो।।<br />
हतौं न खेत खेलाइ खेलाई। तोहि अबहिं का करौं बड़ाई।।<br />
प्रथमहिं तासु तनय कपि मारा। सो सुनि रावन भयउ दुखारा।।<br />
जातुधान अंगद पन देखी। भय ब्याकुल सब भए बिसेषी।।<br />
दो0-रिपु बल धरषि हरषि कपि बालितनय बल पुंज।<br />
   पुलक सरीर नयन जल गहे राम पद कंज।।35(क)।।<br />
   साँझ जानि दसकंधर भवन गयउ बिलखाइ।<br />
   मंदोदरी रावनहि बहुरि कहा समुझाइ।।(ख)।।<br />
 --*--*--<br />
कंत समुझि मन तजहु कुमतिही। सोह न समर तुम्हहि रघुपतिही।।<br />
रामानुज लघु रेख खचाई। सोउ नहिं नाघेहु असि मनुसाई।।<br />
पिय तुम्ह ताहि जितब संग्रामा। जाके दूत केर यह कामा।।<br />
कौतुक सिंधु नाघी तव लंका। आयउ कपि केहरी असंका।।<br />
रखवारे हति बिपिन उजारा। देखत तोहि अच्छ तेहिं मारा।।<br />
जारि सकल पुर कीन्हेसि छारा। कहाँ रहा बल गर्ब तुम्हारा।।<br />
अब पति मृषा गाल जनि मारहु। मोर कहा कछु हृदयँ बिचारहु।।<br />
पति रघुपतिहि नृपति जनि मानहु। अग जग नाथ अतुल बल जानहु।।<br />
बान प्रताप जान मारीचा। तासु कहा नहिं मानेहि नीचा।।<br />
जनक सभाँ अगनित भूपाला। रहे तुम्हउ बल अतुल बिसाला।।<br />
भंजि धनुष जानकी बिआही। तब संग्राम जितेहु किन ताही।।<br />
सुरपति सुत जानइ बल थोरा। राखा जिअत आँखि गहि फोरा।।<br />
सूपनखा कै गति तुम्ह देखी। तदपि हृदयँ नहिं लाज बिषेषी।।<br />
दो0-बधि बिराध खर दूषनहि लीँलाँ हत्यो कबंध।<br />
   बालि एक सर मारयो तेहि जानहु दसकंध।।36।।<br />
 --*--*--<br />
जेहिं जलनाथ बँधायउ हेला। उतरे प्रभु दल सहित सुबेला।।<br />
कारुनीक दिनकर कुल केतू। दूत पठायउ तव हित हेतू।।<br />
सभा माझ जेहिं तव बल मथा। करि बरूथ महुँ मृगपति जथा।।<br />
अंगद हनुमत अनुचर जाके। रन बाँकुरे बीर अति बाँके।।<br />
तेहि कहँ पिय पुनि पुनि नर कहहू। मुधा मान ममता मद बहहू।।<br />
अहह कंत कृत राम बिरोधा। काल बिबस मन उपज न बोधा।।<br />
काल दंड गहि काहु न मारा। हरइ धर्म बल बुद्धि बिचारा।।<br />
निकट काल जेहि आवत साईं। तेहि भ्रम होइ तुम्हारिहि नाईं।।<br />
दो0-दुइ सुत मरे दहेउ पुर अजहुँ पूर पिय देहु।<br />
    कृपासिंधु रघुनाथ भजि नाथ बिमल जसु लेहु।।37।।<br />
 --*--*--<br />
नारि बचन सुनि बिसिख समाना। सभाँ गयउ उठि होत बिहाना।।<br />
बैठ जाइ सिंघासन फूली। अति अभिमान त्रास सब भूली।।<br />
इहाँ राम अंगदहि बोलावा। आइ चरन पंकज सिरु नावा।।<br />
अति आदर सपीप बैठारी। बोले बिहँसि कृपाल खरारी।।<br />
बालितनय कौतुक अति मोही। तात सत्य कहु पूछउँ तोही।।।<br />
रावनु जातुधान कुल टीका। भुज बल अतुल जासु जग लीका।।<br />
तासु मुकुट तुम्ह चारि चलाए। कहहु तात कवनी बिधि पाए।।<br />
सुनु सर्बग्य प्रनत सुखकारी। मुकुट न होहिं भूप गुन चारी।।<br />
साम दान अरु दंड बिभेदा। नृप उर बसहिं नाथ कह बेदा।।<br />
नीति धर्म के चरन सुहाए। अस जियँ जानि नाथ पहिं आए।।<br />
दो0-धर्महीन प्रभु पद बिमुख काल बिबस दससीस।<br />
    तेहि परिहरि गुन आए सुनहु कोसलाधीस।।38(((क)।।<br />
    परम चतुरता श्रवन सुनि बिहँसे रामु उदार।<br />
    समाचार पुनि सब कहे गढ़ के बालिकुमार।।38(ख)।।<br />
 --*--*--<br />
रिपु के समाचार जब पाए। राम सचिव सब निकट बोलाए।।<br />
लंका बाँके चारि दुआरा। केहि बिधि लागिअ करहु बिचारा।।<br />
तब कपीस रिच्छेस बिभीषन। सुमिरि हृदयँ दिनकर कुल भूषन।।<br />
करि बिचार तिन्ह मंत्र दृढ़ावा। चारि अनी कपि कटकु बनावा।।<br />
जथाजोग सेनापति कीन्हे। जूथप सकल बोलि तब लीन्हे।।<br />
प्रभु प्रताप कहि सब समुझाए। सुनि कपि सिंघनाद करि धाए।।<br />
हरषित राम चरन सिर नावहिं। गहि गिरि सिखर बीर सब धावहिं।।<br />
गर्जहिं तर्जहिं भालु कपीसा। जय रघुबीर कोसलाधीसा।।<br />
जानत परम दुर्ग अति लंका। प्रभु प्रताप कपि चले असंका।।<br />
घटाटोप करि चहुँ दिसि घेरी। मुखहिं निसान बजावहीं भेरी।।<br />
दो0-जयति राम जय लछिमन जय कपीस सुग्रीव।<br />
    गर्जहिं सिंघनाद कपि भालु महा बल सींव।।39।।<br />
 --*--*--<br />
लंकाँ भयउ कोलाहल भारी। सुना दसानन अति अहँकारी।।<br />
देखहु बनरन्ह केरि ढिठाई। बिहँसि निसाचर सेन बोलाई।।<br />
आए कीस काल के प्रेरे। छुधावंत सब निसिचर मेरे।।<br />
अस कहि अट्टहास सठ कीन्हा। गृह बैठे अहार बिधि दीन्हा।।<br />
सुभट सकल चारिहुँ दिसि जाहू। धरि धरि भालु कीस सब खाहू।।<br />
उमा रावनहि अस अभिमाना। जिमि टिट्टिभ खग सूत उताना।।<br />
चले निसाचर आयसु मागी। गहि कर भिंडिपाल बर साँगी।।<br />
तोमर मुग्दर परसु प्रचंडा। सुल कृपान परिघ गिरिखंडा।।<br />
जिमि अरुनोपल निकर निहारी। धावहिं सठ खग मांस अहारी।।<br />
चोंच भंग दुख तिन्हहि न सूझा। तिमि धाए मनुजाद अबूझा।।<br />
दो0-नानायुध सर चाप धर जातुधान बल बीर।<br />
    कोट कँगूरन्हि चढ़ि गए कोटि कोटि रनधीर।।40।।<br />
 --*--*--<br />
कोट कँगूरन्हि सोहहिं कैसे। मेरु के सृंगनि जनु घन बैसे।।<br />
बाजहिं ढोल निसान जुझाऊ। सुनि धुनि होइ भटन्हि मन चाऊ।।<br />
बाजहिं भेरि नफीरि अपारा। सुनि कादर उर जाहिं दरारा।।<br />
देखिन्ह जाइ कपिन्ह के ठट्टा। अति बिसाल तनु भालु सुभट्टा।।<br />
धावहिं गनहिं न अवघट घाटा। पर्बत फोरि करहिं गहि बाटा।।<br />
कटकटाहिं कोटिन्ह भट गर्जहिं। दसन ओठ काटहिं अति तर्जहिं।।<br />
उत रावन इत राम दोहाई। जयति जयति जय परी लराई।।<br />
निसिचर सिखर समूह ढहावहिं। कूदि धरहिं कपि फेरि चलावहिं।।<br />
दो0-धरि कुधर खंड प्रचंड कर्कट भालु गढ़ पर डारहीं।<br />
    झपटहिं चरन गहि पटकि महि भजि चलत बहुरि पचारहीं।।<br />
 --*--*--<br />
    अति तरल तरुन प्रताप तरपहिं तमकि गढ़ चढ़ि चढ़ि गए।<br />
    कपि भालु चढ़ि मंदिरन्ह जहँ तहँ राम जसु गावत भए।।<br />
दो0-एकु एकु निसिचर गहि पुनि कपि चले पराइ।<br />
   ऊपर आपु हेठ भट  गिरहिं धरनि पर आइ।।41।।<br />
 --*--*--<br />
राम प्रताप प्रबल कपिजूथा। मर्दहिं निसिचर सुभट बरूथा।।<br />
चढ़े दुर्ग पुनि जहँ तहँ बानर। जय रघुबीर प्रताप दिवाकर।।<br />
चले निसाचर निकर पराई। प्रबल पवन जिमि घन समुदाई।।<br />
हाहाकार भयउ पुर भारी। रोवहिं बालक आतुर नारी।।<br />
सब मिलि देहिं रावनहि गारी। राज करत एहिं मृत्यु हँकारी।।<br />
निज दल बिचल सुनी तेहिं काना। फेरि सुभट लंकेस रिसाना।।<br />
जो रन बिमुख सुना मैं काना। सो मैं हतब कराल कृपाना।।<br />
सर्बसु खाइ भोग करि नाना। समर भूमि भए बल्लभ प्राना।।<br />
उग्र बचन सुनि सकल डेराने। चले क्रोध करि सुभट लजाने।।<br />
सन्मुख मरन बीर कै सोभा। तब तिन्ह तजा प्रान कर लोभा।।<br />
दो0-बहु आयुध धर सुभट सब भिरहिं पचारि पचारि।<br />
    ब्याकुल किए भालु कपि परिघ त्रिसूलन्हि मारी।।42।।<br />
 --*--*--<br />
भय आतुर कपि भागन लागे। जद्यपि उमा जीतिहहिं आगे।।<br />
कोउ कह कहँ अंगद हनुमंता। कहँ नल नील दुबिद बलवंता।।<br />
निज दल  बिकल सुना हनुमाना। पच्छिम द्वार रहा बलवाना।।<br />
मेघनाद तहँ करइ लराई। टूट न द्वार परम कठिनाई।।<br />
पवनतनय मन भा अति क्रोधा। गर्जेउ प्रबल काल सम जोधा।।<br />
कूदि लंक गढ़ ऊपर आवा। गहि गिरि मेघनाद कहुँ धावा।।<br />
भंजेउ रथ सारथी निपाता। ताहि हृदय महुँ मारेसि लाता।।<br />
दुसरें सूत बिकल तेहि जाना। स्यंदन घालि तुरत गृह आना।।<br />
दो0-अंगद सुना पवनसुत गढ़ पर गयउ अकेल।<br />
    रन बाँकुरा बालिसुत तरकि चढ़ेउ कपि खेल।।43।।<br />
 --*--*--<br />
जुद्ध बिरुद्ध क्रुद्ध द्वौ बंदर। राम प्रताप सुमिरि उर अंतर।।<br />
रावन भवन चढ़े द्वौ धाई। करहि कोसलाधीस दोहाई।।<br />
कलस सहित गहि भवनु ढहावा। देखि निसाचरपति भय पावा।।<br />
नारि बृंद कर पीटहिं छाती। अब दुइ कपि आए उतपाती।।<br />
कपिलीला करि तिन्हहि डेरावहिं। रामचंद्र कर सुजसु सुनावहिं।।<br />
पुनि कर गहि कंचन के खंभा। कहेन्हि करिअ उतपात अरंभा।।<br />
गर्जि परे रिपु कटक मझारी। लागे मर्दै भुज बल भारी।।<br />
काहुहि लात चपेटन्हि केहू। भजहु न रामहि सो फल लेहू।।<br />
दो0-एक एक सों मर्दहिं तोरि चलावहिं मुंड।<br />
   रावन आगें परहिं ते जनु फूटहिं दधि कुंड।।44।।<br />
 --*--*--<br />
महा महा मुखिआ जे पावहिं। ते पद गहि प्रभु पास चलावहिं।।<br />
कहइ बिभीषनु तिन्ह के नामा। देहिं राम तिन्हहू निज धामा।।<br />
खल मनुजाद द्विजामिष भोगी। पावहिं गति जो जाचत जोगी।।<br />
उमा राम मृदुचित करुनाकर। बयर भाव सुमिरत मोहि निसिचर।।<br />
देहिं परम गति सो जियँ जानी। अस कृपाल को कहहु भवानी।।<br />
अस प्रभु सुनि न भजहिं भ्रम त्यागी। नर मतिमंद ते परम अभागी।।<br />
अंगद अरु हनुमंत प्रबेसा। कीन्ह दुर्ग अस कह अवधेसा।।<br />
लंकाँ द्वौ कपि सोहहिं कैसें। मथहि सिंधु दुइ मंदर जैसें।।<br />
दो0-भुज बल रिपु दल दलमलि देखि दिवस कर अंत।<br />
   कूदे जुगल बिगत श्रम आए जहँ भगवंत।।45।।<br />
 --*--*--<br />
प्रभु पद कमल सीस तिन्ह नाए। देखि सुभट रघुपति मन भाए।।<br />
राम कृपा करि जुगल निहारे। भए बिगतश्रम परम सुखारे।।<br />
गए जानि अंगद हनुमाना। फिरे भालु मर्कट भट नाना।।<br />
जातुधान प्रदोष बल पाई। धाए करि दससीस दोहाई।।<br />
निसिचर अनी देखि कपि फिरे। जहँ तहँ कटकटाइ भट भिरे।।<br />
द्वौ दल प्रबल पचारि पचारी। लरत सुभट नहिं मानहिं हारी।।<br />
महाबीर निसिचर सब कारे। नाना बरन बलीमुख भारे।।<br />
सबल जुगल दल समबल जोधा। कौतुक करत लरत करि क्रोधा।।<br />
प्राबिट सरद पयोद घनेरे। लरत मनहुँ मारुत के प्रेरे।।<br />
अनिप अकंपन अरु अतिकाया। बिचलत सेन कीन्हि इन्ह माया।।<br />
भयउ निमिष महँ अति अँधियारा। बृष्टि होइ रुधिरोपल छारा।।<br />
दो0-देखि निबिड़ तम दसहुँ दिसि कपिदल भयउ खभार।<br />
   एकहि एक न देखई जहँ तहँ करहिं पुकार।।46।।<br />
 --*--*--<br />
सकल मरमु रघुनायक जाना। लिए बोलि अंगद हनुमाना।।<br />
समाचार सब कहि समुझाए। सुनत कोपि कपिकुंजर धाए।।<br />
पुनि कृपाल हँसि चाप चढ़ावा। पावक सायक सपदि चलावा।।<br />
भयउ प्रकास कतहुँ तम नाहीं। ग्यान उदयँ जिमि संसय जाहीं।।<br />
भालु बलीमुख पाइ प्रकासा। धाए हरष बिगत श्रम त्रासा।।<br />
हनूमान अंगद रन गाजे। हाँक सुनत रजनीचर भाजे।।<br />
भागत पट पटकहिं धरि धरनी। करहिं भालु कपि अद्भुत करनी।।<br />
गहि पद डारहिं सागर माहीं। मकर उरग झष धरि धरि खाहीं।।<br />
दो0-कछु मारे कछु घायल कछु गढ़ चढ़े पराइ।<br />
   गर्जहिं भालु बलीमुख रिपु दल बल बिचलाइ।।47।।<br />
 --*--*--<br />
निसा जानि कपि चारिउ अनी। आए जहाँ कोसला धनी।।<br />
राम कृपा करि चितवा सबही। भए बिगतश्रम बानर तबही।।<br />
उहाँ दसानन सचिव हँकारे। सब सन कहेसि सुभट जे मारे।।<br />
आधा कटकु कपिन्ह संघारा। कहहु बेगि का करिअ बिचारा।।<br />
माल्यवंत अति जरठ निसाचर। रावन मातु पिता मंत्री बर।।<br />
बोला बचन नीति अति पावन। सुनहु तात कछु मोर सिखावन।।<br />
जब ते तुम्ह सीता हरि आनी। असगुन होहिं न जाहिं बखानी।।<br />
बेद पुरान जासु जसु गायो। राम बिमुख काहुँ न सुख पायो।।<br />
दो0-हिरन्याच्छ भ्राता सहित मधु कैटभ बलवान।<br />
   जेहि मारे सोइ अवतरेउ कृपासिंधु भगवान।।48(क)।।<br />
          मासपारायण, पचीसवाँ विश्राम<br />
   कालरूप खल बन दहन गुनागार घनबोध।<br />
   सिव बिरंचि जेहि सेवहिं तासों कवन बिरोध।।48(ख)।।<br />
 --*--*--<br />
परिहरि बयरु देहु बैदेही। भजहु कृपानिधि परम सनेही।।<br />
ताके बचन बान सम लागे। करिआ मुह करि जाहि अभागे।।<br />
बूढ़ भएसि न त मरतेउँ तोही। अब जनि नयन देखावसि मोही।।<br />
तेहि अपने मन अस अनुमाना। बध्यो चहत एहि कृपानिधाना।।<br />
सो उठि गयउ कहत दुर्बादा। तब सकोप बोलेउ घननादा।।<br />
कौतुक प्रात देखिअहु मोरा। करिहउँ बहुत कहौं का थोरा।।<br />
सुनि सुत बचन भरोसा आवा। प्रीति समेत अंक बैठावा।।<br />
करत बिचार भयउ भिनुसारा। लागे कपि पुनि चहूँ दुआरा।।<br />
कोपि कपिन्ह दुर्घट गढ़ु घेरा। नगर कोलाहलु भयउ घनेरा।।<br />
बिबिधायुध धर निसिचर धाए। गढ़ ते पर्बत सिखर ढहाए।।<br />
छं0-ढाहे महीधर सिखर कोटिन्ह बिबिध बिधि गोला चले।<br />
   घहरात जिमि पबिपात गर्जत जनु प्रलय के बादले।।<br />
   मर्कट बिकट भट जुटत कटत न लटत तन जर्जर भए।<br />
   गहि सैल तेहि गढ़ पर चलावहिं जहँ सो तहँ निसिचर हए।।<br />
दो0-मेघनाद सुनि श्रवन अस गढ़ु पुनि छेंका आइ।<br />
   उतर्यो बीर दुर्ग तें सन्मुख चल्यो बजाइ।।49।।<br />
 --*--*--<br />
कहँ कोसलाधीस द्वौ भ्राता। धन्वी सकल लोक बिख्याता।।<br />
कहँ नल नील दुबिद सुग्रीवा। अंगद हनूमंत बल सींवा।।<br />
कहाँ बिभीषनु भ्राताद्रोही। आजु सबहि हठि मारउँ ओही।।<br />
अस कहि कठिन बान संधाने। अतिसय क्रोध श्रवन लगि ताने।।<br />
सर समुह सो छाड़ै लागा। जनु सपच्छ धावहिं बहु नागा।।<br />
जहँ तहँ परत देखिअहिं बानर। सन्मुख होइ न सके तेहि अवसर।।<br />
जहँ तहँ भागि चले कपि रीछा। बिसरी सबहि जुद्ध कै ईछा।।<br />
सो कपि भालु न रन महँ देखा। कीन्हेसि जेहि न प्रान अवसेषा।।<br />
दो0-दस दस सर सब मारेसि परे भूमि कपि बीर।<br />
   सिंहनाद करि गर्जा मेघनाद बल धीर।।50।।<br />
 --*--*--<br />
देखि पवनसुत कटक बिहाला। क्रोधवंत जनु धायउ काला।।<br />
महासैल एक तुरत उपारा। अति रिस मेघनाद पर डारा।।<br />
आवत देखि गयउ नभ सोई। रथ सारथी तुरग सब खोई।।<br />
बार बार पचार हनुमाना। निकट न आव मरमु सो जाना।।<br />
रघुपति निकट गयउ घननादा। नाना भाँति करेसि दुर्बादा।।<br />
अस्त्र सस्त्र आयुध सब डारे। कौतुकहीं प्रभु काटि निवारे।।<br />
देखि प्रताप मूढ़ खिसिआना। करै लाग माया बिधि नाना।।<br />
जिमि कोउ करै गरुड़ सैं खेला। डरपावै गहि स्वल्प सपेला।।<br />
दो0-जासु प्रबल माया बल सिव बिरंचि बड़ छोट।<br />
   ताहि दिखावइ निसिचर निज माया मति खोट।।51।।<br />
 --*--*--<br />
नभ चढ़ि बरष बिपुल अंगारा। महि ते प्रगट होहिं जलधारा।।<br />
नाना भाँति पिसाच पिसाची। मारु काटु धुनि बोलहिं नाची।।<br />
बिष्टा पूय रुधिर कच हाड़ा। बरषइ कबहुँ उपल बहु छाड़ा।।<br />
बरषि धूरि कीन्हेसि अँधिआरा। सूझ न आपन हाथ पसारा।।<br />
कपि अकुलाने माया देखें। सब कर मरन बना एहि लेखें।।<br />
कौतुक देखि राम मुसुकाने। भए सभीत सकल कपि जाने।।<br />
एक बान काटी सब माया। जिमि दिनकर हर तिमिर निकाया।।<br />
कृपादृष्टि कपि भालु बिलोके। भए प्रबल रन रहहिं न रोके।।<br />
दो0-आयसु मागि राम पहिं अंगदादि कपि साथ।<br />
   लछिमन चले क्रुद्ध होइ बान सरासन हाथ।।52।।<br />
 --*--*--<br />
छतज नयन उर बाहु बिसाला। हिमगिरि निभ तनु कछु एक लाला।।<br />
इहाँ दसानन सुभट पठाए। नाना अस्त्र सस्त्र गहि धाए।।<br />
भूधर नख बिटपायुध धारी। धाए कपि जय राम पुकारी।।<br />
भिरे सकल जोरिहि सन जोरी। इत उत जय इच्छा नहिं थोरी।।<br />
मुठिकन्ह लातन्ह दातन्ह काटहिं। कपि जयसील मारि पुनि डाटहिं।।<br />
मारु मारु धरु धरु धरु मारू। सीस तोरि गहि भुजा उपारू।।<br />
असि रव पूरि रही नव खंडा। धावहिं जहँ तहँ रुंड प्रचंडा।।<br />
देखहिं कौतुक नभ सुर बृंदा। कबहुँक बिसमय कबहुँ अनंदा।।<br />
दो0-रुधिर गाड़ भरि भरि जम्यो ऊपर धूरि उड़ाइ।<br />
   जनु अँगार रासिन्ह पर मृतक धूम रह्यो छाइ।।53।।<br />
 --*--*--<br />
घायल बीर बिराजहिं कैसे। कुसुमित किंसुक के तरु जैसे।।<br />
लछिमन मेघनाद द्वौ जोधा। भिरहिं परसपर करि अति क्रोधा।।<br />
एकहि एक सकइ नहिं जीती। निसिचर छल बल करइ अनीती।।<br />
क्रोधवंत तब भयउ अनंता। भंजेउ रथ सारथी तुरंता।।<br />
नाना बिधि प्रहार कर सेषा। राच्छस भयउ प्रान अवसेषा।।<br />
रावन सुत निज मन अनुमाना। संकठ भयउ हरिहि मम प्राना।।<br />
बीरघातिनी छाड़िसि साँगी। तेज पुंज लछिमन उर लागी।।<br />
मुरुछा भई सक्ति के लागें। तब चलि गयउ निकट भय त्यागें।।<br />
दो0-मेघनाद सम कोटि सत जोधा रहे उठाइ।<br />
   जगदाधार सेष किमि उठै चले खिसिआइ।।54।।<br />
 --*--*--<br />
सुनु गिरिजा क्रोधानल जासू। जारइ भुवन चारिदस आसू।।<br />
सक संग्राम जीति को ताही। सेवहिं सुर नर अग जग जाही।।<br />
यह कौतूहल जानइ सोई। जा पर कृपा राम कै होई।।<br />
संध्या भइ फिरि द्वौ बाहनी। लगे सँभारन निज निज अनी।।<br />
ब्यापक ब्रह्म अजित भुवनेस्वर। लछिमन कहाँ बूझ करुनाकर।।<br />
तब लगि लै आयउ हनुमाना। अनुज देखि प्रभु अति दुख माना।।<br />
जामवंत कह बैद सुषेना। लंकाँ रहइ को पठई लेना।।<br />
धरि लघु रूप गयउ हनुमंता। आनेउ भवन समेत तुरंता।।<br />
दो0-राम पदारबिंद सिर नायउ आइ सुषेन।<br />
   कहा नाम गिरि औषधी जाहु पवनसुत लेन।।55।।<br />
 --*--*--<br />
राम चरन सरसिज उर राखी। चला प्रभंजन सुत बल भाषी।।<br />
उहाँ दूत एक मरमु जनावा। रावन कालनेमि गृह आवा।।<br />
दसमुख कहा मरमु तेहिं सुना। पुनि पुनि कालनेमि सिरु धुना।।<br />
देखत तुम्हहि नगरु जेहिं जारा। तासु पंथ को रोकन पारा।।<br />
भजि रघुपति करु हित आपना। छाँड़हु नाथ मृषा जल्पना।।<br />
नील कंज तनु सुंदर स्यामा। हृदयँ राखु लोचनाभिरामा।।<br />
मैं तैं मोर मूढ़ता त्यागू। महा मोह निसि सूतत जागू।।<br />
काल ब्याल कर भच्छक जोई। सपनेहुँ समर कि जीतिअ सोई।।<br />
दो0-सुनि दसकंठ रिसान अति तेहिं मन कीन्ह बिचार।<br />
   राम दूत कर मरौं बरु यह खल रत मल भार।।56।।<br />
 --*--*--<br />
अस कहि चला रचिसि मग माया। सर मंदिर बर बाग बनाया।।<br />
मारुतसुत देखा सुभ आश्रम। मुनिहि बूझि जल पियौं जाइ श्रम।।<br />
राच्छस कपट बेष तहँ सोहा। मायापति दूतहि चह मोहा।।<br />
जाइ पवनसुत नायउ माथा। लाग सो कहै राम गुन गाथा।।<br />
होत महा रन रावन रामहिं। जितहहिं राम न संसय या महिं।।<br />
इहाँ भएँ मैं देखेउँ भाई। ग्यान दृष्टि बल मोहि अधिकाई।।<br />
मागा जल तेहिं दीन्ह कमंडल। कह कपि नहिं अघाउँ थोरें जल।।<br />
सर मज्जन करि आतुर आवहु। दिच्छा देउँ ग्यान जेहिं पावहु।।<br />
दो0-सर पैठत कपि पद गहा मकरीं तब अकुलान।<br />
    मारी सो धरि दिव्य तनु चली गगन चढ़ि जान।।57।।<br />
 --*--*--<br />
कपि तव दरस भइउँ निष्पापा। मिटा तात मुनिबर कर सापा।।<br />
मुनि न होइ यह निसिचर घोरा। मानहु सत्य बचन कपि मोरा।।<br />
अस कहि गई अपछरा जबहीं। निसिचर निकट गयउ कपि तबहीं।।<br />
कह कपि मुनि गुरदछिना लेहू। पाछें हमहि मंत्र तुम्ह देहू।।<br />
सिर लंगूर लपेटि पछारा। निज तनु प्रगटेसि मरती बारा।।<br />
राम राम कहि छाड़ेसि प्राना। सुनि मन हरषि चलेउ हनुमाना।।<br />
देखा सैल न औषध चीन्हा। सहसा कपि उपारि गिरि लीन्हा।।<br />
गहि गिरि निसि नभ धावत भयऊ। अवधपुरी उपर कपि गयऊ।।<br />
दो0-देखा भरत बिसाल अति निसिचर मन अनुमानि।<br />
    बिनु फर सायक मारेउ चाप श्रवन लगि तानि।।58।।<br />
 --*--*--<br />
परेउ मुरुछि महि लागत सायक। सुमिरत राम राम रघुनायक।।<br />
सुनि प्रिय बचन भरत तब धाए। कपि समीप अति आतुर आए।।<br />
बिकल बिलोकि कीस उर लावा। जागत नहिं बहु भाँति जगावा।।<br />
मुख मलीन मन भए दुखारी। कहत बचन भरि लोचन बारी।।<br />
जेहिं बिधि राम बिमुख मोहि कीन्हा। तेहिं पुनि यह दारुन दुख दीन्हा।।<br />
जौं मोरें मन बच अरु काया। प्रीति राम पद कमल अमाया।।<br />
तौ कपि होउ बिगत श्रम सूला। जौं मो पर रघुपति अनुकूला।।<br />
सुनत बचन उठि बैठ कपीसा। कहि जय जयति कोसलाधीसा।।<br />
सो0-लीन्ह कपिहि उर लाइ पुलकित तनु लोचन सजल।<br />
    प्रीति न हृदयँ समाइ सुमिरि राम रघुकुल तिलक।।59।।<br />
तात कुसल कहु सुखनिधान की। सहित अनुज अरु मातु जानकी।।<br />
कपि सब चरित समास बखाने। भए दुखी मन महुँ पछिताने।।<br />
अहह दैव मैं कत जग जायउँ। प्रभु के एकहु काज न आयउँ।।<br />
जानि कुअवसरु मन धरि धीरा। पुनि कपि सन बोले बलबीरा।।<br />
तात गहरु होइहि तोहि जाता। काजु नसाइहि होत प्रभाता।।<br />
चढ़ु मम सायक सैल समेता। पठवौं तोहि जहँ कृपानिकेता।।<br />
सुनि कपि मन उपजा अभिमाना। मोरें भार चलिहि किमि बाना।।<br />
राम प्रभाव बिचारि बहोरी। बंदि चरन कह कपि कर जोरी।।<br />
दो0-तव प्रताप उर राखि प्रभु जेहउँ नाथ तुरंत।<br />
    अस कहि आयसु पाइ पद बंदि चलेउ हनुमंत।।60(क)।।<br />
    भरत बाहु बल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार।<br />
    मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार।।60(ख)।।<br />
 --*--*--<br />
उहाँ राम लछिमनहिं निहारी। बोले बचन मनुज अनुसारी।।<br />
अर्ध राति गइ कपि नहिं आयउ। राम उठाइ अनुज उर लायउ।।<br />
सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ। बंधु सदा तव मृदुल सुभाऊ।।<br />
मम हित लागि तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता।।<br />
सो अनुराग कहाँ अब भाई। उठहु न सुनि मम बच बिकलाई।।<br />
जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू। पिता बचन मनतेउँ नहिं ओहू।।<br />
सुत बित नारि भवन परिवारा। होहिं जाहिं जग बारहिं बारा।।<br />
अस बिचारि जियँ जागहु ताता। मिलइ न जगत सहोदर भ्राता।।<br />
जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना।।<br />
अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जौं जड़ दैव जिआवै मोही।।<br />
जैहउँ अवध कवन मुहु लाई। नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई।।<br />
बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि बिसेष छति नाहीं।।<br />
अब अपलोकु सोकु सुत तोरा। सहिहि निठुर कठोर उर मोरा।।<br />
निज जननी के एक कुमारा। तात तासु तुम्ह प्रान अधारा।।<br />
सौंपेसि मोहि तुम्हहि गहि पानी। सब बिधि सुखद परम हित जानी।।<br />
उतरु काह दैहउँ तेहि जाई। उठि किन मोहि सिखावहु भाई।।<br />
बहु बिधि सिचत सोच बिमोचन। स्त्रवत सलिल राजिव दल लोचन।।<br />
उमा एक अखंड रघुराई। नर गति भगत कृपाल देखाई।।<br />
सो0-प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर।<br />
   आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस।।61।।<br />
हरषि राम भेंटेउ हनुमाना। अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना।।<br />
तुरत बैद तब कीन्ह उपाई। उठि बैठे लछिमन हरषाई।।<br />
हृदयँ लाइ प्रभु भेंटेउ भ्राता। हरषे सकल भालु कपि ब्राता।।<br />
कपि पुनि बैद तहाँ पहुँचावा। जेहि बिधि तबहिं ताहि लइ आवा।।<br />
यह बृत्तांत दसानन सुनेऊ। अति बिषअद पुनि पुनि सिर धुनेऊ।।<br />
ब्याकुल कुंभकरन पहिं आवा। बिबिध जतन करि ताहि जगावा।।<br />
जागा निसिचर देखिअ कैसा। मानहुँ कालु देह धरि बैसा।।<br />
कुंभकरन बूझा कहु भाई। काहे तव मुख रहे सुखाई।।<br />
कथा कही सब तेहिं अभिमानी। जेहि प्रकार सीता हरि आनी।।<br />
तात कपिन्ह सब निसिचर मारे। महामहा जोधा संघारे।।<br />
दुर्मुख सुररिपु मनुज अहारी। भट अतिकाय अकंपन भारी।।<br />
अपर महोदर आदिक बीरा। परे समर महि सब रनधीरा।।<br />
दो0-सुनि दसकंधर बचन तब कुंभकरन बिलखान।<br />
    जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान।।62।।<br />
 --*--*--<br />
भल न कीन्ह तैं निसिचर नाहा। अब मोहि आइ जगाएहि काहा।।<br />
अजहूँ तात त्यागि अभिमाना। भजहु राम होइहि कल्याना।।<br />
हैं दससीस मनुज रघुनायक। जाके हनूमान से पायक।।<br />
अहह बंधु तैं कीन्हि खोटाई। प्रथमहिं मोहि न सुनाएहि आई।।<br />
कीन्हेहु प्रभू बिरोध तेहि देवक। सिव बिरंचि सुर जाके सेवक।।<br />
नारद मुनि मोहि ग्यान जो कहा। कहतेउँ तोहि समय निरबहा।।<br />
अब भरि अंक भेंटु मोहि भाई। लोचन सूफल करौ मैं जाई।।<br />
स्याम गात सरसीरुह लोचन। देखौं जाइ ताप त्रय मोचन।।<br />
दो0-राम रूप गुन सुमिरत मगन भयउ छन एक।<br />
   रावन मागेउ कोटि घट मद अरु महिष अनेक।।63।।<br />
 --*--*--<br />
महिष खाइ करि मदिरा पाना। गर्जा बज्राघात समाना।।<br />
कुंभकरन दुर्मद रन रंगा। चला दुर्ग तजि सेन न संगा।।<br />
देखि बिभीषनु आगें आयउ। परेउ चरन निज नाम सुनायउ।।<br />
अनुज उठाइ हृदयँ तेहि लायो। रघुपति भक्त जानि मन भायो।।<br />
तात लात रावन मोहि मारा। कहत परम हित मंत्र बिचारा।।<br />
तेहिं गलानि रघुपति पहिं आयउँ। देखि दीन प्रभु के मन भायउँ।।<br />
सुनु सुत भयउ कालबस रावन। सो कि मान अब परम सिखावन।।<br />
धन्य धन्य तैं धन्य बिभीषन। भयहु तात निसिचर कुल भूषन।।<br />
बंधु बंस तैं कीन्ह उजागर। भजेहु राम सोभा सुख सागर।।<br />
दो0-बचन कर्म मन कपट तजि भजेहु राम रनधीर।<br />
    जाहु न निज पर सूझ मोहि भयउँ कालबस बीर। 64।।<br />
 --*--*--<br />
बंधु बचन सुनि चला बिभीषन। आयउ जहँ त्रैलोक बिभूषन।।<br />
नाथ भूधराकार सरीरा। कुंभकरन आवत रनधीरा।।<br />
एतना कपिन्ह सुना जब काना। किलकिलाइ धाए बलवाना।।<br />
लिए उठाइ बिटप अरु भूधर। कटकटाइ डारहिं ता ऊपर।।<br />
कोटि कोटि गिरि सिखर प्रहारा। करहिं भालु कपि एक एक बारा।।<br />
मुर् यो न मन तनु टर् यो न टार् यो। जिमि गज अर्क फलनि को मार्यो।।<br />
तब मारुतसुत मुठिका हन्यो। पर् यो धरनि ब्याकुल सिर धुन्यो।।<br />
पुनि उठि तेहिं मारेउ हनुमंता। घुर्मित भूतल परेउ तुरंता।।<br />
पुनि नल नीलहि अवनि पछारेसि। जहँ तहँ पटकि पटकि भट डारेसि।।<br />
चली बलीमुख सेन पराई। अति भय त्रसित न कोउ समुहाई।।<br />
दो0-अंगदादि कपि मुरुछित करि समेत सुग्रीव।<br />
    काँख दाबि कपिराज कहुँ चला अमित बल सींव।।65।।<br />
 --*--*--<br />
उमा करत रघुपति नरलीला। खेलत गरुड़ जिमि अहिगन मीला।।<br />
भृकुटि भंग जो कालहि खाई। ताहि कि सोहइ ऐसि लराई।।<br />
जग पावनि कीरति बिस्तरिहहिं। गाइ गाइ भवनिधि नर तरिहहिं।।<br />
मुरुछा गइ मारुतसुत जागा। सुग्रीवहि तब खोजन लागा।।<br />
सुग्रीवहु कै मुरुछा बीती। निबुक गयउ तेहि मृतक प्रतीती।।<br />
काटेसि दसन नासिका काना। गरजि अकास चलउ तेहिं जाना।।<br />
गहेउ चरन गहि भूमि पछारा। अति लाघवँ उठि पुनि तेहि मारा।।<br />
पुनि आयसु प्रभु पहिं बलवाना। जयति जयति जय कृपानिधाना।।<br />
नाक कान काटे जियँ जानी। फिरा क्रोध करि भइ मन ग्लानी।।<br />
सहज भीम पुनि बिनु श्रुति नासा। देखत कपि दल उपजी त्रासा।।<br />
दो0-जय जय जय रघुबंस मनि धाए कपि दै हूह।<br />
   एकहि बार तासु पर छाड़ेन्हि गिरि तरु जूह।।66।।<br />
 --*--*--<br />
कुंभकरन रन रंग बिरुद्धा। सन्मुख चला काल जनु क्रुद्धा।।<br />
कोटि कोटि कपि धरि धरि खाई। जनु टीड़ी गिरि गुहाँ समाई।।<br />
कोटिन्ह गहि सरीर सन मर्दा। कोटिन्ह मीजि मिलव महि गर्दा।।<br />
मुख नासा श्रवनन्हि कीं बाटा। निसरि पराहिं भालु कपि ठाटा।।<br />
रन मद मत्त निसाचर दर्पा। बिस्व ग्रसिहि जनु एहि बिधि अर्पा।।<br />
मुरे सुभट सब फिरहिं न फेरे। सूझ न नयन सुनहिं नहिं टेरे।।<br />
कुंभकरन कपि फौज बिडारी। सुनि धाई रजनीचर धारी।।<br />
देखि राम बिकल कटकाई। रिपु अनीक नाना बिधि आई।।<br />
दो0-सुनु सुग्रीव बिभीषन अनुज सँभारेहु सैन।<br />
    मैं देखउँ खल बल दलहि बोले राजिवनैन।।67।।<br />
 --*--*--<br />
कर सारंग साजि कटि भाथा। अरि दल दलन चले रघुनाथा।।<br />
प्रथम कीन्ह प्रभु धनुष टँकोरा। रिपु दल बधिर भयउ सुनि सोरा।।<br />
सत्यसंध छाँड़े सर लच्छा। कालसर्प जनु चले सपच्छा।।<br />
जहँ तहँ चले बिपुल नाराचा। लगे कटन भट बिकट पिसाचा।।<br />
कटहिं चरन उर सिर भुजदंडा। बहुतक बीर होहिं सत खंडा।।<br />
घुर्मि घुर्मि घायल महि परहीं। उठि संभारि सुभट पुनि लरहीं।।<br />
लागत बान जलद जिमि गाजहीं। बहुतक देखी कठिन सर भाजहिं।।<br />
रुंड प्रचंड मुंड बिनु धावहिं। धरु धरु मारू मारु धुनि गावहिं।।<br />
दो0-छन महुँ प्रभु के सायकन्हि काटे बिकट पिसाच।<br />
    पुनि रघुबीर निषंग महुँ प्रबिसे सब नाराच।।68।।<br />
 --*--*--<br />
कुंभकरन मन दीख बिचारी। हति धन माझ निसाचर धारी।।<br />
भा अति क्रुद्ध महाबल बीरा। कियो मृगनायक नाद गँभीरा।।<br />
कोपि महीधर लेइ उपारी। डारइ जहँ मर्कट भट भारी।।<br />
आवत देखि सैल प्रभू भारे। सरन्हि काटि रज सम करि डारे।।।<br />
पुनि धनु तानि कोपि रघुनायक। छाँड़े अति कराल बहु सायक।।<br />
तनु महुँ प्रबिसि निसरि सर जाहीं। जिमि दामिनि घन माझ समाहीं।।<br />
सोनित स्त्रवत सोह तन कारे। जनु कज्जल गिरि गेरु पनारे।।<br />
बिकल बिलोकि भालु कपि धाए। बिहँसा जबहिं निकट कपि आए।।<br />
दो0-महानाद करि गर्जा कोटि कोटि गहि कीस।<br />
    महि पटकइ गजराज इव सपथ करइ दससीस।।69।।<br />
 --*--*--<br />
भागे भालु बलीमुख जूथा। बृकु बिलोकि जिमि मेष बरूथा।।<br />
चले भागि कपि भालु भवानी। बिकल पुकारत आरत बानी।।<br />
यह निसिचर दुकाल सम अहई। कपिकुल देस परन अब चहई।।<br />
कृपा बारिधर राम खरारी। पाहि पाहि प्रनतारति हारी।।<br />
सकरुन बचन सुनत भगवाना। चले सुधारि सरासन बाना।।<br />
राम सेन निज पाछैं घाली। चले सकोप महा बलसाली।।<br />
खैंचि धनुष सर सत संधाने। छूटे तीर सरीर समाने।।<br />
लागत सर धावा रिस भरा। कुधर डगमगत डोलति धरा।।<br />
लीन्ह एक तेहिं सैल उपाटी। रघुकुल तिलक भुजा सोइ काटी।।<br />
धावा बाम बाहु गिरि धारी। प्रभु सोउ भुजा काटि महि पारी।।<br />
काटें भुजा सोह खल कैसा। पच्छहीन मंदर गिरि जैसा।।<br />
उग्र बिलोकनि प्रभुहि बिलोका। ग्रसन चहत मानहुँ त्रेलोका।।<br />
दो0-करि चिक्कार घोर अति धावा बदनु पसारि।<br />
   गगन सिद्ध सुर त्रासित हा हा हेति पुकारि।।70।।<br />
 --*--*--<br />
सभय देव करुनानिधि जान्यो। श्रवन प्रजंत सरासनु तान्यो।।<br />
बिसिख निकर निसिचर मुख भरेऊ। तदपि महाबल भूमि न परेऊ।।<br />
सरन्हि भरा मुख सन्मुख धावा। काल त्रोन सजीव जनु आवा।।<br />
तब प्रभु कोपि तीब्र सर लीन्हा। धर ते भिन्न तासु सिर कीन्हा।।<br />
सो सिर परेउ दसानन आगें। बिकल भयउ जिमि फनि मनि त्यागें।।<br />
धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा। तब प्रभु काटि कीन्ह दुइ खंडा।।<br />
परे भूमि जिमि नभ तें भूधर। हेठ दाबि कपि भालु निसाचर।।<br />
तासु तेज प्रभु बदन समाना। सुर मुनि सबहिं अचंभव माना।।<br />
सुर दुंदुभीं बजावहिं हरषहिं। अस्तुति करहिं सुमन बहु बरषहिं।।<br />
करि बिनती सुर सकल सिधाए। तेही समय देवरिषि आए।।<br />
गगनोपरि हरि गुन गन गाए। रुचिर बीररस प्रभु मन भाए।।<br />
बेगि हतहु खल कहि मुनि गए। राम समर महि सोभत भए।।<br />
छं0-संग्राम भूमि बिराज रघुपति अतुल बल कोसल धनी।<br />
   श्रम बिंदु मुख राजीव लोचन अरुन तन सोनित कनी।।<br />
   भुज जुगल फेरत सर सरासन भालु कपि चहु दिसि बने।<br />
   कह दास तुलसी कहि न सक छबि सेष जेहि आनन घने।।<br />
दो0-निसिचर अधम मलाकर ताहि दीन्ह निज धाम।<br />
   गिरिजा ते नर मंदमति जे न भजहिं श्रीराम।।71।।<br />
 --*--*--<br />
दिन कें अंत फिरीं दोउ अनी। समर भई सुभटन्ह श्रम घनी।।<br />
राम कृपाँ कपि दल बल बाढ़ा। जिमि तृन पाइ लाग अति डाढ़ा।।<br />
छीजहिं निसिचर दिनु अरु राती। निज मुख कहें सुकृत जेहि भाँती।।<br />
बहु बिलाप दसकंधर करई। बंधु सीस पुनि पुनि उर धरई।।<br />
रोवहिं नारि हृदय हति पानी। तासु तेज बल बिपुल बखानी।।<br />
मेघनाद तेहि अवसर आयउ। कहि बहु कथा पिता समुझायउ।।<br />
देखेहु कालि मोरि मनुसाई। अबहिं बहुत का करौं बड़ाई।।<br />
इष्टदेव सैं बल रथ पायउँ। सो बल तात न तोहि देखायउँ।।<br />
एहि बिधि जल्पत भयउ बिहाना। चहुँ दुआर लागे कपि नाना।।<br />
इत कपि भालु काल सम बीरा। उत रजनीचर अति रनधीरा।।<br />
लरहिं सुभट निज निज जय हेतू। बरनि न जाइ समर खगकेतू।।<br />
दो0-मेघनाद मायामय रथ चढ़ि गयउ अकास।।<br />
    गर्जेउ अट्टहास करि भइ कपि कटकहि त्रास।।72।।<br />
 --*--*--<br />
सक्ति सूल तरवारि कृपाना। अस्त्र सस्त्र कुलिसायुध नाना।।<br />
डारह परसु परिघ पाषाना। लागेउ बृष्टि करै बहु बाना।।<br />
दस दिसि रहे बान नभ छाई। मानहुँ मघा मेघ झरि लाई।।<br />
धरु धरु मारु सुनिअ धुनि काना। जो मारइ तेहि कोउ न जाना।।<br />
गहि गिरि तरु अकास कपि धावहिं। देखहि तेहि न दुखित फिरि आवहिं।।<br />
अवघट घाट बाट गिरि कंदर। माया बल कीन्हेसि सर पंजर।।<br />
जाहिं कहाँ ब्याकुल भए बंदर। सुरपति बंदि परे जनु मंदर।।<br />
मारुतसुत अंगद नल नीला। कीन्हेसि बिकल सकल बलसीला।।<br />
पुनि लछिमन सुग्रीव बिभीषन। सरन्हि मारि कीन्हेसि जर्जर तन।।<br />
पुनि रघुपति सैं जूझे लागा। सर छाँड़इ होइ लागहिं नागा।।<br />
ब्याल पास बस भए खरारी। स्वबस अनंत एक अबिकारी।।<br />
नट इव कपट चरित कर नाना। सदा स्वतंत्र एक भगवाना।।<br />
रन सोभा लगि प्रभुहिं बँधायो। नागपास देवन्ह भय पायो।।<br />
दो0-गिरिजा जासु नाम जपि मुनि काटहिं भव पास।<br />
    सो कि बंध तर आवइ ब्यापक बिस्व निवास।।73।।<br />
 --*--*--<br />
चरित राम के सगुन भवानी। तर्कि न जाहिं बुद्धि बल बानी।।<br />
अस बिचारि जे तग्य बिरागी। रामहि भजहिं तर्क सब त्यागी।।<br />
ब्याकुल कटकु कीन्ह घननादा। पुनि भा प्रगट कहइ दुर्बादा।।<br />
जामवंत कह खल रहु ठाढ़ा। सुनि करि ताहि क्रोध अति बाढ़ा।।<br />
बूढ़ जानि सठ छाँड़ेउँ तोही। लागेसि अधम पचारै मोही।।<br />
अस कहि तरल त्रिसूल चलायो। जामवंत कर गहि सोइ धायो।।<br />
मारिसि मेघनाद कै छाती। परा भूमि घुर्मित सुरघाती।।<br />
पुनि रिसान गहि चरन फिरायौ। महि पछारि निज बल देखरायो।।<br />
बर प्रसाद सो मरइ न मारा। तब गहि पद लंका पर डारा।।<br />
इहाँ देवरिषि गरुड़ पठायो। राम समीप सपदि सो आयो।।<br />
दो0-खगपति सब धरि खाए माया नाग बरूथ।<br />
   माया बिगत भए सब हरषे बानर जूथ। 74(क)।।<br />
   गहि गिरि पादप उपल नख धाए कीस रिसाइ।<br />
   चले तमीचर बिकलतर गढ़ पर चढ़े पराइ।।74(ख)।।<br />
 --*--*--<br />
मेघनाद के मुरछा जागी। पितहि बिलोकि लाज अति लागी।।<br />
तुरत गयउ गिरिबर कंदरा। करौं अजय मख अस मन धरा।।<br />
इहाँ बिभीषन मंत्र बिचारा। सुनहु नाथ बल अतुल उदारा।।<br />
मेघनाद मख करइ अपावन। खल मायावी देव सतावन।।<br />
जौं प्रभु सिद्ध होइ सो पाइहि। नाथ बेगि पुनि जीति न जाइहि।।<br />
सुनि रघुपति अतिसय सुख माना। बोले अंगदादि कपि नाना।।<br />
लछिमन संग जाहु सब भाई। करहु बिधंस जग्य कर जाई।।<br />
तुम्ह लछिमन मारेहु रन ओही। देखि सभय सुर दुख अति मोही।।<br />
मारेहु तेहि बल बुद्धि उपाई। जेहिं छीजै निसिचर सुनु भाई।।<br />
जामवंत सुग्रीव बिभीषन। सेन समेत रहेहु तीनिउ जन।।<br />
जब रघुबीर दीन्हि अनुसासन। कटि निषंग कसि साजि सरासन।।<br />
प्रभु प्रताप उर धरि रनधीरा। बोले घन इव गिरा गँभीरा।।<br />
जौं तेहि आजु बधें बिनु आवौं। तौ रघुपति सेवक न कहावौं।।<br />
जौं सत संकर करहिं सहाई। तदपि हतउँ रघुबीर दोहाई।।<br />
दो0-रघुपति चरन नाइ सिरु चलेउ तुरंत अनंत।<br />
    अंगद नील मयंद नल संग सुभट हनुमंत।।75।।<br />
 --*--*--<br />
जाइ कपिन्ह सो देखा बैसा। आहुति देत रुधिर अरु भैंसा।।<br />
कीन्ह कपिन्ह सब जग्य बिधंसा। जब न उठइ तब करहिं प्रसंसा।।<br />
तदपि न उठइ धरेन्हि कच जाई। लातन्हि हति हति चले पराई।।<br />
लै त्रिसुल धावा कपि भागे। आए जहँ रामानुज आगे।।<br />
आवा परम क्रोध कर मारा। गर्ज घोर रव बारहिं बारा।।<br />
कोपि मरुतसुत अंगद धाए। हति त्रिसूल उर धरनि गिराए।।<br />
प्रभु कहँ छाँड़ेसि सूल प्रचंडा। सर हति कृत अनंत जुग खंडा।।<br />
उठि बहोरि मारुति जुबराजा। हतहिं कोपि तेहि घाउ न बाजा।।<br />
फिरे बीर रिपु मरइ न मारा। तब धावा करि घोर चिकारा।।<br />
आवत देखि क्रुद्ध जनु काला। लछिमन छाड़े बिसिख कराला।।<br />
देखेसि आवत पबि सम बाना। तुरत भयउ खल अंतरधाना।।<br />
बिबिध बेष धरि करइ लराई। कबहुँक प्रगट कबहुँ दुरि जाई।।<br />
देखि अजय रिपु डरपे कीसा। परम क्रुद्ध तब भयउ अहीसा।।<br