कभी कहीं हम-तुम मिलते, जब मिलते लड़ते-झगड़ते, बिगड़ते-बड़बड़ाते रूठते-मनाते और फिर चिढ़ते-चिढ़ाते कभी कहीं हम-तुम, कभी कहीं हम-तुम नहीं तुम, नहीं तुम! तुम्हें कुछ नहीं आता इस बात पर तुम लड़ती, मैं झगड… more →
तख़लीक़-ए-नज़रmequitnever wrote 1 month ago: आज मैं अपने डेस्क को ठीक कर रहा था और कहीं कोने से मेरे हाथ एक फोल्डर लगा | उस फोल्डर में रंगीन कगाज … more →
mequitnever wrote 3 months ago: After breathing for 22 years 8 months 2 weeks 5 days 9 hours 17 minutes and counting, I realized, … more →
विनय wrote 6 months ago: कभी कहीं हम-तुम मिलते, जब मिलते लड़ते-झगड़ते, बिगड़ते-बड़बड़ाते रूठते-मनाते और फिर चिढ़ते-चिढ़ाते कभ … more →
विनय wrote 7 months ago: सहने दे ग़म थोड़ा – थोड़ा जो तुमने रुख़ मोड़ा-मोड़ा जान यह जाने दे ज़रा-ज़रा रहने दे आँखों को भर … more →
विनय wrote 12 months ago: जो मुझको जानते हैं ज़रा कम जानते हैं जो नहीं जानते हैं ज़रा ज़्यादा जानते हैं जो ढीठ बनके बैठा हुआ है म … more →
विनय wrote 1 year ago: जैसे-तैसे निभाते हैं प्यार करके पछताते हैं सच्चे-झूठे सपने तेरे रातों की नींदें उड़ाते हैं दो किनारे … more →
विनय wrote 1 year ago: तुमको न पाया तो खोया भी कुछ नहीं पत्थर है दिल मेरा नहीं सच नहीं मुझको यक़ीं ख़ुद पे नहीं है सनम दूर र … more →
विनय wrote 1 year ago: दिल के दाग़ सभी ज़ख़्म हुए वह ख़फ़ा हुआ हम ख़त्म हुए कोसूँ क्या अपनी क़िस्मत को हमें भी कुछ नये इल्म हुए … more →