छायागृह में चलचित्र के एक दृश्य में नायक घायल हो गया तो एक महिला दर्शक रोने लगी। तब पास में बैठी दूसरी महिला बोली ‘अरे, घर पर रोना होता है इसलिये मनोरंजन के लिये यहां हम आते हैं पता नहीं तुम जैसे लोग … more →
**दीपक भारतदीप की हिंदी साहित्य-पत्रिका** ***Deepak Bharatdeep ki Hindi Patrika***दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: छायागृह में चलचित्र के एक दृश्य में नायक घायल हो गया तो एक महिला दर्शक रोने लगी। तब पास में बैठी दूस … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: चंद पलों की खुशी की खातिर पूरी जिन्दगी दाव पर लगा देना भला कौनसी अक्लमंदी है सब कुछ करते हैं हम अपने … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: अभी हुई है भोर शुरू कर दिया उन्होने शोर कैसे न होंगे दिन भर बोर जहाँ मौन रखकर ध्यान करना था वहाँ लगा … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: वादों के बादल बरसने का मौसम जब आता है यादों पर ग्रहण लग जाता है जजबातों के सौदागर तय करते हैं कि कौन … more →