ख़लिश को जगह न दो दिल में नासूर बन जायेगी मरहम भी न लगा पाओगे साँस घुट के मर जायेगी ज़ीस्त अलग है, ज़ीस्त जीना अलग समझे ‘नज़र’! मजलिस में बैठोगे वाइज़ के साथ बाँह खुल जायेगी… ज़ीस्त= जीवन… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: ख़लिश को जगह न दो दिल में नासूर बन जायेगी मरहम भी न लगा पाओगे साँस घुट के मर जायेगी ज़ीस्त अलग है, ज़ी … more →