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	<title>bhaarat &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/bhaarat/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "bhaarat"</description>
	<pubDate>Sat, 11 Oct 2008 23:44:06 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[फरिश्ते से पहले शैतान बनाना जरूरी-हास्य व्यंग्य]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=465</link>
<pubDate>Fri, 15 Aug 2008 07:32:19 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.hi.wordpress.com/2008/08/15/a-hindi-article/</guid>
<description><![CDATA[शैतान कभी इस जहां में मर ही नहीं सकता। ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>शैतान कभी इस जहां में मर ही नहीं सकता। वजह! उसके मरने से फरिश्तों  की कदर कम हो जायेगी। इसलिये जिसे अपने के फरिश्ता साबित करना होता है वह अपने लिये पहले एक शैतान जुटाता है।  अगर कोई कालोनी का फरिश्ता बनना चाहता है तो पहले वह दूसरी कालोनी की जांच करेगा। वहां किसी व्यक्ति का-जिससे लोग डरते हैं- उसका भय अपनी कालोनी में पैदा करेगा। साथ ही बतायेगा कि वह उस पर नियंत्रण रख सकता है। शहर का फरिश्ता बनने वाला दूसरे शहर का और प्रदेश का है तो दूसरे प्रदेश का शैतान अपने लिये चुनता है। यह मजाक नहीं है। आप और हम सब यही करते हैं।</p>
<p>घर में किसी चीज की कमी है और अपने पास उसके लिये लाने का कोई उपाय नहीं है तो परिवार के सदस्यों को समझाने के लिये यह भी एक रास्ता है कि किसी ऐसे शैतान को खड़ा कर दो जिससे वह डर जायें।  सबसे बड़ा शैतान हो सकता है वह जो हमारा रोजगार छीन सकता है।  परिवार के लोग अधिक कमाने का दबाव डालें तो उनको बताओं कि उधर एक एसा आदमी है जिससे मूंह फेरा तो वह वर्तमान रोजगार भी तबाह कर देगा। नौकरी कर रहे हो तो बास का और निजी व्यवसाय कर रहे हों तो पड़ौसी व्यवसायी का भय पैदा करो। उनको समझाओं कि ‘अगर अधिक कमाने के चक्कर में पड़े तो इधर उधर दौड़ना पड़ा तो इस रोजी से भी जायेंगे।  यह काल्पनिक शैतान हमको बचाता है।<br />
नौकरी करने वालों के लिये तो आजकल वैसे भी बहुत तनाव हैं। एक तो लोग अब अपने काम के लिये झगड़ने लगे हैं दूसरी तरफ मीडिया स्टिंग आपरेशन करता है ऐसे में उपरी कमाई सोच समझ कर करनी पड़ती है। फिर सभी जगह उपरी कमाई नहीं होती।  ऐसे में परिवार के लोग कहते हैं‘देखो वह भी नौकरी कर रहा है और तुम भी! उसके पास घर में सारा सामान है। तुम हो कि पूरा घर ही फटीचर घूम रहा है।<br />
ऐसे में जबरदस्ती ईमानदारी का जीवन गुजार रहे नौकरपेशा आदमी को अपनी सफाई में यह बताना पड़ता है कि उससे कोई शैतान नाराज चल रहा है जो उसको ईमानदारी वाली जगह पर काम करना पड़ रहा है। जब कोई फरिश्ता आयेगा तब हो सकता है कि कमाई वाली जगह पर उसकी पोस्टिंग हो जायेगी।’<br />
खिलाड़ी हारते हैं तो कभी मैदान को तो कभी मौसम को शैतान बताते हैं। किसी की फिल्म पिटती है तो वह दर्शकों की कम बुद्धि को शैताना मानता है जिसकी वजह से फिल्म उनको समझ में नहीं आयी। टीवी वालों को तो आजकल हर दिन किसी शैतान की जरूरत पड़ती है। पहले बाप को बेटी का कत्ल करने वाला शैतान बताते हैं। महीने भर बाद वह जब निर्दोष बाहर आता है तब उसे फरिश्ता बताते हैं। यानि अगर उसे पहले शैतान नहीं बनाते तो फिर दिखाने के लिये फरिश्ता आता कहां से? जादू, तंत्र और मंत्र वाले तो शैतान का रूप दिखाकर ही अपना धंध चलाते हैं। ‘अरे, अमुक व्यक्ति बीमारी में मर गया उस पर किसी शैतान का साया पड़ा था। किसी ने उस पर जादू कर दिया था।’‘उसका कोई काम नहीं बनता उस पर किसी ने जादू कर दिया है!’यही हाल सभी का है। अगर आपको कहीं अपने समूह में इमेज बनानी है तो किसी दूसरे समूह का भय पैदा कर दो और ऐसी हालत पैदा कर दो कि आपकी अनुपस्थिति बहुत खले और लोग भयभीत हो कि दूसरा समूह पूरा का पूरा  या उसके लोग उन पर हमला न कर दें।’<br />
अगर कहीं पेड़ लगाने के लिये चार लोग एकत्रित करना चाहो तो नहीं आयेंगे पर उनको सूचना दो कि अमुक संकट है और अगर नहीं मिले भविष्य में विकट हो जायेगता तो चार क्या चालीस चले आयेंगे। अपनी नाकामी और नकारापन छिपाने के लिये शैतान एक चादर का काम करता है। आप भले ही किसी व्यक्ति को प्यार करते हैं। उसके साथ उठते बैैठते हैं। पेैसे का लेनदेन करते हैं पर अगर वह आपके परिवार में आता जाता नहीं है मगर  समय आने पर आप उसे अपने परिवार में शैतान बना सकते हैं कि उसने मेरा काम बिगाड़ दिया। इतिहास उठाकर देख लीजिये जितने भी पूज्यनीय लोग हुए हैं सबके सामने कोई शैतान था। अगर वह शैतान नहीं होता तो क्या वह पूज्यनीय बनते। वैसे इतिहास में सब सच है इस पर यकीन नहीं होता क्योंकि आज के आधुनिक युग में जब सब कुछ पास ही दिखता है तब भी लिखने वाले कुछ का कुछ  लिख जाते हैं और उनकी समझ पर तरस आता है तब लगता है कि पहले भी लिखने वाले तो ऐसे ही रहे होंगे।<br />
एक कवि लगातार फ्लाप हो रहा था। जब वह कविता करता तो कोई ताली नहीं बजाता।  कई बार तो उसे कवि सम्मेलनों में बुलाया तक नहीं जाता। तब उसने चार चेले तैयार किये और एक कवि सम्मेलन में अपने काव्य पाठ के दौरान उसने अपने ऊपर ही सड़े अंडे और टमाटर फिंकवा दिये। बाद में उसने यह खबर अखबार में छपवाई जिसमें  उसके द्वारा शरीर में खून का आखिरी कतरा होने तक कविता लिखने की शपथ भी शामिल थी । हो गया वह हिट।  उसके वही चेले चपाटे भी उससे पुरस्कृत होते रहे।<br />
जिन लड़कों को जुआ आदि खेलने की आदत होती है वह इस मामले में बहुत उस्ताद होते हैं। पैसे घर से चोरी कर सट्टा और जुआ में बरबाद करते हैं पर जब उसका अवसर नहीं मिलता या घर वाले चैकस हो जाते हैं तब वह घर पर आकर वह बताते हैं कि अमुक आदमी से कर्ज लिया है अगर नहीं चुकाया तो वह मार डालेंगे। उससे भी काम न बने तो चार मित्र ही कर्जदार बनाकर घर बुलवा लेंगे जो जान से मारने की धमकी दे जायेंगे।  ऐसे में मां तो एक लाचार औरत होती है जो अपने लाल को पैसे निकाल कर देती है। जुआरी लोग तो एक तरह से हमेशा ही भले बने रहते हैं। उनका व्यवहार भी इतना अच्छा होता है कि लोग कहते हैं‘आदमी ठीक है एक तरह से फरिश्ता है, बस जुआ की आदत है।’<br />
जुआरी हमेशा अपने लिये पैसे जुटाने के लिये शैतान का इंतजाम किये रहते हैं पर दिखाई देते हैं।  उनका शैतान भी दिखाई देता है पर वह होता नहीं उनके अपने ही फरिश्ते मित्र होते हैं। आशय यह है कि शैतान अस्तित्व में होता नहीं है पर दिखाना पड़ता है। अगर आपको परिवार, समाज या अपने समूह में शासन करना है तो हमेशा कोई शैतान उसके सामने खड़ा करो। यह समस्या के रूप में भी हो सकता है और व्यक्ति के रूप में भी। समस्या न हो तो खड़ी करो और उसे ही शैतान जैसा ताकतवर बना दो। शैतान तो बिना देह का जीव है कहीं भी प्रकट कर लो। किसी भी भेष में शैतान हो वह आपके काम का है पर याद रखो कोई और खड़ा करे तो उसकी बातों में न आओ। यकीन करो इस दुनियां में शैतान है ही नहीं बल्कि वह आदमी के अंदर ही है जिसे शातिर लोग समय के हिसाब से बनाते और बिगाड़ते रहते हैं।<br />
एक आदमी ने अपने सोफे के किनारे ही चाय का कप पीकर रखा और वह उसके हाथ से गिर गया। वह उठ कर दूसरी जगह बैठ गया पत्नी आयी तो उसने पूछा-‘यह कप कैसे टूटा?’<br />
उसी समय उस आदमी को एक चूहा दिखाई दिया। उसने उसकी तरफ इशारा करते हुए कहा-‘उसने तोड़ा!<br />
’पत्नी ने कहा-‘आजकल चूहे भी बहुत परेशान करने लगे हैं। देखो कितना ताकतवर है उसकी टक्कर उसे कम गिर गया। चूहा है कि उसके रूप में शेतान?<br />
वह चूहा बहुत मोटा था इसलिये उसकी पत्नी को लगा कि हो सकता है कि उसने गिराया हो और आदमी अपने मन में सर्वशक्तिमान का शुक्रिया अदा कर रहा कि उसने समय पर एक शैतान-भले ही चूहे के रूप में-भेज दिया।’<br />
याद रखो कोई दूसरा व्यक्ति भी आपको शैतान बना सकता है। इसलिये सतर्क रहो। किसी प्रकार के वाद-विवाद में मत पड़ो। कम से कम ऐसी हरकत मत करो जिससे दूसरा आपको शैतान साबित करे। वैसे जीवन में दृढ़निश्चयी और स्पष्टवादी लोगों को कोई शैतान नहीं गढ़ना चाहिए, पर कोई अवसर दे तो उसे छोड़ना भी नहीं चाहिए।<br />
जैसे कोई आपको अनावश्यक रूप से अपमानित करे या काम बिगाड़े और आपको व्यापक जनसमर्थन मिल रहा हो तो उस आदमी के विरुद्ध अभियान छेड़ दो ताकि लोगों की दृष्टि में आपकी फरिश्ते की छबि बन जाये। सर्वतशक्तिमान की कृपा से फरिश्ते तो यहां कई मनुष्य बन ही जाते हैं पर शैतान इंसान का ही ईजाद किया हुआ है इसलिये वह बहुत चमकदार या भयावह हो सकता है पर ताकतवर नहीं। जो लोग नकारा, मतलबी और धोखेबाज हैं वही शैतान को खड़ा करते हैं क्योंकि अच्छे काम कर लोगों के दिल जीतने की उनकी औकात नहीं होती।<br />
----------------------------------</p>
<blockquote><p><strong>यह मूल पाठ इस ब्लाग <a href="http://rajlekh.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की शब्द- पत्रिका’</a> पर लिखा गया। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का शब्दज्ञान-पत्रिका</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वह औरत-कविता ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=423</link>
<pubDate>Thu, 12 Jun 2008 16:16:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.hi.wordpress.com/2008/06/12/she-women-hindi-poem/</guid>
<description><![CDATA[दिन भर ईंट, पत्थर और
सीमेंट का मसाला-तस]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>दिन भर ईंट, पत्थर और<br />
सीमेंट का मसाला-तस्सल सिर<br />
पर रखकर ढोती वह औरत<br />
रात्रि में प्लास्टिक की छत से ढंकी<br />
झौंपडी के बाहर आंगन में<br />
बबूल की लकड़ी से<br />
अग्नि जलाकर<br />
उस पर रोटी सेंकती वह औरत</p>
<p>सुबह चाय बनाते हुए<br />
अपने बच्चे को<br />
गोद में बैठाकर<br />
उसे बडे स्नेह से<br />
मुस्कान बिखेरती<br />
और दूध पिलाती वह औरत</p>
<p>अपने अनवरत संघर्ष से<br />
इस सृष्टी में जीवन को ही<br />
सहजता से जीवनदान देती<br />
चेहरे पर शिकन तक नहीं आने देती<br />
अपनी शक्ति और सामर्थ्य का<br />
प्रतीक है वह औरत<br />
कोई उसके दर्द को नहीं सहलाता<br />
उसकी तस्वीरें बाजार में बिकतीं हैं मंहगे भाव में<br />
सोच भी नहीं सकती वह औरत<br />
उसके दर्द का बयान करती हुई लिखी गयी कहानियां<br />
बनी कई फिल्में<br />
पाए उन्होने इनाम<br />
न ही बदली उसकी दिनचर्या न काम<br />
रोटी बनाना सुबह और शाम<br />
दिन में मजदूरी और फिर खाने के बाद थोडा आराम<br />
उसमें भी अपने ही जैसी औरतों को<br />
अपना दर्द सुनाकर खुश होने की कोशिश करती  वह औरत </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मै अखबार आज भी क्यों पढ़ता हूं-हास्य व्यंग्य]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=402</link>
<pubDate>Thu, 01 May 2008 15:14:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.hi.wordpress.com/2008/05/01/%e0%a4%ae%e0%a5%88-%e0%a4%85%e0%a4%96%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%86%e0%a4%9c-%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%a2%e0%a4%bc%e0%a4%a4%e0%a4%be/</guid>
<description><![CDATA[          मैने अखबार पढ़ना बचपन से ही शुर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color:#003300;"><strong>          मैने अखबार पढ़ना बचपन से ही शुरू किया क्योंकि मोहल्ले का वाचनालय हमारे किराये के घर के पास में ही था। धीरे-धीरे इसकी ऐसी आदत हो गयी कि जब हमने मकान बदले तो भी मैं सुबह वाचनालय अखबार पढ़ने जरूर जाता और धीरे-धीरे शहर बढ़ने के साथ  थोड़ी दूर एक कालोनी में आया और वहां कोई वाचनालय नहीं होने के कारण अखबार मंगवाना शुरू किया। </strong></span></p>
<p><span style="color:#003300;"><strong>इधर इलैक्ट्रोनिक मीडिया के तेजी से बढ़ने के साथ ही डिस्क कनेक्शन भी लग गया और एक लायब्रेरी भी पास में खुल गयी जहां मैं अपने घर आने वाले अखबार के अलावा अन्य अखबार वहां कभी कभी पढ़ लेता हूं। कई बार सोचता हूं कि अखबार बंद कर दूं पर श्रीमतीजी उसे बड़ी रुचि के साथ पढ़ती हैं और वही हमें बतातीं हैं कि आज अमुक जगह आपको शवयात्रा या उठावनी में जाना है। </strong></span></p>
<p><span style="color:#003300;"><strong>सुबह जब मैं अपने घर के बाहर पेड़ के नीचे योगसाधना करता हूं  तब अखबार वाला फैंक कर चला जाता है और उस समय वह कई बार मेरे ऊपर आकर गिरता है। खासतौर से जब उष्टासन या सर्वांगासन के समय वह आकर गिरता है तब अगर श्रीमतीजी वहां  होती है तो जोर-जोर से  हंसती हैं। </strong></span></p>
<p><span style="color:#003300;"><strong>कई बार देर होने की वजह से अखबार नहीं पढ़ पाता तो श्रीमती जी मोबाइल पर सूचना देतीं हैं ‘आपने आप अखबार नहीं पढ़ा आज उठावनी पर जाना है‘ या ‘आज आप जल्दी निकल गये उधर शवयात्रा पर जाना है’। शहर से बाहर होने के बावजूद आप अपने लोगों से कट नहीं सकते। किसी कि शादी में आप जायें या नहीं या कोई आपको बुलाये या नहीं पर गमी में आपको जाना ही चाहिये और इसी कारण इसकी सूचना कहीं न कहीं से होना जरूरी है। कई बार निकट व्यक्ति होने के कारण सूचना फोन पर आ जाती है, पर अगर थोड़ा दूर का हो तो उस फिर उसके लिये अखबार एक मददगार साबित होता है।</strong></span></p>
<p><span style="color:#003300;"><strong>कई बार ऐसे अवसरों पर दूसरे शहर भी जाना पड़ता है। उस समय उस शहर में बस स्टेंड या रेल्वे स्टेशन पर ही अखबार खरीद लेता हूं जिससे पता चल जाता है कि उठावनी कहां है। कई बार तो  ऐसा भी हुआ है कि जिनके घर हम जा रहे हैं उनका पता हमें इसीलिये नहीं होता क्योंकि पहले कभी उनके घर गये नहीं  हैं या उसकी आवश्यकता नहीं  अनुभव की। तब ऐसे ही अखबार से पता लिया है। एक बार तो हम छहः लोग एक साथ एक दूसरे शहर उठावनी में शामिल होने जा रहे थे पर किसी के पास पता नहीं था। तब मैंने ही अखबार का आईडिया सुझाया और मेरा अनुमान सही निकला।  हम समय पर वहां पहुंच गये और वहां किसी को नहीं बताया कि अखबार से पता निकाल कर लायें हैं वरना कोई सुनता तो क्या कहता कि निकटस्थ लोग होकर इनको घर का पता तक नहीं मालुम था। वह समय यह सफाई देने का नहीं होता कि जिसके यहां आये हैं वह हमारे पास कई बार आये पर हम उनके यहां पहली बार आये हैं।</strong></span></p>
<p><span style="color:#003300;"><strong>एक बार तो हम एक शोक कार्यक्रम में शामिल होने गये तो जिस व्यक्ति के यहां जा रहे थे उसके घर पर न होने की पक्की संभावना थी क्योंकि उनके पिता का देहांत हुआ था और वह उनसे अलग रहते थे। हम पांच लोग थे और इस बात को लेकर चिंतित थे कि कैसे वहां पहुंचेगे। मैने बस से उतरते ही अखबार खरीद लिया और फिर हमारी समस्या हल हो गयी। </strong></span></p>
<p><span style="color:#003300;"><strong>हालांकि अखबार में कई दिलचस्प खबरे आतीं हैं और वह हमारे जीवन को अभिन्न अंग है पर समय के साथ कुछ ऐसा हो गया है कि उसमें दिलचस्पी तभी होती है जब समय होता है पर फिर भी ऐसे अवसरों पर अखबारों की सहायता मिलती है जो उनके प्रकाशन का उद्देश्य बिल्कुल नहीं होता।  हालांकि आजकल अखबार इतने सस्ते हैं कि उसका व्यय तो कही गिना भी नहीं जाता पर फिर भी कभी आदमी सोचता है कि क्या फायदा? कहा जाता है कि किसी की शादी में भले मत जाओ पर गमी में जरूर जाना चाहिए। शहरों के बढ़ने के साथ आधुनिक साधन भी आये हैं पर आदमी की सोच और विचार का दायदा सिकुड़ रहा है। कई बार लोग ऐसे अवसरों सूचना नहीं देते या आवश्यकता नहीं अनुभव नहीं करते पर वहां अपना पहुंचना जरूरी होता है तब अखबारों की सहायता मिल जाती है। इसलिये आज भी अखबार पढ़ता हूं तो केवल इसलिये ताकि अन्य सूचनाओं के साथ ऐसी सूचनाएं भी मिलतीं रहें जिससे समाज से सतत संपर्क में रहा जा सके। अन्य सूचनाएं भी मिल जाती है जो महत्वपूर्ण होती हैं और अपने लिखने के साथ जानकारी बढ़ाने के काम भी आतीं हैं। </strong></span></p>
<p><span style="color:#003300;"><br />
<strong></strong></span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[समूह और वर्ग होते हैं भ्रम का प्रतीक ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=389</link>
<pubDate>Fri, 11 Apr 2008 16:51:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.hi.wordpress.com/2008/04/11/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%b9-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%ad%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%ae/</guid>
<description><![CDATA[                       समाज को बांटकर विकास ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>                       समाज को बांटकर विकास करने का सिद्धांत मुझे कभी नहीं सुहाता। मुझे उकताहट होती है जब कोई आदमी अपनी जाति, भाषा, धर्म, प्रदेश और या कुल के नाम अपना परिचय देकर अहंकार या कुंठा प्रदर्शित करते हैं। मेरा मानना है कि यह सब उन लोगों को कहना पड़ता है जो अपने अंदर केवल कमाने और खाने के अलावा कोई योग्यता नहीं रखते। वैसे कोई आदमी किसी का सगा नहीं होता। यहां तक कि जब अपने परिवार पर संकट होता है तो पहले अपने को बचाने का प्रयास करता है। अगर वह किसी समूह या वर्ग के होने का दावा करता है तो इसका आशय यह है कि उसका  लाभ उठाना चाहता है अगर कहीं से उसे लगता है कि उसके वर्ग या समूह की हानि से उसे भी परेशानी होगी तो वह उसके साथ हो जाता है। इसके विपरीत अगर उसे लगता है कि  मदद नहीं  करने से व्यक्तिगत हानि होगी तो वह दूर भागता है और अगर हानि लाभ की संभावना से परे हो तो वह मूंह भी फेर लेता है। </strong></p>
<p><strong>                     मतलब यह कि व्यक्तियों द्वारा  समूहों और वर्गों के जुड़े होना भी एक भ्रम है। मै किसी प्रकार के नारों और वाद पर चर्चा नहीं करता क्योंकि उनमें कोई को गहन विचार नहीं होता। कुछ अनुमान और कल्पनाएं दिखाकर ऐसे नारे और वाद प्रतिपादित किये जाते हैं जिनका प्रयोजन उन समूहों और वर्गो के लोगों को  एकत्रित कर अपने लिये आर्थिक और सामाजिक श्रीवृद्धि के साधन जुटायें जायें। हर समूह या वर्ग के शीर्षस्थ लोग कथित रूप से बड़े होने का स्वांग कर कल्याण और विकास का नारा देते हैं। मैंने कई बार देखा है और कई बार ठगा जाता हूं। कई बार तो ऐसा भी लगा है कि जिस समूह या वर्ग से जुड़ा बताकर कोई बड़ा आदमी मेरे कल्याण की बात कर मुझे अपने साथ जुड़ने को प्रेरित कर रहा है तो यह जानते हुए भी कि वह ढोंग कर रहा है तब भी उसकी बात दिखाने के लिये मान लेता हूं। सोचता हूं कि यार, आदमी को समूह या वर्ग से जुड़ा होना चाहिए क्योंकि सब लोग एसा ही करते हैं। मनुष्य ही सामजिक प्राणी है और असामाजिक भी। ऐसे में अपने समूह या वर्ग से अलग किसी समूह या वर्ग के व्यक्ति से कोई वाद-विवाद हुआ तो उसमें मेरे लोग ही मेरे काम आयेंगे-यही भ्रम पालकर  खामोश हो जाता हूं। भरोसा नहीं है कि मेरे समूह या वर्ग के बड़े लोग मेरे किसी काम आयेंगे इसलिये किसी से वाद-विवाद भी नही करता पर फिर भी सच नहीं कहता और भीड़ में भेड़ की तरह शामिल हो जाता हूं। </strong></p>
<p><strong>यह मेरा अकेले का सच नहीं है बल्कि सब लोग यही कर रहे हैं। अपने अंदर एक अनजाना खौफ है जो शुरू से आदमी में जाति,भाषा,धर्म और क्षेत्र के नाम पर बने समूहों और वर्गों में उसे बने रहने के लिये प्रेरित करता है जो सामान्य लोगों के सहयोग से कुछ कथित लोगों को बड़ा आदमी बना देते हैं और उनका  जीवन भर उनका शोषण करते हैं। इस देश में पहले भी ऐसा ही हुआ अब भी हो रहा है। सत्य सब जानते हैं कि कोई भी किसी का नहीं है पर फिर भी भ्रम का साथ देते हैं।<br />
</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शैतान के सम्मान की माया-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=360</link>
<pubDate>Tue, 29 Jan 2008 17:11:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.hi.wordpress.com/2008/01/29/shaitan-ke-samman-kee-maya-hasya-kavita/</guid>
<description><![CDATA[साधू के आश्रम में पहुंचकर शैतान ने
अपन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>साधू के आश्रम में पहुंचकर शैतान ने<br />
अपनी चाल का जाल बिछाया<br />
उसके सब चेलों को  अलग-अलग बुलाकर<br />
'सर्वश्रेष्ठ चेले' का सम्मान दिलाने का<br />
लुभावना सपना दिखाया </p>
<p>इधर शैतान निकला<br />
सभी चेले उसके पीछे भागे<br />
भूल गए गुरु का यह सन्देश<br />
''लालच बुरी बला है'<br />
कुछ भी उनको समझ में नहीं आया </p>
<p>आगे-आगे शैतान<br />
पीछे-पीछे चेले दौड़ते जाते<br />
सम्मान की मैराथन दौड़ लगी हो<br />
ऐसे गति बढाते जाते<br />
कहीं अंत नजर नहीं आया </p>
<p>जब वह थकने लगे<br />
तब रुक गया शैतान और मुस्कराया<br />
और कुछ रंग बिरंगे कागज़<br />
पेन और कुछ पत्थर के सिक्के<br />
उनकी तरफ बढाते हुए बोला<br />
''लो यह सब सम्मान<br />
तुम सब ही नंबर वन हो<br />
मैंने अपना फर्ज निभाया''</p>
<p>चेलों ने उससे सामान अपने हाथ में लिया<br />
शैतान फिर वहाँ नज़र नहीं आया<br />
कागज पर चेलों की तारीफ के शब्द थे बहुत<br />
पर फिर भी उनका मन खाली था<br />
पर इस सम्मान का मतलब<br />
अब शिष्यों के समझ में आया<br />
'इस शैतान ने हमारे गुरु की<br />
तपस्या में भंग करने का षड़यंत्र रचाया'</p>
<p>लौट के साधू के आश्रम पर चेले  आये<br />
तो वह मुस्कराये और बोले<br />
''यह सम्मान का खेल<br />
तुम्हारे बूते का नहीं है<br />
या ज्ञान छोड़ दो या सम्मान पाने की चाहत<br />
वरना कभी अपमान से भी होगे आहत<br />
अपनी काबलियत पर यकीन करो<br />
दुनिया में बिखेरों अपनी शक्ति और भक्ति<br />
बाजार में जो बिक सकता है<br />
उसके लिए ही कोई सम्मान के शब्द लिखता है<br />
खुद में ही देखो अपने को<br />
भूल जाओ यह सब<br />
यह तो थी शैतान के सम्मान की माया<br />
---------------------------------------  </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भीड़ में अपना अस्तित्व ढूँढता आदमी ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/12/15/bheed-men-apna-astitv-dhoondhtaa-admi/</link>
<pubDate>Sat, 15 Dec 2007 09:41:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.hi.wordpress.com/2007/12/15/bheed-men-apna-astitv-dhoondhtaa-admi/</guid>
<description><![CDATA[अलग खडा नहीं रह सकता
इसलिये भीड़ में श]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अलग खडा नहीं रह सकता<br />
इसलिये भीड़ में शामिल<br />
हो जाता आदमी<br />
फिर वहीं तलाशता है<br />
अपनी पहचान आदमी<br />
भीड़ में सवाल-दर सवाल<br />
सोचता मन में<br />
पर किसी से पूछने का सहस नहीं जुटाता<br />
भीड़ में शामिल पर अलग सोचता आदमी</p>
<p>भीड़ में शामिल लोगों में<br />
अपने धर्म के रंग<br />
अपनी जाति का संग<br />
अपनी भाषा का अंग<br />
देखना और ढूंढना  चाहता आदमी<br />
अपनी टोपी जैसी सब पहने<br />
और उसके देवता को सब माने<br />
उसके सच को ही सर्वश्रेष्ठ जाने<br />
अपनी शर्तें भीड़ पर थोपता आदमी<br />
भीड़ में किसी की पहचान नहीं होती<br />
यह जानकर उसे कोसता आदमी</p>
<p>अपने अन्दर होते विचारों में छेद<br />
भीड़ में देखता सबके भेद<br />
अपनी सोच पर कभी नहीं होता खेद<br />
सबको अलग बताकर एकता की कोशिश<br />
दूसरे की नस्ल पर उंगुली उठाकर<br />
अपने को श्रेष्ठ साबित कराने का इरादा<br />
असफल होने पर सबको समान<br />
बताने का दावा<br />
आदमी देता है भीड़ को धोखा<br />
पर भीड़ का कोई रंग नहीं होता<br />
कोई देवता उसकी पहचान नहीं बनता<br />
कोई उसकी भाषा नहीं होती<br />
कहा-सुना सब बेकार<br />
तब हताश हो जाता है आदमी<br />
भीड़ में शामिल होना चाहता<br />
पर अपनी  शर्तें<br />
कभी नहीं भूलना चाहता आदमी<br />
अपने अंतर्द्वंदों से मुक्त नहीं हो पाता आदमी<br />
---------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जैसे कोई डाक्टर पीछे आया ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/11/22/jaise-koyee-daktar-peechhe-aayaa/</link>
<pubDate>Thu, 22 Nov 2007 17:08:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[एक आदमी ने सुबह-सुबह
दौड़ लगाने का कार]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक आदमी ने सुबह-सुबह<br />
दौड़ लगाने का कार्यक्रम बनाया<br />
और अगले दिन ही घर से बाहर आया<br />
उसने अपने घर से ही<br />
दौड़ लगाना शुरू की<br />
आसपास के लड़के बडे हैरान हुए<br />
वह भी उनके पीछे भागे<br />
और भागने का कारण पूछा<br />
तो वह बोला<br />
'मैने कल टीवी पर सुना<br />
मोटापा बहुत खतरनाक है<br />
कई बिमारियों का बाप है<br />
आजकल अस्पताल और डाक्टरों के हाल<br />
देखकर डर लगता है<br />
जाओ इलाज कराने और<br />
लाश बनकर लौटो<br />
इसलिये मैने दौड़ने का मन बनाया'</p>
<p>लड़कों ने हैरान होकर पूछा<br />
'पर आप इस उम्र में दौडैंगे कैसे<br />
आपकी हालत देखकर हमें डर समाया'<br />
उसने जवाब दिया<br />
'जब मेरी उम्र पर आओगे तो सब समझ जाओगे<br />
लोग भगवान् का ध्यान करते हुए<br />
योग साधना करते हैं<br />
मैं यही ध्यान कर दौड़ता हूँ कि<br />
जैसे कोई मुझे डाक्टर पकड़ने आया<br />
अपनी स्पीड बढाता हूँ ताकि<br />
उसकी  न पडे मुझे पर छाया</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे: बिपति भए धन न रहे]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/11/01/%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%8b%e0%a4%b9%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%ad%e0%a4%8f-%e0%a4%a7%e0%a4%a8-%e0%a4%a8-%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Thu, 01 Nov 2007 03:51:56 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[बिपति भए धन न रहे, रहे जो लाख करोड़
नभ त]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बिपति भए धन न रहे, रहे जो लाख करोड़<br />
नभ तारे छिपि जात है, ज्यों रहीम भए भोर</strong> </p>
<p>कवि रहीम कहते हैं, जैसे प्रभात होते ही आकाश से तारागन विलीन जो जाते हैं, उसी प्रकार आपत्ति आने पर चाहे कई लाख-करोड़ धन भी पास हो तो वह भी समाप्त हो जाता है।</p>
<p><strong>रहिमन राम न उर धरै, रहत विषय लपटाय<br />
पसु खर खात सवाद सों, गुर गुलियाए खाय</strong> </p>
<p>कवि रहीम कहते हैं की कुछ लोग भगवान् राम को ह्रदय में धारण नहीं करते और भोग-विलास में डूबे रहते हैं । पशु की टांगों को स्वाद से खाने के बाद दवा भी खाते हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दिल का क्या हिसाब रखते ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/10/30/%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%ac-%e0%a4%b0%e0%a4%96%e0%a4%a4%e0%a5%87/</link>
<pubDate>Tue, 30 Oct 2007 14:24:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[जिस राह से गुजरे हम
वहीं हमसफ़र मिलते ग]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जिस राह से गुजरे हम<br />
वहीं हमसफ़र मिलते गये<br />
वह अपनी मंजिल पर आकर रुके<br />
हम अपनी राह पर चलते गये<br />
किसी से बिछडे तो किसी से मिले<br />
अपना  कारवां लिए बढते रहे<br />
जो बिछडे क्या उनका पता रखते<br />
क्या भला अपनी उनको खबर करते<br />
जो साथ होते<br />
उनसे ही निभाने से फुर्सत कहाँ होती<br />
अपनी राह पर हम चलते रहे<br />
कहीं रास्ते में नहीं होंगे हमारे पैर के निशान<br />
कहीं नहीं होगी हमारे नाम की इबारत<br />
हमारे आगे जाते ही सब मिटते गये<br />
हो सकता है कि किसी के दिल में<br />
हमारे लिए जगह हो<br />
क्योंकि दिल  पर नहीं होता बस किसी का<br />
अगर बसे तो बस ही गये<br />
करते हों शायद वह लोग<br />
जिन्हें हम खुद भूल गए<br />
दिलों को पढ़ना कहाँ संभव<br />
किसके दिन में कैसे बसे<br />
किसकी आंखों के सामने से गुजरे<br />
और उसके दिल में बसे<br />
और कहाँ बाहर से ही निकल गए<br />
--------------------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सात समंदर भी कम होंगे ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/10/27/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a4-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%b0-%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%ae-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%87/</link>
<pubDate>Sat, 27 Oct 2007 04:43:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[अगर सुबह का भूला शाम को
घर लौट आये तो बु]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अगर सुबह का भूला शाम को<br />
घर लौट आये तो बुद्धिमान कहलाता<br />
पर रात को जो भटका घर लौटे तो<br />
उसको माफ़  क्यों नहीं किया जाता<br />
शायद आदमी के पाप सूरज की अग्नि में<br />
जलकर राख हो जाते हैं पर<br />
रात को अंधियारे में  चाँद की तरह लगा दाग<br />
कभी नहीं मिट पाता<br />
इसीलिए भी रात का भटका<br />
कभी घर वापस नहीं आता<br />
----------------------------------<br />
एक घूँट मिले तो ग्लास चाहिए<br />
ग्लास मिले तो गागर चाहिए<br />
गागर मिले तो सागर चाहिए<br />
प्यास अगर पानी  से बुझने वाली होती तो<br />
कोई जंग नहीं होती<br />
पर जो पैसे से बुझती है<br />
उसको बुझाने के लिए तो<br />
सात समंदर भी कम होंगे<br />
उसके लिए तो दिल को तसल्ली<br />
देने के लिए कोई अच्छा  ख्याल चाहिए<br />
आदमी को पैगाम पर पैगाम देने कुछ नहीं होगा<br />
उन पर अमल करने का जज्बा चाहिए</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अपने आंसू धीरे-धीरे बहाओ- हास्य कविता ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/10/19/%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%86%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a5%82-%e0%a4%a7%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%a7%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%93/</link>
<pubDate>Fri, 19 Oct 2007 14:23:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[शिष्य के हाथ से पिटाई का
गुरुजी को मला]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>शिष्य के हाथ से पिटाई का<br />
गुरुजी को मलाल हो गया<br />
जिसको पढ़ाया था दिल से<br />
वह यमराज का दलाल हो गया<br />
गुरुजी को मरते देख<br />
हैरान क्यों हैं लोग<br />
गुरू दक्षिणा के रुप में<br />
लात-घूसों की बरसात होते देख<br />
परेशान क्यों है लोग<br />
यह होना था<br />
आगे भी होगा<br />
चाहत थी फल की बोया बबूल<br />
अब वह पेड युवा हो गया<br />
राम को पूजा दिल से<br />
मंदिर बहुत बनाए<br />
पर कभी दिल में बसाया नहीं<br />
कृष्ण भक्ति  की<br />
पर उसे फिर ढूँढा नहीं<br />
गांधी की मूर्ति पर चढाते रहे माला<br />
पर चरित्र अंग्रेजों का<br />
हमारा आदर्श हो गया<br />
कदम-कदम पर रावण है<br />
सीता के हर पग पर है<br />
मृग मारीचिका के रूपमें<br />
स्वर्ण मयी लंका उसे लुभाती है<br />
अब कोई स्त्री हरी नहीं जाती<br />
ख़ुशी से वहां जाती है<br />
सोने का मृग  उसका हीरो हो गया<br />
जहाँ देखे कंस बैठा है<br />
अब कोइ नहीं चाहता कान्हा का जन्म<br />
कंस अब उनका इष्ट हो गया<br />
रिश्तों को तोलते रूपये के मोल<br />
ईमान और इंसानियत की<br />
सब तारीफ करते हैं<br />
पर उस राह पर चलने से डरते हैं<br />
बैईमानी और हैवानियत दिखाने का<br />
कोई अवसर नहीं छोड़ते लोग<br />
आदमी ही अब आदमखोर हो गया<br />
घर के चिराग से नहीं लगती आग<br />
हर आदमी शार्ट सर्किट हो गया<br />
किसी अवतार के इन्तजार में हैं सब<br />
जब होगा उसकी फ़ौज के<br />
ईमानदार सिपाही बन जायेंगे<br />
पर तब तक पाप से नाता निभाएंगे<br />
धीरे धीरे ख़ून के आंसू बहाओ<br />
जल्दी में सब न गंवाओ<br />
अभी और भी मौक़े आएंगे<br />
धरती के कण-कण में<br />
घोर कलियुग जो हो गया</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सड़क दुर्घटनाएं और भविष्यवाणियाँ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/10/18/%e0%a4%b8%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%95-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%98%e0%a4%9f%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%8f%e0%a4%82-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%ad%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b7%e0%a5%8d/</link>
<pubDate>Thu, 18 Oct 2007 15:24:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[       उस दिन एक आदमी दूसरे से कह रहा था कि ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>       उस दिन एक आदमी दूसरे से कह रहा था कि 'एक ज्योतिषी ने पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी कि अमुक तारीख से लेकर अमुक समय तक देश के लिए समय भारी है और इसमें बहुत सारे सड़क हादसे भी होंगे.अब देखो रोज  कोई न  कोई ऐसी  दुर्घटना हो रही है. अखबार ऐसी ही ख़बरों से रंगे पड़े हैं.'</p>
<p>      भारत का  ज्योतिष एक विज्ञान है पर इसकी आड़ में कई लोगों ने पैसा और नाम कमाने के चक्कर में इसे बदनाम कर दिया है, और वह स्वाभाविक रूप से होने वाली घटनाओं  का पूर्व में  आंकलन कर उसे इस तरह  प्रस्तुत करते हैं जैसे कोई बहुत बड़ी भविष्यवाणी  कर रहे हों. स्वाभाविक रूप से उसने जो तारीखें बताई उस समय हमारे देश में  मंदिरों और बाजारों में चहल-पहल बढ़ जाती है.  ग्रीष्म और  वर्षा काल में आदमी बहुत कम घर से निकलना बहुत काम चाहता है. जैसे ही वर्षाकाल समाप्त होता है हमारे देश में त्योहारों का दौर शुरू होता है. इस समय  देश में नवरात्रि के दिन चल रहे हैं, और हमारे देश में हर शहर में कोई न कोई ऐसा प्रसिद्ध मंदिर  जरूर होता है जहाँ दर्शन करने के लिए  उसके आसपास के शहरों और गाँवों के लोग झुंड के झुंड बनाकर चलते हैं. एक तो ग्रीष्म और वर्षाकाल में अपने घरों में दुबके लोगों के मन में बदलते मौसम की उमंग होती है और फिर भक्ति भाव से वह लोग चहल पहल करने चल देते हैं-तीज-त्यौहार की वहज से व्यापार बढ़ने की संभावना से बडे भार वाहकों की आवाजाही भी बढ़ जाती है.  इसी तरह अन्य लोग भी दशहरा और दीपावली पर बाजार से नया सामान खरीदने निकलते हैं ऐसी स्थिति  में सब जगह भीड़ होती है. गाडियाँ टकराने से कई जगह लोगों में आपसी विवाद भी होता है पर कहीं बड़ी दुर्घटना होती है तो उसकी खबर अखबारों में छपती है. आजकल तीव्र गति के वाहनों के चलाने और ट्रैफिक के नियमों का पालन न  करने से दुर्घटनाएं बहुत होने लगी हैं और मोटर साइकिल चलाने वाले तो तय ही कर चुके हैं जब तक पुलिस वाले डंडा नहीं घुमाएंगे तब तक हेल्मेंट नहीं पहनेंगे और सबसे ज्यादा खबरें ऐसे ही चालकों की होतीं हैं. अभी एक अखबार में मैंने ऐसे दुपहिया चालकों के रिश्तेदारों की मार्मिक अपील अखबार में पढी थी जिनकी सड़क हादसे  में मौत हुई थी और वह हेलमेट नहीं पहने हुए थे. उन रिश्तेदारों ने  सब लोगों से हेलमेट पहनकर वाहन चलने की अपील की थी.  मुझे ताज्जुब होता है कि सब कुछ जानते हुए भी लोग इस तरफ ध्यान नहीं देते. </p>
<p>       वैसे तो देश में  ऐसा कोई दिन नहीं होता जो दुर्घटना में लोग काल कलवित न होते हों पर भीड़-भाड़ वाले दिनों में सड़क हादसे कुछ अधिक ही हो जाते है पर कुछ तथाकथित ज्योतिष ऐसी भविष्यवाणी कर अपने को सही साबित करना चाहते हैं. वह सफल इसलिए होते हैं कि लोग जागरूक होकर दुर्घटना से बचने के लिए वह सावधानी नहीं बरतते और साथ उतावलापन करते हैं. एक बात और वह यह कि बडे मार्ग जहाँ बस और ट्रक चलते हैं उनमें अपने छोटे वाहन भी इस तरह चलते हैं जैसे शहर में चलाते हैं जहाँ तीव्र गति से चलने वाले वाहनों से कम ही वास्ता पड़ता है. वैसे तो अगर शहर से थोडी  दूर स्थित दूसरे शहर या गाँव जाने के लिए बस उपलब्ध हों वहाँ अपने छोटे वाहन ले जाना कुछ लोग गलत मानते हैं क्योंकि उसमें थकावट और मानसिक तनाव भी वाहन का संतुलन गड़बड़ कर देते हैं. जहाँ रेल का सफर और हवाई जहाज से जाया जा सकता है  वहाँ अपनी कार ले जाना भी कुछ लोग पसंद नहीं करते. देश में सड़क दुर्घटनाओं की खबरें आम हो गईं है इससे कई परिवार झेल चुके हैं और वह अन्य लोगों से सावधानी बरतने की अपील करते हैं पर जिनके पास लोहे लंगर से बने वाहन नये-नये आये होते हैं उनको लगता है कि हमने सड़क भी खरीद ली है. </p>
<p>        कुल मिलाकर बात यह है कि इन सड़क दुर्घटनाओं के मद्दे नजर किसी ज्योतिषी की भविष्यवाणी कि परवाह किये बिना सब जगह स्थानीय प्रशासन पहले ही बढ़ती भीड़ को देखकर ऐसी दुर्घटनाओं से निपटने के लिए अपने इंतजाम महत्वपूर्ण जगहों पर करने लगता है पर सड़क पर आदमी को खुद भी तो यह सोचकर चलना चाहिए  कि इस पर और भी लोग और वाहन चलते हैं. अगर वह लोग ऐसा करें तो तथाकथित ज्योतिषियों को ऐसी भी भविष्यवाणी करने का अवसर ही न मिले.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[धोनी कप्तान की तरह पेश आये ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/10/15/%e0%a4%a7%e0%a5%8b%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a4%b9-%e0%a4%aa%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%86%e0%a4%af%e0%a5%87-2/</link>
<pubDate>Mon, 15 Oct 2007 14:55:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.hi.wordpress.com/2007/10/15/%e0%a4%a7%e0%a5%8b%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a4%b9-%e0%a4%aa%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%86%e0%a4%af%e0%a5%87-2/</guid>
<description><![CDATA[          एक दिवसीय मैचों के श्रंखला में आस्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>          एक दिवसीय मैचों के श्रंखला में आस्ट्रेलिया ने भारत को अभी  मैचों में हराकर यह सिद्ध कर दिया है कि अभी भी विश्व में उसके सामने कोई टीम टिक नहीं सकती। बीस ओवर के मैचों में भारत को विश्व विजेता का खिताब क्या मिला लोग फिर एक बार क्रिकेट की तरफ आकर्षित होने लगे थे पर अब इन दो पराजयों से उनकी खुमारी उतरने लगी है। समस्या यह है कि दोनों के खेल नियमों बहुत अंतर है और फिर पचास ओवर में हमेशा खिलाड़ियों के खेल के साथ उनके और कप्तान के रणनीतिक कौशल की भी परीक्षा होती है। इस मामले में भी हमेशा भारतीय खिलाडी कमजोर रहे हैं। कप्तान बनना तो सभी चाहते हैं पर उसके दायित्व को कोई नहीं समझता। सबको यह सम्मान तो चाहिए पर इस पद का निर्वाह कैसे हो यह कोई नहीं जानता। जब टीम जीतती है तो कप्तान वाह-वही लूटने को तैयार है और हारते हैं तो सारा आरोप खिलाडियों पर डाल देते हैं-उसमें भी किसी खिलाडी का नाम लेने से कराते हैं। कभी कोई कप्तान अपने खिलाड़ियों को निर्देश देते नज़र नहीं आते। भारतीय गेंदबाज कभी कप्तान से निर्देश लेकर गेंद डाल रहे हों ऐसा नहीं लगता।</p>
<p>               मैने एक कप्तान को यह कहते हुए सुना था कि 'सभी खिलाडी प्रोफेशनल हैं और कोई चीज समझाने की जरूरत नहीं है, वह सब खुद ही जानते है'। मैं सोच रहा था कि फिर अखिर कप्तान आखिर किस मर्ज की दवा है। क्या वह अपने साथी खिलाडियों को सख्ती से अपने मूल स्वरूप के साथ हालत के अनुसार खेलने का निर्देश नहीं दे सकता? ऐसा लगता है कि भारतीय टीम में सीनियर-जूनियर का कहीं न कहीं भेद चलता है इसीलिये ही सीनियर खिलाड़ी चाहे जैसा खेलने लगते हैं क्योंकि इनको वहां समझ या चेतावनी देने वाला कोई नहीं होता। अगर आज हम धोनी से यह अपेक्षा करें कि वह अपनी से वरिष्ठ खिलाडियों पर उनके निराशाजनक खेल पर नाराजगी जताए तो इसकी संभावना नहीं लगती। शायद यह भारतीय टीम के अभ्यास में ही नहीं है कि उसका कप्तान अपने से वरिष्ठ या कनिष्ठ खिलाडी पर ग़ुस्सा जाहिर करे क्योंकि कब सामने वाला उसका कप्तान बनकर आ जाये और फिर बदला लेने। फिर धोनी तो अपनी सामने ही तीन ऐसे भूतपूर्व कप्तानों के खेलते देख रहे हैं जो कभी भी फिर कप्तान बन सकते हैं और ऎसी स्थिति में 'जैसा चल रहा है वैसे चलने दो' की नीति पर चलने के अलावा उनके पास कोई चारा भी नहीं है।</p>
<p>        बीस ओवर की विश्व कप प्रतियोगिता में धोनी इस मामले में बडे भाग्यशाली थे कि उनके व्यक्तित्व को वहाँ चुनौती देने वाला युवराज के अलावा और कोई नहीं था और उसने भी उनका बखूबी साथ निभाया। पर इन एक दिवसीय मैचों में जिस तरह भारतीय टीम पिट रही हैं उससे तो यह लगता है कि धोनी अपनी ही देश में असफल होने जा रहे हैं और खिलाड़ियों पर उनका कोई नियन्त्रण नहीं है। इस तरह लगतार असफल होने पर अगर वह अपने साथी खिलाडियों पर अगर इस वजह से गुस्सा नहीं हुए कि भविष्य में कोई उनमें से पुन: उनका कप्तान बनकर उनका भी भविष्य चौपट कर सकता है तो इस टीम के खिलाडियों के खेल में कोई सुधार नहीं होने वाला। अगर धोनी चाहते हैं कि उनका नाम सफल कप्तानों की सूची में शामिल हो तो उन्हें वरिष्ठ खिलाड़ियों को भी हालत के अनुसार खेलने के निर्देश देने होंगे।</p>
<p>अभी श्रंखला में हारने से उनकी कप्तानी पर प्रश्न चिन्ह उठना शुरू हो गया हैं-बीस ओवर की विश्व कप  में उनकी जो छबि बनी थी अब वह धूमिल होना शुरू हो गयी है-वैसे वहाँ किसी खास रणनीतिक कौशल का प्रदर्शन नहीं किया था और जो अब मिला तो वह उनके हाथ से जा रहा है. एक मामले में उनके स्थिति अन्य भारतीय  कप्तानों से अलग है कि आज तक किसी भी कप्तान ने तीन भूतपूर्व कप्तानों का संभालने का काम नहीं किया है </p>
<p>कल  ब्लोग पर प्रकाशित कविता यहाँ प्रस्तुत है।<br />
<strong>बीस का नोट पचास में नहीं चलेगा</strong></p>
<p>बीस के शेर<br />
पचास में ढ़ेर<br />
जीतते हैं तो फुलाते सीना<br />
हारें तो कहें’समय का फेर’<br />
समझाया था क्यों करते हो<br />
पचास का आयोजन<br />
जब है बीस का भोजन<br />
क्रिकेट कोई दाल होता तो<br />
पानी मिलाकर चला लेते<br />
कुछ खा लेते तो<br />
बाकी भूखे रह जाते माला फेर<br />
बीस ओवर के खेल पर<br />
बहुत खुश हुए थे कि<br />
दुनिया में जीते अपने शेर<br />
पचास ओवर के खेल में<br />
कंगारुओं की फुर्ती से हुए ढ़ेर<br />
कहैं दीपक बापूलोग पूछ रहें हैं<br />
‘वह मधुर सपना था या<br />
खडा है सामने यह कटु सत्य’<br />
दिन भर पूछने लगे हैं फिर स्कोर<br />
चर्चा करते हैं क्रिकेट की<br />
सांझ हो या भोर<br />
चौबीस साल पुरानी  कहानी<br />
फिर सामने आ रही है<br />
जब विश्व विजेता हुए थे<br />
इसी तरह ढ़ेर<br />
अब इस कहानी पर<br />
अगले चौबीस महीने तक भी<br />
नहीं चलेगा खेल<br />
काठ की हांडी बार-बार नहीं चढती<br />
छोटी जीत पर बड़ी हर नहीं फबती<br />
बीस का नोट पचास में नहीं चलेगा<br />
कितना भी नया हो बीस का ही रहेगा<br />
पोल खुल जायेगी देर-सबेर</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जो सहज  वह 'कबीर' जो असहज वह गरीब है ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/10/14/%e0%a4%9c%e0%a5%8b-%e0%a4%b8%e0%a4%b9%e0%a4%9c-%e0%a4%b5%e0%a4%b9-%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a5%8b-%e0%a4%85%e0%a4%b8%e0%a4%b9%e0%a4%9c-%e0%a4%b5%e0%a4%b9-%e0%a4%97/</link>
<pubDate>Sun, 14 Oct 2007 07:47:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[भारत में संत कबीर जी का नाम बहुत श्रद्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>भारत में संत कबीर जी का नाम बहुत श्रद्धा से लिया जा सकता है. कबीर दास जी के दोहों और साखियों में  न  केवल सहज  भक्ति भाव की प्रेरणा  है वरन जीवन में नैतिक आदर्शों पर चलने और व्यवहार में सरलता अपनाने का भी संदेश है. कबीर दास जी ने अगर सभी धर्मों पर कटाक्ष नहीं किये होते और मूर्ति पूजा को हास्यास्पद नही बताया होता तो  तो शायद उनके नाम पर भी लोगों  ने धर्म का प्रतिपादन किया होता-और आश्रम बनाकर उनका ख़ूब प्रचार करते. सच तो यह है कि उन्होने जीवन को सहजता से जीने का संदेश दिया है वह अनुकरणीय है. संत कबीर सहजता के प्रतीक हैं  और  मेरी इसमें मान्यता है कि जो आदमी जीवन में भक्ति और व्यवहार  में सहज वह कबीर है और जो असहज है वह गरीब है.  </p>
<p>कबीर दास जी ने अपना पूरा जीवन के जुलाहे के रूप में व्यतीत किया. कभी अपना काम नहीं छोडा. श्री गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि 'हे अर्जुन! मुझे इन तीनों लोकों में  न तो कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु है और कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है तो भी मैं कर्म में ही बरतता हूँ. क्योंकि हे पार्थ! यदि कदाचित मैं सावधान होकर कर्मों में न बरतूं तो बड़ी हानि हो जाये क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं. इसलिये मैं कर्म न करूं तो तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जायँ और मैं संकरताका करने वाला होऊँ तथा इस समस्त प्रजा को नष्ट करने वाला बनूँ.'</p>
<p>           संत कबीर के अपने जीवन कल में ही शिष्य बन गये थे फिर भी  उन्होने अपना काम बंद नहीं किया क्योंकि वह जानते थे कि अगर उन्होने ऐसा किया तो बाद में लोग उनके कथन पर यकीन नहीं करेंगे-यह अलग बात है कि आजकल के कई व्यासायिक संत  उनके कथनों को सुनाकर वाह-वाही लूटते हैं पर उनके जीवन चरित्र पर चलने का साहस कोई नहीं कर पाता. </p>
<p><strong>पाँव पुजावेँ बैठि के, भखै मांस मद दोय<br />
तिनकी दीच्छा मुक्ति नहिं, कोटि नरक फल होय</strong><br />
      आशय -जो साधू-संत खाली बैठकर अपने पाँव पुजवाते हैं और मांस-मदिरा दोनों का सेवन करते हैं उनकी दीक्षा से कभी किसी की मुक्ति नहीं हो सकती, उल्टे करोड़ों नरकों का भीषण कष्टप्रद फल भोगना पड़ता है।<br />
       आप यह समझ सकते हैं कि कबीर दास जी कितने बडे दूरदर्शी थे. इससे एक बात और समझ सकते हैं कि हम कहते हैं कि आजकल ज़माना ही ऐसा हो गया है पर हम देखें तो एसा तो उनके समय में रहा होगा तभी तो उन्होने ऐसा लिखा. शायद यही कारण है कि कबीर का दर्शन आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना पहले था- हम यह नहीं कह सकते कि उनका ज़माना कुछ और था और हमारा और.</p>
<p> <strong>जो जल बाढै नाव में, घर में बाढै दाम<br />
दोनों हाथ उलीचिये, यही सयानों काम</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी का आशय यह है किसी कारणवश नाव में जल भरने लगे और घर में धन की मात्रा बढती चली जाये तो बिना देरी किये दोनों हाथों से उसे निकालो, यही बुद्धिमानी का काम है, अन्यथा डूब जाओगे।<br />
     वह जीवन के गूढ़ रहस्यों के साथ मनुष्य के मनोविज्ञान को कितनी गहराई सा समझते थे उनकी रचनाओं को देखकर यह समझा जा सकता है. कबीरदास जीं कोई न तो कोइ पूंजीपति थे और न ही आश्रमों का निर्माण करने वाले संत. जीवन भर अपने परिवार के साथ घर में रहे. कोई पाखंड या दिखावा नहीं किया, यही कारण यह है कि उनका जीवन दर्शन आम आदमी के निकट दिखाई देता है. </p>
<p>           अगर आज हम देखें तो हमारे अन्दर जो मन है वह भावनाओं की नदी में तैरता है. आजकल उसमें  भगवान् की भक्ति की जगह ऐसे भाव भरे जा रहे हैं जिससे उनका आर्थिक दोहन किया जा सके-और अगर कोई इसके बाद भी हाथ नहीं आता तो भक्ति में ही ऐसे आकर्षक तत्व जोड़ दो कि अपने आप आदमी जेब ढीली करेगा. एक मजे की बात यह है कि मैने देखा है कि भक्ति के तंतु अगर बचपन में  आदमी के मन में नहीं बैठे  तो फिर कभी नहीं आते और आजकल धार्मिक चैनलों को लेकर ऎसी टिप्पणी आती है कि वह तो केवल बूढों के लिए है-और भगवान की भक्ति तो बुदापे में की जाती है . मैं इन बातों पर बचपन पर ही हंसता हूँ. मैं हर विषय में दिलचस्पी लेता हूँ पर लिप्प्त भक्ति में ही होता हूँ क्योंकि मुझे यह संस्कार बचपन से मिले हैं. श्रीवाल्मिकी रामायण, श्रीगीता और श्रीगुरु ग्रंथ साहब के साथ हिंदी साहित्य में कबीर दास की रचनाओं के अध्ययन मैने भक्ति और चिंतन के साथ किया है. शायद यही वजह है कि मुझे इन पर लिखने  में बहुत मजा आता है इस बात की परवाह किये बिना कि उसे कितना पढेंगे. कबीर दास का जीवन के प्रति सहज और सरल भाव मुझे सदैव आकर्षक लगता है. वह हमेशा ही सादगी से दैहिक जीवन जिए और आत्मिक रूप से आज भी हमारे आध्यात्म विचार का महत्वपूर्ण स्तम्भ  हैं. इसलिये कहता हूँ कि जो आदमी जीवन में सहज है वह कबीर है और जो असहज है वह गरीब है. जिसके पास  सब कुछ  है पर संतोष नहीं है उसे गरीब नही तो क्या कहा जायेगा.  ऐसे महान संत को मेरा प्रणाम. </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सहमति-असहमति का द्वंद ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/10/13/%e0%a4%b8%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%85%e0%a4%b8%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%82%e0%a4%a6/</link>
<pubDate>Sat, 13 Oct 2007 16:16:14 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[   जब किसी विषय पर एक से अधिक लोगों के मध]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>   जब किसी विषय पर एक से अधिक लोगों के मध्य  विचार होता है तब असहमति भी  होती है और होना भी चाहिए क्योंकि उससे ही किसी नए मत के निर्माण  की संभावना होती है. जब कोई अपना विचार किसी विषय पर व्यक्त इस उद्देश्य से करता है कि लोग उसकी बात को माने तो उसे इस बात के लिए भी तैयार रहना चाहिऐ कि उस पर कहीं सहमति तो कहीं असहमति होगी-और उसे दोनों पर दृष्टि रखते हुए ही अपने विचार का पुन:निरीक्षण  भी करना चाहिए. पर ऐसा होता नहीं है. जिन लोगों के पास पद, प्रतिष्ठा और पैसा होता है उन्हें कभी कोई चुनौती स्वीकार्य नहीं है. जिनके पास अपने विचार व्यक्त करने के साधन है वह किसी असहमति को सुनने को तैयार  नहीं होती और यहीं से शुरू होता है संघर्ष. विचारों का यह  संघर्ष अनंत काल से चल रहा है और आज तक कोई एक धारा- जिससे इस धरती पर शांति और विश्वास  स्थापित हो सके-नहीं बह सकी.</p>
<p>       कहते हैं कि झूठ मत बोलो पर बोलते सभी हैं. कहते हैं जीवन में आराम नहीं काम करना चाहिए पर आराम की तलाश सभी कर रहे हैं. दूसरे को सुख दो तो सुख मिलेगा और दुख दोगे तो वह भी तुम्हारे हिस्से में आयेगा, पर वास्तविकता में सभी अपने सुख जुटाने में लगे हैं और अवसर पाते ही दूसरे को दुख देते हैं. ज्ञान बघारने को सब तैयार पर चलने को तैयार नहीं है. आदमी का अहंकार उसे कभी अपने विचार से पीछे नहीं हटने देता. मानसिक अंतर्द्वंद में फंसा आदमी कभी भला किसी को सुख दे सकता है?  रचना से अधिक विध्वंस में उसकी रूचि होती है. कहीं शांति हो उसका ध्यान नहीं जाता जहाँ द्वंद हो वहाँ वह मन और तन के साथ उपस्थित होने में उसे बहुत आनन्द आता है. </p>
<p>     मेरा विचार सब माने-यह विचार हर आदमी का है. असहमति उसे उतेजित कर देती है और वह लड़ने पर आमादा हो जाता है. इस पूरे विश्व में तमाम तरह के वर्ग, जातियाँ,  धर्म और भाषाएं हैं उनके आधार पर मनुष्यों ने अपने को अलग-अलग समूहों में   बाँट लिया है, और इन समूहों के आपसे संघर्ष  से इतिहास भरा पढा है . कहते हैं हम यह हैं और तुम वह हो .कही लड़ते हैं तो कहीं एकता की बात करते हैं. यह दोनों ही बाते भ्रम हैं क्योंकि कहीं जब एकता की चर्चा होती है तो सब अपनी गाते हैं और  इसमें असहमति है और फिर बात इस निष्कर्ष पर ख़त्म होती है कि  समूहों में एकता क्यों होना चाहिए? कहते हैं शांति के लिए! शांति क्यों हो? क्योंकि लडाई हो रही है? आदमी हमेशा अपने मन में विचारों का अंतर्द्वंद पाले रहता है जब वह शांत रह नहीं रह सकता समाज कैसे शांत रह सकता है. समान भी तो आदमी की इकाई से बना है. </p>
<p>            भला अशांत मन कभी शांति ला सकते हैं. सहज नहीं होना चाहते बल्कि शांति चाहते हैं. हम चिल्लायें और बाकी लोग शांत हो जाएँ. हम कहें उसे सब माने और शांत हो जाएँ. कहीं लडाई विचारों की है को कहीँ शांति के लिए है. असहमति को खत्म करने के लिए सहमति बना रहे हैं और अधिक असहमत  होते जा रहे हैं. भला सहमत हुए बिना भी कभी सहमति बन सकती है. अपने विचारों में बदलाव के बिना कभी हम जब किसी से सहमत नहीं हो सकते तो दूसरा कैसे हो जायेगा कभी सोचा है.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:भक्त में अहंकार नहीं होता ]]></title>
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<pubDate>Tue, 09 Oct 2007 02:43:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[
जब लग नाता जाति का, तब लग भक्ति न होय
ना]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
जब लग नाता जाति का, तब लग भक्ति न होय<br />
नाता तोड़े गुरू भजै, भक्त कहावै सोय</strong></p>
<p>कविवर कबीर दास जी कहते हैं कि जाति-पांति का अभिमान है तब तक भक्ति नहीं हो सकती। अहंकार और मोह को त्यागा कर, सभी नाते-रिश्तों को तोड़कर भक्ति करो तभी भक्त कहला सकते हो।<strong></p>
<p>भक्ति बिना नहिं निस्तरै, लाख कराइ जो कोय<br />
शबद हृँ सनेही रहै, घर को पहुंचे सोय</strong></p>
<p>भक्ति के बिना उद्धार नहीं हो सकता, चाहे लाख प्रयत्न करो, वे सब व्यर्थ ही सिद्ध होंगे, जो केवल सदगुरु के प्रेमी हृँ, उनके सत्य-ज्ञान का आचरण करने वाले हैं वही अपने उद्देश्य को पा सकते हैं, अन्य कोई नहीं। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी: जल-धन बढने लगे तो उसे निकालो ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/10/08/%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%b2-%e0%a4%a7%e0%a4%a8-%e0%a4%ac%e0%a4%a2%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a4%97/</link>
<pubDate>Mon, 08 Oct 2007 03:43:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[
जो जल बाढै नाव में, घर में बाढै दाम
दोन]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
जो जल बाढै नाव में, घर में बाढै दाम<br />
दोनों हाथ उलीचिये, यही सयानों काम </strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी का आशय यह है किसी कारणवश नाव में जल भरने लगे और घर में धन की मात्रा बढती चली जाये तो बिना देरी किये दोनों हाथों से उसे    निकालो,यही बुद्धिमानी का काम है, अन्यथा डूब जाओगे। </p>
<p><strong>निन्दक ते कुता भला, हट कर माँडै शर<br />
कुत्ते ते क्रोधी बुरा, गुरू दिलावै गार</strong></p>
<p>निंदा से बहुत भला तो कुता है, जो कि दूर हटकर भौंकता है। परंतु कुत्ते से भी अधिक क्रोध करने वाल निंदा बुरा है जो अपने गुरू को गाली दिलवाता है। लोग सोचते हैं कि जब यही ऐसा अज्ञानी और परनिन्दा करने वाला है तो इसका गुरू भी ऐसा ही होगा।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी: बिना विचारे बोलना नासमझी ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/10/07/%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%87/</link>
<pubDate>Sun, 07 Oct 2007 03:24:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[मुख आवै सोई कहै, बोलै नहीं विचार
हते पर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>मुख आवै सोई कहै, बोलै नहीं विचार<br />
हते पराई आतमा, जीभ बाँधि तलवार </strong></p>
<p>कुछ नासमझ लोग ऐसे हैं, जो विचारकर नहीं बोलते। बस अपनी मनमर्जी से उलटा -सीधा जो भी मुहँ में आया बोलने लग जाते है। ऐसे लोग अपनी जीभ में कड़वे और कठोर वचन रूपी तलवार बांधकर दूसरों की आत्मा को कष्ट देते रहते हैं। ऐसे लोगों को अमानवीय प्रवृति का ही कहा जा सकता है। </p>
<p><strong>साधू सिद्ध बहु अंतरा, साधू मता प्रचंड<br />
सिद्ध जू बारे आपको, साधू तारे नौ खण्ड</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जीं कहते हैं कि साधू और सिद्ध में अन्तर है, दोनों में साधू ही श्रेष्ठ है। सिद्ध तो केवल अपना ही कल्याण करता है लेकिन साधू लोग पूरे विश्व का उद्धार करते हैं। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[धोनी कप्तान की तरह पेश आयें]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/10/06/%e0%a4%a7%e0%a5%8b%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a4%b9-%e0%a4%aa%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%86%e0%a4%af%e0%a5%87/</link>
<pubDate>Sat, 06 Oct 2007 10:46:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[एक दिवसीय मैचों के श्रंखला में आस्ट्र]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक दिवसीय मैचों के श्रंखला में आस्ट्रेलिया ने भारत को अभी दो मैचों में हराकर यह सिद्ध कर दिया है कि अभी भी विश्व में उसके सामने कोई टीम टिक नहीं सकती। बीस ओवर के मैचों में भारत को विश्व विजेता का खिताब क्या मिला लोग फिर एक बार क्रिकेट की तरफ आकर्षित होने लगे थे पर अब इन दो पराजयों से उनकी खुमारी उतरने लगी है। समस्या यह है कि दोनों के खेल नियमों बहुत अंतर है और फिर पचास ओवर में हमेशा खिलाड़ियों के खेल के साथ उनके और कप्तान के रणनीतिक कौशल की भी परीक्षा होती है। इस मामले में भी हमेशा भारतीय खिलाडी कमजोर रहे हैं। कप्तान बनना तो सभी चाहते हैं पर उसके दायित्व को कोई नहीं समझता। सबको यह सम्मान तो चाहिए पर इस पद का निर्वाह कैसे हो यह कोई नहीं जानता। जब टीम जीतती है तो कप्तान वाह-वही लूटने को तैयार है और हारते हैं तो सारा आरोप खिलाडियों पर डाल देते हैं-उसमें भी किसी खिलाडी का नाम लेने से कराते हैं। कभी कोई कप्तान अपने खिलाड़ियों को निर्देश देते नज़र नहीं आते। भारतीय गेंदबाज कभी कप्तान से निर्देश लेकर गेंद डाल रहे हों ऐसा नहीं लगता।</p>
<p>मैने एक कप्तान को यह कहते हुए सुना था कि 'सभी खिलाडी प्रोफेशनल हैं और कोई चीज समझाने की जरूरत नहीं है, वह सब खुद ही जानते है'। मैं सोच रहा था कि फिर अखिर कप्तान आखिर किस मर्ज की दवा है। क्या वह अपने साथी खिलाडियों को सख्ती से अपने मूल स्वरूप के साथ हालत के अनुसार खेलने का निर्देश नहीं दे सकता? ऐसा लगता है कि भारतीय टीम में सीनियर-जूनियर का कहीं न कहीं भेद चलता है इसीलिये ही सीनियर खिलाड़ी चाहे जैसा खेलने लगते हैं क्योंकि इनको वहां समझ या चेतावनी देने वाला कोई नहीं होता। अगर आज हम धोनी से यह अपेक्षा करें कि वह अपनी से वरिष्ठ खिलाडियों पर उनके निराशाजनक खेल पर नाराजगी जताए तो इसकी संभावना नहीं लगती। शायद यह भारतीय टीम के अभ्यास में ही नहीं है कि उसका कप्तान अपने से वरिष्ठ या कनिष्ठ खिलाडी पर ग़ुस्सा जाहिर करे क्योंकि कब सामने वाला उसका कप्तान बनकर आ जाये और फिर बदला लेने। फिर धोनी तो अपनी सामने ही तीन ऐसे भूतपूर्व कप्तानों के खेलते देख रहे हैं जो कभी भी फिर कप्तान बन सकते हैं और ऎसी स्थिति में 'जैसा चल रहा है वैसे चलने दो' की नीति पर चलने के अलावा उनके पास कोई चारा भी नहीं है।</p>
<p>बीस ओवर की विश्व कप प्रतियोगिता में धोनी इस मामले में बडे भाग्यशाली थे कि उनके व्यक्तित्व को वहाँ चुनौती देने वाला युवराज के अलावा और कोई नहीं था और उसने भी उनका बखूबी साथ निभाया। पर इन एक दिवसीय मैचों में जिस तरह भारतीय टीम पिट रही हैं उससे तो यह लगता है कि धोनी अपनी ही देश में असफल होने जा रहे हैं और खिलाड़ियों पर उनका कोई नियन्त्रण नहीं है। इस तरह लगतार असफल होने पर अगर वह अपने साथी खिलाडियों पर अगर इस वजह से गुस्सा नहीं हुए कि भविष्य में कोई उनमें से पुन: उनका कप्तान बनकर उनका भी भविष्य चौपट कर सकता है तो इस टीम के खिलाडियों के खेल में कोई सुधार नहीं होने वाला। अगर धोनी चाहते हैं कि उनका नाम सफल कप्तानों की सूची में शामिल हो तो उन्हें वरिष्ठ खिलाड़ियों को भी हालत के अनुसार खेलने के निर्देश देने होंगे।</p>
<p>कल इसी ब्लोग पर प्रकाशित कविता यहाँ प्रस्तुत है।<br />
<strong>बीस का नोट पचास में नहीं चलेगा</strong></p>
<p>बीस के शेर<br />
पचास में ढ़ेर<br />
जीतते हैं तो फुलाते सीना<br />
हारें तो कहें’समय का फेर’<br />
समझाया था क्यों करते हो<br />
पचास का आयोजन<br />
जब है बीस का भोजन<br />
क्रिकेट कोई दाल होता तो<br />
पानी मिलाकर चला लेते<br />
कुछ खा लेते तो<br />
बाकी भूखे रह जाते माला फेर<br />
बीस ओवर के खेल पर<br />
बहुत खुश हुए थे कि<br />
दुनिया में जीते अपने शेर<br />
पचास ओवर के खेल में<br />
कंगारुओं की फुर्ती से हुए ढ़ेर<br />
कहैं दीपक बापूलोग पूछ रहें हैं<br />
‘वह मधुर सपना था या<br />
खडा है सामने यह कटु सत्य’<br />
दिन भर पूछने लगे हैं फिर स्कोर<br />
चर्चा करते हैं क्रिकेट की<br />
सांझ हो या भोर<br />
चौबीस साल पुरानी  कहानी<br />
फिर सामने आ रही है<br />
जब विश्व विजेता हुए थे<br />
इसी तरह ढ़ेर<br />
अब इस कहानी पर<br />
अगले चौबीस महीने तक भी<br />
नहीं चलेगा खेल<br />
काठ की हांडी बार-बार नहीं चढती<br />
छोटी जीत पर बड़ी हर नहीं फबती<br />
बीस का नोट पचास में नहीं चलेगा<br />
कितना भी नया हो बीस का ही रहेगा<br />
पोल खुल जायेगी देर-सबेर</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ चाणक्य नीति:भावना से प्रतिमा में भी भगवान्]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/10/06/%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4/</link>
<pubDate>Sat, 06 Oct 2007 02:39:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[        1.मन की शुद्ध भावना से यदि लकड़ी, पत्थ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>        1.मन की शुद्ध भावना से यदि लकड़ी, पत्थर या किसी धातु से बनी मूर्ति की पूजा की जायेगी तो सब में व्याप्त परमात्मा वहां भी भक्त पर प्रसन्न होंगें। अगर भावना है तो जड़ वस्तु में भी भगवान का निवास होता है ।</p>
<p>     2.इस क्षण-भंगुर संसार में धन-वैभव का आना-जाना सदैव लगा रहेगा। लक्ष्मी चंचल स्वभाव की है। घर-परिवार भी नश्वर है। बाल्यकाल, युवावस्था और बुढ़ापा भी आते हैं और चले जाते हैं। कोई भी मनुष्य उन्हें सदा ही उन्हें अपने बन्धन में नहीं बाँध सकता। इस अस्थिर संसार में केवल धर्म ही अपना है। धर्म का नियम ही शाश्वत है और उसकी रक्षा करना ही सच्चा कर्तव्य है।</p>
<p>     3.सच्ची भावना से कोई भी कल्याणकारी काम किया जाये तो परमात्मा की कृपा से उसमें अवश्य सफलता मिलेगी। मनुष्य की भावना ही प्रतिमा को भगवान बनाती है। भावना का अभाव प्रतिमा को भी जड़ बना देता है। </p>
<p>     4.विद्या की शोभा उसकी सिद्धि में है । जिस विद्या से कोई उपलब्धि प्राप्त हो वही काम की है।</p>
<p>    5.धन की शोभा उसके उपयोग में है । धन के व्यय में अगर कंजूसी की जाये तो वह किसी मतलब का नहीं रह जाता है, अत: उसे खर्च करते रहना चाहिऐ</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हास्य कविता -बीस का नोट पचास में नहीं चलेगा ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/10/05/%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a5%8b%e0%a4%9f-%e0%a4%aa%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%9a%e0%a4%b2/</link>
<pubDate>Fri, 05 Oct 2007 16:16:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[बीस के शेर
पचास में ढ़ेर
जीतते हैं तो फु]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>बीस के शेर<br />
पचास में ढ़ेर<br />
जीतते हैं तो फुलाते सीना<br />
हारें तो कहें'समय का फेर'<br />
समझाया था क्यों करते हो<br />
पचास का आयोजन<br />
जब है बीस का भोजन<br />
क्रिकेट कोई दाल होता तो<br />
पानी मिलाकर चला लेते<br />
कुछ खा लेते तो<br />
बाकी भूखे रह जाते माला फेर<br />
बीस ओवर के खेल पर<br />
बहुत खुश हुए थे कि<br />
दुनिया में जीते अपने शेर<br />
पचास ओवर के खेल में<br />
कंगारुओं की फुर्ती से हुए ढ़ेर</p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
लोग पूछ रहें हैं<br />
'वह मधुर सपना था या<br />
खडा है सामने यह कटु सत्य'<br />
दिन भर पूछने लगे हैं फिर स्कोर<br />
चर्चा करते हैं क्रिकेट की<br />
सांझ हो या भोर<br />
चौबीस साल पुरानी कहानी<br />
फिर सामने आ रही है<br />
जब विश्व विजेता हुए थे<br />
इसी तरह ढ़ेर<br />
अब इस कहानी पर<br />
अगले चौबीस महीने तक भी<br />
नहीं चलेगा खेल<br />
काठ की हांडी बार-बार नहीं चढती<br />
छोटी जीत पर बड़ी हर नहीं फबती<br />
बीस का नोट पचास में नहीं चलेगा<br />
कितना भी नया हो बीस का ही रहेगा<br />
पोल खुल जायेगी देर-सबेर</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:मन तो पंछी है ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2007/10/05/%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a5%80%e0%a4%ae%e0%a4%a8-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9b%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%88/</link>
<pubDate>Fri, 05 Oct 2007 02:25:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[मनुवां तो पंछी भया, उडिके चला अकास
ऊपर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>मनुवां तो पंछी भया, उडिके चला अकास<br />
ऊपर ही ते गिरि पडा, मन माया के पास</strong></p>
<p>संत कबीर दास कहते हैं कि मन पक्षी के रूप में भावना रूपी आकाश में ऊंची उड़ान पर चल पड़ता है। लकिन जैसे ही उसे माया का दृश्य नीचे के ओर दिखता है वह ऊपर से नीचे की तरह आकर गिर पड़ता है।<br />
इसका आशय यह है कि हमारा मन हमेशा हमें भटकाता रहता है और हम कभी इधर तो कभी उधर धन, पद और सम्मान पाने के लिए भटकते हैं। यहाँ नहीं तो वहाँ मिलेगा पर जब लगता है कि जहां हम थे वहीं हमे सब कुछ मिलेगा तो भाग कर फिर लौट आते हैं। </p>
<p><strong>मन चलताँ तन भी चलै, ताते मन को घेर<br />
तन मन दोऊ बसि कराइ, होय राईं सुमेर</strong></p>
<p>मन से ही हमारा तन प्रभावित होकर चलता है। जब मन किसी विषय से आकर्षित होता है तो अपनी शरीर को उसी तरफ ले जाते हैं। इसलिये मन को सदैव अपने वश में रखना चाहिए। यदि तन और मन को वश में कर लिया जाये तो इस थोड़े से प्रयास से हम सुमेरु पर्वत के समान लाभ पा सकते हैं। </p>
]]></content:encoded>
</item>

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