जानि अनीती जे करैं, जागत ही रह सोई। ताहि सिखाई जगाईबो, उचित न होई ॥ अर्थ-समझ-बूझकर भी जो व्यक्ति अन्याय करता है वह तो जागते हुए भी सोता है, ऐसे व्यक्ति को जाग्रत रहने के शिक्षा देना भी उचित नहीं है।… more →
****दीपकबापू कहिन**** ****Deepak Bharatdeep's hindi patrika****दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: रहिमन जिह्म बावरी, कही गइ सरग पाताल आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल कविवर रहीम कहते हैं कि इस मन … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: यों रहीम गति बडेन की ज्यों तुरंग व्यवहार दाग दिवावत आपु तन, सही होत असवार कविवर रहीम कहते हैं की घो … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: बिपति भए धन न रहे, रहे जो लाख करोड़ नभ तारे छिपि जात है, ज्यों रहीम भए भोर कवि रहीम कहते हैं, जैसे … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: जानि अनीती जे करैं, जागत ही रह सोई। ताहि सिखाई जगाईबो, उचित न होई ॥ अर्थ-समझ-बूझकर भी जो व्यक्ति अ … more →