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	<title>bhrashtachar &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "bhrashtachar"</description>
	<pubDate>Sat, 25 May 2013 16:57:47 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[मास्टर, डॉक्टर और  पुलिस - भ्रष्टाचार के तीन स्त्रोत]]></title>
<link>http://swaarth.wordpress.com/2011/09/05/teacherdoctorpolice/</link>
<pubDate>Mon, 05 Sep 2011 14:44:17 +0000</pubDate>
<dc:creator>स्वार्थ</dc:creator>
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<description><![CDATA[वह एक पुलिस का सिपाही है जो तलाश रहा है एक सभ्य नागरिक जिसकी ज़ेब से निकलवा सके वह आखिरी नोट। और वह ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[वह एक पुलिस का सिपाही है जो तलाश रहा है एक सभ्य नागरिक जिसकी ज़ेब से निकलवा सके वह आखिरी नोट। और वह ज]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[अन्ना आये हैं दिया जलाने]]></title>
<link>http://swaarth.wordpress.com/2011/04/07/annaayehaindiyajalane/</link>
<pubDate>Thu, 07 Apr 2011 13:42:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>स्वार्थ</dc:creator>
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<description><![CDATA[ईमानदारी दर-ब-दर है इस दौर में ईमानदारी मौत की डगर है इस दौर में ईमानदारी फाकों का सफर है इस दौर में]]></description>
<content:encoded><![CDATA[ईमानदारी दर-ब-दर है इस दौर में ईमानदारी मौत की डगर है इस दौर में ईमानदारी फाकों का सफर है इस दौर में]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[ईमानभक्षी खटमल]]></title>
<link>http://swaarth.wordpress.com/2011/02/28/khatmal/</link>
<pubDate>Mon, 28 Feb 2011 18:20:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>स्वार्थ</dc:creator>
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<description><![CDATA[जीवन का कुछ पता नहीं चलता कि यह किस करवट सोयेगा और कैसी अंगड़ाई लेकर जागेगा। लोगों को बात का पता भी न]]></description>
<content:encoded><![CDATA[जीवन का कुछ पता नहीं चलता कि यह किस करवट सोयेगा और कैसी अंगड़ाई लेकर जागेगा। लोगों को बात का पता भी न]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[बाबा रामदेव समाज में चेतना लाये बिना सफल नहीं हो सकते-हिन्दी लेख (baba ramdev,bharshtachar aur samajik chetna-hindi lekh]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2011/02/24/baba-ramdev-aur-samaj-kee-chetna-hindi-article/</link>
<pubDate>Thu, 24 Feb 2011 15:20:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[भ्रष्टाचार के विरुद्ध स्वामी रामदेव का अभियान अब देश में चर्चा का विषय बन चुका है। बाबा रामदेव अब खु]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div dir="ltr" style="text-align:left;">
<div style="text-align:justify;">
</div>
<div style="text-align:justify;">
भ्रष्टाचार के विरुद्ध स्वामी रामदेव का अभियान अब देश में चर्चा का विषय बन चुका है। बाबा रामदेव अब खुलकर अपने योग मंच का उपयोग भ्रष्टाचार तथा काले धन के विरुद्ध शब्द योद्धा की तरह कर रहे हैं। हम यह भी देख रहे हैं कि देश की हर समस्या की जड़ में भ्रष्टाचार को जानने वाले जागरुक लोग बाबा रामदेव की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। कुछ लोगों को तसल्ली हो गयी है कि अब कोई नया अवतार उनके उद्धार के लिये आ गया है। हम यहां बाबा रामदेव की अभियान पर कोई विपरीत टिप्पणी नहीं कर रहे क्योंकि यह अब एक राजनीतिक विषय बन चुका है और वह अपना राजनीतिक दल बनाने की घोषणा भी कर चुके हैं। हां, यह सवाल पूछ रहे हैं कि अगर देश की दुर्दशा के लिये भ्रष्टाचार जिम्मेदार हैं तो फिर भ्रष्टाचार के लिये कौन जिम्मेदार हैं? क्या इसकी पहचान कर ली गयी है?</div>
<div style="text-align:justify;">
एक बात यहां हम बता दें कि यह लेखक निजी रूप से बाबा रामदेव को नहीं जानता पर टीवी पर उनकी योग शिक्षा की सराहना करता है और उनके वक्तव्यों को समझने का प्रयास भी करता है। दूसरी बात यह भी बता दें कि श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों का अध्ययन भी किया है और उनके परिप्रेक्ष्य में बाबा की सभी प्रकार की गतिविधियों को देखने का प्रयास यह लेखक करता है। बाबा रामदेव अब आक्रामक ढंग से राष्ट्रधर्म के निर्वाह के लिये तत्पर दिखते हैं, यह अच्छी बात है पर एक बात यह भी समझना चाहिए कि राजनीतिक क्रांतियां तो विश्व के अनेक देशों में समय समय पर होती रही हैं पर वहां के समाजों को इसका क्या परिणाम मिला इसकी व्यापक चर्चा कोई नहंी करता। इसका कारण यह है कि राष्ट्रधर्म निर्वाह करने वाले लोग अपने देश की समस्याओं का मूल रूप नहीं समझतें।</div>
<div style="text-align:justify;">
भारत में भ्रष्टाचार समस्या नहीं बल्कि अनेक प्रकार की सामाजिक, धार्मिक तथा पारिवारिक रूढ़िवादी परंपराओं की वजह से आम आदमी में दूसरे से अधिक धन कमाकर खर्च कर समाज में सम्मान पाने की इच्छा का परिणाम है।</div>
<div style="text-align:justify;">
बाबा रामदेव बाबा समाज के शिखर पुरुषों को ही इसके लिये जिम्मेदार मानते हैं पर सच यह है कि इस देश में ईमानदार वही है जिसे बेईमान होने का अवसर नहीं मिलता।</div>
<div style="text-align:justify;">
भारत का अध्यात्मिक ज्ञान विश्व में शायद इसलिये ही सर्वश्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि सर्वाधिक मूढ़ता यही पाई जाती है जिसे हम भोलेपन और सादगी कहकर आत्ममुग्ध भी हो सकते हैं। हमारे ऋषियों, मुनियों और तपस्वियों ने समाज के इसी चरित्र की कमियों को देखते हुए सत्य की खोज करते हुए तत्वज्ञान का सृजन किया। शादी, गमी, जन्मदिन और अन्य तरह के सामूहिक कार्यक्रमों में खर्च करते हुए सामान्य लोग फूले नहीं समाते। लोगों को यही नहीं मालुम कि अच्छा क्या है और बुरा क्या है? भ्रष्टाचार को समाज ने एक तरह से शिष्टाचार मान लिया है? क्या आपने कभी सुना है कि किसी रिश्वत लेने वाले अधिकारी याद कर्मचारी को उसके मित्र या परिचित सामने रिश्वतखोर कहने का साहस कर पाते हैं। इतना ही नहीं सभी जानते हैं कि अमुक आदमी रिश्वत लेता है पर उसकी दावतों में लोग खुशी से जाते हैं। समाज में चेतना नाम की भी नहीं है। इसका सीधा मतलब यह कि समाज स्वयं कुछ नहीं करता बल्कि किसी के रिश्वत में पकड़े जाने पर वाह वाह करता है। उसकी जमकर सामूहिक निंदा होती है और इसमें वह लोग भी शामिल होते हैं जो बेईमान हैं पर पकड़े नहीं गये। आज यह स्थिति यह है कि जो पकड़ा गया वही चोर है वरना तो सभी ईमानदार हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">
आखिर यह भ्रष्टाचार पनपा कैसे? आप यकीन नहीं करेंगे कि अगर देश के सभी बड़े शहरों में अतिक्रमण विरोधी अभियान चल जाये तो पता लगेगा कि वहां चमकती हुए अनेक इमारतें ही खंडहर बन जायेंगी। नई नई कालोनियों में शायद ही कोई ऐसा मकान मिले जो अतिक्रमण न मिले। सभी लोग अपने सामर्थ्य अनुसार भूखंड लेते हैं पर जब मकान बनता है तो इस प्रयास में लग जाते हैं कि उसका विस्तार कैसे हो। पहली मंजिल पर अपनी छत बाहर इस उद्देश्य से निकाल देते हैं कि ऊपर अच्छी जगह मिल जायेगी। बड़े बड़े भूखंड है पर चार पांच फुट उनको अधिक चाहिये वह भी मुफ्त में। यह मुफ्त का मोह कालांतर में भ्रष्टाचार का कारण बनता है। जितना भूखंड है उसमें अगर चैन से रहा जाये तो भी बहुत उन लोगों के लिये बड़ा है पर मन है कि मानता नहीं।</div>
<div style="text-align:justify;">
विवाह नाम की परंपरा तो भ्रष्टाचार का एक बहुत बड़ा कारण है। बेटे को दुधारु बैल समझकर ं हर परिवार चाहता है कि उसके लिये अच्छा दहेज मिले। लड़की को बेचारी गऊ मानकर उसे धन देकर घर से धकेला जाता है। शादी के अवसर पर शराब आदि का सेवन अब परंपरा बन गयी है। स्थिति यह है कि अधिक से अधिक दिखावा करना, पाखंड करते हुंए धार्मिक कार्यक्रम करना और दूसरों से अधिक धनी दिखने के मोह ने पूरे समाज को अंधा कर दिया है। बाबा रामदेव ने स्वयं ही एक बार बताया था कि जब तक मुफ्त में योग सिखाते थे तब कम संख्या में लोग आते थे। जब धन लेना शुरु किया तो उनके शिष्य और लोकप्रियता दोनों ही गुणात्मक रूप से बढ़े। सीधी सी बात है कि समाज पैसा खर्च करने और कमाने वाले पर ही विश्वास करता है। अज्ञान में भटकते इस समाज को संभालने का काम संत इतिहास में करते रहे हैं पर आज तो पंच सितारे आश्रमों में प्रवचन और दीक्षा का कार्यक्रम होता है। आज भी कोई ऐसा प्रसिद्ध संत कोई बता दे जो कबीर दास और रविदास की तरह फक्कड़ हो तो मान जायें। हम यहां बाबा रामदेव की संपत्ति का मामला नहीं उठाना चाहते पर पतंजलि योग पीठ की भव्यता उनसे जुड़े लोगों की वजह से है यह तो वह भी मानते हैं। हम यहां स्पष्ट करना चाहेंगे कि पतंजलि योग पीठ की भव्य इमारत वह नहीं बनाते तो भी उनका सम्मान आम आदमी में कम नहीं होता। जिस तरह धन आने पर उन्होंने भव्य आश्रम बनाया वैसे ही देश के दूसरी धनी भी यही करते हैं। वह सड़क पर फुटपाथ पर कब्जा कर लेते हैं। फिर उससे ऊपर आगे अपनी इमारत ले जाकर सड़के के मध्य तक पहुंच जाते हैं। धन आने पर अनेक लोगों की मति इतनी भ्रष्ट हो जाती है कि उनको पता ही नहीं चलता कि अतिक्रमण होता क्या है? जमीन से ऊपर उठे तो उनको लगता है कि आकाश तो भगवान की देन है।</div>
<div style="text-align:justify;">
मुख्य बात यह है कि अंततः धन माया का रूप है जो अपना खेल दिखाती है। इसके लिये जरूरी था कि धार्मिक संत सामाजिक चेतना का रथ निरंतर चलाते रहें पर हुआ यह कि संतों के चोले व्यापारियों ने पहन लिये और अपने महलों और होटलों को आश्रम का नाम दे दिया। बाबा रामदेव पर अधिक टिप्पणियां करने का हमारा इरादा नहीं है पर यह बता दें कि जब तक समाज में चेतना नहीं होगी तब भ्रष्टाचार नहीं मिट सकता। एक जायेगा दूसरा आयेगा। मायावी लोगों का समूह ताकतवर है और उसे अपना व्यापार चलाने और बढ़ाने के लिये बाबा रामदेव को भी मुखौटा बनाने में झिझक नहीं होगी। अगर समाज स्वयं जागरुक नहीं है तो फिर कोई भी प्रयास सफल नहीं हो सकता। यह तभी संभव है कि योग शिक्षा के साथ अध्यात्मिक ज्ञान भी हो। बाबा रामदेव जब अपने विषय में की गयी प्रतिकूल टिप्पणियों को उत्तेजित होकर बयान दे रहे थे तब वह एक तत्वज्ञानी योगी नहीं लगे। उनके चेहरे पर जो भाव थे वह उनके मन की असहजता को प्रदर्शित कर रहे थे। हम यह नहीं कहते कि उत्तेजित होना अज्ञान का प्रमाण है पर कम से उनका स्थिरप्रज्ञ न होना तो दिखता ही है। वह केवल शिखर पुरुषों को कोसते हैं और समाज में व्याप्त मूढ़तापूर्ण स्थिति पर कुछ नहीं कहते। ऐसे में उनसे यह अपेक्षा भी की जा सकती है कि वह समाज को अपने अंदर की व्यवस्था के बारे में मार्गदर्शन दें।</div>
<div style="text-align:justify;">
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</div>
<div>
<b>लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior</b><br />
<b><a href="http://dpkraj.blogspot.com" rel="nofollow">http://dpkraj.blogspot.com</a></b></p>
<blockquote><p>
<b>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</item>
<item>
<title><![CDATA[तबादला]]></title>
<link>http://swaarth.wordpress.com/2011/02/09/tabadala/</link>
<pubDate>Wed, 09 Feb 2011 07:29:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>स्वार्थ</dc:creator>
<guid>http://swaarth.wordpress.com/2011/02/09/tabadala/</guid>
<description><![CDATA[चार दिन गायब रहने के बाद हरेंद्र हॉस्टल वापस आया तो बहुत खुश था। अपने कमरे में जाकर सामान रखने के बा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[चार दिन गायब रहने के बाद हरेंद्र हॉस्टल वापस आया तो बहुत खुश था। अपने कमरे में जाकर सामान रखने के बा]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दशहराःरावण के नये रूप महंगाई, भ्रष्टाचार, और बेईमानी से लड़ना आवश्यक-हिन्दी लेख (ravan ke naye roop-hindi lekh]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2010/10/17/mahagai-bhrashtachar-beimani-bhee-ravan-ke-roop-hindi-article/</link>
<pubDate>Sun, 17 Oct 2010 09:14:49 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2010/10/17/mahagai-bhrashtachar-beimani-bhee-ravan-ke-roop-hindi-article/</guid>
<description><![CDATA[आज पूरे देश में त्रेतायुग में श्री राम की रावण पर युद्ध के समय हुई विजय के रूप में मनाये जाने वाले द]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div style="text-align:justify;">
आज पूरे देश में त्रेतायुग  में श्री राम की रावण पर युद्ध के समय हुई  विजय के रूप में मनाये जाने वाले दशहरा पर्व की धूम मची हुई है।  एक दिन के लिये खुशी से मनाये जाने वाले इस पर्व के मायने बहुत हैं यह अलग बात है कि लोग इसे समझना नहीं चाहते। दरअसल भगवान श्री राम और रावण दो ऐसे व्यक्तित्व थे जो अपने समय में सर्वाधिक शक्तिशाली और पराक्रमी माने जाते थे पर इसके बावजूद भगवान श्रीराम को अच्छाई तथा रावण को बुराई का प्रतीक माना जाता है।  रावण के बारे तो कहा जाता है कि उसमें विद्वता कूट कूट कर भरी हुई थी। जहां तक उसकी धार्मिक प्रवृत्ति का सवाल है तो उसने भगवान शिव की तपस्या कर ही अमरत्व का वरदान प्राप्त किया था। इसका मतलब यह है कि कम से कम वह भगवान शिव का महान भक्त था और वह उसके आराध्य देव थे जिनको आज भी भारतीय समाज बहुत मानता है। आखिर रावण में क्या दुर्गुण थे इस पर अवश्य विचार करना चाहिये क्योंकि कहीं न कहीं हम उनकी समाज में उपस्थिति देखते हैं और तब अनेक लोग रावण तुल्य लगते हैं। </div>
<div style="text-align:justify;">
अमरत्व के वरदान ने रावण के मन में अहंकार का भाव स्थापित कर दिया  था। वह अपने अलावा अन्य सभी पूजा पद्धतियों का विरोधी था।  उसे लगता था कि केवल तपस्या के अलावा अन्य सब पूजा पद्धतियां  व्यर्थ है और वह यज्ञ और हवन का विरोधी था। दूसरा वह यह भी कि वह नहीं चाहता था कोई दूसरा तप या स्वाध्याय कर उस जैसा शक्तिशाली हो जाये।  इसलिये ही उसने वनों में रहने वाले ऋषियों, मुनियों तथा तपस्वियों के साथ उस समय के अनेक समृद्ध राजाओं को भी सताया था।  देवराज इंद्र तक उससे आतंकित थे।  वह यज्ञ और हवन करने वाले स्थानों पर उत्पात मचाने के लिये अपने अनुचर नियुक्त करता  था जिनमें सुबाहु और मारीचि के साथ भगवान श्रीराम की मुठभेड़ ऋषि विश्वमित्र के आश्रम पर हुई थी।  दरअसल यहीं से ही भगवान श्रीराम की शक्ति का परिचय तत्कालीन रावण विरोधी रणनीतिकारों को मिला जिससे वह भगवान श्री राम का रावण से युद्ध कराने के लिये जुट गये तो साथ ही रावण को भी यह संदेश गया कि अब उसका पतन सन्निकट है।  जो लोग सीताहरण को ही भगवान श्रीराम और रावण का कारण मानते हैं वह अन्य घटनाओं पर विचार नहंीं करते।  रावण ने श्रीसीता का हरण केवल भगवान श्रीराम को अपने राज्य में लाकर उनको मारने के लिये किया था।  सूपर्णखा का नाक कान कटना भी भगवान श्रीराम के द्वारा रावण को चुनौती भेजने जैसा ही था। </div>
<div style="text-align:justify;">
एक भारतीय उपन्यासकार कैकयी को खलनायिका मानने की बजाय तत्कालीन कुशल  रणनीतिकारों में एक मानते हैं।  इसका कारण यह है कि वह स्वयं एक युद्ध विशारद होने के साथ ही कुशल सारथी थी।  उसे एक युद्ध में राजा दशरथ के घायल होने पर उनका रथ स्वयं दूर ले जाकर उनको बचाया था जिसके एवज में तीन वरदान देने का वादा पति से प्राप्त किया जो अंततः भगवान श्रीराम के वनवास तथा भरत का राज्य मांगने के रूप में प्रकट हुए।   रावण के समय में देवराज इंद्र उसके पतन के लिये बहुत उत्सुक थे।  कैकयी को राम के वनवास के लिये उकसाने वाली मंथरा भी शायद इसलिये अयोध्या आयी थी।  संभवत उसे देवताओं ने ही कैकयी को भड़काने या संदेश देने के लिये भेजा था जबकि प्रकटतः  बताया जाता है कि सरस्वती देवी ने मंथरा की बुद्धि हर ली थी। कहा जाता है कि श्रीराम कके वनवास के बाद मंथरा फिर अयोध्या में नहीं दिखी जो इस बात का प्रमाण है कि वह केवल इसी काम के लिये आयी थी और कहीं न कहीं उस समय के धार्मिक रणनीतिकारों के दूत या गुप्तचर के रूप में उसने काम किया था। कैकयी स्वयं एक युद्ध और रणनीतिकविशारद थी इसलिये जानती थी कि ऋषि विश्वमित्र के आश्रम पर सुबाहु के वध और मारीचि के भाग जाने के परिणाम से रावण नाखुश होगा और वह भगवान श्रीराम से कभी न कभी लड़ेगा।  ऐसे में अयोध्या में संकट न आये और भगवान श्रीराम सामर्थ्यवान होने के कारण राजधानी से दूर जाकर उसका वध करें इसी प्रयोजन से उसने भगवान श्रीराम को वन भेजने का वर मांगा होगा।  रावण के विद्वान और आदर्शवादी होने की बात कैकयी जानती होंगी पर उनको यह अंदाज बिल्कुल नहीं रहा होगा कि वह श्रीसीता का हरण जैसा जघन्य कार्य करेगा।  जब कैकयी भगवान श्री राम को वनवास का संदेश दे रही थीं तब वह मुस्करा रहे थे।  इससे ऐसा लगता है वह सारी बातें समझ गये थे।  इतना ही नहीं भगवान श्रीराम ने हमेशा ही अपने भाईयों को कैकयी का सम्मान करने का आदेश दिया जो इस बात को समझते थे कि वह अयोध्या के हितार्थ एक रणनीति के तहत स्वयं काम रही हैं या उनको प्रेरित किया जा रहा है। जब कैकयी ने भगवान श्रीराम और श्री लक्ष्मण के साथ श्रीसीता को भी वल्कल वस्त्र पहनने को लिये दिये तब वहां उपस्थिति पूरा जनसमुदाय हाहाकार कर उठा। दशरथ गुस्से में आ गये पर कैकयी का दिल नहीं पसीजा।  इस घटना से पूर्व तक कैकयी को एक सहृदय महिला माना जाता था। उसकी क्रूरता का एक भी उदाहरण नहीं मिलता। तब यकायक क्या हो गया? कैकयी क समर्थन करने वाले यह भी सवाल उठाते हैं कि उसने 14 वर्ष की बजाय जीवन भर का वनवास क्यों नहीं मांगा क्योंकि भगवान श्रीराम 14 वर्ष बाद तो और अधिक  बलशाली होने वाले थे। वनवास जाते समय तो नवयुवक थे और बाद में भी उनके बाहुबल और पराक्रम के साथ ही अनुभव में वृद्धि की संभावना थी।  ऐसे में कैकयी जैसी बुद्धिमान महिला यह सोच भी नहीं सकती थी कि 14 वर्ष बाद राम अयोध्या का राज्य पुनः प्राप्त करने लायक नहीं रहेंगें। </div>
<div style="text-align:justify;">
कैकयी जानती थी कि देवता, ऋषि गण, तथा मुनि लोग भगवान श्रीराम और रावण के बीच युद्ध की संभावनाऐं ढूंढ रहे हैं।  उन सभी के रणनीतिकार रावण के पतन के लिये भगवान श्रीराम की तरफ आंख लगाये बैठे हैं।  ऐसे में भगवान श्रीराम अगर अयोध्या में राज सिंहासन पर बैठेंगे तो चैन से नहीं रह पायेंगे और इससे प्रजा पर भी कष्ट आयेगा। फिर रावण वध उस समय के सभी राजाओं की सबसे बड़ी प्राथमिकता थी और प्रमुख होने के कारण अयोध्या पर ही इसका दारोमदार था। </div>
<div style="text-align:justify;">
जब वनवास में भगवान श्री राम अपने भ्राता लक्ष्मण और सीता के साथ अगस्त्य ऋषि के आश्रम पर आये तो देवराज इंद्र उनको देखकर चले गये जो संभावित राम रावण युद्ध पर ही विचार करने वहां आये थे। वहीं अगस्त्य ऋषि ने उनको अलौकिक धनुष दिया जिससे रावण का वध हुआ। </div>
<div style="text-align:justify;">
अपने यज्ञ की रक्षा करने के लिये जब ऋषि विश्वमित्र भगवान श्रीराम का हाथ मांगने दशरथ की दरबार में पहुंचे तो उनका पिता हृदय सौंपने को तैयार नहीं हुआ। तब गुरु वशिष्ठ ने उनको समझाया तब कहीं दशरथ ने भगवान श्रीराम को ऋषि विश्व मित्र के साथ भेजा।  यहां यह भी याद रखना चाहिए कि गुरु वशिष्ट ने विश्वमित्र ने अपनी पुरानी शत्रुता को इसलिये भुला दिया था क्योंकि उस समय समाज में रावण का संकट विद्यमान था जिसका निवारण आवश्यक था। इस तरह भगवान शिव की तपस्या से अवध्य हो चुके रावण की भूमिका तैयार हुई थी।  </div>
<div style="text-align:justify;">
इससे एक संदेश मिलता है कि राज्य और समाज के उत्थान और रक्षा के लिये दूरगामी अभियान बनाने पड़ते हैं जिनके परिणाम में बरसो लग जाते हैं।  केवल नारों और धर्म की रक्षा के लिये हिंसक संघर्ष का भाव रखने से काम नहीं चलता।  दूसरी बात यह भी कि ऋषि विश्वमित्र, अगस्त्य, वशिष्ठ, भारद्वाज मुनि तथा अन्य अपने तपबल से रावण का अस्त्र शस्त्रों के साथ ही शाप देकर भी  संहार करने में समर्थ थे पर तपस्या के कारण अहिंसक प्रवृत्ति के चलते उन्होंने ऐसा नहीं किया।  उनको रावण वध या पतन से मिलने वाली प्रतिष्ठा का लोभ नहीं था और  उन्होंने उस समय के महान धनुर्धर भगवान श्रीराम को इस कार्य के लिये चुनकर समाज के लिये एक आदर्श के रूप में प्रतिष्ठत करने का रावण वध के साथ ही दूसरा  अभियान प्रारंभ कर उसे पूरा किया जिसमें उस समय के देवराज इंद्र जैसे समृद्ध और पराक्रमी पुरुषों का भी सहयोग मिला।  सीधी बात यह है कि ऐसे अभियानों के लिये नेता के रूप में एक शीर्षक मिल जाता है पर आवश्यक यह है कि उसके लिये सामूहिक प्रयास हों। </div>
<div style="text-align:justify;">
दशहरे पर रावण का पुतला जलाना अब कोई खुशी की बात नहीं रही।   भ्रष्टाचार, बेईमानी, मिलावट, तथा महंगाई के रूप में यह रावण अब अनेक सिर लेकर विचर रहा है। इनसे लड़ने के लिये हर भारतीय में विवेक, संतोष, तथा सहकारिता के भाव का होना जरूरी है। अब बुद्धि को धनुष, विचार को तीर तथा संकल्प को गदा की तरह साथ रखना होगा तभी अब अदृश्य रूप से विचर रहे रावण के रूपों का संहार किया जा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;">
इस दशहरे के अवसर इसी पाठ के साथ इस ब्लाग लेखक के मित्र ब्लाग लेखकों तथा पाठकों इस पर्व की ढेर सारी बधाई। उनका भविष्य मंगलमय हो यही हमारी कामना है।</div>
<div style="text-align:justify;">
&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</div>
<p><b>लेखक संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’, ग्वालियर, मध्यप्रदेश<br />
writer and editor-Deepak Raj Kukreja &#8220;Bharatdeep&#8221;,Gwalior, madhyapradesh</p>
<p><a href="http://dpkraj.blogspot.com" rel="nofollow">http://dpkraj.blogspot.com</a></b></p>
<p><b>यह आलेख/हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग <a href="http://teradipak.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’</a>पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।<br />
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<title><![CDATA[मैत्रीपूर्ण संघर्ष-हिन्दी हास्य व्यंग्य (friendly fighting-hindi comic satire article)]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/2010/08/29/maitripoorn-sangharsh-hindi-hasya-vyangya/</link>
<pubDate>Sun, 29 Aug 2010 08:59:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[दृश्यव्य एवं श्रव्य प्रचार माध्यमों के सीधे प्रसारणों पर कोई हास्य व्यंगात्मक चित्रांकन किया गया-अक्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div style="text-align:justify;">
दृश्यव्य एवं श्रव्य प्रचार माध्यमों के सीधे प्रसारणों पर कोई हास्य व्यंगात्मक चित्रांकन  किया गया-अक्सर टीवी चैनल हादसों रोमांचों  का सीधा प्रसारण करते हैं जिन पर बनी इस फिल्म का नाम शायद&#8230;&#8230;&#8230;&#8230; लाईव है। यह फिल्म न देखी है न इरादा है। इसकी कहानी कहीं पढ़ी।  इस पर हम भी अनेक हास्य कवितायें और व्यंगय लिख चुके हैं।  हमने तो ‘टूट रही खबर’ पर भी बहुत लिखा है संभव है कोई उन पाठों को लेकर कोई काल्पनिक कहानी लिख कर फिल्म बना ले। </div>
<div style="text-align:justify;">
उस दिन हमारे एक मित्र कह रहे थे कि ‘यार, देश में इतना भ्रष्टाचार है उस पर कुछ जोरदार लिखो।’</div>
<div style="text-align:justify;">
हमने कहा-‘हम लिखते हैं तुम पढ़ोगे कहां? इंटरनेट पर तुम जाते नहीं और जिन प्रकाशनों के काग़जों पर सुबह तुम आंखें गढ़ा कर पूरा दिन खराब करने की तैयारी करते हो वह हमें घास भी नहीं डालते।’</div>
<div style="text-align:justify;">
उसने कहा-‘हां, यह तो है! तुम कुछ जोरदार लिखो तो वह घास जरूर डालेेंगे।’</div>
<div style="text-align:justify;">
हमने कहा-‘अब जोरदार कैसे लिखें! यह भी बता दो। जो छप जाये वही जोरदार हो जाता है जो न छपे वह वैसे ही कूंड़ा है।’</div>
<div style="text-align:justify;">
तब उसने कहा-‘नहीं, यह तो नहीं कह सकता कि तुम कूड़ा लिखते हो, अलबत्ता तुम्हें अपनी रचनाओं को मैनेज नहीं करना आता होगा। वरना यह सभी तो तुम्हारी रचनाओं के पीछे पड़ जायें और तुम्हारे हर बयान पर अपनी कृपादृष्टि डालें।’</div>
<div style="text-align:justify;">
यह मैनेज करना एक बहुत बड़ी समस्या है।  फिर क्या मैनेज करें! यह भी समझ में नहीं आता!  अगर कोई संत या फिल्मी नायक होते या समाज सेवक के रूप में ख्याति मिली होती तो यकीनन हमारा लिखा भी लोग पढ़ते।  यह अलग बात है कि वह सब लिखवाने के लिये या तो चेले रखने पड़ते या फिर किराये पर लोग बुलाने पड़ते।  कुछ लोग फिल्मी गीतकारों के लिये यह बात भी कहते हैं कि उनमें से अधिकतर केवल नाम के लिये हैं वरना गाने तो वह अपने किराये के लोगों से ही लिखवाते रहे हैं।  पता नहंी इसमें कितना सच है या झूठ, इतना तय है कि लिखना और सामाजिक सक्रियता एक साथ रखना कठिन काम है।  सामाजिक सक्रियता से ही संबंध बनते हैं जिससे पद और प्रचार मिलता है और ऐसे में रचनाऐं और बयान स्वयं ही अमरत्व पाते जाते है। </div>
<div style="text-align:justify;">
अगर आजकल हम दृष्टिपात करें तो यह पता लगता है कि प्रचार माध्यमों ने धार्मिक, आर्थिक और सामाजिक शिखरों पर विराजमान प्रतिमाओं का चयन कर रखा है जिनको समय समय पर वह सीधे प्रसारण या टूट रही खबर में दिखा देते हैं। </div>
<div style="text-align:justify;">
एक संत है जो लोक संत माने जाते हैं।  वैसे तो उनको संत भी प्रचार माध्यमों ने ही बनाया है पर आजकल उनकी वक्रदृष्टि का शिकार हो गये हैं।  कभी अपने प्रवचनों में ही विदेशी महिला से ‘आई लव यू कहला देते हैं’, तो कभी प्रसाद बांटते हुए भी आगंतुकों से लड़ पड़ते हैं।  उन पर ही अपने आश्रम में बच्चों की बलि देने का आरोप भी इन प्रचार माध्यमों ने लगाये।  जिस ढंग से संत ने प्रतिकार किया है उससे लगता है कि कम से कम इस आरोप में सच्चाई नहंी है।  अलबत्ता कभी किन्नरों की तरह नाचकर तो कभी अनर्गल बयान देकर प्रचार माध्यमों को उस समय सामग्री देतेे हैं जब वह किसी सनसनीखेज रोमांच के लिये तरसते हैं।  तब संदेह होता है कि कहीं यह प्रसारण प्रचार माध्यमों और उन संत की दोस्ताना जंग का प्रमाण तो नहीं है। </div>
<div style="text-align:justify;">
एक तो बड़ी धार्मिक संस्था है।  वह आये दिन अपनी विचारधारा से जुड़े लोगों के लिये अनर्गल फतवे जारी करती है।  सच तो यह है कि इस देश में कोई एक व्यक्ति, समूह या संस्था ऐसी नहंी है जिसका यह दावा स्वीकार किया जाये कि वह अपने धर्म की अकेले मालिक है मगर उस संस्था का प्रचार यही संचार माध्यम इस तरह करते हैं कि उस धर्म के आम लोग कोई भेड़ या बकरी हैं और उस संस्था के फतवे पर चलना उसकी मज़बूरी है।  वह संस्था अपने धर्म से जुड़े आम इंसान  के लिये कोई रोटी, कपड़े या मकान का इंतजाम नहंी करती और उत्तर प्रदेश के एक क्षेत्र तक ही उसका काम सीमित है पर दावा यह है कि सारे देश में उसकी चलती है।  उसके उस दावे को प्रचार माध्यम हवा देते हैं।  उसके फतवों पर बहस होती है! वहां से दो तीन तयशुदा विद्वान आते हैं और अपनी धार्मिक पुस्तक का हवाला देकर चले जाते हैं।  जब हम फतवों और चर्चाओं का अध्ययन करते हैं तो संदेह होता है कि कहीं यह दोस्ताना जंग तो नहीं है। </div>
<div style="text-align:justify;">
एक स्वर्गीय शिखर पुरुष का बेटा प्रतिदिन कोई न कोई हरकत करता है और प्रचार माध्यम उसे उठाये फिरते हैं।   वह है क्या? कोई अभिनेता, लेखक, चित्रकार या व्यवसायी! नहीं, वह तो कुछ भी नहीं है सिवाय अपने पिता की दौलत और घर के मालिक होने के सिवाय।’ शायद वह देश का पहला ऐसा हीरो है जिसने किसी फिल्म में काम नहीं किया पर रुतवा वैसा ही पा रहा है। </div>
<div style="text-align:justify;">
लब्बोलुआब यह है कि प्रचार माध्यमों के इस तरह के प्रसारणों में हास्य व्यंग्य की बात है तो केवल इसलिये नहीं कि वह  रोमांच का सीधा प्रसारण करते हैं बल्कि वह पूर्वनिर्धारित लगते हैं-ऐसा लगता है कि जैसे उसकी पटकथा पहले लिखी गयी हों  हादसों के तयशुदा होने की बात  कहना कठिन है क्योंकि अपने देश के प्रचार कर्मी आस्ट्रेलिया के उस टीवी पत्रकार की तरह नहीं कर सकते जिसने अपनी खबरों के लिये पांच कत्ल किये-इस बात का पक्का विश्वास है पर रोमांच में उन पर संदेह होता है। </div>
<div style="text-align:justify;">
ऐसे में अपने को लेकर कोई भ्रम नहीं रहता इसलिये लिखते हुए अपने विषय ही अधिक चुनने पर विश्वास करते हैं। रहा भ्रष्टाचार पर लिखने का सवाल!  इस पर क्या लिखें!  इतने सारे किस्से सामने आते हैं पर उनका असर नहीं दिखता!  लोगों की मति ऐसी मर गयी है कि उसके जिंदा होने के आसार अगले कई बरस तक नहीं है।  लोग दूसरे के भ्रष्टाचार पर एकदम उछल जाते हैं पर खुद करते हैं वह दिखाई नहीं देता।  यकीन मानिए जो भ्रष्टाचारी पकड़े गये हैं उनमें से कुछ इतने उच्च पदों पर रहे हैं कि एक दो बार नहीं बल्कि पचास बार स्वाधीनता दिवस, गणतंत्र, गांधी जयंती या नव वर्ष पर उन्होंने कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि की भूमिका का निर्वाह करते हुए ‘भ्रष्टाचार’ को देश की समस्या बताकर उससे मुक्ति की बात कही होगी।  उस समय तालियां भी बजी होंगी।  मगर जब पकड़े गये होंगे तब उनको याद आया होगा कि उनके कारनामे भी भ्रष्टाचार की परिधि में आते है।</div>
<div style="text-align:justify;">
कहने का अभिप्राय यह है कि लोगों को अपनी कथनी और करनी का अंतर सहजता पूर्वक कर लेते हैं। जब कहा जाये तो जवाब मिलता है कि ‘आजकल इस संसार में बेईमानी के बिना काम नहीं चलता।’</div>
<p>जब धर लिये जाते हैं तो सारी हेकड़ी निकल जाती है पर उससे दूसरे सबक लेते हों यह नहीं लगता।  क्योंकि ऊपरी कमाई करने वाले सभी शख्स अधिकार के साथ यह करते हैं और उनको लगता है कि वह तो ‘ईमानदार है’ क्योंकि पकड़े आदमी से कम ही पैसा ले  रहे हैं।’ अलबत्ता प्रचार माध्यमों में ऐसे प्रसारणों के बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि वह दोस्ताना जंग है। यह अलग बात है कि कोई बड़ा मगरमच्छ अपने से छोटे मगरमच्छ को फंसाकर प्रचार माध्यमों के लिये सामग्री तैयार करवाता&#160; हो या जिसको हिस्सा न मिलता हो वह जाल बिछाता हो । वैसे अपने देश में जितने भी आन्दोलन हैं भ्रष्टाचार के विरुद्ध नहीं बल्कि उसके बंटवारे के लिए होते हैं ।<b> इस पर अंत में प्रस्तुत है एक क्षणिका।<br />
एक दिन उन्होंने भ्रष्टाचार पर भाषण दिया<br />
दूसरे दिन रिश्वत लेते पकड़े गये,<br />
तब बोले<br />
‘मैं तो पैसा नहीं ले रहा था,<br />
वह जबरदस्ती दे रहा था,<br />
नोट असली है या नकली<br />
मैं तो पकड़ कर देख रहा था।’</b><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
<b>कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर</p>
<p><a href="http://anant-shabd.blogspot.com" rel="nofollow">http://anant-shabd.blogspot.com</a></b></p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;<br />
<b><a href="http://bharatdeep.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</b></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[खबरदार श्रीमान नेता जी]]></title>
<link>http://swaarth.wordpress.com/2010/06/03/khabardarnetaji/</link>
<pubDate>Thu, 03 Jun 2010 17:46:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>स्वार्थ</dc:creator>
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<description><![CDATA[सुनो नेता जी तुम क्यों एक नंगे बच्चे जैसा व्यवहार करते हो जो अपनी आँखें बंद कर लेता है और सोचता है क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[सुनो नेता जी तुम क्यों एक नंगे बच्चे जैसा व्यवहार करते हो जो अपनी आँखें बंद कर लेता है और सोचता है क]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[भ्रष्टाचार: कुछ अनबुझे सवाल]]></title>
<link>http://swaarth.wordpress.com/2011/09/03/bhrashtacharkuchsawal/</link>
<pubDate>Sat, 03 Sep 2011 04:49:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>स्वार्थ</dc:creator>
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<description><![CDATA[एक किसान होकर मैं पूछता हूँ कि, बीज बोने से लेकर फसल काटने तक किसान, खेत मज़दूर जो जीतोड़ मेहनत करके अ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[एक किसान होकर मैं पूछता हूँ कि, बीज बोने से लेकर फसल काटने तक किसान, खेत मज़दूर जो जीतोड़ मेहनत करके अ]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[अन्ना सोचो तो बताओ तो]]></title>
<link>http://swaarth.wordpress.com/2011/08/26/annasochotobataoto/</link>
<pubDate>Fri, 26 Aug 2011 17:18:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>स्वार्थ</dc:creator>
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<description><![CDATA[मैं जनता हूँ मुझमें और कसाई की भेड़ों में बस इतना ही अंतर है, भाषणों के बाजीगरों द्वारा संवेदना की छु]]></description>
<content:encoded><![CDATA[मैं जनता हूँ मुझमें और कसाई की भेड़ों में बस इतना ही अंतर है, भाषणों के बाजीगरों द्वारा संवेदना की छु]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[कितना ज़रूरी है सह-अस्तित्व पर चलना]]></title>
<link>http://swaarth.wordpress.com/2011/08/25/sahastitvaparchalna/</link>
<pubDate>Thu, 25 Aug 2011 17:54:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>स्वार्थ</dc:creator>
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<description><![CDATA[भ्रष्टाचार भौतिकवाद का लाडला परपोता है जबकि पूंजीवाद इसका बेटा और उपभोक्तावाद भौतिकवाद का पोता है। इ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[भ्रष्टाचार भौतिकवाद का लाडला परपोता है जबकि पूंजीवाद इसका बेटा और उपभोक्तावाद भौतिकवाद का पोता है। इ]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[भ्रष्टाचार और दोहरे चरित्र का द्वन्द]]></title>
<link>http://swaarth.wordpress.com/2011/08/19/bhrashtachardohracharitra/</link>
<pubDate>Fri, 19 Aug 2011 03:18:54 +0000</pubDate>
<dc:creator>स्वार्थ</dc:creator>
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<description><![CDATA[भ्रष्टाचार के विरुद्ध बहती हुयी गंगा में आज हर कोई हाथ धोने के लिए तत्पर है केवल यह दिखाने के लिए कि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[भ्रष्टाचार के विरुद्ध बहती हुयी गंगा में आज हर कोई हाथ धोने के लिए तत्पर है केवल यह दिखाने के लिए कि]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[हम खुद ही न मार डालें कहीं अन्ना को!]]></title>
<link>http://swaarth.wordpress.com/2011/08/17/hamnamardenannako/</link>
<pubDate>Wed, 17 Aug 2011 04:56:29 +0000</pubDate>
<dc:creator>स्वार्थ</dc:creator>
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<description><![CDATA[आजकल हालात के चलते कई बार सोचने पर मजबूर हूँ उस सच के बारे में जिसे सब जानते है पर बोलने को कोई तैया]]></description>
<content:encoded><![CDATA[आजकल हालात के चलते कई बार सोचने पर मजबूर हूँ उस सच के बारे में जिसे सब जानते है पर बोलने को कोई तैया]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[चांद और समंदर-हिन्दी कविता (chand aur samandar-hindi poem)]]></title>
<link>http://deepakbapukahin.wordpress.com/2011/07/03/chandrama-aur-samudra-hindi-kavita/</link>
<pubDate>Sun, 03 Jul 2011 14:10:45 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[चांद पर भी कहीं न कहीं दाग है, समंदर में भी कहीं न कहीं आग है। ऊपर और नीचे होता खेल कुदरत का है इंसा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div dir="ltr" style="text-align:left;">
<div style="background-color:#d9ead3;color:#38761d;text-align:center;">
<b>चांद पर भी कहीं न कहीं दाग है,</b></div>
<div style="background-color:#d9ead3;color:#38761d;text-align:center;">
<b>समंदर में भी कहीं न </b><b>कहीं</b><b> आग है।</b></div>
<div style="background-color:#d9ead3;color:#38761d;text-align:center;">
<b>ऊपर और नीचे होता खेल कुदरत का है</b></div>
<div style="background-color:#d9ead3;color:#38761d;text-align:center;">
<b>इंसान गाता मुख से अपना ही राग है।</b></div>
<div style="background-color:#d9ead3;color:#38761d;text-align:center;">
<b>शिष्टाचार बैठा है  सोने के तख्त पर</b></div>
<div style="background-color:#d9ead3;color:#38761d;text-align:center;">
<b>सजावट में भ्रष्टाचार का पूरा भाग है।</b></div>
<div style="background-color:#d9ead3;color:#38761d;text-align:center;">
<b>कहें दीपक बापू दिखते सभी यहां इंसान</b></div>
<div style="background-color:#d9ead3;color:#38761d;text-align:center;">
<b>पर उनमें भी कोई भेड़िया कोई नाग है।</b></div>
<div style="background-color:#d9ead3;color:#38761d;text-align:center;">
<b>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</b></div>
<div style="background-color:#fce5cd;color:#274e13;">
<b>कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर<br />
jpoet, Writer and editor-Deepak &#8216;Bharatdeep&#8217;,Gwalior</p>
<p><a href="http://zeedipak.blogspot.com" rel="nofollow">http://zeedipak.blogspot.com</a></b>&#160;</div>
<div>
यह कविता/आलेख इस ब्लाग <a href="http://rajlekh-hindi.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</div>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[फुस्स फटाखा रामदेव और खोखले बांस से मेरा टेसू झईं अड़ा का सुर आलापते अन्ना]]></title>
<link>http://gwaliortimes.wordpress.com/2011/06/29/%e0%a4%ab%e0%a5%81%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b8-%e0%a4%ab%e0%a4%9f%e0%a4%be%e0%a4%96%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b5-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%96%e0%a5%8b%e0%a4%96/</link>
<pubDate>Wed, 29 Jun 2011 05:50:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>gwaliortimes</dc:creator>
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<description><![CDATA[फुस्स फटाखा रामदेव और खोखले बांस से मेरा टेसू झईं अड़ा का सुर आलापते अन्ना नरेन्द्र सिंह तोमर ‘’आनन्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[फुस्स फटाखा रामदेव और खोखले बांस से मेरा टेसू झईं अड़ा का सुर आलापते अन्ना नरेन्द्र सिंह तोमर ‘’आनन्]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बाबा रामदेव: आर.एस.एस, भाजपा और कांग्रेस ]]></title>
<link>http://swaarth.wordpress.com/2011/06/16/ramdev3/</link>
<pubDate>Thu, 16 Jun 2011 16:41:51 +0000</pubDate>
<dc:creator>स्वार्थ</dc:creator>
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<description><![CDATA[बतकही 1- बाबा रामदेव: छाप, तिलक, अनशन सब छीनी रे नेताओं ने पुलिस लगाय के अशोक &#8211; एक बार को मान]]></description>
<content:encoded><![CDATA[बतकही 1- बाबा रामदेव: छाप, तिलक, अनशन सब छीनी रे नेताओं ने पुलिस लगाय के अशोक &#8211; एक बार को मान]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भ्रष्टाचार विरोध को इंसाफ मिलेगा क्या?]]></title>
<link>http://swaarth.wordpress.com/2011/06/08/bhrashtacharvirodh/</link>
<pubDate>Tue, 07 Jun 2011 19:28:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>स्वार्थ</dc:creator>
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<description><![CDATA[बीते दिनों सन्यासी, ठग, व्यपारी और मसीहा के बीच उलझे हुये सत्य का अजीब रूप देखने को मिला है। खून-पसी]]></description>
<content:encoded><![CDATA[बीते दिनों सन्यासी, ठग, व्यपारी और मसीहा के बीच उलझे हुये सत्य का अजीब रूप देखने को मिला है। खून-पसी]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बाबा रामदेव: छाप, तिलक, अनशन सब छीनी रे नेताओं ने पुलिस लगाय के ]]></title>
<link>http://swaarth.wordpress.com/2011/06/06/ramdev2/</link>
<pubDate>Mon, 06 Jun 2011 16:04:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>स्वार्थ</dc:creator>
<guid>http://swaarth.wordpress.com/2011/06/06/ramdev2/</guid>
<description><![CDATA[बाबा रामदेव के काले धन की विदेश से वापसी और भ्रष्टाचार के खिलाफ किये अनशन से सम्बंधित दुखद घटनाक्रमो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[बाबा रामदेव के काले धन की विदेश से वापसी और भ्रष्टाचार के खिलाफ किये अनशन से सम्बंधित दुखद घटनाक्रमो]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ईमानदारी-भ्रष्टाचार के बीच झूलता मानस]]></title>
<link>http://swaarth.wordpress.com/2011/04/21/imandaribhrashtachar/</link>
<pubDate>Thu, 21 Apr 2011 17:48:22 +0000</pubDate>
<dc:creator>स्वार्थ</dc:creator>
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<description><![CDATA[रमेश ज़रूरी काम से गांव जाने के लिये सपत्नीक स्टेशन पहुँचा तो पाया कि पहले से ही मुसाफिरों की लंबी ला]]></description>
<content:encoded><![CDATA[रमेश ज़रूरी काम से गांव जाने के लिये सपत्नीक स्टेशन पहुँचा तो पाया कि पहले से ही मुसाफिरों की लंबी ला]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[बगुलाभगत आये रे!]]></title>
<link>http://swaarth.wordpress.com/2011/04/19/bagulabhagat/</link>
<pubDate>Tue, 19 Apr 2011 16:40:53 +0000</pubDate>
<dc:creator>स्वार्थ</dc:creator>
<guid>http://swaarth.wordpress.com/2011/04/19/bagulabhagat/</guid>
<description><![CDATA[वो जो बेचते थे जहर अब तक, सुना है पहने झक सफेद कपड़े डाले गले में आला महामारी भगाने की अपनी क्षमता का]]></description>
<content:encoded><![CDATA[वो जो बेचते थे जहर अब तक, सुना है पहने झक सफेद कपड़े डाले गले में आला महामारी भगाने की अपनी क्षमता का]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[जनता से ठगी की विरासत]]></title>
<link>http://swaarth.wordpress.com/2011/04/14/jantasethagikivirasat/</link>
<pubDate>Thu, 14 Apr 2011 16:02:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>स्वार्थ</dc:creator>
<guid>http://swaarth.wordpress.com/2011/04/14/jantasethagikivirasat/</guid>
<description><![CDATA[तुम सदा से रहे हो मेरे खून के प्यासे बैल के स्थान पर मुझे जुता हुआ देख कर आँखे चमक उठती थी तुम्हारी]]></description>
<content:encoded><![CDATA[तुम सदा से रहे हो मेरे खून के प्यासे बैल के स्थान पर मुझे जुता हुआ देख कर आँखे चमक उठती थी तुम्हारी]]></content:encoded>
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