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	<title>bloroll &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/bloroll/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "bloroll"</description>
	<pubDate>Sun, 07 Sep 2008 23:44:24 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[Funny :)]]></title>
<link>http://uzzytm.wordpress.com/?p=616</link>
<pubDate>Mon, 04 Aug 2008 21:11:29 +0000</pubDate>
<dc:creator>uZZy TM</dc:creator>
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<description><![CDATA[Vad la Urban ceva haios,si  &#8220;am furat&#8221; si eu  .just enjoy!

]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>Vad la <a href="http://urbanreality.wordpress.com/2008/08/04/tzuica-apolodor/" target="_blank">Urban ceva haios</a>,si  "am furat" si eu ;) .just enjoy!</p>
<p><span style='text-align:center; display: block;'><object width='425' height='350'><param name='movie' value='http://www.youtube.com/v/JNRLTPmpbnE'></param><param name='wmode' value='transparent'></param><embed src='http://www.youtube.com/v/JNRLTPmpbnE&rel=0' type='application/x-shockwave-flash' wmode='transparent' width='425' height='350'></embed></object></span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दो क्षणिकाएं]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=177</link>
<pubDate>Thu, 12 Jun 2008 14:51:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=177</guid>
<description><![CDATA[आसमान से जो देखा धरती पर
तो इंसान चींट]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आसमान से जो देखा धरती पर<br />
तो इंसान चींटियों की तरह<br />
सड़क पर रेंगता नजर आया<br />
वैसे भी धरती पर  इंसान<br />
कब इंसान की तरह चल पाया<br />
चींटियों की रानी लेती है<br />
अपनी प्रजा से सेवा<br />
पर इंसान  ढूंढता है<br />
अपने आराम से रहने के लिये कोई राजा<br />
जो उसे खिलाये मुफ्त में मेवा<br />
दौड़ सकता है अपनी टांगो के सहारे<br />
पर फिर भी रैंगना उसे पसंद है<br />
करता है पहाड़ जैसी बातें पर<br />
इंसान का चरित्र हमेशा बौना नजर आया<br />
..................................................</p>
<p>शिखर पर पहुंचे हैं वह लोग<br />
जिनके चरित्र बौने हैं<br />
बांस की  टांगों के सहारे<br />
वह दिखते हैं बहुत लंबे<br />
पर जब हट जाती हैं वह<br />
तो लगते वह रोने हैं<br />
बांसों के सहारे हो रहा है शासन<br />
बांस भी रूप बदलता है<br />
कहीं पद तो कहीं बनता है आसन<br />
एक बार लग जाये तो<br />
फिर आदमी सलामत हो जाता<br />
हर कोई उसे सलाम ठोकने द्वार पर आता<br />
मिल जाये एक बांस<br />
तो मिल जाती है प्रसिद्धि की सांस<br />
जिसके हाथ में आया, वह तो हो गया राजा<br />
अपना लिखा हुक्म ही समझ में न आये<br />
पर बांस के जोर पर<br />
उसके पाप तो प्रजा को ढोने हैं</p>
<p>..........................................</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शब्द अपनी दुनियां स्वयं बसाते है-आलेख और कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=160</link>
<pubDate>Sun, 18 May 2008 10:34:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=160</guid>
<description><![CDATA[मैने कई ब्लाग पर हाइकु के रूप में कवित]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मैने कई ब्लाग पर हाइकु के रूप में कविताएं पढ़ीं, पर मेरे समझ में नही आता था कि वह होता क्या है। आज <a href="http://www.meenakshi-meenu.blogspot.com/">मीनाक्षी जी</a></a>  के ब्लाग पर पढ़ा कि उसे त्रिपदम कहा जाता है। हिंदी में इस विधा के बारे में कहीं लिख गया है तो मुझे पता नहीं पर मुझे लगा कि यह एक मुक्त कविता की तरह ही है। शायद इस विधा को अंग्रेजी से लिया गया होगा और मैं इस आधार पर कोई विरोध करने वाला नहीं हूं। मुख्य बात है कि हम अपनी बात कहना चाहते है और उसके लिये हम गद्य या पद्य किसी में भी लिख सकते हैं।</p>
<p>त्रिपदम(हाइकु) पढ़कर मेरे मन में विचार आया कि आज अपने कुछ विचारों को इस विधा में  लिख कर देखें। कभी-कभी मुझे लगता है कि लोग अपने मन की हलचल को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाते या कभी वह कुछ कहना चाहते है पर कुछ और कह जाते है। हमारा मन बहुत गहरा होता है और हम उसमें डुबकी तो सभी लगा लेते हैं पर वहां से कितने मोती उठा पाते हैं यह एक विचार का विषय है। हम कई बार कहते हैं कि अमुक व्यक्ति बहुत गहराई से लिखता या विचार करता है। इसका यह आशय  यह कदापि नहीं हैं कि कि हम ऐसा नहीं कर सकते हैं। दरअसल जो लोग लिखने या विचार करने मेंे गहराई का संकेत देते हैं वह अपने अंदर से बाहर आ रहे विचार और शब्दों को रोकने का प्रयास नहीं करते। दृष्टा की तरह उनको बाहर लोगों के पास जाते देखते हैं। हां, यह मुझे लगता है। कई बार मेरे साथ ऐसा होता है। जब शब्द और और विचारों के बाह्य प्रवाह के बीच मैं स्वयं खड़ा होने का प्रयास करता हूं तो लगता है कि वह अवरुद्ध हो गया।</p>
<p>मुझे पता नहीं कि मैं अच्छा लिखता हूं कि बुरा? पर कुछ मित्र मेरी कुछ रचनाओं पर फिदा हो जाते हैं और कुछ पर कह देते हैं कि यह क्या लिखा है हमारे समझ में नहीं आया।’ तब मुझे इस बात की अनुभुति होती है कि मैंने खराब कही जा रही रचनाओं के समय अपने विचारों और शब्दों के प्रवाह में अपनी टांग अड़ाई थी। आज जब मेरे मन में हाइकू (त्रिपदम) लिखने का विचार आया तो मैं अपने अ्र्रंर्तमन पर दृष्टिपात कर रहा हूं कि क्या वहां कोई विचार या शब्द हैं जो बाहर आना चाहते है।</p>
<h3 style="padding-left:30px;">मन में उठती कुछ उमंगें<br />
विचारों की बहती तरंगें<br />
आशाओं की उड़ती पतंगें</h3>
<h3 style="padding-left:30px;">मौसम के खुशनुमा होने का अहसास<br />
किसी का हमदर्द बनने का विश्वास<br />
प्यार में वफादारी की आस</h3>
<h3 style="padding-left:30px;">अनुभूतियों से भरा तन<br />
अभिव्यक्त होना चाहता मन<br />
शब्द चहक रहे खिलाने को चमन</h3>
<h3 style="padding-left:30px;">जब तलाशता हूं उनका रास्ता<br />
संदर्भों से जोड़ता हूं उनका वास्ता<br />
सोचता हूं परोसूं जैसे नाश्ता</h3>
<h3 style="padding-left:30px;">तब असहज हो जाता हूं<br />
अपने को भटका पाता हूं<br />
नयी तलाश में पुराना भूल जाता हूं</h3>
<h3 style="padding-left:30px;">जब हट जाता हूं उनके पास से<br />
रचना होने की आस से<br />
अपने अस्तित्व के आभास से</h3>
<h3 style="padding-left:30px;">तब वह कोई कविता बन जाते हैं<br />
या कोई कहानी सजाते हैं<br />
शब्द अपनी दुनिया स्वयं बसाते है</h3>
<p>यह मेरा त्रिपदम(हाइकु) लिखने का एक प्रयास है। मुझे इसे लिखना बहुत अच्छा लगा। यह अलग बात है कि पढ़ने वाले इस पर क्या सोचते है। मेरा प्रयास अपने को अभिव्यक्त करना होता है और प्रयास यही करता हूं कि अपने आपसे दिखावा नहीं करूं। हमेशा ऐसा नहीं कर पाता यह अलग बात है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्रिकेट में अब देशप्रेम का सुख नहीं उठाते-हास्य कविता]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=145</link>
<pubDate>Sat, 19 Apr 2008 17:09:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=145</guid>
<description><![CDATA[आया फंदेबाज और बोला
‘क्या दीपक बापू कि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003300;">आया फंदेबाज और बोला<br />
‘क्या दीपक बापू किक्रेट भूल गये देखना<br />
पता नहीं तुम्हें अब यहां<br />
क्रिकेट मैच चल रहे हैं<br />
तुम्हारे नेत्र उनका आनंद उठाने की बजाय<br />
कंप्यूटर में जल रहे हैं<br />
क्यों नहीं कुछ मजा उठाते’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#003300;">सुन कर पहले उदास हुए<br />
फिर टोपी लहराते हुए कहें दीपक बापू<br />
‘जजबातों में बहकर देख लिया<br />
जिनकी जीत पर हंसे<br />
और हारने पर रोए<br />
उनके खिलवाड़ को सहकर देख लिया<br />
कमबख्तों ने  पहले राष्ट्रप्रेम जगाने के लिये<br />
आजादी के गाने सुनवाये<br />
और हमारे जजबातों से खूब पैसे बनाये<br />
अब क्रिकेट हो गया बाकी सब जगह कंगाल<br />
विदेशी खिलाड़ी हो रहे बेहाल<br />
किसी भी तरह इस देश में ही कमाना है<br />
पर बाहर ही तो रखना अपना खजाना है<br />
इसलिये देश में अंदर ही बंटने के लिये<br />
देश की बजाय टीमों के नाम की भक्ति के लिये<br />
नये-नये मनोरंजक तराने बनवाये<br />
अब तो देशप्रेम उनको सांप की तरह<br />
डसने लगता है<br />
क्योंकि विदेशी नाराज न हो जायें<br />
इससे शरीर उनका कंपता है<br />
हमें तो लगने लगा है कि<br />
इतिहास में ही आडम्बर भरा पड़ा है<br />
गुलामी का दैत्य तो अब भी यहीं खड़ा है<br />
कभी इस देश को एक करने के लिये<br />
सब जगह नारे लगे<br />
अब बांटने के लिये सितारे लगे<br />
पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण में<br />
मनोरंजन के नाम पर बांटा जा रहा है<br />
देशप्रेम से शायद व्यापार नहीं होता<br />
विश्व के सबसे उपभोक्ता यहीं हैं<br />
उनको बांटने से ही कई लोगों का<br />
बेड़ा पार यहीं होता<br />
देशप्रेम हम नहीं छोड़ पाते<br />
उसके नाम के बिना क्रिकेट में सुख नहीं पाते<br />
लोग उसे भुलाने के लिये<br />
बन  रहे हैं बैट बाल के खेल में<br />
पेश कर रहे हैं नृत्य और गाने<br />
उसे देखेंगे शोर के दीवाने<br />
हास्य कविता लिखेंगे हम जैसे सयाने<br />
अब हम क्रिकेट से मनोरंजन नहीं उठाते<br />
..........................................<br />
</span></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[आठ साल की बच्ची का हाथ कैसे कुचला जा सकता है-आलेख ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=144</link>
<pubDate>Sat, 12 Apr 2008 16:12:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=144</guid>
<description><![CDATA[आज श्री सुरेश चिपलूनकर जी ने कुछ फोटो ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>आज श्री सुरेश चिपलूनकर जी ने कुछ फोटो की श्रृंखला भेजी जिसने मेरा मन विचलित कर दिया। वह अकेले ऐसे ब्लागर हैं जिनसे मैं व्यक्तिगत रूप से मिल चुका हूं। मुलाकात के बाद वह अपने ब्लाग और ऐसे फोटो ईमेल से भेज देते हैं। उनका लेखन कितना प्रभावी है यह बताने की आवश्यकता नहीं है पर उनके द्वारा प्रेषित फोटो भी बहुत संदेश देते हैं।</strong></p>
<p><strong>उनके बारे में विस्तार से कभी समीक्षा लिखूंगा पर आज उनके द्वारा भेजे गये फोटो ने तत्काल  कुछ लिखने को मजबूर कर दिया। उनके कथानुसार यह फोटो ईरान से लिया गया है। वहां एक आठ वर्षीय लड़की पर ब्रेड चुराने का आरोप लगाया गया और फिर उसका हाथ कार के नीचे कुचला गया। उसके पास एक पेंटशर्ट पहने आदमी बकायदा इसकी घोषणा माइक पर करते दिखाया गया है। उसके आसपास भारी भीड़ खड़ी है।  मुझे यह फोटो देखकर बहुत तकलीफ हुई।</strong></p>
<p><strong>हमारे देश में भी अंधविश्वासों के कारण कई ऐसी घटनाएं होतीं हैं पर एक तो वह अशिक्षित लोगों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में की जातीं है और अगर उसकी जानकारी प्रशासन पर आये तो वह कार्रवाई भी करता है, दूसरे ऐसे कुकृत्यों को कोई सामूहिक सामाजिक समर्थन प्राप्त नहीं होता। मैं ऐसी घटनाओं पर बहुत लिख चुका हूं और एक बात तय है कि ऐसी घटनाओं को कानून की दृष्टि से कोई समर्थन नहीं मिलता। हम ईरान की बात कर रहे हैं वहां के धार्मिक कानून के अनुसार चोरी की सजा हाथ काट देने या कुचलना ही है। मतलब वहां उसे कानूनी संरक्षण प्राप्त है। </strong></p>
<p><strong>अपराध की दृष्टि से देखें तो चोरी सबसे छोटा अपराध है पर हम उसको बड़ा कहते हैं क्योंकि वह कमजोर लोगों द्वारा अपनी  भूख मिटाने के लिये किया जाता है। मैंने तो एक व्यंग्य भी लिखा है ‘‘चोरी करना पाप है’ यह एक नारे की तरह पढ़ाया जाता है। कहीं यह नहीं पढ़ाया जाता कि ‘रिश्वत लेना पाप है’ या अपहरण करना पाप है। अगर कोई स्कूल यह पढ़ाना शुरू कर दे तो उसके यहां लोग अपने बच्चों को भेजना ही बंद कर देंगे। आखिर वह बच्चों को इसलिये नहीं पढ़ाते कि उनका बच्चा पढ़लिखकर उच्च पद पर तो पहुंचे और ऊपरी कमाई न करे। </strong></p>
<p><strong>पर मैं इन फोटो पर कोई व्यंग्य नहीं लिख सकता। यह मेरे मन को विचलित करने वाली फोटों है। वह तो बच्ची है मैं तो बड़ी आयु के आदमी पर भी ऐसा करने के  विरुद्ध हूं। खासतौर से तब यह वह डबलरोटी चोरी करने के आरोप में दी गयी है। एक समय की भूख के लिये उस बच्ची का जिंदगी भर का हाथ नष्ट करना एक जघन्य अपराध है। होना तो चह चाहिए था कि उस बच्ची की व्यथा सुनकर उसके लिये कोई उपाय किया जाता पर उल्टे उसका हाथा कुचला गया। मैं उन फोटो को अपने ब्लाग पर लाने में सफल नहीं हो पाया और वैसे भी मैने अपने शब्दों में ही जो चित्र खींचा उसे आप पढ़कर समझें तो ठीक रहेगा। वैसे मैंने चिपलूनकर जी सच ईमेल किया है कि वह ऐसी फोटो के लिये एक अलग ब्लाग शुरू करें क्योंकि कई बार चित्र भी बहुत कुछ कह जाते हैं।  आखिर एक गरीब आठ साल की बच्ची का हाथ केवल इसलिये जिंदगी भर के लिये कैसे नष्ट किया जा सकता है जिसने एक समय के खाने के लिये डबलरोटी चुराई हो। यहां मैं स्पष्ट कर दूं कि मैंने जो भी  कुछ लिखा है वह चिपलूनकर जी के उसी फोटो को देखकर ही लिखा है।<br />
</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[तब तक बहुत देर हो जायेगी-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=143</link>
<pubDate>Fri, 11 Apr 2008 17:28:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=143</guid>
<description><![CDATA[हर शाख पर उल्लू बिठा दो
जब बिजली चली जा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हर शाख पर उल्लू बिठा दो<br />
जब बिजली चली जायेगी<br />
वह तरक्की-तरक्की के नारे लगायेगा<br />
लोग समझेंगे सब ठीक-ठाक है<br />
अंधेरे में भला किसे तरक्की नजर आयेगी<br />
...................................................................................<br />
तरक्की हो रही चारों तरफ<br />
भ्रमित लोग चले जा रहे यह सोचकर कि <br />
कहीं हमें भी मिल जायेगी<br />
जमीन में धंसता जा रहा  है पानी<br />
आदमी में कहां रहेगा<br />
घर में बढ़ते कबाड़ में खोया<br />
जब गला तरसेगा  पानी को<br />
तब उसे समझ आयेगी<br />
पर तब तक बहुत देर हो जायेगी<br />
....................................................................</p>
<p>उसने कहा<br />
‘मैं तरक्की करूंगा<br />
आकाश में तारे की तरह<br />
लोगों के बीच चमकूंगा<br />
मेरी ख्याति चारों और फैल जायेगी’<br />
बरसों हो गये वह घूमता रहा<br />
रोटी से अधिक कुछ हाथ नहीं आया<br />
अब कहता है<br />
‘‘इतनी कट गयी जिंदगी<br />
जो बची है वह भी कट जायेगी’<br />
<!--more--></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हमने भी कुछ खोया नहीं-हिन्दी शायरी  ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=141</link>
<pubDate>Sun, 06 Apr 2008 11:02:09 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=141</guid>
<description><![CDATA[अपनी राह चलते जाना है
कहीं फूल बरसेंगे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<blockquote><strong>अपनी राह चलते जाना है<br />
कहीं फूल बरसेंगे<br />
तो कहीं लोग ताने कसेंगे<br />
थोड़ी खुशी के लिये<br />
बहुत दूर तक ढूंढते बहाने<br />
निराश होने पर<br />
भागने लगते हैं गम भुलाने<br />
ऐसे लोगों के इशारे पर<br />
अगर चले जिंदगी की राह पर<br />
तो ताउम्र अपनी मंजिल को तरसेंगे<br />
.......................................................</p>
<p>उनके इशारे पर लड़ते रहे जमाने से<br />
वह तो रहे पर्दे में, मतलब रख कमाने से<br />
जो वक्त आया तो फेर लीं नजरें हमसे<br />
जब मिलने गये तो लगे अनजाने से<br />
उन्होंने बहुत कुछ पा लिया<br />
पर हमने भी कुछ खोया नहीं<br />
हमें भी मतलब था<br />
कुछ जिंदगी के सच देखने से<br />
अपना मकसद पूरा किया<br />
अपनी जिंदगी को आजमाने से </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जो बडे हैं वह कभी संयम नहीं गंवाते-हास्य कविता ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=139</link>
<pubDate>Sat, 29 Mar 2008 16:34:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/?p=139</guid>
<description><![CDATA[आया फंदेबाज और बोला
&#8221;क्या दीपक बापू ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>आया फंदेबाज और बोला<br />
''क्या दीपक बापू हम तो<br />
समझते थे कोई भारी भरकम लेखक को<br />
पर हम अब समझे हमें भरमाते हो<br />
सभ्य शब्दों की बात करते हो<br />
गालियाँ लिखने में शर्माते हो<br />
देखो अंतर्जाल पर बडे-बडे लेखकों के नाम का<br />
 लेखक  गालिया चाप (छाप) जाते<br />
और लोग तारीफ भी कर आते''</p>
<p>सुन पहले चौंके<br />
फिर कुर्सी से उठकर<br />
टोपी को घुमाते कहानी दीपक बापू<br />
''लोगों की  हताशा और निराशा दूर करने का<br />
ठेका वैसे हमने नहीं लिया<br />
अभिव्यक्ति की आजादी है<br />
किसी का मुहँ सिलने का<br />
काम हमने कभी नहीं किया<br />
करते हो गालियों की बात<br />
हम नहीं लिखेंगे<br />
चाहे तालियाँ बजे या पड़े लात<br />
लोगों का क्या<br />
जो लेखक होते सामने<br />
उनका पूछते नहीं<br />
पीठ पीछे उनके नाम की<br />
कविताओं के गुणगान कर जाते<br />
समझना तो दूर कभीं पढीं भी<br />
नहीं होगी जिन कवियों की कवितायेँ<br />
उनके पीछे गाते हैं उनकी गाथाएं<br />
और अपना प्रभाव जमाने के लिए<br />
उनकी  गालियाँ चिपका जाते<br />
दूसरों पर लाशों का व्यापार करने का<br />
आरोप लगाने वाले<br />
स्वर्गवासी लोगों के नाम से<br />
गालियाँ छपने के  लिए आते<br />
अपने दिल के अरमान दबाये दिल में<br />
बडे कवियों के नाम से वाह-वाही लूट जाते<br />
हिन्दी भाषा का है बहुत बडा इलाका<br />
दर्द भी बहुत है यहाँ<br />
इसलिए कवि और लेखक भी बहुत हैं<br />
सबको कौन पढ़ पाता<br />
इसलिए लोग अपनी बात उनसे नाम से<br />
चिपका जाते<br />
हम तो बस इतना जानते कि<br />
जो बडे हैं वह कभी अपना संयम नहीं गंवाते''<br />
----------------------------------------------</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[Do We Need ‘Easier’ Poetry to Bring Back Readers? (Quote of the Day/William Logan)]]></title>
<link>http://oneminutebookreviews.wordpress.com/2008/01/20/do-we-need-%e2%80%98easier%e2%80%99-poetry-to-bring-back-readers-quote-of-the-daywilliam-logan/</link>
<pubDate>Sun, 20 Jan 2008 22:34:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>1minutebookreviewswordpresscom</dc:creator>
<guid>http://oneminutebookreviews.wordpress.com/2008/01/20/do-we-need-%e2%80%98easier%e2%80%99-poetry-to-bring-back-readers-quote-of-the-daywilliam-logan/</guid>
<description><![CDATA[William Logan reviews the latest book by Geoffrey Hill, who writes perhaps the most complex and diff]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>William Logan reviews the latest book by Geoffrey Hill, who writes perhaps the most complex and difficult poems of the 21st century, in today's <i>New York Times Book Review</i>.  Hill believes that "sinking to common ground betrays the high purpose of verse," Logan says in his review of<i> A Treatise of Civil Power </i>(Yale University Pres, $30, cloth, and $16, paper) <a href="http://www.nytimes.com/2008/01/20/books/review/Logan-t.html">www.nytimes.com/2008/01/20/books/review/Logan-t.html</a>. Should poets dumb down their work to attract readers? Logan expressed his own views on the question in his most recent collection of poetry criticism:</p>
<div align="right"></div>
<p align="left"><b>“Many have argued that to regain its lost audience poetry must become as easy to read as the instructions for opening a tin of sardines (no, easier), whimsical and ordinary in all the right whimsical and ordinary ways. This will bring back the <i>common</i> reader – once we have him, once he has that taste for poetry, by baby steps he will develop a passion for Alexander Pope. There have been a few such readers, no doubt, though they might have progressed to Pope just as quickly if they’d started with the backs of cereal boxes. The poems for prospective readers must be written in first person, in free verse, as often as possible in present tense, and as much like prose as possible, because metaphor is obscure, allusion elitist if not unjust, and something as strict as meter surely undemocratic, even (as has been claimed) the design of fascists. Oh, and such poems must be about the poet’s life, because we should always write about what we know, and what else does a poet know? How fortunate that Shakespeare was a close friend of Julius Caesar and that Milton supped frequently with the Devil.</b></p>
<p align="left"><b>“Poetry has for some time tried to dumb itself down to attract an audience; when any art becomes so desperate, it is already endangered. … Perhaps there <i>is</i> a place for disposable poetry; but let’s not fool ourselves that it’s better than it is, simply because the times are what they are. What we lack is not readers but a culture that teaches how to read.”</b></p>
<div align="right"></div>
<p align="left">William Logan in the introduction to his most recent book of poetry criticism, <i>The Undiscovered Country: Poetry in the Age of Tin</i> (Columbia University Press, $29.50) <a href="http://www.columbia.edu/cu/cup/">www.columbia.edu/cu/cup/</a>. Logan teaches at the University of <a href="http://Florida%20www.english.ufl.edu/faculty/wlogan/index.html%20">Florida www.english.ufl.edu/faculty/wlogan/index.html  </a>and writes the Verse Chronicle for the New Criterion <a href="http://newcriterion.com:81/">newcriterion.com:81/</a>. He is author of three other works of criticism and seven books of poetry. His awards include a citation for excellence in reviewing from the National Book Critics Circle <a href="http://www.bookcritics.org/">www.bookcritics.org</a>.</p>
<div align="right"></div>
<div align="right"></div>
<p align="left"><i>One-Minute Book Reviews is for people who like to read but dislike hype and review and inflation.</i></p>
<div align="right"></div>
<p align="right"><i>© 2008 Janice Harayda. All rights reserved.</i></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:जिस देश में मूर्खों का सम्मान नहीं होता वहाँ समृद्धि आती है ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/11/chanakya-nitijahan-moorkhon-ka-samman-naheen-hota/</link>
<pubDate>Tue, 11 Dec 2007 04:03:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/11/chanakya-nitijahan-moorkhon-ka-samman-naheen-hota/</guid>
<description><![CDATA[१.जिस देश में मूर्खों का सम्मान नहीं ह]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>१.जिस देश में मूर्खों का सम्मान नहीं होता, अन्न संचित रहता है तथा पति-पत्नी में झगडा नहीं होता वहाँ लक्ष्मी बिना बुलाए निवास करती है.<br />
अभिप्राय-इस कथन का आशय यह है की यदि किसी देश में सुख और समृद्धि आयेगी तो गुणवानों  के समान  से आयेगी.इसके अलावा जहाँ खाद्यान के भण्डार एवं परिवारों में शांति होती है वही खुशहाली होती है.      </p>
<p> 2.जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुचाने वाले मर्मभेदी वचन बोलते हैं, दूसरों की बुराई करने में खुश होते हैं। अपने वचनों द्वारा से कभी-कभी अपने ही वाचों द्वारा बिछाए जाल में स्वयं ही घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह रेत की टीले के भीतर बांबी समझकर सांप घुस जाता है और फिर दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।<br />
३.समय  के अनुसार विचार न करना अपने लिए विपत्तियों को बुलावा देना है, गुणों पर स्वयं को समर्पित करने वाली संपतियां विचारशील पुरुष का वरण करती हैं। इसे समझते हुए समझदार लोग एवं आर्य पुरुष सोच-विचारकर ही किसी कार्य को करते हैं। मनुष्य को कर्मानुसार फल मिलता है और बुद्धि  भी कर्म फल से ही प्रेरित होती है। इस विचार के अनुसार विद्वान और सज्जन पुरुष विवेक पूर्णता से ही किसी कार्य को पूर्ण करते हैं।<br />
4.जो बात बीत गयी उसका सोच नहीं करना चाहिए। समझदार लोग भविष्य की भी चिंता नहीं करते और केवल वर्तमान पर ही विचार करते हैं।हृदय में प्रीति रखने वाले लोगों को ही दुःख झेलने पड़ते हैं। प्रीति सुख का कारण है तो भय का भी। अतएव प्रीति में चालाकी रखने वाले लोग ही सुखी होते है.<br />
५. व्यक्ति आने वाले संकट का सामना करने के लिए पहले से ही तैयारी कर रहे होते हैं वह उसके आने पर तत्काल उसका उपाय खोज लेते हैं। जो यह सोचता है कि भाग्य में लिखा है वही होगा वह जल्द खत्म हो जाता है। मन को विषय में लगाना बंधन है और विषयों से मन को हटाना मुक्ति है.</p>
]]></content:encoded>
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<item>
<title><![CDATA[अपनी बेहतर रचनाएं विकिपीडिया पर पोस्ट करें ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/12/07/apnee-rahchnaaen-wikipidiyaa-par-post-karen/</link>
<pubDate>Fri, 07 Dec 2007 15:44:54 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[विकिपीडिया ज्ञान और विज्ञान की एक बहु]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>विकिपीडिया ज्ञान और विज्ञान की एक बहुत बड़ी वेब साईट है. इसमें हिन्दी से संबंधित पोस्टों के संख्या पर अक्सर सवाल उठाया जाता है और कहा जाता है की वहाँ इनकी संख्या बहुत कम है. इसमें कोई दो राय नहीं है और यह सच भी है कि अन्य भाषाओं के मुकाबले बहुत कम है और मैंने इसे देखा है. पर मैंने अन्य भाषाओं की कुछ जानकारी लेने का प्रयास किया था और उसके लिए संबंधित भाषाओं के जानकारों को साथ लिया. अन्य रचनाओं की भाषाओं की सामग्री मुझे वहाँ  दिखी वह ज्ञान और विज्ञान की दृष्टि से बहुत अधिक उपयोगी नहीं लगी और हिन्दी में ऐसी ही जानकारी ब्लोगों पर उपलब्ध है. </p>
<p>फिर भी मेरी नजर से कुछ लेख ऐसे हैं जो पठनीय और संग्रहणीय हैं उन्हें अगर विकिपीडिया पर रखा जाये तो बहुत अच्छा है. खासतौर से जो लोग अपने पर्यटन,  एतिहासिक जानकारी और ज्ञान और विज्ञान की पुस्तकों से विषय उठाकर उस पर मौलिक विचार व्यक्त करते हैं उन्हें अपनी सामग्री विकिपीडिया पर अवश्य रखना चाहिऐ. मैंने अपने कुछ पोस्ट वहाँ रखीं पर मुझे नहीं लगता कि वह कोई उपयोगी हैं क्योंकि उनमें कोई ज्ञान और विज्ञान से जुडा कुछ भी नहीं था. हमारी पोस्ट भले दस लाइन की हो पर हमें लगता है कि वह आगे के लिए भी उपयोगी है तो उसे विकिपीडिया में रख दें. आज मुझे पता लगा कि उस पर १५ हजार पोस्ट हैं और यह संख्या वाकई बहुत कम है, पर मैं संख्याओं के इस खेल में नहीं पड़ता पर फिर भी जिस तरह विकिपीडिया की जो अभी तक स्थिति है और उसे जिस तरह लोग अपने से संबंधित विषयों के लिए देखते हैं और उस पर हमारे किसी  आलेख या निबंध से सहायता मिलती है तो उसमें बुरी बात क्या है? मैंने अपने लेखों में लिखा है कि समस्या यह नहीं है कि ब्लोग के लिए पाठक कम है बल्कि समस्या है यह है कि लोगों कि मानसिकता ही अंतर्जाल पर हिन्दी लिखने और पढ़ने की नहीं है. जब विकिपीडिया पर जाने वाले लोगों को हिन्दी में सामग्री मिलगी तो धीरे-धीरे उनकी हिन्दी की मानसिकता बनेगी जो कि अंतर्जाल पर हिन्दी को दृढ़ता पूर्वक स्थापित करने की अनिवार्य शर्त है.  </p>
<p><strong>विकिपीडिया ने अपने ऑफ़लाइन हिन्दी टूल का कूडा किया </strong><br />
विकिपीडिया का पहले  हिन्दी का ऑफ़लाइन टूल थोड़ा काम का था, पर जब इ की मात्रा अक्षर से पहले आती थी पर अब पीछे आती है तो समझ में  नहीं आता कि हमने लिखा क्या है? हाँ उसका उपयोग तब बहुत उपयोगी होता है जब  बाहर कहीं टाईप कर उसे इस पर हिन्दी में किया जाये और फिर इंडिक टूल पर लाकर एडिट किया जाये.   इससे पूर्व यह टूल पोस्ट लिखने के भी काम  आ सकता था पर अब उसमें दिक्कत आती है. मैं आशा करता हूँ वह इसकी तरफ ध्यान देंगे. ऐसा लगता है कि वहाँ सतत इस पर काम चल रहा है और आशा करना चाहिए कि वह एक पूर्ण ऑफ़लाइन हिन्दी टूल बनाने में सफल होंगे.</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[ मेरे इन ब्लोगस की रचनाओं को देखें]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/2007/09/28/%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%87%e0%a4%a8-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a4%9a%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%93%e0%a4%82-%e0%a4%95/</link>
<pubDate>Fri, 28 Sep 2007 16:58:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[समस्त पाठकों से निवेदं है कि यदि आप मे]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>समस्त पाठकों से निवेदं है कि यदि आप मेरी रचनाएं इस ब्लोग पर पढना चाह्ते हैं तो कृप्या कमेंट अवश्य लिखे। इस ब्लोग पर मेरा इरादा एक उप ंयास लिखने का है। तब तक आप मेरे इन ब्लोगस की रचनाओं को देखें<br />
दीपक भारतदीप्</p>
<p>1. <a href="http://deepakbapukahin.wordpress.com/">http://deepakbapukahin.wordpress.com</a></p>
<p>2. <a href="http://deepakraj.wordpress.com/">http://deepakraj.wordpress.com</a></p>
<p>3. <a href="http://rajlekh.wordpress.com/">http://rajlekh.wordpress.com</a></p>
<p>4. <a href="http://dpkraj.blogspot.com/">http://dpkraj.blogspot.com</a></p>
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