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	<title>brahminism &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/brahminism/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "brahminism"</description>
	<pubDate>Wed, 09 Jul 2008 12:56:15 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA['Hinduism cannot be saved without Brahminism']]></title>
<link>http://churumuri.wordpress.com/?p=2457</link>
<pubDate>Tue, 20 May 2008 07:25:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>churumuri</dc:creator>
<guid>http://churumuri.wordpress.com/?p=2457</guid>
<description><![CDATA[T.J.S. George, the editorial of the New Indian Express, asked in his weekly column &#8216;Point of V]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><span class="contentpara"><a href="http://www.newindpress.com/sunday/colItems.asp?ID=SEC20080223134006"><strong>T.J.S. George</strong></a>, the editorial of the <em>New Indian Express</em>, asked in his weekly column '<a href="http://hamsa.org/george.htm">Point of View</a>' recently: "In the ageless tussle between Brahminic Hinduism and its challengers, is the balance tipping in favour of Brahminism again?</span></p>
<p><strong>K.B. Ganapathy</strong> responds thus in <a href="http://www.starofmysore.com"><em>Star of Mysore</em></a>:</p>
<blockquote><p>"A<span class="contentpara">fter visiting a few important Hindu temples in the South recently, I am inclined to believe that the balance is indeed tipping in favour of Brahminism. And I am also inclined to believe that if Hinduism is to be saved, it is possible only if it has the patronage and protection from Brahminism. After all, Hinduism minus Brahminism is like a body without a soul. </span></p>
<p><span class="contentpara">"To the hardware of Hinduism, Brahminism provides the software that ignites spiritualism among all the followers of Hinduism irrespective of caste, creed and the individual religious rituals. It could be animistic or nature worship where meat and liquor are also offered after animal sacrifice to appease a deity."</span></p></blockquote>
<p><strong>Also read</strong>: <a href="http://churumuri.wordpress.com/2007/05/01/meet-the-brahmins-indias-newest-toilet-cleaners/">Meet India's newest toilet cleaners: the Brahmins<br />
</a></p>
<p><a href="http://churumuri.wordpress.com/2008/01/06/never-quite-top-of-the-heap-now-even-lower/">Never quite top of the heap, now even lower</a></p>
<p><a href="http://churumuri.wordpress.com/2008/01/05/just-4-of-population-but-7-brahmins-in-indian-xi/">Just 4% of the population, but 7 Brahmins in Indian team</a></p>
<p>Link via <strong>Nikhil Moro</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[गांधी , अम्बेडकर और मिट्टी की पट्टियाँ (७) : अफ़लातून]]></title>
<link>http://samatavadi.wordpress.com/?p=297</link>
<pubDate>Wed, 23 Apr 2008 09:48:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
<guid>http://samatavadi.wordpress.com/?p=297</guid>
<description><![CDATA[गांधी बनाम अम्बेडकर की बहस में गांधी ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:left;">गांधी बनाम अम्बेडकर की बहस में गांधी जी की धारा के दो प्रमुख उत्तराधिकारियों - डॉ. लोहिया और जयप्रकाश नारायण के आन्दोलनों में सामाजिक परिवर्तन के कार्यक्रमों को नजरअन्दाज करने पर बहस अपूर्ण रहेगी । संपूर्ण क्रांति के आन्दोलन के बीच लोकनायक जयप्रकाश की उपस्थिति में तोड़ी गयी जनेऊ का ढेर लग जाता था तथा हजारों नवयुवकों ने जातिसूचक चिह्न त्याग दिये थे । समाजिक विभाजन कम से कम हो इसलिए डॉ. लोहिया ने 'साठ संकड़ा' के सिद्धान्त में औरत , आदिवासी , दलित और पिछड़ों को एक ही राजनैतिक परिभाषा में संगठित करने के प्रयास किए । उनकी पार्टी में हर स्तर साठ सैंकड़ा का सिद्धान्त लागू होने के कारण दलितों और पिचड़ों का नेतृत्व भी पैदा हुआ ।</p>
<p style="text-align:left;">    यह निश्चित तौर पर स्पष्त रहना चाहिए कि इस बहस में गांधी जी की पैरवी में मुखर हो रहे धार्मिक सहिष्णुता विरोधी दल तथा नव-साम्राज्यवाद का बंदनवार सजा कर स्वागत करने वाले दल के कंधे से कंधा मिलाना जयप्रकाश , विनोबा तथा लोहिया के अनुगामियों के लिए संभव नहीं है । इसे प्रकार अम्बेडकरवादी स्मूहों को भी नयी आर्थिक नीति के सन्दर्भ में एक स्पष्ट सोच प्रकट करनी होगी ।</p>
<p style="text-align:left;">    गांधी बनाम अम्बेडकर की बहस में हिस्सा लेने वालों के लिए गांधी जी की यह सलाह सर्वथा उचित है - <strong>" हम बड़ों के बल का अनुसरण करें , उनकी कमजोरी का कभी नहीं । बड़ों की लाल आँखों में अमृत देखें , उनके लाड़ से दूर भागें , मोहमयी दया के वश होकर वे बहुत कुछ करने की इजाजत दें , बहुत कुछ करने को कहें , तब लोहे जैसे सख्त बनकर उससे इनकार करें । मैं एक बार यदि कहूँ कि हरगिज झूठ न बोलना , मगर मुश्किल में पड़कर झूठ के सामने आँखें बन्द कर लूँ , तब मेरी आँखों की पलकों को पकड़कर जोर से खोल देने में तुम्हारी भक्त होगी , मेरे इस दोष को दरगुजर करने में द्रोह होगा । " ( </strong><em>पत्र - मगनभाई देसाई को, महादेवभाई की डायरी , खण्ड तीन, पृ. ११२ </em><strong> ) *</strong></p>
<p style="text-align:left;"> </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ गांधी , अम्बेडकर और मिट्टी की पट्टियाँ(६) : क्या 'हरिजन' शब्द शाश्वत रहे?]]></title>
<link>http://samatavadi.wordpress.com/?p=295</link>
<pubDate>Tue, 22 Apr 2008 10:07:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
<guid>http://samatavadi.wordpress.com/?p=295</guid>
<description><![CDATA[    &#8216;हरिजन&#8217; शब्द शाश्वत रहे , यह गांध]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:left;"><a href="http://samatavadi.wordpress.com/files/2008/04/e0a495e0a4bfe0a4b6e0a4a8.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-296" src="http://samatavadi.wordpress.com/files/2008/04/e0a495e0a4bfe0a4b6e0a4a8.jpg?w=193" alt="Kishan Pattanayak" width="193" height="300" /></a>    'हरिजन' शब्द शाश्वत रहे , यह गांधी जी नहीं चाहते थे । 'अछूत' शब्द के प्रति उनका विरोध था , इसीलिए वे यहाँ तक मानते थे कि ' स्वराज्य में दफ़ा १२४ राजद्रोह के लिए नहीं होगी , परन्तु हरिजनों को अछूत कहने वाले के विरुद्ध होगी।' ( <em>महादेवभाई की डायरी , खण्ड दो , पृ. १९४ </em>)</p>
<p style="text-align:left;">    हरिजन शब्द के प्रति अपने लगाव के बावजूद दलितों की इस शब्द के प्रति आपत्ति को वे तरजीह देते थे । मद्रास के शंकर नामक एक कार्यकर्ता ने वहाँ के दलितों के लिए हरिजन शब्द के बारे में आपत्ति की बाबत गांधी जी को लिखा कि वे हरिजन कैसे कहलाए ? हम तो हरजन हैं हरिजन नहीं । शंकर ने लिखा था ,इन लोगों को यदि हिन्दू कहें , तो इन्हें अच्छा लगेगा । आप इजाजत दीजिए ।' उसे गांधी जी ने लिखा ,' हरिजन नाम पर आपत्ति होने पर के लिए मुझ अफ़सोस होता है । तुम्हारे मित्रों को जो नाम पसन्द हो , वह इस्तेमाल कर सकते हो । मगर उन्हें यह समझाना कि मेरे मन में विष्णु य शिव का जरा भी ख्याल न था । मेरे लिए तो इसका अर्थ 'भगवान का आदमी' ही होता है । विष्णु , शिव या ब्रह्मा में मैं कोई भेद नहीं मानता । सभी ईश्वर के नाम हैं ।मगर इस मामले में उनके निर्णय पर अमल करना चाहिए ।' ( <em>वही , पृ. </em>१३७ ) </p>
<p style="text-align:left;">    २९ अक्टूबर , १९३२ को एक बंगाली सज्जन का पत्र गांधी जी को मिला, 'आप 'हरिजन' नाम देकर अछूतों का दूसरा नाम कायम करना चाहते हैं । इन्हें नाम देने की बात ही क्यों न छोड़ दी जाए ? उसके जवाब में गांधी जी ने लिखा- 'हरिजन' शब्द अछूत भाइयों को ध्यान में रखकर हमेशा के लिए इस्तेमाल करना हो , तो आपका ऐतराज ठीक हैओ ।मगर अभी तो उन्हें अलग करके दिखलाए बिना काम नहीं चल सकता ।साथ ही मुझे यह लगता है कि 'अछूत' या उससे मिलते-जुलते देशी भाषाओं में काम में लिए जाने वाले दूसरे शब्द उनके लिए इस्तेमाल करना अब उचित नहीं है।' ( <em>वही, पृ. १५५ </em>)</p>
<p style="text-align:left;">    गांधी जी ने सवर्णों के लिए भी एक नाम दिया था । अहमदाबाद में सवर्णों की एक सभा में उनके भाषण में यह नाम आया है । ' मेरे लिए अछूत , यदि हम अपने से (सवर्णों से ) तुअलना करें , तो हर्जन है - भगवान का आदमी और हम दुर्जन हैं ।अछूतों ने सारे श्रम करके , शोणित सुखाकर तथा अपने हाथ गंदे करके हमें आराम और सफाई से रहने की सुविधा दी है । ----- यदि हम चाहें तो अब से भी खुद हरिजन बन सकते हैं , लेकिन इसके लिए हमें उनके प्रति किये गये पापों का प्रायश्चित करना पड़ेगा ।' (<em>महात्मा गांधी ,अहमदाबाद के सवर्णों को , यंग इण्डिया ,६ अगस्त ,१९३१,पृ. २०३</em> )</p>
<p style="text-align:left;">    समतावादी नेता किशन पटनायक का 'हरिजन बनाम दलित' , नाम की इस बहस के सन्दर्भ में ठोश सुझाव है कि 'हरिजन' शब्द अछूतों के लिए था । जिस हद तक अछूत नहीं रह गये हैं  उस हद तक हरिजन शब्द भी हटाना चाहिए और अगर प्रत्यक्ष या परोक्ष ढंग से सवर्ण जातियाँ अस्पृश्यता को चलाए रखना चाहती हैं तो गांधी के द्वारा प्रयुक्त दूसरे शब्द का इतेमाल व्यापक होना चाहिए और सभी उच्च जातियों को दुर्जन जातियाँ कह कर पुकारना चाहिए ।----'दलित' शब्द की विशेषता यह है कि स्वत: स्फूर्त ढंग से शिक्षित , सचेत हरिजन समूह इस शब्द के साथ जुड़ रहे हैं ।' ( <em>हरिजन बनाम दलित,सं राजकिशोर</em> ) यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि इस वर्ग के बड़ी संख्या में साधारण ग्रामीण आज भी अपनी जाति का नाम न बता कर खुद को हरिजन कहते हैं । क्या इसका यह कारण है कि ग्रामीण समाज में अस्पृश्यता समाप्त नहीं हुई है और इस कारण गांधी जी द्वारा दिया गया नाम सवर्णों से बताने में एक तरह की सुरक्षा का भाव छिपा होता है ?</p>
<p style="text-align:left;"> </p>
<p style="text-align:left;"><strong>[ जारी ]</strong></p>
<p style="text-align:left;"><strong><a href="http://samatavadi.wordpress.com/2008/04/16/gandhi_ambedkar/">भाग १</a></strong></p>
<p style="text-align:left;"><strong><a href="http://samatavadi.wordpress.com/2008/04/17/gandhi_ambedkar2/">भाग २</a></strong></p>
<p style="text-align:left;"><strong><a href="http://samatavadi.wordpress.com/2008/04/18/gandhi_ambedkar3/">भाग ३</a></strong></p>
<p style="text-align:left;"><strong> <a href="http://samatavadi.wordpress.com/2008/04/19/gandhi_ambedkar_4/">भाग ४</a></strong></p>
<p style="text-align:left;"><strong> <a href="http://samatavadi.wordpress.com/2008/04/21/gandhi_ambedkar5/" target="_blank">भाग ५</a></strong></p>
<p style="text-align:left;">   </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ गांधी , अम्बेडकर और मिट्टी की पट्टियाँ (५) : अफ़लातून ]]></title>
<link>http://samatavadi.wordpress.com/?p=294</link>
<pubDate>Mon, 21 Apr 2008 09:33:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
<guid>http://samatavadi.wordpress.com/?p=294</guid>
<description><![CDATA[      गांधी जी और कांग्रेस ने दूसरी गोल]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:left;">      गांधी जी और कांग्रेस ने दूसरी गोलमेज वार्ता के बाद पहली बार डॉ. अम्बेडकर को दलितों के प्रतिनिधियों के रूप में मान्यता दी । इसी लिए पूना करार में डॉ. अम्बेडकर को एक पक्ष बनाया गया । ये दोनों विभूतियाँ दलित समस्या के प्रति एक दूसरे के दृष्टिकोण से अच्छी तरह वाकिफ़ थीं । यरवदा जेल में कार्यकर्ताओं से बातचीत में गांधी जी ने स्पष्ट शब्दों में इन मतभेदों को प्रकट किया है । ' प्रधानमन्त्री के खिलाफ यह लड़ाई ( पृथक निर्वाचन के विरुद्ध उपवास ) न की होती , तो हिन्दू धर्म का खात्मा हो जाता । अलबत्ता , अभी तक हम लोगों की आपसी लड़ाई तो खड़ी ही है । आज अम्बेदकर चार करोड़ लोगों के लिए नहीं बोलते । मगर जब इन चार करोड़ में शक्ति आयेगी , तब वे सोच विचार नहीं करेंगे । इन चार लोगों का मन भगवान पल भर में बदल सकता है और वे मुसलमान भी बन सकते हैं । लेकिन ऐसा न हो तो वे चुन - चुन कर हिन्दुओं को मारेंगे । यह चीज मुझे अच्छी नहीं लगेगी , पर मैं इतना जरूर कहूँगा कि सवर्ण हिन्दू इसी लायक थे । ' गांधीजी की मान्यता थी कि सामाजिक और आध्यात्मिक स्तर पर उनके द्वारा लिए जा रहे कार्यक्रम का विकल्प दलितों को राजनैतिक सत्ता दिलाकर वैधानिक परिवर्तन कराना नहीं हो सकता । मंदिर प्रवेश और सहभोज के कार्यक्रमों में डॉ. अम्बेडकर की दिलचस्पी कम थी , लेकिन गांधी जी इन कार्यक्रमों को करोड़ों आस्तिक दलितों की दृष्टि से और हिन्दू समाज की एकता की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानते थे । डॉ. अम्बेडकर की नीति तथा उनके स्वतंत्र नेतृत्व का गांधी जी पर दबाव था । इसी प्रकार गांधी जी के नेतृत्व का डॉ. अम्बेडकर पर दबाव था । गांधी जी ने पूना करार के बाद एक बार कहा था , ' मैं हरिजनों का कम छोड़ दूँ ,तो अम्बेडकर ही मुझ पर टूट पड़ें ? और जो करोड़ों बेजुबान हरिजन हैं , उनका क्या हो ? " पूना करार के लिए डॉ. अम्बेडकर और गांधी जी की वार्ताओं के जो दौर चले थे उसका डॉ. अम्बेदकर ने अपनी पुस्तक में विवरण बिलकुल नहीं दिया है , लेकिन महादेवभाई की डायरी ने उस दौर के इतिहास को दस्तावेज का रूप दिया है । इन वार्ताओं के दरमियान डॉ. अम्बेडकर ने गांधी जी से कहा था , ' मगर आप के साथ मेरा एक ही झगड़ा है , आप केवल हमारे लिए नहीं , वरन कथित राष्ट्रीय हित के लिए काम करते हैं । आप सिर्फ़ हमारे लिए काम करें , तो आप हमारे लाड़ले वीर ( हीरो )  बन जाँए । ' ( <em>महदेवभाई की डायरी , खण्ड दो , पृष्ठ ६० </em>) पूना करार पर सहमति के तुरन्त पश्चात डॉ. अम्बेडकर गांधी जी से जेल में मिलने आये , तब जो संवाद हुए वे इस प्रकार हैं-</p>
<p style="text-align:left;">    ठक्कर बापा - 'अम्बेडकर का परिवर्तन हो गया '</p>
<p style="text-align:left;">    बापू बोले - ' यह तो आप कहते हैं । अम्बेडकर कहाँ कहते हैं ? "</p>
<p style="text-align:left;">    अम्बेडकर - ' हाँ, महात्मा हो गया । आपने मेरी बहुत मदद की । आपके आदमियों ने मुझे समझने का जितना प्रयत्न किया , उसके बनिस्पत आपने मुझे समझने का अधिक प्रयत्न किया । मुझे लगता है कि इन लोगों की अपेक्षा आपमें और मुझमें अधिक साम्य है । '</p>
<p style="text-align:left;">    सब खिलखिलाकर हँस पड़े । बापू ने कहा , ' हाँ ' । इन्हीं दिनों बापू ने भी कहा था कि , ' मैं भी एक तरह का अम्बेदकर ही तो हूँ ? कट्टरता के अर्थ में । ' ( <em>वही , पृ. ७१ </em>)</p>
<p style="text-align:left;">    पूना करार के बाद के दिनों में इन दोनों विभूतियों के निकट आने की कफ़ी संभावना थी । गांधी जी की प्रेरणा से बने अस्पृश्यता निवारण मंडल की केन्द्रीय समिति में अम्बेडकर ने रहना मंजूर किया था । इस संस्था के उद्देश्य निर्धारित करने के संदर्भ में डॉ. अम्बेडकर द्वारा समाज व्यवस्था की बाबत अपनी पैनी समझदारी प्रकट करने वाले सुझाव दिए । बाद में जब उक्त मंडल के व्यवस्थापन में दलितों की भागीदारी की बात आयी तब गांधी जी ने कहा कि प्रायश्चित करने वाले सवर्ण ही इस मंडल में कर्ज चुकाने की भावना से रहेंगे । कर्जदार को समझना चाहिए , कि उसे अपना ऋण कैसे चुकाना है । डॉ. अम्बेडकर के मन पर इन रवैए का प्रतिकूल असर पड़ा ।</p>
<p style="text-align:left;"><strong>[ जारी ]</strong></p>
<p style="text-align:left;"><strong><a href="http://samatavadi.wordpress.com/2008/04/16/gandhi_ambedkar/" target="_blank">भाग १ </a></strong></p>
<p style="text-align:left;"><strong><a href="http://samatavadi.wordpress.com/2008/04/17/gandhi_ambedkar2/" target="_blank">भाग २</a></strong></p>
<p style="text-align:left;"><strong><a href="http://samatavadi.wordpress.com/2008/04/18/gandhi_ambedkar3/" target="_blank">भाग ३</a> </strong></p>
<p style="text-align:left;"><strong><a href="http://samatavadi.wordpress.com/2008/04/19/gandhi_ambedkar_4/" target="_blank">भाग ४ </a></strong></p>
<p style="text-align:left;"> </p>
<p style="text-align:left;">
<div id="9041f4f7-ef58-4742-9bb3-b80b22e28e2a" class="wlWriterEditableSmartContent" style="display:inline;text-align:left;margin:0;padding:0;">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%80"><span style="color:#0066cc;">गांधी</span></a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%85%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%a1%e0%a4%95%e0%a4%b0"><span style="color:#0066cc;">अम्बेडकर</span></a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/gandhi"><span style="color:#0066cc;">gandhi</span></a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/ambedkar"><span style="color:#0066cc;">ambedkar</span></a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/brahminism"><span style="color:#0066cc;">brahminism</span></a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/puna%20pact"><span style="color:#0066cc;">puna pact</span></a></div></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[மனு தர்மமும் மானிடமும் - பாகம் 2]]></title>
<link>http://nerkondapaarvai.wordpress.com/?p=13</link>
<pubDate>Sun, 20 Apr 2008 18:02:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>Lakshminarayanan</dc:creator>
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<description><![CDATA[முந்தைய பாகத்தில் மனு ஸ்மிருதி என்பத]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>முந்தைய பாகத்தில் மனு ஸ்மிருதி என்பது என்ன என்பதைப் பற்றியும், அதிலிருந்து சில விளக்கங்களையும் பார்த்தோம். இப்பாகத்தில் மனு ஸ்மிருதி பற்றி மேலும் அலசுவோம்.</p>
<p>பின்வரும் ஸ்லோகங்கள் மனுஸ்மிருதியில் இடம் பெற்றுள்ளன.</p>
<p style="text-align:center;"><strong>‘சூத்ரோ ப்ராமணதாமேதி ப்ராமணஸ்சைதி சூத்ரதாம்<br />
க்ஷத்ரியாஜ்ஜாதவேதம் து வித்யாத்வைச்யாத்ததைவ ச’</strong></p>
<p>அதாவது - ‘சூத்திரன் பிராமணனாகி விடலாம்; பிராமணனும் சூத்திரனாகலாம்; அதே போல், க்ஷத்ரிய மற்றும் வைசிய வர்ணங்களைச் சார்ந்தவர்களின் மகன்களும், மகள்களும் வேறு வர்ணத்தை அடையலாம்’. ஆக, சூத்திரர்கள் வேதம் கற்கக் கூடாது என்று சொல்லும் அதே மனு தர்மம்தான் அவர்கள் வேதம் ஓதும் பிராமணர்கள் ஆகலாம் என்று சொல்கிறது. இதை மற்றோர் விதமாய் சொல்ல வேண்டுமானால், வேதம் ஓத விருப்பம் தெரிவிப்பவன் பிராமணனாக மாறியே அவ்வாறு செய்ய இயலுமேயன்றி சூத்திரனாகவே இருந்து செய்ய இயலாது.  இதில் யாரும் எந்த வகையிலும் தடுக்கப்படவோ ஒடுக்கப்படவோ இல்லை.</p>
<p style="text-align:center;"><strong>அப்ராம்ணாத் அத்யயனம் ஆபத்காலே விதியதே<br />
அனுவ்ரஜா ச சுச்ரூஷா யாவத் அத்யயனம் குரோ:</strong></p>
<p>அதாவது, தவிர்க்க முடியாத காலங்களில் ஒரு பிராமண மாணவன் பிராமணன் அல்லாத குருவிடமிருந்து கல்வி கற்கலாம். அவ்வாறு செய்கையில் அம்மாணவன் அக்குருவிற்கு பணிவிடை செய்ய வேண்டும்.</p>
<p>பிற்போக்கு கண்ணோட்டத்துடன் மனுஸ்ம்ருதியை  அணுகும் முற்போக்குவாதிகளின் கண்களில் முன்னுக்குப்பின் முரணாக தென்படும் இந்த தர்மங்களுக்கு பின்னால் ஆதவனென பிரகாசிக்கும் உண்மை - மனுஸ்ம்ருதி ஜாதி அடிப்படையில் அமைக்கப்பட்டது அல்ல என்பதே.  ஒரு சமூகத்தின் அனைத்து அங்கங்களும் ஒன்றோடு ஒன்று இணைந்து செயல்பட்டால் மட்டுமே சமூக நலன் காக்க முடியும் என்ற கருத்தே இந்த தர்ம நூலின் அடிப்படை. அனைவருமே வேதம் கற்க வந்தாலோ அனைவருமே விவசாயம் செய்யத்தொடங்கினாலோ சமூகத்தில் சீரமைப்பு இருக்க வழியில்லை. வழி வழியாக ஒரு தொழிலை ஒரு குடும்பத்தினர் செய்கையில் அவர்கள் ரத்தத்தில் அது ஊறி விடுமென்று மனுஸ்ம்ருதி கூறுவது முட்டாள்த்தனம். ஆனால் 'ஜீன்' எனப்படும் மரபணுக்கள் நம் முன்னோர்களிடம் இருந்து வருகிறது. அதன் மூலமாகவே பல குணங்களை நாம் பெறுகிறோம் என்று ஆங்கிலேயன் கூறினால் அது விஞ்ஞானம்! </p>
<p>எந்த ஒரு தர்ம சாத்திரத்தையும் வார்த்தைக்கு வார்த்தை அமல்படுத்துவது நடைமுறைக்கு ஒவ்வாத ஒரு விஷயம்!  அது மனு தர்மத்திற்கும் முற்றிலும் பொருந்தும். மனுவின் நீதிகள் அனைத்தையும் ஒரு அரசன் அமல்படுத்த வேண்டியதில்லை. அந்த ராஜ்ஜியத்திற்கு, மக்களின் வாழ்க்கை முறைக்கு எது தேவையோ அவற்றை மட்டும் எடுத்துக் கொள்ளலாம். அவ்வாறே மனுவின் நீதிகளும் கூட வகுக்கப்பட்டுள்ளன.<br />
இதற்க்கு மேலும் மனுவின் தர்மங்கள் பிராமணர்களுக்கு சாதகமாகவும் மாற்ற வர்ணத்தவருக்கு பாதகமாகவும் வகுக்கப் பட்டுள்ளன என்று கூச்சலிடும் இன்றைய பகுத்தறிவாளிகளில் (?) நீங்கள் ஒருவராக இருப்பின் உங்களுக்காக இன்னும் சில உண்மைகள் தொடர்கின்றன.</p>
<p>நான் முந்தைய பதிவில் சொன்னதுபோல் மனு பிராமணர்களுக்கு சில சலுகைகளை வழங்கினாலும், மிகக் கடுமையான விதிகளை விதிக்கிறான். வேதம் ஓதி, சாஸ்திர முறைப்படி வாழாத பிராமணனை மனு தர்மம் மிகக் கடுமையாக அணுகுகிறது.</p>
<p>'மற்றவர் பொருளில் விருப்பம் வைத்து, பொய்யைப் பரப்பி, கர்வம் கொண்டு, பொறாமை உடைய பிராமணன் பூனையின் குணம் கொண்டவன். இப்படிப்பட்ட குணமுடைய பிராமணன் நரகத்தில் வீழ்கிறான். பூனை குணம் கொண்ட பிராமணனுக்கோ, விரதமுடையவன் போன்ற வேடம் போடுகிற பிராமணனுக்கோ, வேதங்களை முறையாகப் பயிலாத பிராமணனுக்கோ, நன்னடத்தை கொண்ட எவனோருவனும் ஒரு சிறிய தானத்தைக் கூட செய்து விடுதல் கூடாது. அவ்வாறு செய்தால் தானம் வாங்கியவனோடு சேர்ந்து தானம் கொடுத்தவனும் துன்பத்தையே அனுபவிப்பான்.'  இதனை, நான் சொல்லவில்லை, பிராமணனுக்கு சலுகைகள் பல வழங்கி மற்றவர்களை ஒடுக்கியதாக பிராமண துவேஷர்கள் சொல்லும் மனு தர்மம் சொல்கிறது.</p>
<p>மீண்டும் சொல்கிறேன், பிராமணர்களுக்கு சிற்சில சலுகைகளை வழங்கினாலும் அவர்கள் மீது பற்பல சுமைகளை ஏற்றுகிறது மனுஸ்மிருதி. இருப்பினும் மனுதர்மம் தவறானது, பேதங்களைக் கற்பிப்பது. இன்றைய இந்திய அரசியல் சாசன சட்டமோ, வெறும் பிறப்பை அடிப்படையாகக் கொண்டு கல்வி, வேலைவாய்ப்பு, வேலையில் பணி உயர்வு, கல்வியில் பண உதவி என எண்ணிலடங்கா சலுகைகளை வழங்குகிறது. அவ்வாறு சலுகை பெறுவோருக்கு எவ்வித கட்டுப்பாடுகளும் இல்லை. இத்தகைய சட்டம் உயரியது, சிறப்பானது. இவ்வாறு காமாலைக் கண்ணோடு எதனையும் பார்ப்பவர்களுக்கு என்ன சொன்னாலும் புரியாது, எத்தனை ஆதாரங்கள் கொடுத்தாலும் விளங்காது.</p>
<p>அனைத்திற்கும் மேல் நான்கு வர்ணங்களைத் தவிர ஐந்தாவது பிரிவு என்றொன்று கிடையாது என்பதை மனு தர்மம் மீண்டும் மீண்டும் வலியுறுத்துகிறது. எனவே, 'தாழ்த்தப்பட்டவர்' என்ற ஒன்று இந்த சாதீய முறை வந்த பின்னரே தோன்றியுள்ளது. 'சாதி' என்ற வார்த்தையே இல்லாத மனுஸ்மிருதியை இதற்க்கு எவ்வாறு குற்றம் கூற இயலும். நான் ஏற்கனவே சொன்னது போல், 'தீண்டாமை' என்ற ஒரு தவறை அனைத்துத் தரப்பினரும் இழைத்துள்ளனர். இன்றும், இந்த கொடுமைகளை செய்பவர்களில் அநேகர் பிராமணரல்லாதோரே. உண்மை அவ்வாறிருக்க, பிராமணரை மட்டும் சாடி வருவது வெறும் சாதி அரசியலே. வெறும் 3% உள்ள பிராமணர்களுக்கு எதிராக மற்ற 97% மக்களிடம் துவேசத்தை ஏற்படுத்தி அதன் மூலம் அவர்களின் ஓட்டைப் பெறுவதற்கு. பாவம், இந்த கேடுகெட்ட அரசியல்வாதிகளின் சூழ்ச்சிக்கு இரையாவது ஏழை பிராமணர்களே.</p>
<p>இன்று நடைமுறையில் இல்லாத 'மனுஸ்மிருதி' என்ற ஒரு விஷயத்திற்காக கூட்டம் போட்டு, பிராமணர்களை மானாவாரியாகத் திட்டி தீர்மானங்கள் எழுப்பும் எனதருமை உடன்பிறப்புகளே! மனுஸ்மிருதி நல்லதா, கெட்டதா என்ற விவாதத்தை சில நாழிகை ஒத்தி வைப்போம். கடந்த மாதம் திருநெல்வேலியில் தகாத உறவு கொண்டமைக்காக ஒரு முஸ்லீம் சகோதரியைக் கல்லால் அடித்தே கொன்றுள்ளனர். இவ்வாறான இன்றளவும் தொடரும் கொடுமைகள் நடக்கும் பொது தாங்கள் எங்கே சென்றிருந்தீர்கள்?</p>
<p style="text-align:center;"><strong>அஜ்யேஷ்டாஸோ அகனிஷ்டாஸ ஏதே<br />
ஸம் ப்ராதரோ வாவ்ருது: ஸௌபகாய<br />
(ரிக்)</strong></p>
<p style="text-align:center;">பொருள்:  உங்க‌ளில் உய‌ர்ந்த‌வ‌ர் தாழ்ந்தவ‌ர் என்று யாரும் கிடையாது. நீங்க‌ள் அனைவ‌ரும் ச‌கோத‌ர‌ர்க‌ளே! என‌வே ஒன்றுப‌ட்டு வாழ்வீர்க‌ளாக‌, மேன்மைய‌டைவீர்க‌ளாக‌!</p>
<p style="text-align:center;"> ---தொடரும், அகத்தெளிவு பிறக்கும் வரை----</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ गांधी , अम्बेडकर और मिट्टी की पट्टियाँ (4 ): मनु स्मृति , गीता आदि:अफ़लातून]]></title>
<link>http://samatavadi.wordpress.com/?p=293</link>
<pubDate>Sat, 19 Apr 2008 10:20:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[जहाँ तक मनुस्मृति , गीता आदि ग्रन्थों ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:left;">जहाँ तक मनुस्मृति , गीता आदि ग्रन्थों के दलित विरोध को पुष्ट करने का प्रश्न है , गांधी जी का दृष्टिकोण स्पष्ट है ।उन्हें यह विश्वास था कि वे हिन्दू धर्म का एक सुधरा स्वरूप भारतीय समाज से ग्रहण करवा लेंगे । उनके दृष्टिकोण को प्रकट करने वाला निम्नलिखित पत्र अलीगढ़ विश्वविद्यालय के संस्कृत के प्रोफेसर हबीबुर रहमान को लिखा गया है । इस पत्र में उन्होंने लिखा , " हिन्दू धर्म की खसूसियत यह है कि उसमें काफी विचार स्वातंत्र्य है । और उसमें हर एक धर्म के प्रति उदार भाव होने के कारण उसमें जो कुछ अच्छी बातें रहतीं हैं , उनको हिन्दूधर्मी मान सकता है । इतना ही नहीं , परन्तु मानने का उसका कर्तव्य है ।ऐसा होने के कारण धर्म ग्रन्थों के अर्थ का दिन-प्रतिदिन विकास होता रहा है । हिन्दू धर्म के नाम से प्रचलित ग्रन्थों में जो कुछ लिखा गया है , वह सबके सब धर्मवचन हैं , ऐसा नहीं है । <strong>वेदपाठ सुननेवाले शूद्र के कान में गरम सीसा डालने की बात अगर ऐतिहासिक मानी जाए , तो मैं उस धर्म को मानने के लिए हरगिज तैयार नहीं हूँ और ऐसे असंख्य हिन्दू हैं ,जो उसे धर्म वचन नहीं मानते हैं । हिन्दू धर्म के लिए एक कसौटी रखी गयी है , जिसको एक बालक भी समझ सकता है । जो बुद्धिग्राह्य वस्तु नहीं है और बुद्धि से विपरीत है , वह कभी धर्म नहीं हो सकती है । और जो सत्य और अहिंसा के विपरीत है , वह भी धर्म नहीं हो सकती ।" </strong>( <em>महादेवभाई की डायरी , खण्ड दो , पृ. १७३ - १७४ </em>)</p>
<p style="text-align:left;">    यरवदा जेल में मथुरादास नामक कार्यकर्ता को समझाते हुए गांधी जी ने कहा , "<strong> गुलामों से बदतर - इन लोगों को जानवर बनाया और इनका हमने यह धर्म बना दिया कि ये लोग अपने कर्मों का कुफल भोगते हैं । यह तो धर्म का राक्षसी स्वरूप है । हिन्दू धर्म का अगर यह अर्थ हो तो मैं भी गीता ,  मनुस्मृति सबको जला डालूँ ।</strong> ( <em>महादेवभाई की डायरी , खण्ड तीन , पृ. २६९ </em> )</p>
<p style="text-align:left;">    अस्पृश्यता को पाप का फल माननेवाले लोग कर्म मार्ग का सबसे बद़्आ अनर्थ करते हैं , ऐसा गांधी जी मानते थे । २५ जुलाई १९३४ को लखनऊ में एक आम सभा में गांधी जी ने कहा , " धर्म के नाम पर दुनिया भर में अस्पृश्यता नहीं देखी है । अमरीका और दक्षिण अफ़्रीका में गोरे काले के बीच इस प्रकार का तिरस्कार और घृणा है लेकिन उसे वे धर्म कार्य नहीं कहते । हिन्दुओं ने ठेका ले रखा है । <strong>चाहे जैसा शौचाचार का पालन करने वाले छह करोड़ लोगों के साथ अस्पृश्यता और घृणा का बर्ताव किया जाता है , जैसे डॉ. अम्बेडकर ।सवर्ण अकिंचन का जो स्थान समाज में है वह अम्बेदकर का नहीं है । सवर्णों के बुद्धिमान के साथ अम्बेडकर बैठ सकते हैं । वे बुद्धि से इतने तीव्र हैं कि किसी से कम नहीं । हरिजन सेवा के लिए उनमें त्याग और बहादुरी भी है । इतना आपको सुनाना चाहता हूँ कि हमारे बीच इस सेवाकार्य में मतभेद होने पर भी उनकी बुद्धि , त्याग व बहादुरी के बारे में मुझे कोई शंका नहीं है । उनके विषय में कहना कि उनका पापी योनि में जन्म है ? चाहे जितना प्रायश्चित करें वे अस्पृश्य रहेंगे , पाप धुलेंगे नहीं ? इससे बड़ा कोई पाप नहीं है , कर्ममार्ग का इससे बड़ा अनर्थ मेरी नजर में कोई नहीं है । " </strong>( <em>महादेवभाई की डायरी (गुजराती),खण्ड-२०, पृ ६३-६४ )</em> ।</p>
<p style="text-align:left;">    डॉ . अम्बेडकर और महात्मा गांधी के बीच दलितों के नेतृत्व को लेकर संघर्ष था । फरवरी १९३७ में हुए प्रान्तीय विधान सभाओं के निर्वाचन परिणामों के फलस्वरूप डॉ. अम्बेडकर ने " कांग्रेस और गांधी ने अछूतों के साथ क्या किया " नामक पुस्तक दलित और विदेशी पाठकों के लिए लिखी । इन चुनावों में अनुसूचित जाति के लिए निर्धारित १५१ सीटों में से कांग्रेस ने ७३ सीटें जीतीं ।इन ७३ सीटों में से अनुसूचित जाति के बहुमत से जीती गयीं ३८ सीटें थीं । डॉ. अम्बे्डकर ने चुनाव के कुछ माह पूर्व ही इन्डिपेण्डेण्ट लेबर पार्टी का गठन किया था । इस पार्टी ने सिर्फ महाराष्ट्र में चुनाव लड़ा जहाँ १५ सुरक्षित सीटों में से १३ पर उसकी जीत हुई  तथा २ सामान्य सीटें भी इसने हासिल कीं थीं । सिवा एक गाली के इस पुस्तक के निष्कर्षों को ही सुश्री मायावती दोहरा रही हैं ।" जाति तोड़ो : समाज जोड़ो " का "आन्दोलन " चला रहे श्री कांशीराम जाति तोड़ने के डॉ. अम्बेदकर द्वारा सुझाये गये चार कार्यक्रमों के सन्दर्भ में क्या कर पाए हैं ? यह उन्हें बताना चाहिए । डॉ. अम्बेडकर के अनुसार जाति-प्रथा के नाश के लिए १. अन्तर्जातीय विवाह - सवर्ण-अवर्ण ,२. धर्म की चिकित्सा ( विषमता बढ़ाने वाले तत्वों की आलोचना) ,धर्मान्तरण तथा ४. दलितों की सामाजिक-आर्थिक उन्नति - ये चार कार्यक्रम बताये गए थे ।</p>
<p style="text-align:left;"><strong>[ जारी ]</strong></p>
<p style="text-align:left;"><strong><a href="http://samatavadi.wordpress.com/2008/04/16/gandhi_ambedkar/">भाग १</a> </strong></p>
<p style="text-align:left;"><strong><a href="http://samatavadi.wordpress.com/2008/04/17/gandhi_ambedkar2/">भाग २</a></strong></p>
<p style="text-align:left;"><strong><a href="http://samatavadi.wordpress.com/2008/04/18/gandhi_ambedkar3/">भाग ३ </a></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ गांधी , अम्बेडकर और मिट्टी की पट्टियाँ (३) : अफ़लातून]]></title>
<link>http://samatavadi.wordpress.com/?p=292</link>
<pubDate>Fri, 18 Apr 2008 05:30:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[    लोकनायक जयप्रकाश और महात्मा गांधी ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>    लोकनायक जयप्रकाश और महात्मा गांधी के जीवन और विचार यात्राओं के विकासक्रम को नजरअन्दाज करके विसंगतिपूर्ण उद्धरण प्रस्तुत किए जाँए तो बहुत आसानी से जे.पी को मार्क्सवादी और गांधीजी को जाति - प्रथा का पक्षधर होने के भ्रामक निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं । गांधी जी को इस प्रकार की विसंगतियों की परवाह नहीं थी । उनकी हर मौलिक ( किसी अन्य व्यक्ति द्वारा सम्पादित अथवा संकलित नहीं ) पुस्तक में " पाठकों से " निवेदन में यह स्पष्ट कहा जाता है कि <strong>" सत्य की खोज " में मैंने कई विचारों का त्याग किया है और नयी चीजें सीखीं हैं । सुधी पाठक , यदि उन्हें मेरी दिमागी दुरुस्ती पर भरोसा हो तो एक ही विषय पर बाद की तिथि में कही गयी बाद की बात को ही ग्रहण करेंगे । </strong>जे.पी. <strong>मेरी विचार यात्रा</strong>  में इसी प्रकार की सावधानी बरतने का पाठकों से आग्रह करते हैं । वर्णाश्रम का जन्मना - कर्मणा सिद्धान्त , जाति - प्रथा तथा रोटी - बेटी व्यवहार के सन्दर्भ में गांधी जी के विचार - आचार के विकासक्रम को उपर्युक्त सावधानी के साथ ही समझा जाना चाहिए । <strong>वर्तमान समय में बुद्धिवादियों का एक समूह सती - प्रथा और वर्णव्यवस्था का पक्षधर है । कुछ राजनैतिक हल्कों में इस समूह को 'हिन्दू नक्सलाइट' नाम दिया गया है ( धरमपाल ,बनवारी आदि) ।  "गांधी बनाम अम्बेडकर" की बहस के बहाने इन लोगों ने वर्णव्यवस्था के पक्ष में तथा जाति प्रथा को मजबूत करने के हेतु से गांधी जी के कुछ अद्धरण प्रस्तुत किये हैं । ऐसा करना उनकी बौद्धिक बेईमानी का परिचायक है ।</strong></p>
<p>    गांधी जी वर्णव्यवस्था का आधार जन्मना और कर्मणा दोनों मानते थे । पुश्तैनी गुणों के संरक्षण की अपनी परिकल्पना के कारण उन्होंने अपने वर्न में विवाह को कफी समय तक इष्ट माना । हालांकि रोटी-बेटी के प्रतिबन्ध हिन्दू धर्म के अविभाज्य अंग नहीं हैं ऐसा उनका मानना था । अस्पृश्यता के मसले पर कांग्रेस ने हिन्दू महासभा को सहयोगी बनाया था । डॉ. अम्बेडकर ने इसकी आलोचना की है । परन्तु महामनाअ मालवीय द्वारा साम्प्रदायिकता का विरोध तथा काशी विश्वविद्यालय में दलित छात्र-छात्राओं के पठन-पाठन तथा छात्रावासीय जीवन में आनेवाली जातीय-विभेद तहा छूआछूत की कठिनाइयों को दूर करने उनके द्वारा स्वयं पहल करने के उदाहरण से इस 'सहयोग' का सकारात्मक पहलू प्रकट होता है। काशी विश्वविद्यालय के दो चर्चित पूर्व विद्यार्थी श्री रामधन ( अब स्वर्गस्थ)  और स्व. जगजीवनराम के छात्र जीवन के अनुभव इसके प्रमाण हैं । परस्पर सम्मान के बावजूद महामना और गांधी जी के बीच रोटी - बेटी के प्रतिबन्ध के सन्दर्भ में मतभेद था । कलकत्ता की एक महिला कार्यकर्ता ने गांधी जी से इस मतभेद की बात पूछी थी । उसे गांधी जी ने उत्तर दिया - " रोटी - बेटी का प्रतिबन्ध हिन्दू-धर्म का अविभाज्य अंग नहीं है । यह रूढ़ि हो गई है । हरिजनों और दूसरी जातियों के बीच हरगिज भेद नहीं रचा जा सकता है ( <em>महादेव भाई की डायरी , खण्ड दो , पृ. ११७ </em>) । सोनार जाति के एक सज्जन ने अन्तर्जातीय विवाह करने के सन्दर्भ में गांधी जी से व्यक्तिगत सलाह मांगी थी । गांधी जी ने उन्हें लिखा,"जात-पाँत की पाबन्दियों का धर्म के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है । यह सही है कि वह हिन्दू धर्म में बहुत समय से चली आ रही रूढ़ि बन गयी है । मगर रूढ़ियां तो समय - समय पर बदलती ही रहती हैं ।" ( <em>महादेव भाई की डायरी , खण्ड दो , पृ. १५५ </em>) । एक आर्यसमाजी श्री धर्मदेव ने वर्णाश्रम के सन्दर्भ में यरवदा जेल में १७ -१-१९३३ को गांधीजी से लम्बी बातचीत हुई थी । वर्णाश्रम पर बोलते हुए गांधी जी ने कहा " मेरी तो आजकल साधना चल रही है ।इस मामले में मैं आत्मविश्वास से नहीं बोल सकता क्योंकि मेरी साधना थोड़ी है । " ( <em>महादेवभाइ की डायरी खण्ड - ३ ,पृ. ६१ </em>) उसी दिन लेडी टेकरसी ने गांधी जी से मिश्र विवाह की बात छेड़ी औए कहा " ये सनातनी इस मिश्र विवाह से बहुत डर गए हैं। " गांधी जी ने कहा - " अब यह भी मैं समझा दूँ । आज अस्पृश्यता के सिलसिले में मैं इसका प्रचार नहीं करता । पर इसमें कोई शक नहीं कि यह चीज मुझे पसन्द है । इसी चीज के बारे में निरन्तर विचार चलते रहते हैं और मेरे विचार अधिकाधिक स्पष्ट होते जा रहे हैं । मेरे सामने सवाल किया जाए तब जवाब देते-देते भी मेरे विचारों में स्पष्टता बढ़ती रहती है । " ( <em>महादेवभाई की डायरी , भाग - ३ , पृ. ६६-६७ </em>) । सुरेश बनर्जी नामक एक कार्यकर्ता ने लिखा कि बंगाल में जात-पांत टूटे यही अस्पृश्यता निवारण कहलाएगा । उन्हें गांधीजी ने लिखा - " मैं आप से इस बारे में पूरी तरह सहमत हूँ कि जातियों को नष्ट होना ही पड़ेगा । लेकिन यह मेरी जिन्दगी में होगा या नहीं , यह मैं नहीं जानता। इन दोनों मुद्दों को  एक दूसरे से मिलाकर हमें दोनों को बिगाड़ना नहीं चाहिए । अस्पृश्यता आत्मा का हनन करने वाला पाप है । जात-पांत सामाजिक बुराई है । आप अपनी हमेशा की लगन के साथ जात-पांत से भिड़ जाइए । इसमें आपको मेरा अच्छा सहयोग मिलेगा ।" ( <em>महादेवभाई की डायरी ,खण्ड दो , पृ. १०४ ) </em>। इसी दौर में वर्ण व्यवस्था के वर्तमान स्वरूप के बारे में गांधी जी ने १४ - २ - १९३३ को कहा - " हम, सब शूद्र हो गए हैं इस अर्थ में मैं अम्बेडकर से सहमत हूँ ।"( <em>महादेवभाई की डायरी खण्ड तीन , पृ, - १४३ ) </em>। डॉ. अम्बेडकर ने मई १९३६ के एक लेख में गांधी जी के इस विषय पर दृष्टिकोण के सन्दर्भ में लिखा था , " हमें प्रतीक्षा करनी चाहिए कि उन्होंने जिस तरह जाति पर विश्वास करना छोड़ दिया है , उसी तरह वे वर्ण में विश्वास करना छोड़ देंगे । " ( <em>राष्ट्रीय सहारा , २४-४-९४ द्वारा उद्धृत डॉ. अम्बेडकर का मई १९३६ का लेख ) </em>।</p>
<p>    १९४५ से गांधी जी ने घोषित कर दिया था कि वे सिर्फ उन विवाहों में शामिल होंगे जिनमें एक पक्ष हरिजन हो । <strong>इस लेखक के माता-पिता का विवाह अन्तर्जातीय और अन्तरप्रान्तीय था - गांधी जी ने उन्हें आशीर्वाद के पत्र में लिखा कि अन्तरप्रान्तीय विवाह होने के कारण तुम्हें न्यूनतम उत्तीर्ण होने के अंक दूंगा लेकिन प्रथम श्रेणी के अंक तो सवर्ण-अवर्ण विवाह को ही मिलेंगे ।</strong> सवर्ण दलित विवाहों के सन्दर्भ में ७ - ७ - १९४६ के 'हरिजन ' में गांधीजी ने लिखा " ऐसे विवाहों की अन्तिम कसौटी यह है कि वे दोनों पक्षों में सेवाभाव विकसित करें । ऐसे विवाह से जुड़ी रूढ़िजन्य कठिनाइयाँ हर अन्तर्जातीय विवाह द्वारा किसी हद तक दूर होती जाएंगी । अन्तत: एक ही जाति रह जाएगी जिसे हम भंगी के सुन्दर नाम से जानते हैं - भंगी यानी सुधारक अथवा गन्दगी को दूर करनेवाला । हम सब प्रार्थना करें कि ऐसा मंगल-प्रभात शीघ्र होगा ।" ( <em>कलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ महात्मा गांधी , खण्ड - ८४ , पृ. ३८८-३८९ ) </em>। जातियों के उन्मूलन के बाद वर्गों का  विभाजन आड़ा ( हॉरिज़ॉन्टल) होगा ,खड़ा (वर्टिकल) नहीं - गांधीजी ने ऐसी कल्पना की है ।</p>
<p><strong>[ जारी ]</strong></p>
<p><strong><a href="http://samatavadi.wordpress.com/2008/04/16/gandhi_ambedkar/" target="_blank">भाग १ </a></strong></p>
<p><strong><a href="http://samatavadi.wordpress.com/2008/04/17/gandhi_ambedkar2/" target="_blank">भाग २</a></strong></p>
<p> </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[गांधी , अम्बेडकर और मिट्टी की पट्टियाँ (२) : अफ़लातून]]></title>
<link>http://samatavadi.wordpress.com/?p=290</link>
<pubDate>Thu, 17 Apr 2008 08:29:31 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[ 

Technorati tags: गांधी, अम्बेडकर, gandhi, ambedkar


भाग एक
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="left"> </p>
<p align="left">
<div id="0a5eaee6-7ba8-4da2-b409-cafd9eec743a" class="wlWriterSmartContent" style="display:inline;margin:0;padding:0;">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%80">गांधी</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%85%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%a1%e0%a4%95%e0%a4%b0">अम्बेडकर</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/gandhi">gandhi</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/ambedkar">ambedkar</a></div>
</p>
<p align="left">
<div class="wlWriterSmartContent" style="display:inline;margin:0;padding:0;"><a href="http://samatavadi.wordpress.com/2008/04/16/gandhi_ambedkar/" target="_blank">भाग एक</a></div>
</p>
<p align="left">    गांधीजी पर कांशीराम ने कानपुर में हुए एक पिछड़ी जाति सम्मेलन में एक आरोप लगाया था कि उन्होंने सरदार पटेल की उपेक्षा करके पंडित जवाहरलाल नेहरू को प्रधानमन्त्री की कुर्सी दिलवाई थी । इस आरोप की छानबीन करना गैरजरूरी है लेकिन इस आरोप के पीछे जो मक़सद छिपा है उसे जान लेना जरूरी है । इससे ब्राह्मणवाद की बसपाई समझ और सोच का पता चलता है । उत्तर प्रदेश और बिहार के कुर्मी सरदार पटेल को स्वजातीय मानते हैं । कुर्मी समाज के लोग सरदार पटेल के नाम से शिक्षण संस्थाएं चलाते हैं । <strong>उन्हें यह जानकर अत्यन्त आश्चर्य होता है कि गुजरात में पिछड़ों के लिए आरक्षण के विरोध की कमान पटेलों के हाथ में ही थी ।(यहाँ, मण्डल लागू होने के पूर्व गुजरात के बक्षी-आयोग की संस्तुतियों के विरोध का सन्दर्भ है ।) </strong>' महात्मा गांधी और कांग्रेस ने अछूतों के साथ क्या किया ' डॉ. अम्बेडकर ने अपनी इस चर्चित पुस्तक में सरदार पटेल के 'सत्ताधारी वर्ग' का होने के 'ब्राह्मणवादी गुमान' का वर्णन किया है । (<em> पृ. २०९ , डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेस , खण्ड-१,प्रकाशक : शिक्षा विभाग , महाराष्ट्र शासन)</em>।</p>
<p align="left">    लेकिन कांशीराम ऐसे उद्धरण देने की मूर्खता क्यों करें ? बाबा साहब के विचारों को ऐसे चालाक संशोधनों के साथ न ग्रहण करने पर घाटा हो जाएगा , इसलिए बसपा के प्रशिक्षण शिविरों में गांधी-नेहरू-पटेल पर ये नये 'तथ्य' धड़ल्ले से चलाये जाते हैं ।</p>
<p align="left">    गांधी जी के राष्ट्रीय पटल पर आने के बाद कांग्रेस एक अभिजात समूह से सर्वसाधारण का जन संगठन बनी । डॉ. अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक में इस बात का पूरा श्रेय गांधी जी को दिया है ( <em>वही , पृ. १९ , १६२ </em>) । दलितों के प्रश्न के सन्दर्भ में गांधी जी के आगमन के बाद जो तब्दीली आई , वह गौरतलब है । दलितों के बीच बड़प्पन दिखा कर नसीहत देने की वृत्ति गांधी जी के गले नहीं उतरती थी और उन्होंने कांग्रेस की इस कार्यशैली को बदला। इस महत्वपूर्ण परिवर्तन की चर्चा गांधी जी ने सरदार पटेल और महादेव देसाई से यरवदा जेल में इस प्रकार की थी , ' आज इस प्रश्न ने जो स्वरूप ग्रहण किया है , उस के लिए शुरु से ही इस विषय की वृत्ति जिम्मेदार है । जब १९१५ में गोखले गुजर गये और मैं पूना के सर्वेन्ट ऑफ इण्डिया सोसाइटी के हॉल में रहा था, तभी मैंने यह देख लिया था ।वह प्रसंग मुझे अच्छी तरह याद है । मैंने देवधर से उनकी प्रवृत्तियों का संक्षिप्त विवरण मांगा , जिससे मुझे पता चले कि मुझे क्या काम हाथ में लेना है : इस विवरण में यह था कि 'उनके पास जाकर भाषण देना , उन पर कैसे अन्याय होते हैं इस बारे में उनमें जागृति लाना वगैरा' ।मैंने देवधर से कह दिया था कि मैंने मांगी रोटी और उसके बदले पत्थर मिलता है । इस ढंग से अस्पृश्यों का काम कैसे हो सकता है ? यह सेवा नहीं है । यह तो हमारा मुरब्बीपन है। अछूतों का उद्धार करने वाले हम कौन हैं? हमें तो इन लोगों के प्रति किये पाप का प्रायश्चित करना है , कर्ज लौटाना है । यह काम इन लोगों को अपनाने से होगा,इनके सामने भाषण करने से नहीं होगा। शास्त्री घबराये और बोले , ' मुझे यह उम्मीद नहीं थी कि आप इस तरह न्यायासन पर बैठ कर बात करेंगे ।' हरिनारायण आपटे भी बहुत चिढ़े । हरिनारायण को मैंने कहा - ' मालूम  होता है आप लोग तो समाज में विद्रोह करायेंगे।'.......इस तरह बड़ी बहस हुई थी । मैंने दूसरे दिन शास्त्री , देवधर , आपटे सबसे कह दिया - ' मुझे कल्पना नहीं थी कि मैं आपको दुख दूंगा।' मैंने माफी मांगी और इन लोगों पर अच्छा असर पड़ा।बाद में तो हम लोगों की बन गयी। '</p>
<p align="left">    वल्लभ भाई -  " आपकी तो सभी के साथ बन जाती है ।आपको क्या है ? बनिये की मूँछ नीची।'</p>
<p align="left">    बापू बोले - ' देखो इसलिए मैं काट डालता हूँ न ?'</p>
<p align="left"><a href="http://samatavadi.files.wordpress.com/2008/04/windowslivewriterd89ccda31f8e-a484withpatel6.gif"><img src="http://samatavadi.files.wordpress.com/2008/04/windowslivewriterd89ccda31f8e-a484withpatel-thumb4.gif" alt="" height="380" /></a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ गांधी - अम्बेडकर और मिट्टी की पट्टियाँ : अफ़लातून]]></title>
<link>http://samatavadi.wordpress.com/?p=287</link>
<pubDate>Wed, 16 Apr 2008 15:31:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
<guid>http://samatavadi.wordpress.com/?p=287</guid>
<description><![CDATA[[ मेरे नेता किशन पटनायक ने मुझसे ' गांधी]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>[ मेरे नेता किशन पटनायक ने मुझसे ' गांधी - अम्बेडकर ' पर गहराई से अध्ययन करने के लिए कहा था। फलस्वरूप मैंने 'गांधी - अम्बेडकर और मिट्टी की पट्टियाँ' शीर्षक से लम्बा लेख लिखा । दल की पत्रिका 'सामयिक वार्ता' में यह अक्टूबर १९९४ में प्रकाशित हुआ तथा अन्य भाषाओं में इसका अनुवाद भी हुआ । मुझे यकीन है कि चिट्ठालोक के पाठक इसे पढ़ेंगे । - अफ़लातून ]</strong></p>
<p><strong>    </strong>' टाइम्स ' के संवाददाता मैक्रे और गांधीजी की ६ फरवरी १९३३ को यरवदा जेल में एक अच्छी भेंटवार्ता हुई । गांधीजी के सिर पर लगी हुई मिट्टी की पट्टी के बारे में उसने पूछा । ' रिटर्न टू नेचर ' नामक पुस्तक पढ़कर सन १९०५ में सिर पर पट्टी बाँधना कैसे शुरु किया था , और उसके बाद सैंकड़ों मौकों पर किस तरह उस पर अमल किया , यह बापू ने उसे बताया । किसी अच्छी चीज को पढ़कर तुरन्त उस पर अमल करने की बात गांधीजी के मन में कैसे आती है इसका उदाहरण रस्किन की ' अन टू दिस लास्ट ' नामक पुस्तिका थी जिसे पढ़कर उन्होंने जीवन परिवर्तन किया । गांधीजी ने यह बातें सरल ढंग से मैक्रे को सुनाई । उसे मजेदार तो लगीं , लेकिन ये बातें ' टाइम्स ' को भेजे तो वह क्यों उन्हें छापेगा ? इसलिए उसने धीरे से पूछा - " पर अम्बेदकर के लिए आपके पास कोई मिट्टी की पट्टियाँ हैं ? "</p>
<p>    बापू बोले - मुझे मालूम नहीं । पर हमारे मतभेदों से दोनों के सिर चढ़ जांए तो जरूर मट्टी की पट्टियाँ ढूँढनी पडेंगी। मेरे और उनके बीच ज्यादा मतभेद की गुंजाइश नहीं है क्योंकि अधिकतर मामलों में ऐक्य है । मतभेद की मुझे परवाह नहीं है । मेरे पास सवर्णों से कर्ज अदा करवाने के सिवाय दूसरा काम नहीं है । ( <em>महादेवभाई की डायरी ,खस्ण्ड तीन , पृ.१२८ )</em>  ।</p>
<p>    मायावती - कांशीराम द्वारा छेड़ी गयी बहस गांधीजी के कथित पैरवीकारों तथा डॉ. अम्बेडकर के तथाकथित उत्तराधिकारियों के सिर पर चढ़ती नजर आ रही है इसलिए मिट्टी की कुछ पट्टियाँ ढूँढ़ने का प्रयास जरूरी है ।स्वेच्छा से अछूत बनने का असाधारण दावा करनेवाले महात्मा गांधी डॉ. अम्बेडकर से विनम्रतापूर्वक यह कह सकते थे , ' आप मेरे लिए कोई अपमानजनक या क्रोधजनक शब्द काम में लेते हैं , तब मैं अपने दिल से यही कहता हूँ कि तू इसी लायक है। आप मेरे मुंह पर थूकें , तो भी मैं गुस्सा नहीं करूँगा । यह मैं ईश्वर को साक्षी रखकर कहता हूँ इसीलिए कि मैं जानता हूँ कि आपको जीवन में बहुत कड़वे अनुभव हुए हैं । ' ( <em>महादेवभाई की डायरी , खण्द दो, पृ. ६१ </em>) मायावती की टिप्पणियों और गालियों के प्रति गांधीजी के पैरवीकार क्या इतने साफ़ दिल का परिचय दे रहे हैं ? इष्टदेव की प्रतिमा को विधर्मी द्वारा स्पर्श कर लेने पर भक्तगणों के हाहाकार मचाने की छवि इस मसले के साथ उभर आई है । अस्पृश्यता निवारण , सामाजिक न्याय और जातिप्रथा उन्मूलन के लक्ष्यों से वर्तमान में सरोकार न रखकर भी हम डॉ. अमेडकर या गांधीजी की पैरवी किए जा रहे हैं । एक राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक के मुख्य सम्पादक और साहित्यकार अस्पृश्यता को पराकाष्ठा तक अपनाये हुए हैं । 'पंक्ति-पावन' होने के लिए खुद के बरतन लेकर चलते हैं मानो स्वयं को 'अस्पृश्य' बना लिया हो । इलाहाबाद के दौना गाँव की दलित महिला शिवपती को निर्वस्त्र करनेवाले दबंग पिछड़ों का बचाव इसी जाति का बसपा विधायक खुले आम करता है । शरीर श्रम की अप्रतिष्ठा दिलों में भर कर मंदल विरोधी छात्र सड़कों पर जूता-पॉलिश करने ,कपड़े धोने और सब्जी बेचने को 'अहिंसक प्रतिकार पद्धतियों में शामिल करा चुके हैं । मौजूदा परिस्थिति की इन दुखद झलकियों को धुंधला करके इस विषय पर बहस करना बेमानी है और बेईमानी भी ।</p>
<p><strong>[ जारी ]</strong></p>
<p><img style="vertical-align:text-bottom;" src="http://www.aapf.org/focus/images/ambedkar.jpg" alt="" width="240" height="240" />    </p>
<p><img style="vertical-align:bottom;" src="http://www.gwu.edu/~erpapers/humanrights/timeline/gandhi-india.jpg" alt="" width="345" height="245" /></p>
<p style="text-align:left;">   </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[डॉ. अम्बेडकर : एक चेताने वाली कथा : ले. महादेव देसाई]]></title>
<link>http://samatavadi.wordpress.com/?p=285</link>
<pubDate>Mon, 14 Apr 2008 06:40:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[   [ आज बाबासाहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>  <strong><em> [ आज बाबासाहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की जन्म तिथि है । १९३२ में पुणे के यरवड़ा जेल में उनकी और गाँधीजी की अंग्रेजों द्वारा घोषित पृथक निर्वाचन मन्डल पर वार्ता चली जिसके फलस्वरूप प्रसिद्ध पूना समझौता हुआ । इसी दौर में बाबासाहब ने अपने जीवन की आपबीती गांधीजी के सचिव और 'हरिजन' पत्र के सम्पादक महादेव देसाई को सुनाई । गांधीजी के गुजराती पत्र 'हरिजनबन्धु' में महादेव देसाई १९३२ में यह 'कथा' लिखी । अनुवाद मेरा है : अफ़लातून ] </em></strong></p>
<p><img style="vertical-align:middle;" src="http://www.sikhspectrum.com/122002/images/ambedkar.jpg" alt="Dr. B.R. Ambedkar" width="304" height="395" /></p>
<p><em><strong>   </strong></em> डॉ. अम्बेडकर की गांधीजी के साथ भेंट के बारे में अखबारों में " गप्पगोले " चलने लगे हैं । नागपुर से किसी ने लिखा है कि वे दस वर्ष तक धर्मान्तरण न करने का गाम्धी जी को वचन दे आए हैं । ये सब बैठे ठाले हांकी गई गप्पें ही हैं । धर्मान्तरण करने या न करने के सन्दर्भ में गांधी जी की राय की डॉ. अम्बेडकर को आवश्यकता लगी ही नहीं है । उन्होंने जो बातें की वे मैं यहाँ प्रकट नहीं कर सकता हूं, परन्तु भेंट के दरमियान उनका मानस समझने का जो सुयोग मिला उसका लाभ " हरिजनबन्धु " के पाठकों को मुझे देना चाहिए । हिन्दू धर्म से ऊबने के कौन से कारण हैं यह मैंने उनसे नहीं पूछा , परन्तु कुछ हिन्दू धर्मियों के उन्हें जो अनुभव हुए हैं उनके कारण उनके जीवन में एक असाध्य कड़वाहट भर गई है । डॉ. अम्बेडकर के अनेक आलोचक गांधी जी से मिलने आते हैं । ये लोग गांधी जी के बारे में उनकी कड़वाहट की याद गांधी जी को दिलाते हैं , परन्तु गांधी जी उन्हें उलट कर कहते हैं , " यह रोष और क्रोध करने का डॉ. अम्बेडकर को अधिकार है । यह उनकी भलमनसाहत है कि वे अधिक प्रहार नहीं कर रहे हैं ।उन पर क्या बीती है यह हमें जानना चाहिए ।" यह आपबीती उन्होंने मुझे सुनाई ।</p>
<p>     " दापोली रत्नागिरी जिले की एक तहसील है । दापोली की पाठशाला में मैंने पढ़ाई की शुरुआत की थी । मेरे अपमानित जीवन के अध्ययन की शुरुआत भी तब से ही शुरु हुई । पाठशाला में हमारे बैठने की व्यवस्था क्यों होती ? बाहर बरान्दे में अथवा आंगन में कक्षा एक से अन्तिम दरजे तक के महार लड़कों के साथ बैठना पड़ता था । शिक्षक की कृपा हो जाती तब एक बार पूछ लेते , " क्यों बे , कायदे से पढ़ रहे हो , न ?" इस सब में मेरा कल्याण नहीं है , यह समझ कर मेरे पिता मुझे सतारा ले गए । मेरे बाप दादा फौज में थे।  मेरे पिताजी को फौज की पेंशन मिलती थी , इसलिए उनका दरजा नीचा तो नहीं कहा जाता था। परन्तु हमें हजाम नहीं मिलता था। मेरी एक बहन छ: भाइयों की हजामत करती थी । सतारा हाईस्कूल में भी अलग बेच पर बैठना था । मुझे संस्कृत सीखने की इच्छा थी , लेकिन संस्कृत शिक्षक मुझे कक्षा में बैठने नहीं देता था । इसलिए मुझे फारसी लेनी पड़ी और बम्बई गया । बम्बई के एक स्कूल से मैट्रिक करके मैं एल्फिन्स्टन कॉलेज में गया । वहाँ से बी.ए. किया उसकी पहले की मेरी तकलीफ़ों की कथा श्री सायाजीराव गायकवाड़ तक किसी मित्र ने पहुंचाई। उन्होंने मुझे वजीफ़ा दिया औए बी.ए. कर लेने पर बडौदा बुलाया। वहाँ फौज में लेफ्टिनेन्ट जगह दी और फिर वजीफा दे कर अमेरिका भेजा । इन कुछ महीनों में बडौदा में फौजी छावनी के मकान में रहता था । "</p>
<p>    " आपको रहने का स्थान नहीं मिला था, वह इसके बाद की बात है ? " " हां , वह तो अमेरिका से मैं डाक्टरेट करके लौटा तब की है । मैं डिग्री ले कर आ तो गया , पर रहने के लिए घर नहीं मिल रहा था । गायकवाड़ सरकार से कहा कि मुझे कॉलेज में प्रोफेसर नामित कीजिए तो अच्छा हो ,रहने की जगह तो मिल जाएगी । परन्तु वे मेरे अर्थशास्त्रीय ज्ञान का उपयोग करना चाहते थे इसलिए मुझे उन्होंने वित्त विभाग में रखा । मेरी विडम्बना का पार न था । घर की तलाश में भटकते भटकते  थक गया पर घर न मिला । एक पारसी धर्मशाला थी , उसके सामने पहुंचा। मैं पारसी नहीं हूं इसलिए राजी खुशी क्यों रहने देंगे ? परन्तु धर्मशाला में कोई और नहीं था ।उसके चौकीदार ने मुझे तरकीब बतायी। पारसी नाम धारण कर लें तब रह सकते हैं , ऐसा उसने कहा । मैं पारसी नाम धारण करके रहने लगा। कुछ दिन ऐसे ही चला। पहले फौज की छावनी में रहता था तब मुझे जिन लोगों ने देखा था , वे पहचान गए। पारसी युवकों की एक टोली एक दिन लाठी लेकर आई और मुझसे कहा , 'निकल नहीं तो तुम्हारी जान चली जाएगी।" मैंने उनसे शाम तक की मोहलत मांगी और शाम को ही निकल गया। एक बार मिस्टर सैम्युअल जोशी ने मुझसे अपने घर रहने का आग्रह किया था ,उस प्रस्ताव का लाभ उठाने का मन हुआ। मैं वहां गया जरूर लेकिन मिस्टर सैम्युअल जोशी का मन परख न सका। फिर स्वर्गीय कुडालकर के यहां गया। वे मेरे मित्र थे ,अच्छा सम्बन्ध रखते थे। उन्होंने मुझे रहने के लिए कहा जरूर, साथ यह भी जना दिया कि नौकर जान जाएंगे तो सब भाग जाएंगे, रसोइया भी नहीं रहेगा। मैं उन्हें इतनी कठिनाइयों में क्यों डालता ? मैंने बडौदा से विदा ली और बम्बई से महाराज साहब को पत्र लिखकर अपनी दिक्कतों का वर्णन किया । उन्होंने मुझे बडौदा लौटने को कहा। मैं गया । राज्य के अतिथि गृह में टिका। रोज के छ: रुपये बीस दिन तक भरे लेकिन गायकवाड़ सरकार से मुलाकात नसीब न हुई । मैं लौट आया । "</p>
<p><strong>[ जारी ]</strong> </p>
<p> </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[Reason For Anger Against Upper Caste In Modern India]]></title>
<link>http://praveengeorge.wordpress.com/?p=33</link>
<pubDate>Fri, 11 Apr 2008 17:50:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>praveengeorge</dc:creator>
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<description><![CDATA[The current anger against uppercaste is due to the last decade of divisive politics by the biggest b]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>The current anger against uppercaste is due to the last decade of divisive politics by the biggest brahmin effort in Indian history to undermine national interests called B.J.P .India was very close to getting healed from the wounds of partition and was on the path to becoming an equal opportunity country.BJPs crookedness combined with the RSS and VHPs attempt to potray fellow citizens in India as anti nationals and spread hatred among citizens has dealt a major blow to national integrity.No discussion on decadence of civil liberties in India will be complete without a reference to the last decade of the "Politics of Hatred" unleased by the stalwarts of brahminism.The past decade is replete with tales of insults,abuse , campaigns of misinformation and denial of civil rights by uppercaste, not to mention an aborted attempt by BJP to infiltrate the Indian Army with it's Sympathizers.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शिक्षा , मलाईदार परतें और गैर आरक्षित क्रीमी लेयर]]></title>
<link>http://samatavadi.wordpress.com/?p=284</link>
<pubDate>Fri, 11 Apr 2008 06:28:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[    शिक्षा की अपनी एक दुनिया है । वहीं श]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:left;">    शिक्षा की अपनी एक दुनिया है । वहीं शिक्षा-जगत व्यापक विश्व का एक हिस्सा भी है - एक उप व्यवस्था । उप व्यवस्था होने के कारण व्यापक विश्व के- मूल्य , विषमतायें , सत्ता सन्तुलन आदि के प्रतिबिम्ब आप यहाँ भी देख सकते/सकती हैं । हर जमाने की शिक्षा व्यवस्था उस जमाने के मूल्य , विषमताओं , सत्ता सन्तुलन को बरकरार रखने का एक औजार होती है । हमारी तालीम में एक छलनी-करण की प्रक्रिया अन्तर्निहित है । लगातार छाँटते जाना । मलाई बनाते हुए, छाँटते जाना। उनको बचाए रखना जो व्यवस्था को टिकाए रखने के औजार बनने 'लायक' हों । इस छँटनी-छलनी वाली तालीम का स्वरूप बदले इसलिए एक नारा युवा आन्दोलन में चला था - <strong>'खुला दाखिला ,सस्ती शिक्षा । लोकतंत्र की यही परीक्षा'</strong> यानि जो भी पिछली परीक्षा पास कर चुका हो और आगे भी पढ़ना चाहता हो , उसे यह मौका मिले। १९७७ में यही नारा लगा कर हमारे विश्वविद्यालय में 'खुला दाखिला' हुआ था । इस नारे को मानने वाले उच्च शिक्षा में आरक्षण के विरोधी थे और नौकरियों में विशेष अवसर के पक्षधर । इस नारे की विफलता के कारण शिक्षा में आरक्षण की आवश्यकता आन पड़ी ।</p>
<p style="text-align:left;">     न्यायपालिका (जहाँ आरक्षण नहीं लागू है) ने सांसद-विधायकों के बच्चों को क्रीमी लेयर मान कर आरक्षण से वंचित रखने की बात कही है । क्रीमी लेयर के कारण वास्तविक जरूरतमंद आरक्षण से वंचित हो जाते हैं यह माना जाता है। अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति में क्रेमी लेयर के rider से न्यायपालिका ने इन्कार किया है । तीसरे तबके में क्रीमी लेयर की बाबत जज चुप हैं। क्या अनारक्षित वर्ग में मलाईदार परतें नहीं हैं ? क्या विश्वविद्यालयों में इस तबके मास्टरों के बच्चे उन्हीं विभागों में टॉप करने के बाद वहीं मास्टर नहीं बनते ? क्या अनारक्षित वर्ग के अफ़सरों के बच्चे अफ़सर नहीं बनते ? नेता के बच्चे नेता भी हर वर्ग में बनते हैं ।  गैर मलाईदार वर्गों के साथ उन्हें स्पर्धा में क्यों रखा जाता है ? <strong>गैर आरक्षित वर्ग के क्रीमी लेयर पर भी  rider लगाने की बहस भी अब शुरु होनी चाहिए ।</strong></p>
<p style="text-align:left;">    पिछड़े वर्गों के कुछ अभ्यर्थी खुली स्पर्धा से भी चुने जाते हैं और अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के भी । हर साल लोक सेवा आयोग द्वारा अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति के अभ्यर्थियों के सामान्य वर्ग में चुने जाने की तादाद बढ़ने की स्वस्थ सूचना प्रेस कॉन्फ़रेन्स द्वारा दी जाती है। सामान्य सीटों पर उत्तीर्ण होने वाले पिछड़े वर्गों के अभ्यर्थियों की गिनती 'कोटे' के तहत क्यों नहीं की जाती इसे मण्डल कमीशन की रपट में बहुत अच्छी तरह समझाया गया है ।</p>
<p style="text-align:left;">  सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कल दिए गए फैसले के बाद हमारे समाज की यथास्थिति ताकतें ( जैसे मनुवादी मीडिया और फिक्की , एसोकेम जैसे पूंजीपतियों के संगठन ) फिर खदबदायेंगी , यह लाजमी है ।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[மனு தர்மமும், மானிடமும்]]></title>
<link>http://nerkondapaarvai.wordpress.com/?p=10</link>
<pubDate>Sat, 05 Apr 2008 19:27:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>Lakshminarayanan</dc:creator>
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<description><![CDATA[இந்து சாஸ்திரங்களுக்காக போராடும் நம]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:left;">இந்து சாஸ்திரங்களுக்காக போராடும் நம் நண்பர்களே சிறிது அடங்கிப் போகும் ஒரு விஷயம் மனு ஸ்மிருதி. ஏனெனில், இன்றுள்ள சாதிய முறைக்கும், இத்தனை ஆண்டு காலம் நிகழ்ந்த தீண்டாமைக் கொடுமைகளுக்கும் மனு ஸ்மிருதியே காரணம் என்ற ஒரு கருத்து அனைவரது (இந்துக்கள், பிராமணர்கள் உட்பட) ஆழமாக விதைக்கப்பட்டு விட்டது.</p>
<p>பிராமண துவேஷம் எங்கெல்லாம் நடக்கிறதோ (தமிழகத்தில் மட்டுமல்ல, எல்லா இடங்களிலும்) அங்கெல்லாம் மேற்கோள் காட்டப்படுவது ' மனு ஸ்மிருதி' எனப்படும் மனுவின் நீதி நூல். இது நீதி நூல் என்பதையே பலரும் அறிந்திருக்க வாய்ப்பில்லை. மனிதர்களால் உருவாக்கப்பட்டு, காலத்திற்கேற்ப மாறுவது 'ஸ்மிருதி' . அந்தந்த கால கட்டத்திற்கும் , மக்களின் வாழ்க்கை முறைக்கும் ஏற்ப, பல்வேறு ஸ்மிருதிகள் உருவாக்கப்பட்டுள்ளன. இப்போது அனைவராலும் தூற்றப்படும் மனு ஸ்மிருதி கிருதா யுகத்திற்க்கானது. இதை கலி யுகத்தில் பயன்படுத்தியது நம் முன்னோர்கள் செய்த முதல் தவறு. ஆயினும், மனு ஸ்மிருதியில் எவ்வித பிழையும் இல்லை, அதை உறுதி செய்யவே இந்தக் கட்டுரை.</p>
<p>முதலில் மனு ஸ்மிருதியில் குறிப்பிடப்பட்டுள்ள வர்ணாசிரம முறைகள் அதன் ஒரு மிகச் சிறிய பகுதி என்பதை அனைவரும் உணர வேண்டும். கல்வி, வாழ்க்கை முறை, பக்தி, குற்றங்கள், தண்டனைகள், போர் முறை, திருமணம், சாட்சி சொல்லும் முறை, ஒற்றர்கள் என பல சமுதாய, அரசியல் விஷயங்களும் மனு ஸ்மிருதியில் விவாதிக்கப்பட்டுள்ளன. ஆயிரக்கணக்கான ஆண்டுகளுக்கு முன்னரே இப்படி அனைத்து விஷயங்களையும் விவாதிக்கும் ஒரு நீதி நூல் உருவாக்கப்பட்டது ஆச்சர்யமே!</p>
<p>மனு ஸ்மிருதி மனிதர்களை வர்ண முறையில் நான்காகவும், ஆசிரம முறையில் நான்காகவும் பிரிக்கிறது. வர்ண முறையில் பிராமணர், க்ஷத்ரியர், வைசியர், சூத்திரர் என அவரவர் செய்யும் தொழிலின் அடிப்படையிலும், ஆசிரம முறையில் சிறுவர் (வயது &#60; 8), பிரமச்சாரி (8-16), சம்சாரி (16-48) மற்றும் சந்நியாசி (&#62;48) எனவும் பிரிக்கிறது. ஒவ்வொரு வகுப்பினருக்கும் கடமைகளையும், வாழ்க்கைமுறைகளையும் விளக்கமாக எடுத்துரைக்கிறது மனு தர்மம். இவை அனைத்தும் மக்கள் வாழ்க்கையை நெறிப்படுத்த உருவாக்கப் பட்டனவே அன்றி, பாழ்படுத்த அல்ல.</p>
<p>பிராமணர்கள் வேதம் ஒதுவதற்கும், பக்தி மார்க்கத்தைப் பரப்புவதற்கும், க்ஷத்ரியர்கள் ஆட்சி செய்து நீதி வழங்கவும், வைசியர்கள் நியாயமான வியாபாரம் செய்யவும், சூத்திரர்கள் உடல் உழைப்பு தேவைப்படும் வேலைகளை செய்வதற்கும் பணிக்கப்பட்டனர். இதில் பிராமண துவேஷர்களின் வாதம் யாதெனில், மனு ஸ்மிருதியில் பிராமணர்களுக்கு உயரிய இடம் கொடுக்கப்பட்டிருக்கிறது, மனு ஸ்மிருதி என்ன சொல்கிறது?</p>
<p>'க்ஷத்ரியனை விட உயர்ந்தவன் இல்லை. ஆகையால் ராஜசூயம் நடக்கும்போது, பிராமணன் க்ஷத்ரியனை விட தாழ்வான இடத்திலேதான் அமர வேண்டும்' - இது சதபத புராணம் கூறுவது. 'சந்திரன், வாயு, அக்னி, சூரியன், இந்திரன், குபேரன், வருணன், யமன் ஆகிய எட்டு உலக நாயகர்களின் அம்சங்களைக் கொண்டவன் அரசன். ஆகையால் அவனுக்கு அசுத்தம் கிடையாது' என்றும் சொல்கிறது. பிராமணன் அரசனாக முடியாது என்றும் கூறுகிறது மனு தர்மம். இதிலிருந்து, க்ஷத்ரியர்களே உயர்வானவர்களாக சொல்லப்பட்டுள்ளனர் என்பது தெளிவாகிறது.</p>
<p>மற்றொரு குற்றச்சாட்டு, பிராமணர்களுக்கு பல சலுகைகள் அளிக்கப்பட்டுள்ளன என்பது. உதாரணமாக பிராமணனுக்கு வரி விலக்கு என்பது. இதை மனு தர்மம் யாருக்கு அளிக்கிறது? நன்கு கற்றறிந்து, வேதம் ஓதி, இரந்து உண்ணும் பிராமணனுக்கே இச்சலுகை. பிராமணனாகப் பிறந்து, வேறு தொழில் ஒருவன் செய்வானாயின் அவனுக்கு எவ்வித சலுகையும் வழங்கவில்லை மனு தர்மம். மாறாக, வன்மையாகக் கண்டிக்கிறது. எவ்வளவு வசதியாக இருந்தாலும், ஜாதியைப் பொறுத்து சலுகை வழங்கும் இன்றைய சட்டங்களைப் போற்றுவோருக்கு, மனு ஸ்மிருதி தவறாகத்தான் தெரியும்.</p>
<p>மனு ஸ்மிருதி பிராமணர்களுக்கு மரண தண்டனையிலிருந்து விலக்கு அளிக்கிறது என்றால் வேதங்களை கற்றுணர்ந்து, தனக்கு வகுத்த முறைப்படி வாழும் எந்த பிராமணனும் மரண தண்டனை அளிக்கும் அளவுக்கு தவறு இழைக்க மாட்டான் என்ற நம்பிக்கையே காரணம். இதில் தவறேதும் இல்லையே. இன்று வரை மரண தண்டனை விதிக்கத் தகுந்ததாக கருதப்படும் குற்றங்களான கொலையிலும், கற்பழிப்பிலும், ராஜ த்ரோகத்திலும் எத்தனை பிராம்மணர்கள் சம்மந்தப்பட்டிருக்கின்றனர்? பார்ப்பன பயங்கரவாதம் என்று இந்த இருபத்தி ஓராம் நூற்றாண்டில் பிதற்றிக் கொண்டிருப்பது தொடர்ந்த போதும் பிராமணர்கள் குற்றங்களிலோ, குற்றங்களைத் தூண்டுவதிலோ, வன்முறையை ஊக்குவிப்பதிலோ எந்த பங்கும் கொள்வதில்லை என்பதே உண்மை.</p>
<p>பிராமணனுக்கு மரண விலக்கு அளிக்கும் அதே மனு ஸ்மிருதிதான் இதையும் சொல்கிறது</p>
<p style="text-align:left;"><strong><br />
                                       அஷ்டோபாத்யம் து சூத்ரச்ய<br />
                                       ஸ்தேயே பவதி கில்பிஷம்.<br />
                                       ஷோடசைவ து வைச்யச்ய<br />
                                       த்வாத்ரிம்சத் க்ஷத்ரிச்ய  ச.<br />
                                       ப்ராம்மனச்ய சது: ஷஷ்டி:<br />
                                       பூர்ணம் வாபி சதம் பவேத்.<br />
                                       த்விகுணா வா சது.<br />
                                      ஷஷ்டி: தத் தொஷகுனா வித்தி: ஸ: </strong></p>
<p>அதாவது, 'அறிந்து திருட்டுக் குற்றத்தை செய்கின்ற சூத்திரனுக்கு, வழக்கமான தண்டனையை விட எட்டு மடங்கு அதிக தண்டனையை விதிக்க வேண்டும். வைச்யனுக்கு பதினாறு மடங்கு. க்ஷத்ரியனுக்கு முப்பத்திரண்டு மடங்கு. குற்றத்தின் தன்மையை அறிந்தவன் என்பதால் பிராமணனுக்கு 64 அல்லது 100 அல்லது 128 மடங்கு தண்டனை விதிக்க வேண்டும்'. பிராமணனுக்கு சலுகைகள் தரும் அதே மனு ஸ்மிருதிதான் இதனையும் கூறுகிறது.</p>
<p>இந்த சலுகைகள் பிராமணனுக்கு மட்டும் வழங்கப்படவில்லை. முதியோர், ஊனமுற்றோர், ஏழைகள், சிறு தொழில் செய்வோர் என அனைவருக்கும் வழங்கப்பட்டுள்ளது. ஒரு பிராமணன் மனு தர்மத்தின் படி வாழ்கையில் அவன் ஏழை என்ற பகுதிக்குக் கீழ் வந்து விடுகிறான். ஏனெனில், வேதங்களின் படியும், மனு தர்மத்தின் படியும், பிராமணன் அடுத்த நாள் உணவுக்காகக் கூட பொருள் சேர்த்து வைக்கக் கூடாது. பிராமணனுக்கு சலுகைகளைத் தரும் அதே மனு தர்மம்தான் அவன் மீது இத்தகைய சுமைகளையும் ஏற்றுகிறது. மற்ற எந்த தரப்பினருக்கும் இத்தகைய கடுமையான கட்டுப்பாடுகள் விதிக்கப்படவில்லை.</p>
<p>பிராமணர்கள் மனு ச்மிரிதியை உருவாக்கி இருந்தால் தாங்களே தங்களுக்கு இத்தகைய கட்டுப்பாடுகளை இட்டுக் கொண்டிருப்பார்களா? இன்று இந்திய சட்டத்தின்கீழ் சலுகை பெறுவோருக்கு ஏதேனும் கட்டுப்பாடுகள் உள்ளனவா? நீங்கள் சற்றே சிந்திக்க வேண்டிய விஷயம்.</p>
<p>தங்களை எதிர்த்து இவ்வளவு அவதூறுகள் பரப்பப்பட்டும், எத்தனையோ ஏழை மாணவர்களின் கல்வி ஜாதியின் பெயரால் கெடுக்கப்பட்டும் அழுவது மட்டுமே அறிந்து, அழிப்பது அறியாத அப்பாவி பிராமணர்களை என்றுதான் இந்த தேசம் புரிந்து கொள்ளப் போகிறதோ சர்வேஷ்வரா!</p>
<p>மனு தர்மம் பற்றி மேலும் விரிவாகப் பார்ப்போம், அடுத்த கட்டுரையில்...</p>
<p style="text-align:center;"><strong>ஸம்ஸமித்யுவஸே வ்ருஷன்னக்னேன விச்வான்யர்ய ஆ (ரிக்)</strong><br />
பொருள்: நன்மையை அள்ளிக் கொடுக்கின்ற தெய்வமான அக்னி தேவனே! எல்லா  உயிரினங்களையும் ஒற்றுமையாக இருக்கச் செய்வாயாக!'</p>
<p style="text-align:center;"><strong>------- வளரும், வழித்தடைகள் விலகும் வரை ---</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[பிராமணர்கள் தமிழர்களா? - பாகம் இரண்டு]]></title>
<link>http://nerkondapaarvai.wordpress.com/?p=11</link>
<pubDate>Sat, 05 Apr 2008 18:07:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>Lakshminarayanan</dc:creator>
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<description><![CDATA[முந்தைய பாகத்தில், பிராமணர்கள் தமிழர]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>முந்தைய பாகத்தில், பிராமணர்கள் தமிழர்களா, இல்லையா என்பதைப் பற்றியும், ஆரிய படையெடுப்பு எனும் கட்டுக்கதையைப் பற்றியும் அலசினோம். இந்த ஆதாரம் போதாது என்கின்றனர் சிலர். அவர்களிடம் ஆரிய படையெடுப்பை உறுதி செய்யும் ஆதாரங்களை நீங்கள் கொண்டு வாருங்கள் என்றால் பேச்சு, மூச்சைக் காணோம். எனது மறுமொழியில் சொன்னது போல், முன்பு ப்ளுட்டோ ஒரு கிரகம் என்று விஞ்ஞானிகள் சொன்ன போதும் நம்பினோம், இப்போது இல்லையென்று சொல்லும்போதும் நம்புகிறோம். ஆனால் இந்த ஆரியர்கள் விஷயத்தில் மட்டும் பழைய ஆதாரங்களை மட்டும்தான் நம்புவோம், இப்போது நிரூபிக்கப்பட்ட உண்மைகளை நம்ப மாட்டோம் என அடம்பிடிப்பது நியாய வாதமா, இல்லை துவேஷ வாதமா?</p>
<p>சரி. அப்படியே இவர்கள் சொல்வது போல் முதல் ஆராய்ச்சி முடிவுகளே உண்மை, இப்போது சொல்லப்பட்ட அனைத்தும் புரட்டு என்றே வைத்துக் கொண்டாலும், பிராமணர்கள் தமிழர்களே. ஒரு நாட்டில் பிறக்கும் குழந்தைக்கே அந்த நாட்டு குடியுரிமை வழங்கப்படும் போது, பல்லாயிரங்காலமாக தமிழகத்தில் வாழ்ந்து வருபவர்களை தமிழர்கள் அல்லர் என்று சொல்வது விந்தையிலும் விந்தை.  மற்றவர்களுக்கு தமிழ்ப் பற்றில் பிராமணர்கள் எவ்விதமும் குறைந்தவர்கள் அல்லர். தமிழுக்கு பிராமணர்கள் ஆற்றியுள்ள தொண்டுகள் அளப்பரியன. அருந்தமிழ்த் தொண்டாற்றிய அந்தணர்களைப் பற்றி எழுத ஒரு WORDPRESS போதாது. பேய்மழையில் ஒரு துளி போல, சில இங்கே.</p>
<p> சுந்தரர், மாணிக்க வாசகர், திருஞான சம்பந்தர் என நான்கு முக்கிய சைவ பெரியவர்களில் மூவர் அந்தணர்கள். மாபெரும் புலவர் கபிலர், திருக்குறளுக்கு உரை எழுதிய பரிமேலழகர், காளமேகப் புலவர் முதல் பாரதி, கல்கி, சுஜாதா வரை அனைவரும் பிராமணர்களே. உ.வே.சா இல்லையெனில் இன்று நாம் போற்றக் கூடிய பல அறிய தமிழ் நூல்கள் நமக்கு கிடைத்து இருக்குமா? தன் சொந்த செலவில், ஊர் ஊராய்ச் சென்று ஓலைச் சுவடிகளை சேகரித்து திருத்தமாகப் பதித்து வெளியிட்டு 'அழியாது காத்த அண்ணல். தமிழ் காத்த தெய்வம். தண்டமிழ் இலக்கியம் வழங்கிய வள்ளல்' என்று பலராலும் போற்றப் பட்டவர் உ.வே. சாமிநாத ஐயர்.</p>
<p>பெரும்பாணாற்றுப் படையும், பட்டினப்பாலையும் இயற்றிய உருத்திரங்கண்ணனார். திருவிளையாடல் படைத்த பெரும்பற்றப் புலியூர் நம்பி. 'நாடகவியல்' என நாடகங்களுக்கு தமிழில் முதலில் இலக்கணம் வகுத்த சூரிய நாராயண சாஸ்திரியார். இவ்வளவு ஏன்? தமிழுக்கே இலக்கணம் எழுதிய அகத்திய மாமுனியே ஒரு அந்தணரே.</p>
<p>இவர்கள் மட்டுமல்ல, எந்த பிரதி பலனையும் எதிர்பாராமல், விளம்பரம் தேடாமல், தமிழைக் காட்டி பிழைப்பு நடத்த முயலாமல், பெரும் தமிழ்த்தொண்டு ஆற்றிய பிராமணர்கள் ஆயிரக்கணக்கானோர் இருந்திருக்கின்றனர், இருக்கின்றனர், இருப்பர். இவையெல்லாம் உண்மை இல்லை, என்று யாராலாவது மறுக்க இயலுமா இல்லை மறைக்கதான் இயலுமா?<br />
தமிழ், தமிழ் என்று பேசி ஓட்டை வாங்கி விட்டு தன் வீட்டு பிள்ளைகளை இந்தி படிக்க வைக்கும் தலைவர்கள் தமிழர்களாம்!  ஆனால் அமெரிக்காவில் இருந்தாலும் தன் மக்கள் தாய்மொழியாம் தமிழைக் கற்க வேண்டும் என்று ஆர்வம் காட்டும் பிராமணர்கள் தமிழர்கள் இல்லையாம்!</p>
<p>தமிழை காட்டு மிராண்டி