कभी कहीं हम-तुम मिलते, जब मिलते लड़ते-झगड़ते, बिगड़ते-बड़बड़ाते रूठते-मनाते और फिर चिढ़ते-चिढ़ाते कभी कहीं हम-तुम, कभी कहीं हम-तुम नहीं तुम, नहीं तुम! तुम्हें कुछ नहीं आता इस बात पर तुम लड़ती, मैं झगड… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 6 months ago: कभी कहीं हम-तुम मिलते, जब मिलते लड़ते-झगड़ते, बिगड़ते-बड़बड़ाते रूठते-मनाते और फिर चिढ़ते-चिढ़ाते कभ … more →
विनय wrote 1 year ago: रहूँ मैं कैसे जुदा मैं जुदा रह नहीं सकता सहूँ मैं कैसे दर्द मैं दर्द सह नहीं सकता इश्क़ ने ऐसा मारा अ … more →