(नागफनी का तर्क) मैं कांटों की झाड़ हूं, बिन पानी की बाढ़ हूं, सब मुझे हैं घूरते बुरी लगती हैं मेरी सूरतें। सोचते हैं व्यर्थ है, धरती पर इसका ना कोई अर्थ है। क्या ज़रुरत थी इसे उगने की? बिन पानी इतना बढ़न… more →
पसंदप्रेमलता पांडे wrote 3 years ago: (नागफनी का तर्क) मैं कांटों की झाड़ हूं, बिन पानी की बाढ़ हूं, सब मुझे हैं घूरते बुरी लगती हैं मेरी सू … more →