यस्य स्नेहो भयं तस्य स्नेहो दुःखस्य भाजनम्। स्नेहमूलानि दुःखानि तानि त्यक्तवा वसेत्सुखम्।। हिंदी में भावार्थ-जहां स्नेह हैं वही दुःख है। स्नेह ही दुःख की उत्पत्ति का कारण है। स्नेह ही दुःख का मूल है। … more →
दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिकाmequitnever wrote 1 month ago: 31 वर्षीय निकोलो माक्यावैली सन् 1500 में ” द प्रिन्स ” इतालवी भाषा में लिखित एक राजनीति … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: संसार विषवृक्षस्य द्वे फले अमृतोपमे। सुभाषितं च सुस्वादु संगतिः सुजने जनै।। हिन्दी में भावार्थ-नीति … more →
दीपक भारतदीप wrote 3 months ago: नीति विशारद चाणक्य कहते हैं आत्मवर्ग परित्यन्य परवर्गे समाश्रितः। स्वयमेव लयं याति यथा राजात्यधर्मतः … more →
chiraan wrote 6 months ago: Beginning from today ,this blog will run a series on Neeti shastra. Man (an average man ) always att … more →
दीपक भारतदीप wrote 7 months ago: १.इतने भारी शरीर वाला हाथी छोटे से अंकुश सा वश में किया जाता है. सब जानते हैं की अंकुश परिमाण में हा … more →
दीपक भारतदीप wrote 8 months ago: 1.राजा, अग्नि, गुरु, स्त्री इनसे निकटता खतरनाक होती है। इनसे थोड़ा परे रहकर संपर्क रखना चाहिए। अग्नि … more →
Sarvesh K Tiwari wrote 9 months ago: In the previous part, we had gleaned through hitopadesha to understand the message of ancient AchAry … more →
Sarvesh K Tiwari wrote 10 months ago: ayaM nijaH paroveti gaNanA laghu-chetasAM udAra charitAnAM tu vasudhaiva kuTumbhakaM || {’Thi … more →
दीपक भारतदीप wrote 10 months ago: 1.आज के युग में अर्थ की प्रधानता है और धन संचय प्रमुख आधार है। धन संचय हर मनुष्य के लिये आवश्यक है … more →
Nikhilashish wrote 10 months ago: वरयेत् कुलजां प्राज्ञो विरूपामपि कन्यकाम् | रूपशीलां न नीचस्य विवाहः सदृशे कुले || बुद्धिमान व्यक्ति … more →
Nikhilashish wrote 10 months ago: यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवं परिषेवते | ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवं नष्टमेव च || जो अपने निश्चित … more →
Nikhilashish wrote 10 months ago: आतुरे व्यसने प्राप्ते दुर्भिक्षे शत्रुसंकटे | राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः || बीमारी में … more →
Nikhilashish wrote 11 months ago: जानीयात् प्रेषणे भृत्यान् बान्धवान् व्यसनाऽऽगमे | मित्रं चाऽऽपत्तिकालेषु भार्यां च विभवक्षये || नौकर … more →
Nikhilashish wrote 11 months ago: यस्मिन् देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवाः | न च विद्याऽऽगमः कश्चित् तं देशं परिवर्जयेत् || जिस द … more →
Nikhilashish wrote 11 months ago: आपदर्थे धनं रक्षेद् दारान् रक्षेद् धनैरपि | आत्मानम् सततं रक्षेद् दारैरपि धनैरपि || विपत्ति के समय क … more →
दीपक भारतदीप wrote 11 months ago: 1.जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुचाने वाले मर्मभेदी वचन बोलते हैं, दूसरों की बुराई … more →
Nikhilashish wrote 11 months ago: दुष्टा भार्या शठं मित्रं भृत्युश्चोत्तरदायकः | ससर्पे च गृहे वासो मृत्युरेव न संशयः || दुष्ट स्त्री, … more →
Nikhilashish wrote 11 months ago: मूर्खशिष्योपदेशेन दुष्टस्त्रीभरणेन च | दुःखितैः सम्प्रयोगेण पण्डितोऽप्यवसीदति || मूर्ख छात्रों को पढ … more →
दीपक भारतदीप wrote 11 months ago: 1.धन से धर्म, खाने पीने और योग से विद्या, शक्ति से राज्य तथा गुणवान पत्नी से घर की रक्षा होती है। 2. … more →