चटनी आमा के (छत्तीसगढ़ी रचना) नंगत ले बइहाये मऊर, ए दे पर बर लटलट ले फर गे। देस के भुंइया ला अमरे बर, आमा के डारा निहरगे।। मंदरस किरवा कस लइकन झूमगे, देख आमा के कयरी। जमदूत कस मुछर्रा रखवार, हावय ननमु… more →
Tularamdewangan's Blogtularamdewangan wrote 8 months ago: चटनी आमा के (छत्तीसगढ़ी रचना) नंगत ले बइहाये मऊर, ए दे पर बर लटलट ले फर गे। देस के भुंइया ला अमरे बर … more →
tularamdewangan wrote 8 months ago: बनगे भारत छत्तिसगढ़िया (छत्तीसगढ़ी रचना) इहॉं के मन निच्चट सिधवा हें, एक्को झन नई हे कोढ़िया। नवा ति … more →
tularamdewangan wrote 8 months ago: जोरय जिनगी के खेल मं (छत्तीसगढ़ी रचना) जनम के नंगरा, जुगुर-जागर, बुग-बाग, सूजी जिव परहा। धरिस गुन गा … more →
hsonline wrote 2 years ago: तिरछी नजरिया के प्रिय पाठंकों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ! दीपावली पर भेंट स्वरूप इस छत्तीसगढ़ी … more →