भरी सभा के बीच खड़ी वो चन्द्रवंश की शोभा थी ललकार लहू को मार रही वो अग्नि सम आभा थी लज्जा की मूरत का देखो भरी सभा अपमान हुआ नारी का आदर भूले कौरव तो कुल का अंत तमाम हुआ ममता की मूरत सीता को जब रावण बरब… more →
Vikasvardhan's Weblogvikasvardhan wrote 1 month ago: भरी सभा के बीच खड़ी वो चन्द्रवंश की शोभा थी ललकार लहू को मार रही वो अग्नि सम आभा थी लज्जा की मूरत का … more →
vikasvardhan wrote 2 years ago: कर्म न समझे पुण्य को, कर्म न जाने पाप जिसकी जैसी भावना, फल उसके अनुपात अधिक न्यून के माप को, जो मापे … more →
vikasvardhan wrote 2 years ago: फिर गुजरेगी मस्त वो हवा, फिर यह गुलशन लहरायेगा जो तुझसे छीना एक झोंके ने, दूजा वापस ले आएगा, हर दौर … more →
vikasvardhan wrote 2 years ago: हँसी का सच्चा गुल जब खिला है दर्दों की पहले बारिश हुई है कागज़ के गुल कभी भी सजा लो टाँगे यहाँ खींचन … more →