ख़ुदाया1 कभी करम मुझ पर भी सुम्बुल2 की थोड़ी मेहर इधर भी प्यार क्या है नहीं जानता मैं मगर सिखा दे मुझे ये हुनर भी तेरा ख़ाब सजाया मैंने आँखों में ख़ाब है चाँद है और सहर3 भी इश्क़ की आग जो इस दिल में है… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 2 years ago: ख़ुदाया1 कभी करम मुझ पर भी सुम्बुल2 की थोड़ी मेहर इधर भी प्यार क्या है नहीं जानता मैं मगर सिखा दे मु … more →