यह मुनासिब नहीं मैं भुला दूँ तुझको तेरे सिवा कुछ होश नहीं है मुझको ना जाने कितने अजनबी गुज़रे हैं मेरे इस जिस्म की गीली मिट्टी से किसी ने कभी न छुआ ऐसे मुझे जिस तरह से छुआ है तूने मुझको मैं बहुत भटका ह… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: यह मुनासिब नहीं मैं भुला दूँ तुझको तेरे सिवा कुछ होश नहीं है मुझको ना जाने कितने अजनबी गुज़रे हैं मेर … more →
विनय wrote 2 years ago: मैं खा़क़सार था उसने मुझको माटी समझा मुझे उम्मीद रही वो मुझको सोने की तरह छूकर देखेगा… उसने कुछ … more →