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	<title>crimanalisation &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/crimanalisation/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "crimanalisation"</description>
	<pubDate>Wed, 09 Jul 2008 12:11:27 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[छात्रसंघ : घूस दो ,बदनाम करो , निकाल फेंको]]></title>
<link>http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/?p=187</link>
<pubDate>Wed, 14 May 2008 04:10:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[ पिछला भाग   
समाजवादी आन्दोलन से प्रभ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:left;"> <a href="http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2008/05/13/studentsunion/" target="_blank"><span style="text-decoration:underline;">पिछला भाग</span> </a>  </p>
<p style="text-align:left;">समाजवादी आन्दोलन से प्रभावित काशी विश्वविद्यालय छात्रसंघ के नेतृत्व में १९६७ में <strong>' अंग्रेजी हटाओ , भारतीय भाषा लाओ ' </strong>चला । एक बुनियादी सवाल पर व्यापक जन जागृति के साथ -साथ इसी आन्दोलन के दौर में पूर्वी उत्तर प्रदेश के महाविद्यालयों में छात्रसंघों की स्थापना भी हो गयी । सातवें दशक में छात्रसंघों और छात्र संगठनों के प्रतिनिधियों के निमंत्रण पर ही जयप्रकाश नारायण ने बिहार आन्दोलन को अपनी शर्तों पर नेतृत्व देना स्वीकार किया । आंतरिक आपातकाल के दौरान सभी मौलिक अधिकारों के निलम्बन के क्रम में छात्रसंघों पर भी राष्ट्रव्यापी प्रतिबन्ध रहा । असम के समस्त महाविद्यालयों के छात्रसंघों के महासंघ ' अखिल असम छात्रसंघ ' द्वारा छेड़ा गया आन्दोलन बुनियादी प्रश्नों से जुड़ा अंतिम सकारात्मक जन आन्दोलन था । इसके बाद की युवा पीढ़ी के नसीब में मंडल विरोधी तथा बाबरी मस्जिद ध्वंस जैसी संविधान विरोधी विकृतियाँ ही रहीं हैं ।</p>
<p style="text-align:left;">    छात्रसंघों की सकारात्मक भूमिकाओं के साथ यह भी गौरतलब है कि व्यापक राजनीति में जाति , पैसे  और अपराध का वर्चस्व बढ़ने के साथ - साथ छात्र राजनीति भी इन व्याधियों से ग्रस्त हुइ है । प्रतिबद्धताविहीन राजनीति का बढ़ना छात्र हितों के भी प्रतिकूल है । छात्र राजनीति के भ्रष्ट नेतृत्व वर्ग की आड़ में शिक्षा जगत के व्यवस्थापकों को निरंकुश और अलोकतांत्रिक कदम उठाने का मौका मिल गया । १९८३ में माधुरी बेन शाह की अध्यक्षता में केन्द्रीय विश्वविद्यालयों की जाँच हेतु बनी समिति ने यहाँ तक संस्तुति कर दी विश्वविद्यालय की व्यवस्था में छात्रसंघों का कोई स्थान नहीं है । छात्रसंघ पदाधिकारियों के प्रति <strong>' घूस दो , बदनाम करो , निकाल फेंको ' </strong>की नीति अपना कर काशी विश्वविद्यालय में छात्रसंघ १९८५ से चार वर्षों तक निलंबित रखा गया । प्रशासन द्वारा छात्रसंघ पदाधिकारियों को दिए गए भारी भरकम अनुदानों का विवरण  विञापन के रूप में राष्त्रीय समाचार पत्रों में छपवाया गया । सच्चाई यह थी कि इन आरोपों का जिम्मेदार और भागीदार भ्रष्ट प्रशासन भी था ।</p>
<p style="text-align:left;">    छात्रसंघों की कार्यप्रणाली में जहां छात्र संसद और छात्रों की साधारण सभा ( जनरल बॉडी ) की भूमिका गौण रखकर पदाधिकारियों के हाथों में अधिकार केन्द्रित कर दिये जाते हैं वहीं यह भ्रष्टाचार संभव होता है । दरअसल , विश्विद्यालय प्रशासन के भ्रष्ट तत्व भी चाहते हैं हैं कि छात्रसंघ के अधिकार विकेन्द्रीकृत न हों क्योंकि छात्र संसद अथवा साधारण सभा के साथ सौदेबाजी मुमकिन नहीं होती । प्रशासन के लिए सिर्फ दो तीन पदाधिकारियों के साथ सौदेबाजी आसान होती है । काशी विश्वविद्यालय छात्र संघ निर्वाचन में १९९७ के पूर्व कभी भी पुलिस हस्तक्षेप की नौबत नहीं आई थी । चुनाव घोषित करके न कराने की स्थिति बनाने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन ने जिला प्रशासन और निजी सुरक्षातंत्र के सहयोग से दमन की पराकाष्ठा कर दी । विश्वविद्यालय के इतिहास में पहली बार प्रशासनिक दमन के फलस्वरूप दो छात्रों की हत्या हुई । राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और अपराध अनुसन्धान विभाग की जाम्च के पश्चात विश्वविद्यालय के तत्कालीन चीफ प्रॉक्टर  तथा एक पुलिस उपाधीक्षक समेत कई पुलिस तथा सुरक्षाकर्मियों पर हत्या का आरोप पत्र दाखिल हो चुका है । तत्कालीन कुलपति ने अपने कार्यकाल के अन्तिम दिन आरोपी चीफ़ प्रॉक्टर को विधिक सहायता हेतु एक बड़ी धनराशि देने का आदेश दे दिया ।</p>
<p style="text-align:left;">    जगतीकरण के इस दौर में उच्च शिक्षा के अवसरों को संकुचित करने तथा ववसायीकरण की दिशा में पहल करने के उद्देश्य से भारी फीस वृद्धि और 'पेड सीट' शुरु करने के निर्णय बिना प्रतिवाद लागू हो जाने में छात्रसंघ का निलंबन मददगार साबित हुआ है । <strong>परिसर में छात्र संगठनों द्वारा चर्चा-गोष्ठियाँ तक प्रतिबन्धित हैं । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा संघ परिवार द्वारा आयोजित गोष्ठियाँ इसका अपवाद हैं ।</strong> यह भी उल्लेखनीय है कि इस धारा के छात्र संगठन द्वारा विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा किए गए छात्र संघ संविधान संशोधन का उच्च न्यायालय में सिर्फ इस लिए समर्थन किया गया ताकि चुनाव में हारा हुआ उसका उम्मीदवार कुर्सी पा सके । ( आइसा के आनन्द प्रधान चुनाव में जीते थे और विद्यार्थी परिषद के हारे हुए प्रत्याशी देवानंद सिंह ने उच्च न्यायालय में प्रशासन के पक्ष का समर्थन किया था। ) </p>
<p style="text-align:left;">     छात्रों को अपनी लोकतांत्रिक भावनाओं व आकांक्षाओं को प्रकट करने का छात्रसंघ जैसा मंच जब नहीं मिल पाता है तब अपराधिक एवं जातिगत गिरोह प्रभावी हो जाते हैं । जन राजनीति में अपराधीकरण का समाधान विधान सभा , लोकसभा निलंबित करके संभव है क्या ? <strong>छात्रों के व्यापक हस्तक्षेप से ही जाति , पैसे और गुण्डागर्दी का इलाज संभव है । डॉ. लोहिया के शब्दों में जब विद्यार्थी राजनीति नहीं करते तब वे सरकारी राजनीति को चलने देते हैं और इस तरह परोक्ष में राजनीति करते हैं ।</strong></p>
<p style="text-align:left;"><strong><em>- अफ़लातून.</em></strong></p>
<p style="text-align:left;"><strong><em>अध्यक्ष , समाजवादी जनपरिषद , उत्तर प्रदेश .</em></strong></p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[लचर कानून-व्यवस्था और माफ़ियाग्रस्त राजनीति के बहाने कुछ यादें]]></title>
<link>http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/?p=152</link>
<pubDate>Mon, 28 Jan 2008 12:20:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
<guid>http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/?p=152</guid>
<description><![CDATA[     कोयला , लोहे का कबाड़ , रेलवे के ठेके, ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="left">     कोयला , लोहे का कबाड़ , रेलवे के ठेके, निर्माण , और ड्रग के धन्धे से जुड़ा <strong>बृजेश सिंह</strong> भुवनेश्वर में पकड़ा गया । उत्तर प्रदेश में ५१ हत्याओं के उस पर आरोप हैं। <strong>बी.ज.द./भाजपा</strong> शासित सूबे में वह तीन वर्षों से रह रहा था । उड़ीसा प्राकृतिक संसाधनों की लूट के लिए हो रहे भारी विदेशी पूँजी निवेश के लिए जाना जा रहा है । यह भारी पूँजी निवेश अन्तत: ऐसे तत्वों की जेब में पहुँचता है । दिल्ली पुलिस द्वारा भुवनेश्वर में घेरे जाते ही तत्काल उड़ीसा पुलिस का हस्तक्षेप करवाने में बृजेश सफल रहा । पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक अन्य <strong>माफ़िया मुन्ना बजरंगी</strong> से दिल्ली पुलिस की <strong>'मुठभेड़'</strong> की राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष को प्रथम सूचना पूर्व प्रधानमंत्री <strong>चन्द्रशेखर</strong> ने दी थी । मुन्ना बजरंगी की अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में चिकित्सा हुई । बृजेश की <strong>'सफल गिरफ़्तारी'</strong> से प्रसन्न भाजपा से विधानपरिषद के लिए चुना गया उसका सगा बड़ा भाई चुलबुल सिंह पिछले तीन दिनों से मिठाई बाँट रहा है । चुलबुल बनारस जिला पंचायत का सदस्य चुना गया तब मुख्यधारा के सभी दल उसके समर्थन में थे ।</p>
<p align="left">     भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिह का पुत्र भी लोहे के कबाड़ के व्यवसाय से जुड़ा है और धन्धे में उसे बृजेश का स्नेह मिलता होगा ,यह माना जाता है । भुवनेश्वर में गिरफ़्तारी के बाद एनडीए के सहयोगी दल बीजद की मशीनरी से राजनाथ द्वारा हस्तक्षेप करवाया गया हो यह भी बहुत सम्भव है ।</p>
<p align="left">    सभी समाचार माध्यमों ने यह जोर - शोर से कहा कि बृजेश को उसके निकट रिश्तेदारों के सिवा किसीने नहीं देखा था और उसकी फोटो उत्तर प्रदेश पुलिस के पास नहीं थी । हमारे देश की लचर न्याय व्यवस्था का यह शर्मनाक नमूना है । हत्या जैसे संगीन जुर्म में गिरफ़्तार अपराधियों के चित्र न खींचना कितने अचरज की बात है ! अप्रैल १९८६ में सिकरौरा गाँव (थाना बलुआ , वर्तमान जिला चन्दौली) के एक यादव परिवार के सात सदस्यों की हत्या के बाद बृजेश के पाँव में गोली लगी थी और कुछ समय बाद वह गिरफ़्तार होने के बाद बनारस जिला जेल में बन्द था । तब वह १७-१८ साल का तरुण।</p>
<p align="left">    उस अवधि में काशी विश्वविद्यालय के छात्र संघ बहाली हेतु चले आन्दोलन के दौरान खुद पर लगे बीसियों आपराधिक मामलों में मैं भी ४० दिन वहीं बन्द था । मैं जनांकिकी में शोध हेतु पंजीकृत होने के बाद विश्वविद्यालय से निलम्बित हो चुका था। निलम्बन के दौरान ही नेट उत्तीर्ण किया था।वजीफा  निर्दोष साबित होने के बाद एक साथ मिला था।मुझ पर तीन अलग अलग हत्या के प्रयास ( ३०२ और ३०७ दोनों जुर्मों की प्रेरक 'हत्या' ही होती है ।),बम फोड़ना ,गिरोहबन्दी  तथा आगजनी आदि की दर्जनों धाराएं लगीं थीं । मेरी जमानत के लिए जो अट्ठारह स्वजन जुटे थे उन्हें ढाई-ढाई हजार की सम्पत्ति के प्रमाण बतौर जमानत पेश करने थे । न्यायाधीश से इन जमानतदारों की बातचीत अत्यन्त रोचक थी :</p>
<p align="left">    मेरे जीजाजी, डॉ. सुरेन्द्र गाड़ेकर से जज ने पूछा , ' आप क्या काम करते हैं ?' तपाक से जवाब मिला ; " अणु उर्जा का विरोध करता हूँ ।' जज मुस्कुराए और आगे कुछ नहीं पूछा।</p>
<p align="left">    मेरी माँ , उत्तरा देसाई ने ढाई हजार की मिल्कियत दिखाने के लिए कहा : " इससे ज्यादा मूल्य की किताबें मेरे पास हैं ।' हाँलाकि वे स्वतंत्रता सेनानियों को मिलने वाली केन्द्रीय पेंशन की पासबुक भी साथ ले गयी थी। १९४२ में १४ वर्ष की अवस्था में वह भारत रक्षा अधिनियम के तहत जेल गयी थी और पौने दो साल बाद कटक जेल से रिहा हुई थी । १९८७ में यह पेंशन शायद तीन सौ प्रतिमाह थी। माँ के परिवार के अन्य ९ सदस्य यह पेंशन पाने के हकदार थे लेकिन इन लोगों  ने पेंशन के लिए आवेदन नहीं किया । माँ को २४ वर्ष की अवस्था में मधुमेह हो गया था और प्रतिदिन वह खुद को इन्सुलिन की सूई लगाती थी । इस खर्च को ध्यान में रखते हुए उसके परिवार में सिर्फ़ उसने पेंशन ली।</p>
<p align="left">    बनारस जिला जेल स्थित <strong>'सभा भवन'</strong> में तब राजनैतिक बन्दी ही रहते थे । अब 'सभा भवन' तोड़ा जा चुका है । राजनैतिक जेल यात्रायें भी तो अब बन्द हैं।आज-कल 'जेल-भरो' के तहत पुलिस लाइन से ही रिहाई हो जाती है , बिना जेल के फाटक का मुँह देखे ही।वह मेरी लम्बी जेल यात्राओं में से एक थी। गिरफ़्तारी से बचने के लिए दाढ़ी-मूँछ विहीन हो गया था और अत्यन्त छोटे बाल रख लिए थे। बीपी हेयर कटिंग सेलून के अमरनाथ ने कहा था : " नेताजी,डॉक्टर साहब बन गए।"एक मित्र का कोट भी लिया हुआ था।उसके पहले या बाद में कभी कोट नहीं पहना । इस हुलिया में जब माँ के पास पहुँचा था तब उसे भी मुझे पहचानने में थोड़ा वक्त लगा था। </p>
<p align="left">    बहरहाल , बृजेश के घायल पाँव पर , बाहर से लोहे की छड़ें कसी हुई थीं । उसने जेल के अस्पताल में खुद को भर्ती करा रखा था । वह शतरंज खेलता रहता था। सिकरौरा गाँव के काण्ड को 'नरसंहार' कहा जा रहा था इसलिए इस लड़के की ओर सबका ध्यान जाना लाजमी था।</p>
<p align="left">    राजेन्द्र राजन की <strong><a target="_blank" href="http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2006/09/27/bhu-hindi-varanasi/">इस</a></strong> कविता को <a target="_blank" href="http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2006/09/29/vishvavidyalay-rajendra-rajan-gandhi-malaviya/">एक परचे</a> में छापा था - <strong>समता युवजन सभा</strong> और <strong>प्रगतिशील छात्र संगठन</strong> ने संयुक्त रूप से। परचे की सहयोग राशि १५ पैसे थी। परचे की बिक्री से आई बत्तीस रुपए की रेचकारी के साथ लंका के एक कैफ़े में इडली खाते वक्त दरोगा ने गिरफ़्तार करने की सूचना दी थी।<strong> 'माया'</strong> में कभी कविता नहीं छपती थी लेकिन छात्रसंघ बहाली आन्दोलन पर निकले अंक में दिनेश 'दीनू' ने उक्त कविता को 'बॉक्स' में छापा था ।</p>
<p align="left">    इस चिट्ठे का नाम - <strong> यही है वह जगह ,</strong> उस कविता से लिया गया है । राजन की राजनैतिक प्रतिबद्धता की बुनियाद इस रचना में झलकती है।</p>
<div style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a5%9e%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be">माफ़िया</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a7%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%a3">अपराधीकरण</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%ac%e0%a5%83%e0%a4%9c%e0%a5%87%e0%a4%b6">बृजेश</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a5">राजनाथ</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%9b%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%98%20%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80">छात्रसंघ बहाली</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/brijesh">brijesh</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/crimanalisation">crimanalisation</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/mafia">mafia</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/rajnath%20singh">rajnath singh</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/bjp">bjp</a></div>
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