विनय wrote 1 year ago: कोई आया है जाने के बाद क़ब्र पर वह गया है दो गुल मुझे नज़्र कर कोई तूफ़ाँ उठा था जो मिट गया है दे गया ह … more →
विनय wrote 1 year ago: और कैसे रक़ीब के यार हमसे पेश आते वह हमसे अय्यारी नहीं तो और क्या फ़रमाते हमारी क़िस्मत में जीते-जी फ़ना … more →
विनय wrote 2 years ago: आज दिन यूँ गुज़रा है झूठी मुस्कुराहट में कि अब हँसता हूँ तो लगता है खु़द-फ़रेबी कर रहा हूँ मैं… … more →