माटी का घड़ा मैं तो अब तलक़ सुखी सी माटी थी मैं धूल सी उड़कर आती जाती थी | मैं जिसके भी अंग लग जाती थी मैं तुरंत खुद को जमीपर पाति थी | कुम्हार बस तूही दयालु इंसान आया जिसने मुझे उठाया,भिगोया,अपनाया |… more →
mehekदीपक भारतदीप wrote 1 year ago: बहुत दिन बाद ऑफिस में आये कर्मचारी ने पुराना कपडा उठाया और टेबल-कुर्सी और अलमारी पर धूल हटाने के लिए … more →
mehhekk wrote 1 year ago: माटी का घड़ा मैं तो अब तलक़ सुखी सी माटी थी मैं धूल सी उड़कर आती जाती थी | मैं जिसके भी अंग लग जाती … more →