विनय wrote 1 year ago: नित उड़ता हूँ तेरी कजरारी अँखियों में मैं रंग-बिरंगे सपनों की छतरी लेके साँवले का मन लुभाके, बिजली ग … more →
विनय wrote 1 year ago: तरक़ीब कोई पहाड़ उठाने की क्यों इसे सिर पे उठा रखा है किसके सर ये आफ़त पटकोगी शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़ … more →
विनय wrote 1 year ago: साहिबा, साहिबा, साहिबा तेरी अदाओं पर मैं फ़िदा साहिबा, साहिबा, साहिबा तू मेरे प्यार की सुबह तुझको ढूँ … more →
विनय wrote 1 year ago: अकेले हम हों कभी, अकेले तुम हो और समन्दर का गुलाबी किनारा हो तन्हाई में हम हों रुसवाई में तुम हो तुम … more →
विनय wrote 1 year ago: आदाब तुझे ऐ मेरे वतन लखनऊ आदाब तुझे मेरे जानो-तन लखनऊ है कभी आईना कभी शराब-सा तू है मेरी शोख़ी मेरा … more →