किरणों की लेखनी चला, लिख देता है, रोज़ दिन नया दिवाकर्, सागर की चंचल लहरों पर| सुनहरी रोशनाई से अलंकृत कर, लहरों के अल्हङ शैशव को, तरुणाई की सीमा-पार ले जाता है| दिखलाता है दिन नया, सुनहरे अम्बर का दर्… more →
पलाशshipsag wrote 1 year ago: किरणों की लेखनी चला, लिख देता है, रोज़ दिन नया दिवाकर्, सागर की चंचल लहरों पर| सुनहरी रोशनाई से अलंकृ … more →
shipsag wrote 1 year ago: एक क्यारी में कच्ची सी, एक पौधा लगा दिया है जो पावस की बूँदों को, नन्हीं पत्तियों में समेटता है झोंक … more →
shipsag wrote 2 years ago: बन गयी मिसेज बच्चन, कल मिस राय, कह कर पुराने आशिकों को टाटा -बाय-बाय, जाने कितनों के सीनों पर खंजर च … more →
shipsag wrote 2 years ago: आज सडक पर हम चलते जा रहे थे | अचानक हमारी नज़र सडक के किनारे अनमने और उदास से बैठे एक शिखाधारी, दीन-ह … more →
shipsag wrote 2 years ago: रंग भी बहुरूपिये से रंग बदलते हैं, कभी चटख, कभी बदरंग लगते है| पुरानी किताब की नयी ज़िल्द में, बन-ठन … more →
shipsag wrote 2 years ago: अमरीका आकर हमें महिला शब्द का एक नवीन प्रकार का संधि- विच्छेद पता चला : महिला =महि+हिला , महि अर्थात … more →
shipsag wrote 2 years ago: एक दिन यूँ ही टहलते हुए, हम घर से थोङा दूर आ गये| कहीं एक कोने में बारिश का पानी इकट्ठा हो गया था| व … more →
shipsag wrote 2 years ago: पिघल रहा था वो बादल, निचोङ अपने हर अंश को, बरखा की निखरी सी बूंदों में| ढल रहा था उसका अस्तित्व, उनी … more →
shipsag wrote 2 years ago: धरती गाती जा रही है,नये तराने | इठलाने के ढूँढ,नित नये बहाने | सोती है गीतों को रख,अपने सिरहाने | लग … more →
shipsag wrote 2 years ago: खिङकियो के जंगले पर, हौले से इधर -उधर झाँकती है| मेरे आँगन की चटाई पर बैठ , मेरा हाथ बँटाती है| बरा … more →