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	<title>editoriyal &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/editoriyal/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "editoriyal"</description>
	<pubDate>Wed, 09 Jul 2008 12:10:07 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[भृतहरि शतकःमनुष्य इच्छा और आशा के कारण नाचता है]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=41</link>
<pubDate>Fri, 04 Jul 2008 04:01:23 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[खलालापाः सोढा कथमपि तदाराश्र्चनपरैर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>खलालापाः सोढा कथमपि तदाराश्र्चनपरैर्निगुह्मान्तर्वाष्पं हस्तिमपि शून्येन मनसा<br />
कृतश्चियत्तस्तम्भः प्रहसितश्रिचयामञ्जलिरपि त्वमाशे मोघाशे किममपरमतो नर्तयसि माम्</strong></p>
<p>हिंदी में भावार्थ-दुष्टजनों की सेवा करते हुए उनके ताने और व्यंग्य सुने। दुख के कारण हृदय में उमड्ने वाले आंसुओं को रोक और उनका मन रखने के लिए उनक सामने हंसने का दिखावा किया। मन को समझाकर उन्हें प्रसन्न करने के लिए उनके समक्ष हाथ भी जोड़े। हे आशा क्या अभी और नचायेगीं।<br />
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-यह गंभीर प्रसंग हैं। हम अपने जीवन के दूसरों के सामने हंसने का प्रयास करते हैं, कई लोगों के व्यंग्य बाण और आलोचना को झेलते हैं। कई बार ऐसा अवसर आता है कि आंखों से आंसु निकलने वाले होते हैं पर हम उन्हें रोक लेते हैं। दुनियां में सबका यही हाल है। आजकल तो सारी माया ही ऐसे लोगों के हाथों में जो जिनके कर्म खोटे हैं। उनके यहां कई लोग सेवा में रहते हैं। वह उनके इशारे पर हंसते और चिल्लाते हैं। दूसरों पर अपने मालिक की तरफ से ताने और फब्तियां कसते हैं। मगर सच यही है कि वह भी वक्त के मारें हैं। हर बार सोचते हैं कि यह हमारा काम हो जाये तो मुक्ति हो जायेगी। ऐसा होता नहीं है। एक कामना पूरी होती है तो दूसरी शुरू हो जाती है। ऐसे में आदमी सोचता ही रह जाता है कि हम उनका साथ छोड़ें जिनके साथ रहने में मन को रंज होता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:विषयी लोग दीप और संत हीरे समान होते हैं]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=39</link>
<pubDate>Thu, 03 Jul 2008 01:30:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=39</guid>
<description><![CDATA[
दीपक सुन्दर देखि करि, जरि जरि मरे पतंग
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
दीपक सुन्दर देखि करि, जरि जरि मरे पतंग<br />
बड़ी लहर जो विषय की, जरत न मोरे अंग </strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं जलते हुए दीपक की रौशनी को देखकर पतंगे जल-जल कर मर जाते हैं। उसी प्रकार जब मनुष्य के मन में विषयों की लहर हमेशा उठती है और वह उसमें बहता रहता है-उसे अपने जीवन मरण का विचार ही नहीं रहता।</p>
<p><strong>सहकामी दीपक दसा, सौंखें तेल निवास<br />
कबीर हीरा संत जन, सहजै सदा प्रकाश </strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जिसमें कामवासना अधिक होती है उसकी दशा दीपक के समान होती है जो जलते हुए अपने तेल को भी चूस लेता है जबकि वह उसकी ऊजा का स्त्रोत होता है और उसके समाप्त होने पर दीपक स्वयं भी बुझ जाता है। इसके विपरीत संत लोग हीरे के समान होते हैं जिनकी तपस्या का प्रकाश चारों और फैलता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:देता तो परमात्मा है किसी अन्य का भ्रम मत पालो]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=38</link>
<pubDate>Wed, 02 Jul 2008 01:32:49 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=38</guid>
<description><![CDATA[देनदार कोउ और है, भेजत सा दिन रैन
लोग भर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>देनदार कोउ और है, भेजत सा दिन रैन<br />
लोग भरम पै धरे, वाते नीचे नैन</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि इस जीवन में कुछ देने वाला तो परमात्मा है पर लोग अपने द्वारा लेने-देने की भ्रम पाल लेते है। इसी कारण हमारे नेत्र झुके रहते है।</p>
<p><strong>दुरदिन परे रहीम कहि, भूलत सब पहिचानि<br />
सोच नहीं वित हानि को, जो न होय हित हानि</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि जीवन में बुरे दिन आने पर सब लोग पहचानना भी भूल जाते है। ऐसे समय में यदि अपने सहृदय लोगों से सम्मान ओर प्रेम मिलता रहे तो फिर धन की हानि की पीड़ा कम हो जाती है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>इस संसार में कुछ लोग तो गरीब है और कुछ अमीर, पर मनुष्य का स्वभाव है कि वह माया के इस भ्रम का शिकार हो जाता है और उसे लगता है कि जो अमीर है वह कुछ अधिक योग्य है और जो गरीब है वह अयोग्य। आजकल तो यह भ्रम और बढ़ गया है लोग चर्चित और धनवान लोगों को देवता समझ लेते हैं जैसे कि उनमें इंसानों जैसे गुणों के साथ कोई दोष हो ही नहीं। चारों तरफ भ्रम का साम्राज्य है। इसलिये लोग छलकपट और अपराध करके अधिक से अधिक धन कमा कर समाज में प्रतिष्ठित होना चाहते है।</p>
<p>समझदार और ज्ञानी लोग कभी भी भ्रम का शिकार नहीं होते उनको पता होता है कि यह सब माया का खेल है। इसलिये वह अमीर गरीब का भेद नहीं करते। ऐसे सहृदय सज्जन ऐसे किसी अमीर मित्र या रिश्तेदार का साथ नहीं छोड़ते तो उस व्यक्ति को अपने आप को धनी ही समझना चाहिए। माया तो आनी जानी है पर अगर कोई अपने लोग फिर भी सम्मान देते हैं तो समझ लो कुछ नहीं गया।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भृतहरि शतकःसंतोष से अमीर-गरीब समान हो जाते हैं]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=37</link>
<pubDate>Tue, 01 Jul 2008 03:58:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=37</guid>
<description><![CDATA[वयमहि परितृष्टा वल्कलैस्त्वं दृकूलै]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>वयमहि परितृष्टा वल्कलैस्त्वं दृकूलैस्सम इह परितोषो निर्विशेषो विशेषः।<br />
स तु भवतु यस्य तृष्णा विशाला मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान् को दरिद्र</strong></p>
<p>भावार्थ-इस भौतिक संसार में कोई मनुष्य वृक्ष की छाल के वस्त्र पहनकर ही संतुष्ट होता है तो किसी का मन रेशमी सूत के बने वस्त्र धारण कर ही प्रसन्न होता है। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। धनी और निर्धन के संतोष में कोई अंतर नही। जिसकी बहुत बड़ी इच्छाएं वह दरिद्र होते हुए भी मन के संतुष्ट हो जाता है तो भला किसे धनी कहा जाये और किसे दरिद्र।</p>
<p><strong>संक्षिप्त व्याख्या-</strong>यहां कोई धनी अपने धन पर इतराता है तो कोई अपनी निर्धनता को लेकर त्रस्त रहता है। अपनी देह में विचरने वाले मन की ओर कोई दृष्टिपात नहीं करता। अगर मन में संतोष है तो फिर किस बात की चिंता रह जाती है। कुछ लोग ऐसे है जो अपने पास भौतिक साधनों के अभाव की परवाह न करते हुए भक्ति भाव से अपना जीवन व्यतीत करते हैं। वह परमात्मा द्वारा दिये गये धन से संतुष्ट हो जाते हैं पर कई धनिक हैं जो धन क पीछे सदैव पड़े रहते हैं पर मन की शांति उनसे कोसों दूर रहती है। इतना ही नहीं अपनी कम आवश्यकताओं के कारण संतुष्ट लोगों के मन की शांति उनको नहीं सुहाती और तब वह सोचते हैं कि काश! हमें मन की शांति मिल जाये। </p>
<p>आज का भौतिक संसार तो आपने देखा होगा मनुष्य की अशांति पर ही अधिक चल रहा है। टीवी चैनलों पर एक विज्ञापन आता है जिसमें एक अभिनेता कहता है-‘डोंट बी संतुष्ट‘। मतलब यह कि आज के युग के व्यवसायी अपने हित के लिऐ ऐसे प्रयास करते हैं कि आम आदमी के मन में असंतोष भड़काकर उन्हें माया के ऐसे चक्कर में फंसाया जहां से वह निकल नहीं सके।</p>
<p>अगर आदमी के मन में संतोष है इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि वह धनी है या निर्धन। हमारा काम कम आवश्यकता से चल जाता है तो उससे संतुष्ट हो जाना चाहिए। संतोष ही सबसे बड़ा धन है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:शरीर रुपी बाजार में मन बिक गया]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=36</link>
<pubDate>Mon, 30 Jun 2008 02:45:47 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=36</guid>
<description><![CDATA[यों रहीम तन हाट में, मनुआ गयो बिकाय 
ज्य]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>यों रहीम तन हाट में, मनुआ गयो बिकाय </strong><br />
ज्यों जल में छाया परे, काया भीतर नांव<br />
कविवर रहीम कहते हैं की शरीर-रुपी बाजार में मन बिक गया, जैसे पानी में व्यक्ति का प्रतिबिबं पड़ने से जल के अन्दर समाहित व्यक्ति का शरीर वास्तविक नहीं होता. वह केवल परछाईं मात्र होता है,</p>
<p><strong>रहिमन ओछे नरन सों, बैर भलो ना प्रीति<br />
कटे चाटै स्वान के, दोउ भांति विपरीति</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं की तुच्छ विचार वाले नीच मनुष्य से प्रेम और द्वेष नहीं करना चाहिए, उससे किसी प्रकार का संबंध नहीं रखना चाहिऐ.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:अपने मन की वेदना सबके सामने मत प्रगट करो]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=35</link>
<pubDate>Sun, 29 Jun 2008 02:47:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=35</guid>
<description><![CDATA[रहिमन आंसुवा नैन ढरि, जिस दुख प्रगट कर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रहिमन आंसुवा नैन ढरि, जिस दुख प्रगट करेइ<br />
जाहिं निकारो गेह तें, कस न भेद कहिं देइ</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि अपने दिल का हाल हर किसी से मत कहो। सबके सामने आपने आंसु गिराने से कोई लाभ नहीं। यहां लोग दूसरे की वेदना का रहस्य सबके सामने कहकर उपहास उड़ाते हैं। अपने दुःख भुलाने के लिये दूसरों की वेदना का मजाक उड़ाने में उनको मजा आता है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>समाज सिकुड़ रहा छोटे और विघटित परिवारों तथा अन्यत्र स्थानों पर कार्य करने की वजह से कई लोग अकेलेपन को झेल रहे हैं। ऐसे में जब उनकी पीड़ा असहनीय हो जाती है तब वह अपने आसपास के लोगों को अपना समझकर कहने लगते हैं जबकि वही लोग बाद में उनका उपहास उड़ाते है। उसके बाद होता यह है कि अपनी समरूया का हल तो होता नहीं उल्टे लोग हंसी उड़ाकर तकलीफ और देते हैं। सच बात तो यह है कि सभी लोग अनेक प्रकार के तनाव झेल रहे हैं पर जब कोई उनको तकलीफ सुनाता है तो वह यह सोचकर तसल्ली कर लेते हैं कि चलो दूसरा भी दुःखी है। अपना दर्द पीते हैं फिर कोई अपनी तकलीफ सुना जाये तो सबके सामने उसका मजाक कर अपना मनोरंजन करते हैं। उसके साथ यह हुआ। देखो उसने यह गलती कर डाली।</p>
<p>ऐसे में अच्छा यही है कि अपनी पीड़ा आप झेलते रहो। समय कभी एक जैसा नहीं रहता। अच्छा समय निकल गया तो बुरा भी निकल जायेगा-यही सोचकर दिल को तसल्ली देना ठीक है। अगर कोई सोचता है कि दिल का हाल सुनाकर तसल्ली हो जाये तो वह संभव नहीं है। हां, अगर यह विश्वास हो जाये कि कोई व्यक्ति वाकई समस्या का हल कर देगा तो फिर उसे सच बता देना चाहिए।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:टोना-टोटका सब झूठ है]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=34</link>
<pubDate>Sat, 28 Jun 2008 04:02:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=34</guid>
<description><![CDATA[जंत्र मंत्र झूठ है, मति भरमो जग कोय
सार ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जंत्र मंत्र झूठ है, मति भरमो जग कोय<br />
सार शब्द जानै बिना, कागा हंस न होय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यंत्र और मंत्र एकदम बेकार है और इसके भ्रम में कभी मत पड़ो। जब तक परम सत्य और शब्द को नहीं जानेगा तब तक वह सिद्ध नहीं हो सकता। कौवा कभी हंस नहीं हो सकता। </p>
<p>जिहि शब्दे दुख ना लगे, सोईं शब्द उचार<br />
तपत मिटी सीतल भया, सोई शब्द ततसार</p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मुख से ऐसे शब्द बोलना चाहिए जिससे दूसरा प्रसन्न हो जाये। अगर दूसरा व्यक्ति हमारे बोलने से प्रसन्न होता है तो हमें स्वाभाविक रूप से आत्मिक सुख की प्राप्ति होती है।</p>
<p>संपादकीय व्याख्या-कहते हैं कि शिक्षा व्यक्ति को जागरूक बनाती है पर कुछ हमारे देश में कुछ लोग ऐसे है जो शिक्षित होने के बावजूद टोने टोटके वालों के पास जाकर अपनी समस्याओं का हल ढूंढते हैं या कथित ढोंगी साधुओं की दरबार में उपस्थित होकर उनका आशीर्वाद लेते हैं। यह यंत्र-मंत्र और टोना टोटका कई लोगों के लिये व्यापार बना हुआ है। कहीं पैसा लेकर यज्ञ हो रहा है तो कही तावीज आदि बेचा जाता है। किसी के हाथ में कोई सिद्धि नहीं है पर सिद्ध कहलाने वाले बहुत लोग मिल जायेंगे। सच तो यह है जीवन का पहिया घूमता है तो कई काम स्वतः बनते हैं तो कई आदमी के बनाने के बावजूद बिगड़ जाते हैं। ऐसे में अंधविश्वासों की सहायता लेना अपने आपको धोखा देना है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:शास्त्रों की निंदा करने वाले अल्पज्ञानी]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=32</link>
<pubDate>Sun, 22 Jun 2008 02:40:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=32</guid>
<description><![CDATA[
1.आकाश में बैठकर किसी से वार्तालाप नही]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong></p>
<p>1.आकाश में बैठकर किसी से वार्तालाप नहीं हो सकता, वहां कोई किसी का संदेश वाहक न जा सकता है और न वहां से आ सकता है जिससे कि एक दूसरे के यहां के रहस्यों जाना जा सकें। अंतरिक्ष के बारे में सामान्य मनुष्यों को कोई ज्ञान नहंी रहता पर फिर भी विद्वान लोगों ने सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के बारे में ज्ञान कर लिया। ऐसे विद्वान प्रतिभाशाली और दिव्य दृष्टि वाले होते हैं।</p>
<p>2.वेद के ज्ञान की गहराई न समझकर वेद की निंदा करने वाले वेद की महानता को कम नहीं कर सकते। शस्त्र निहित आचार-व्यवहार को कार्य बताने वाले अल्पज्ञ लोग शास्त्रों की मर्यादा को नष्ट नहीं कर सकते। </p>
<p>3.बुद्धिमान मनुष्य को कौवे से पांच बातें सीखनी चाहिए। छिपकर मैथुन करना, चारों और दृष्टि रखना अर्थात चैकन्ना रहना, कभी आलस्य न करना, तथा किसी पर विश्वास न करना।</strong></p>
<p>संपादकीय व्याख्या-कई लोग भारतीय वेद शास्त्रों के बारे में दुष्प्रचार में लगे हैं। इनमें तो कई अन्य धर्मों के विद्वान भी हैं। उन्होंने इधर-उधर से कुछ श्लोक सुन लिये और अब वेदों के विरुद्ध विषवमन करते हैं। उनके बारे में वह कुछ नहीं जानते। लाखों श्लोकों में से दो चार श्लोक पढ़कर उन पर टिप्पणियां करना अल्पज्ञान का ही प्रतीक है। इन वेदों के अध्ययन से ऐसा लगता है कि आज अप्रासंगिक लगने वाले कुछ संदेश अपने समय में उपयुक्त रहे होंगे। भारतीय वेदों ने ही इस विश्व में सभ्यता स्थापित की है। वेदों मेें यह कहीं नहीं लिखा हुआ है कि समय के साथ अपने अंदर परिवर्तन नहीं लाओ। </p>
<p>आधुनिक विज्ञान में पश्चिम का गुणगान करने वालों को यह पता होना चहिए कि सूर्य ग्रहण और चंद्रग्रहण के बारे मेें भारतीय विद्वान बहुत पहले से ही जानते थे। भारत के अनेक पश्चिम को ही आधुनिक विज्ञान को सर्वोपरि मानता है जो आज भी पूर्ण नहीं है और प्रयोगों के दौर से गुजर रहा है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भृतहरि शतक:नौकर का धर्म निभाना होता है कठिन]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=31</link>
<pubDate>Fri, 20 Jun 2008 14:16:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=31</guid>
<description><![CDATA[मौनान्मूकः प्रवचनपटूर्वातुलो जल्पक]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>मौनान्मूकः प्रवचनपटूर्वातुलो जल्पको वा<br />
धृष्टः पाश्र्वे वसति च सदा दूरतश्र्चाऽप्रगल्भ<br />
क्षान्त्या भीरुर्यदि न सहते प्रायशो नाभिजातः<br />
सेवाधर्मः परमगहना योगिनामप्यगम्यः</strong><br />
हिंदी में भावार्थ-इस संसार में सेवा का धर्म अत्यंत कठिन है। यदि सेवाक मौन रहे तो उसे गूंगा और बात करे तो बकवादी कहेंगे। अगर हमेशा ही अपने पास बैठा रहे तो ढीठ और दूर रहे तो मूर्ख माना जायेगा। क्षमाशील होता भीरु और अगर कोई बात सहन न करे तो निम्न कोटि का कहा जायेगा। इस बात को तो योगीजन भी समझ नहीं पाते।</p>
<p>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-यहां सेवा से आशय परमार्थ के लिए की जाने वाली सेवा नहीं है वरन् जो अपने पेट पालने के लिए दूसरों की नौकरी करने से है। आज हमारे देश के सभी शिक्षित लोग नोकरी के पीछे भाग रहे हैं और जो नौकरी कर रहे हैं वह सब ऐसी हालत का सामना करते हैं जिसमें उन्हें अपनी स्थिति समझ मेे नहीं आती। कुल मिलाकर अगर हम कहीं नौकरी कर रहे हैं तो अपने आत्म सम्मान की बात आजकल तो भूल ही जाना चाहिए। नौकरी चाहे निजी हो या सरकारी उसमें आदमी के लिऐ तनाव तो रहता ही है। यहां बोस के ऊपर बोस है पर हैं सभी नौकरी करने वाले। नौकरी करते हुए किसी को प्रसन्न नहीं किया जा सकता हैं। इसलिये निश्चिंत होकर नौकरी करें तो ही ठीक है। उसमें अगर आत्म सम्मान बचाने का विचार किया तो वह संभव नहीं है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[समाज के साथ होने का भ्रम पालना व्यर्थ-चिंतन ]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=30</link>
<pubDate>Sat, 07 Jun 2008 07:42:10 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=30</guid>
<description><![CDATA[समाज को बांटकर विकास करने का सिद्धांत ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i21.tinypic.com/1y1nbd.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' />समाज को बांटकर विकास करने का सिद्धांत मुझे कभी नहीं सुहाता। मुझे उकताहट होती है जब कोई आदमी अपनी जाति, भाषा, धर्म, प्रदेश और या कुल के नाम अपना परिचय देकर अहंकार या कुंठा प्रदर्शित करता  हैं। मेरा मानना है कि यह सब उन लोगों को कहना पड़ता है जो अपने अंदर केवल कमाने और खाने के अलावा कोई योग्यता नहीं रखते। वैसे कोई आदमी किसी का सगा नहीं होता। यहां तक कि जब अपने परिवार पर संकट होता है तो आदमी पहले अपने को बचाने का प्रयास करता है। अगर वह किसी समूह या वर्ग के होने का दावा करता है तो इसका आशय यह है कि उसका  लाभ उठाना चाहता है अगर कहीं से उसे लगता है कि उसके वर्ग या समूह की हानि से उसे भी परेशानी होगी तो वह उसके साथ हो जाता है। इसके विपरीत अगर उसे लगता है कि  मदद नहीं  करने से व्यक्तिगत हानि होगी तो वह दूर भागता है और अगर हानि लाभ की संभावना से परे हो तो वह मूंह भी फेर लेता है।</p>
<p>                     मतलब यह कि व्यक्तियों द्वारा  समूहों और वर्गों के जुड़े होना भी एक भ्रम है। मै किसी प्रकार के नारों और वाद पर चर्चा नहीं करता क्योंकि उनमें कोई को गहन विचार नहीं होता। कुछ अनुमान और कल्पनाएं दिखाकर ऐसे नारे और वाद प्रतिपादित किये जाते हैं जिनका प्रयोजन उन समूहों और वर्गो के लोगों को  एकत्रित कर अपने लिये आर्थिक और सामाजिक श्रीवृद्धि के साधन जुटायें जायें। हर समूह या वर्ग के शीर्षस्थ लोग कथित रूप से बड़े होने का स्वांग कर कल्याण और विकास का नारा देते हैं। मैंने कई बार देखा है और कई बार ठगा जाता हूं। कई बार तो ऐसा भी लगा है कि जिस समूह या वर्ग से जुड़ा बताकर कोई बड़ा आदमी मेरे कल्याण की बात कर मुझे अपने साथ जुड़ने को प्रेरित कर रहा है तो यह जानते हुए भी कि वह ढोंग कर रहा है तब भी उसकी बात दिखाने के लिये मान लेता हूं। सोचता हूं कि यार, आदमी को समूह या वर्ग से जुड़ा होना चाहिए क्योंकि सब लोग एसा ही करते हैं। मनुष्य ही सामजिक प्राणी है और असामाजिक भी। ऐसे में अपने समूह या वर्ग से अलग किसी समूह या वर्ग के व्यक्ति से कोई वाद-विवाद हुआ तो उसमें मेरे लोग ही मेरे काम आयेंगे-यही भ्रम पालकर  खामोश हो जाता हूं। भरोसा नहीं है कि मेरे समूह या वर्ग के बड़े लोग मेरे किसी काम आयेंगे इसलिये किसी से वाद-विवाद भी नही करता पर फिर भी सच नहीं कहता और भीड़ में भेड़ की तरह शामिल हो जाता हूं।</p>
<p>यह मेरा अकेले का सच नहीं है बल्कि सब लोग यही कर रहे हैं। अपने अंदर एक अनजाना खौफ है जो शुरू से आदमी में जाति,भाषा,धर्म और क्षेत्र के नाम पर बने समूहों और वर्गों में उसे बने रहने के लिये प्रेरित करता है जो सामान्य लोगों के सहयोग से कुछ कथित लोगों को बड़ा आदमी बना देते हैं और उनका  जीवन भर उनका शोषण करते हैं। इस देश में पहले भी ऐसा ही हुआ अब भी हो रहा है। सत्य सब जानते हैं कि कोई भी किसी का नहीं है पर फिर भी भ्रम का साथ देते हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अपना ज्ञान बघारते हुए-हिन्दी कहानी]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=29</link>
<pubDate>Sat, 31 May 2008 09:55:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=29</guid>
<description><![CDATA[वह ज्ञानी थे और अभी प्रवचन कार्यक्रम क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>वह ज्ञानी थे और अभी प्रवचन कार्यक्रम कर लौटे थे। मेरे से उनकी मुलाकात उनके यजमान के घर पर जो कि मेरे मित्र थे के घर पर हुई जहां मै किसी काम से गया था।</p>
<p>मित्र ने मुझसे कहा कि ‘‘तुम प्रवचन कार्यक्रम में क्यों नहीं आये? आना चाहिए भई। यह ठीक है कि तुम आजकल योग साधना कर रहे हो पर कभी-कभी सत्संग भी सुना करो।’’</p>
<p>वह प्रवचनकर्ता कोई साधु संत नहीं थे बल्कि गृहस्थ थे पर ऐसे ही उनका नाम हो गया था तो लोग समय पास करने के लिये उनका बुला लेते थे। मैं मित्र की बात सुनकर हंस पड़ा तो वह सज्जन बोले-‘‘हां इस दुनियां में सुबह बहुत तेजी से सांस लेने वाले भी कई योगी न रहे। कबीरदास जी यही कहते हैं इसलिये भगवान भजन में मन लगाना चाहिये। योग साधना से क्या होता है।’’</p>
<p>मैं थोड़ा जोर से हंसा तो वह बोले-‘‘आप इसे मजाक मत समझिये मैं आपको सही ज्ञान की बात बता रहा हूं।’’</p>
<p>इसी बीच मेरे मित्र की पत्नी भी एक थाली में फल और मिठाई रखकर आ गयी तो वह उसे देखते हुए बोले-‘‘मिठाई तो अभी नहीं खाउंगा। एक सेव अभी खा लेता हूं बाकी थैले में रख दो घर ले जाता हूं।</p>
<p>मैं भी मुस्कराते हुए उन्हें देख रहा था। मेरा मित्र होम्योपैथी का डाक्टर था और अधिक प्रसिद्ध न होने के बावजूद उसका काम ठीक चल रहा था और अपने मोहल्ले की तरफ के वह इस कार्यक्रम का मुख्य कर्ताधर्ता था।</p>
<p>वह सेव खाते हुए उससे बोले-‘भाई, हमें कम से कम महीने भर की दवाई दे दो ताकि हमारी और पत्नी की डायबिटीज कंट्रोल में रहे।’’</p>
<p>मेरा मित्र दवाई लेने चला गया तो उसकी पत्नी भी वहं से चली गयी। तब वह मुझसे बोले-योगसाधना से कोई सिद्ध नही होता। यह कहने की बात है। इसलिये आप भगवान में मन लगाया करो। उनकी भक्ति से सब ठीक हो जाता है।’’<br />
मैने उनसे कहा-‘यह मेरा मित्र डाक्टर है और पांच  वर्ष पूर्व उच्च रक्तचाप की शिकायत के कारण इलाज कराने आया था । तब इसने मुझे खूब डांटा था। इसके पास अब कभी मरीज का तरह दवाई नहीं लेने न आना पड़े इसलिये ही योगसाधना करता हूं। यकीन करिये केवल उसके बाद दो वर्ष पहले बुखार की शिकायत लेकर आया था यह अलग बात है कि यह उस दिन घर पर नहीं था तो इसके पोर्च में पलंग पर सो गया और मेरा बुखार चला गया। इससे बचने के लिये ही मैं योगसाधना, ध्यान और मंत्रजाप करता हूं।’’</p>
<p>तब तक मेरा मित्र कमरे के अंदर आ गया था और मैने उसके सामने ही कहा-‘‘एक डाक्टर के रूप में मुझे इसकी शक्ल पसंद नहीं है।’’</p>
<p>उनका मूंह उतरा हूआ था। उन्होंने अपना मिठाई और फल को थैला उठाया और वहां से चले गये। जाते वक्त उन्होंने मेरे मित्र और उसकी पत्नी से बात की पर मेरी तरफ देखा भी नहीं। उनके जाने के बाद मैने अपने मित्र से पूछा-‘‘कौन सज्जन थे ये?’’</p>
<p>वह बोला-‘‘कोई अधिक प्रसिद्ध तो नहीं है मेरे मरीज है और मोहल्ले के लोगों ने कहा कि सत्संग कराना है। सो बुलवा लिया। वैसे बहुत ज्ञानी हैं।तुम्हें कैसे लगे?’<br />
मैंने कहा-^मैं क्या कह सकता हूँ. अगर तुम कहते हो तो ज्ञानी ही होंगें. बाकी मैं ऐसे सामान्य लोगों पर अपनी टिप्पणी नहीं करता.''<br />
मित्र और मेरे बीच अनेक बार अध्यात्म पर जोरदार बहसें सुन चुकी उसकी पत्नी को मेरे से इस उत्तर की आशा नहीं थी। इसलिये उसने हंसते हुए पूछा-‘‘क्या सोच बोल रहे हैं या हमारा मन रख रहे हैं।’’</p>
<p>वह गलत नहीं थी पर मैं मित्र द्वारा दिये गये महत्वपूर्ण कागज के लिफाफे को लेकर वहां से बाहर निकल गया। पीछे से मेरा मित्र मुझसे कह रहा था-सच बोलना। क्या तुंम हमारा दिल रखने के लिये मान रहे हो कि वह वास्तव में ज्ञानी हैं।’’</p>
<p>मैने पलटकर उसे मुस्कराते हुए देखा  और वहां से बिना उत्तर दिये चला आया।</p>
<p> </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कठपुतली का खेल तो अब भी चल रहा है-व्यंग्य]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=24</link>
<pubDate>Sun, 18 May 2008 15:01:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=24</guid>
<description><![CDATA[हम घर से बाहर निकल कर जैसे सायकल से सड़]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हम घर से बाहर निकल कर जैसे सायकल से सड़क पर आये तो  एक सज्जन मिल गये और  हमसे बोले-‘कहां जा रहे हो।’</p>
<p>हमने कहा-‘पुतले और पुतली का खेल देखने जा रहे हैं।’<br />
वह बोले-‘‘कहां जा रहे हो? हमें भी बताओ। अरसा हो गया कठपुतली का खेल देखे। हमें भी बताओं तो हम भी अपनी कार से वहां पहुंच रहे हैं।’’<br />
हमने कहा-‘नही, दरअसल हमारे एक मित्र ने हमसे कहा कि आओ पोल खोल देखेंगे। उसी के आग्रह पर उसके घर जा रहे हैं।’</p>
<p>वह बोले-‘‘अरे, वह तो फिल्म का नाम है। उसमें तो मशहूर हीरो  और हीरोइन ने एक्टिंग की है। तुंम उसे पुतले-पुतली का खेल कह रहे हो।’’</p>
<p>हमने कहा-‘मगर फिल्म और कठपुतली के खेल में फर्क क्या हैं?<br />
वह बोला-‘‘कमाल करते हो यार? मैने सुना तुमने पीना छोड़ दी है। लगता है आज सुबह ही पीकर निकले हो। उसमें तो असली हीरो-हीरोइन ने काम किया है।’’</p>
<p>हमने उत्तर दिया कि-‘‘ कब कहा कि नकली ने काम किया है। मगर काम तो वही किया है जो काठ के बने पुतले-पुतली ही करते हैं। उनको जो डायरेक्ट कहता है वैसा ही अभिनय करते हैं। नृत्य निदेशक जैसा कहता है वैसा ही नाचते हैं ओर संवाद लेखक जैसा लिखकर देता है वैसा ही बोलते हैं। बस बोलते खुद है, चलती उनकी टांगे ही है और बोलती उनकी जुबान है। कोई प्रत्यक्ष कोई डोर पकड़े नहीं रहता। अप्रत्यक्ष रूप से तो कोई न कोई पकड़े रहता ही है फिर हुए तो वह भी पुतले-पुतली ही न!’’</p>
<p>वह बातचीत का विषय बदलते हुए बोले-‘छोड़ो यार, कल तुमने क्रिकेट मैच देखा। क्या जोरदार मैच हुआ?’</p>
<p>अमने च ौंककर पूछा-‘‘क्या भारत की टीम का कोई क्रिकेट मैच हो रहा है?’</p>
<p>‘नही यार,‘‘वह बोले-‘वह ट्वंटी-ट्वंटी के मैच हो रहे हैं। क्या जोरदार मैच हो रहे हैं? तुम तो क्रिकेट के शौकीन हो तुम्हें यह मैच देखना चाहिए।</p>
<p>हम बुद्धुओं की तरह खड़े रहे फिर पूछा-‘‘पर मैच किस देश से हो रहा है?<br />
वह झल्लाकर बोले-‘तुमसे बात करना बेकार है। बहस पर बहस करते हो। अरे किसी देश की टीम से नहीं बल्कि ऐसे ही कुछ टीमें हैं उनके मैच हो रहे हैं।’’</p>
<p>हमने बनते हुए कहा-‘‘अच्छा! तुम उन मैचों की बात कर रहे हो। हमने टीवी पर सुना था कि कुछ उस पर बीस हजार करोड़ रुपये का दांव लग रहा है। अब जब दांव लगेगा तो फिर कहीं यह भी कठपुतली के नाच की तरह तो नहीं है।’ जब इतने बड़े मैचों पर जिनमें देश का नाम दांव पर लगा होता है तब ऐसी ही बातें होतीं हैं कि अमुक ने मैचा फिक्स कर लिया  और अमुक ने अपना प्रदर्शन क्षमता से कम किया उसमें सच्चाई न भी होत तो इनमें तो ऐसा हो सकता है क्योंकि इसमें किसी के प्रति जवाबदेही नहीं है।<br />
वह बोले-‘‘अपने का इन चीजों से क्या लेना देना? अपने को तो मैच देखना है।’</p>
<p>हमने शुष्क स्वर में कहा-‘इनसे कोई लेना देना नहीं है इसलिये तो वह मैच नहीं देख रहे। डांस  चाहे इसमे देखें या उसमें है तो डांस ही।  <br />
वह बोले-‘‘तुमसे अब बहस करना बेकार है। मनोरंजन का मतलब ही नहीं समझते।’<br />
हमने कहा-‘‘नहीं समझते तो दोस्त के आमंत्रण पर उसके घर क्यों जा रहे हैं? बस फर्क यह है कि तुम फिल्म कहते हो हम पुतले-पुतली का नाच कहते हैं।</p>
<p>वह सज्जन झल्लाकर चले गये। हमने अपनी राह ली। हम भी सोच रहे थे कि सुबह-सुबह क्योंे पंगा लिया।</p>
<p>दरअसल पहले लोग अपनी शक्ल ही आइने में देख पाते थे और फिर अपने सामने चलते फिरते लोगोंे से मजा किसको आता है। इसलिये कठपुतली के अभिनय को देखकर उनको मजा आता है। अब आ गये हैं कैमरे। उसमें तो हाड़मांस के पुतले काम करते हैं तो हम कह देते है। कि हीरो-हीरोइन हैं। काम तो वह वैसा ही कर रहेे हैं सच तो यह कि हर कोई हीरो-हीरोइन बनने के सपने देखने का आदी है इसलिये कठपुतली कहने से झिझकता है। यह भी हो सकता है कि कठपुतली का खेल कहने से लोगों को अपने गंवार होने का अहसास होता हो क्योंकि आजकल तो हर कोई माडर्न बनकर रहना चाहता है। उन हांड़मांस के पुंतलों में अपने को देखता है इसलिये ही कहता है कि हीरो-हीरोइन है।  हम भी पहले ऐसे ही देखते थे। इधर जब से ज्ञान और ध्यान में घुसे हैं तब से र्थोड़ा देखने का नजरिया बदला है। क्रिकेट खेल देखकर हमने अपना जीवन बरबाद कर लिया और अगर वह वक्त हमने कहीं अगर और लगाया होता तो आज क्या होते? उसक मलाल अब दूर हो गया है जब से इस ब्लाग विधा में घुसे हैं। हम अपने को पुतला नहीं कहते क्योंकि स्वयं ही विचार कर लिखते हैं। हम तो उसे ही मनुष्य की तरह कर्म करने वाला मानते हैं जो अपनी बुद्धि से चलता है न कि दूसरे की बुद्धि से। कहने को खिलाड़ी और अभिनेता भी अपनी बुद्धि से चलते हैं और हम उन्हें अपने जैसा मानते है पर उनकी फिल्म और ऐसे छोटे मैचों में उनकी सक्रियता को ही पुंतलों जैसा मानते हैं। आखिर हमारी इस राय में क्या कमी है?<br />
 </p>
<p> </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[The pain is like writing rather than on conflict]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=23</link>
<pubDate>Tue, 06 May 2008 15:49:51 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=23</guid>
<description><![CDATA[it is a hindi article ant translashan by googl tool
I am writing it on internet Absolutely not mean]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div id="result_box" dir="ltr">it is a hindi article ant translashan by googl tool</div>
<div dir="ltr">I am writing it on internet Absolutely not mean it should be that I am a family of medium-high. Truth is that I was born in the lower middle class and the Board's examination, even after I push wages and run. The shop was on the job I was a wholesale shop and other stores to shop for me many times on the trolley was running out. This was his dad I was also secret. Sometimes my legs had removed the nails into the blood. That his job during the afternoon when I was writing had come to the house - it does not have any pain, but life was optimism. If not today, tomorrow, I will - I believe life is precious capital.</p>
<p>Nowadays you have to work on the scooter I am still split on my bicycle. Physical activity to the poor or the poor say some people may feel comfortable, I do not. So the poor people's pain on stories or verses written Wah '- Wah resources are not interested in me. In this country, work hard on those who lack it is not too full of such pain does not like to work. Yes, AC dining rooms of hotels and those who sit in the privacy of his heart in such sensitive work to pain, she created the juices are happy. The pain is also a juice and everything is on pain who do not have the juice to keep the same reason, depriving them of the pain of poor films and writings became like it. Some of our renowned filmmaker and writer on the same level of pain renowned international support has not even ask any of them here. Yes, this country when they got out of goodwill, here they are also awards provided emotional as ever on the common man not associated with them.</p>
<p>I watched as a worker is the bread I do not respect or sympathy and love, need and therefore a matter of how his people and also are back. Everything in your life, your hard work to make one thing I've seen is that poor workers and the pain and feelings of some people do business. Even if they do not get more money on a lot of respect and he earned a name. A poor labourer on the illness and some real, some fake story written to the pain juice sold.<br />
I always struggle with his poems and poems to set up the price gets so because I am feeling is that the hard work of growing self-confidence. In this country, the welfare of the poor and the workers put the slogan of the intellectuals is a long time and he dominated educational and social institutions such that infiltration has become a society of people from their structure is still in pain juice want to laugh -- They lack confidence because it is so painful and hard work do not juice is not the ones created. The lack of money who do they struggle for survival is a disease and other social crises, and also would not give her a sense he is not wanted. A little respect and love and that nobody wants to give.</p>
<p>My wife sometimes push those who buy goods from the time Even bargain basement healers like him, I am refusing to say that - 'This is working hard to help the society, because if he does not understand the cradle for the stomach of a crime Can '.</p>
<p>It is my inner pain is not present any conflict, but my life experience from a reality. my life in the struggle is an experience I have is that most people work hard so that they respect someone not be crushed under the legs. I would also does not claim that I work hard I of those who are very sensitive because it means that their labour to see reduced.<br />
Today I do not so much physical activity. When I fought physical activity even when I was writing satire and comedy, sometimes even when sweat bathe even when I am just writing fun deal. The authors of this confusion so that the pain is written on the popularity earned them the illusion of prevention will be out. The country also work hard to read as well as occasionally wants to work on the chairs of the people - the pain of watching a film or reading the creation of juice would laugh - ever want to read them. So I prefer to write on the pain rather than conflict.</p>
</div>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[Translation, the author of nearly all the languages of tools will  ]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=22</link>
<pubDate>Sun, 04 May 2008 13:34:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=22</guid>
<description><![CDATA[
I have some lessons to the Blog English translation in Hindi to read them. It is also written by In]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><em></p>
<p>I have some lessons to the Blog English translation in Hindi to read them. It is also written by Indian writers were. It seems that the world's entire world Blog at the same time, however, one of them will appear as the written content of your country and the region has been the subject of a separate - will appear on the fundamentals of a separate not like the reflection. </p>
<p>Hindi with English translation tool to use the Blog writer also went out of his linguistic limitations of the prestigious English may not know that. Hindi on the forums of unregistered Blog English translation of the lessons I am also presented. I read stories in English could be so clear on the translation tool, I will be working hard on the curiosity I am. The English - Hindi tool of the information now found on the already being used elsewhere. I have a Blog writer that day was his comment on a post and when I was there on his Blog post in Hindi. Blog writer's name in English. A number of English first names to write on, I think the comment was such that it will be placed. Blog author of a comment on my Blog in a Hindi - English tool of the discussion was a day when I felt it was a tool that would so quickly I did not expect such a warning.
</p>
<blockquote><p><strong></p>
<p> it is hindi article and it translasion in inglish by googl tool. i dont more knowledge in inglish-Deepak Bharatdeep.enough knowledge of English is not so sorry for any error - Deepak Bharatdeep<strong></p>
<blockquote></blockquote>
<p></strong></p>
</blockquote>
<p>The point is that the translation is not the result cent of its English-reading assistance, has been found. So it has been used to write for me. When I am on my translation of the text for many words, I brought it back to him does not accept the word alternative keeps me. I created a little English, they may also be understood very well, I will take. It seems that his reaction to the positive. Blog writer also some English writers of Hindi Blog for striving to make contact are showing. Blog writer to remember the mood of Hindi-speaking foreign writers Blog for the remains of his contacts should take place. This Blog is not here and who walks through the translation tool at their other speaking Blog writers come in contact with the full possibility. </p>
<p>Blog of a word in the language translation is not a Blog and writers for the Wall of the language seems to have ended. Yesterday an English writer Blog has posted a response on the matter, in the sense that he has been reading my post as he is writing Jennifer Lancey wrote Hello there. I was sent a link to your blog by a friend a while ago. I have been reading a long for a while now. Just wanted to say HI. Thanks for putting in all the hard work. Now is not surprising that I am writing in Hindi read, is the only people who know only English. I read it and the English translation of his address about his opinions do not run, but we will also go well where such comments are alleging that it is clear that our understanding of that. Yes, I can not wait for this thing to me is that a Hindi translation of the Blog tool to read the translation itself but also keeping am. To correct the translation of impurities so am working hard so that my posts and more clearly readable. Now it's time to write the attention that I am keeping Blog of the translation of other languages. All the languages of the world's Blog writer for a day so that they will be close to the longer distances will be named. I want Hindi Blog writer, and they are also the world at his prestigious posts to be on time sometimes on the translation tool that should see the full translation in English that comes from reading. The word translation are not optional for him to choose words as possible. English translation is not necessary that we keep enough of it, that it can be translated in English, the maximum net. There is not any objectionable because we are writing in Hindi and other languages if the author of Blog contact us if they're willing to keep the facility would be. One thing is the experience that we all their lessons in pure Hindi words maximum use it as pure English translation. </p>
<p>Stories<br />
Google's translation of the text has been presented here to</p>
<p></em></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्रिकेट मैच में एक्शन का सीन-हास्य कविता]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=20</link>
<pubDate>Wed, 30 Apr 2008 15:31:05 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=20</guid>
<description><![CDATA[बगल में अखबार दबाकर
घर आया फंदेबाज और ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#ff00ff;">बगल में अखबार दबाकर<br />
घर आया फंदेबाज और बोला<br />
‘दीपक बापु तुमने<br />
पहले अखबारों  और अब ब्लाग पर<br />
क्रिकेट पर ही लिखना शुरू किया<br />
फिर क्यों अब मूंह फेर लिया<br />
देखो क्रिकेट में फिल्म के एक्शन का<br />
मजा भी आ रहा है<br />
पहले पिटा  हीरो<br />
अब पीटकर बाहर जा रहा है<br />
क्यों नहीं तुम भी देखा करते<br />
बैट-बाल के खेल में<br />
मारधाड़ की भी मजा क्यों नहीं लिया करते<br />
ऐसे क्रिकेट से क्यों किनारा किया’</span></strong></p>
<p><strong><span style="color:#ff00ff;">सुनकर पहले हैरान हुए फिर बोले<br />
‘‘हम फिल्म के वक्त फिल्म और<br />
क्रिकेट के वक्त क्रिकेट देख करते हैं<br />
यह टू-इन-वन मजा तुम ही लो<br />
हमें तो अब इससे दूर ही समझ लो<br />
हमने पहले भी कहा था<br />
क्रिकेट अब कम खेली जायेगी<br />
पर उससे पहले उसकी पटकथा लिखा जायेगी<br />
फिल्म वालों ने लिया है मोर्चा<br />
क्रिकेट को चमकान का<br />
तो उनकी कला यहां भी नजर आयेगी<br />
आस्ट्रेलिया में किया था जिसने हीरो को रोल<br />
उसे अब विलेन बनाकर पेश किया<br />
उस समय के विलेन को दे रहे थें जो गालियां<br />
अब बजा रहे उनके लिये तालियां<br />
यह हीरो-हीरोइन भला कब  डायरेक्टर के<br />
 हुक्म के बिना एक्शन के कब होते है<br />
जरूर लिखी होगी किसे ने पटकथा<br />
जो झगड़े की फोटो कैमरे से लेने में रोकते हैं<br />
झगड़ा करने वाले खिलाड़ी<br />
बाद में ऐसे होकर मिलते हैं<br />
जैसे कोई बढि़या अभिनय किया<br />
कह तो रहे है सभी<br />
पर किसने देखा यह कि <br />
थप्पड़ मारने वाले ने अपना कितना नुक्सान किया<br />
हमने ने देखा न मैच न झगड़ा<br />
पर एक बात मानते हैं कि<br />
क्रिकेट खेल में एक्शन का सीन लिखकर<br />
पटकथा लिखने वाले ने कमाल किया<br />
............................</span></strong></p>
<p><strong><br />
</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[वेलेंटाइन डे और भारतीय संस्कृति-hindi article]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=18</link>
<pubDate>Fri, 15 Feb 2008 15:05:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=18</guid>
<description><![CDATA[कल एक टीवी चैनल पर प्रसारित खबर एक खबर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>कल एक टीवी चैनल पर प्रसारित खबर एक खबर के अनुसार सऊदी अरब में वेलेंटाइन डे पर उसे मनाने से रोकने के लिए कड़े प्रतिबन्ध लगाए गए-गुलाब के फूलों की बिक्री रोकी गयी और लाल रंग के कागज़ के रैपर में उपहार बेचने पर पाबंदी लगाई गयी. हमारे देश में भी कई लोग इसका विरोध करते हैं और उसे रोकने के लिए वह उपाय करते हैं जो मेरे विचार से अनुचित है. वेलेंटाइन डे पर कल मैंने दो हास्य कवितायेँ लिखीं थी और मैं इसका विरोध या समर्थन करने की बजाय इसकी उपेक्षा करने का पक्षधर रहा हूँ. मेरे लिए इसे मनाने वाले हंसी के  पात्र हैं एक तरह से प्यार का ऐसा नाटक करते हैं जिसके बारे में वह खुद नहीं जानते. </p>
<p>मैं इस बात के विरुद्ध हूँ कि किसी को ऐसे कार्य से जबरदस्ती रोका जाये जिससे  किसी दूसरे को कोई हानि होती है. स्पष्टत: मैं वेलेंटाइन डे का पक्षधर नहीं हूँ और कभी-कभी तो लगता है कि इसके विरोधियों ने ही इसको प्रोत्साहन दिया है. यह पांचवां  वर्ष है जब इसे इतने जोश-खरोश से मनाया गया. इससे पहले क्यों नहीं मनाया जाता था? साफ है कि इलेक्ट्रोनिक प्रचार माध्यमों को रोज कुछ न कुछ  कुछ चाहिए और वह इस तरह के प्रचार करते हैं. होटलों और अन्य व्यवसायिक स्थानों पर युवा-युवतियों की  भीड़ जाती है. पार्क और अन्य एकांत स्थान पर जब खतरे की आशंका देखते हैं तो वह पैसा खर्च करते हैं. आखिर उसका फायदा किसे होता है?<br />
हमारे में से कई ऐसे लोग होंगे जिन्होंने आज से दस वर्ष पूर्व वेलेंटाइन डे का नाम भी सुना हो. अब उसका समर्थन और विरोध अजीब लगता है. जहाँ तक देश की संस्कृति और संस्कार बचाने का सवाल है तो मुझे जबरन विरोध कोई तरीका नजर नहीं आता. इससे तो उसे प्रचार ही मिलता है. फिर आम आदमी जो इसे नहीं जानता वह भी इसका नाम लेता है. कई लोगों ने इसका आपसी चर्चा में जिक्र किया और मैंने सुना. मुझे लगता है कि इस तरह इसे और प्रचार मिला. </p>
<p>जहाँ तक संस्कृति और संस्कार बचाने का सवाल है तो मैं इसे भी वाद और नारों में लिपटे शब्दों की तरह देखता हूँ. आप यह कह सकते हैं कि मैं हर विषय पर वाद और नारों से जुडे होने की बात क्यों लिखता हूँ. तो जनाब आप  बताईये कि बच्चों को संस्कार और संस्कृति से जोड़ने का काम किसे करना चाहिऐ-माता-पिता को ही न! इस तरह जबरन विरोध कर आप यह स्वीकार कर रहे हैं कि कुछ लोग हैं जो इस काम में नाकाम रहे हैं. दूसरी बात आखिर संस्कारों और संस्कृति का व्यापक रूप लोगों के दिमाग में क्या है यह आज तक कोई नहीं बताया. बस बचाना है और शुरू हो जाते हैं. आखिर इसकी उपेक्षा क्यों नहीं कर देते. एक दिन के विरोध से क्या हम समाज में जो नैतिकता का पतन हुआ है उसे बचा सकते हैं? कतई नहीं, क्योंकि हम अपने समाज के उस खोखलेपन को नहीं देख रहे जो इसे ध्वस्त किये दे रहा है. देश में कन्या के भ्रूण हत्या रोकने के लिए कई अभियान चल रहे हैं पर उसमें  कामयाबी नहीं मिल रही है. जिस दहेज़ प्रथा को हम सामान्य मानते हैं उससे जो विकृति आई है उस पर कभी किसी ने सोचा है?इसने समाज को बहुत बुरी तरह खोखला कर दिया है. </p>
<p>हम सऊदी अरब द्वारा लगाए प्रतिबन्ध की बात करें. वहाँ कोई लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं है वहाँ  भी इस बीमारी ने अपने कदम रखे हैं तो इसका सीधा मतलब यही है कि बाजार एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें पूंजीवर्ग के सदस्य  ही विजय श्री प्राप्त करते  है. इस प्रसंग में एक बात जो महत्वपूर्ण बात यह है कि सऊदी अरब में  एक धार्मिक राज्य होते हुए भी वहाँ क्यों लोग इसके प्रति आकर्षित हुए? विश्व में उदारीकरण के नाम पर  बाजार के ताकतवर लोगों के द्वार सब जगह खुले हैं पर आम आदमी के लिए नहीं. इसलिए बाजार की व्यवस्था वह सब परंपराएं और विचार लेकर आगे बढ़ रही है जो उसके लिए आय के स्त्रोत बना सकते हैं.<br />
इसका मुकाबला करना है तो उसके लिए उन लोगों को खुद दृढ़ हो होना पडेगा जिन पर अपने बच्चों पर संस्कार डालने की जिम्मेदारी है. अपने घर और बाहर अपने बच्चों को अपने आध्यात्म से अवगत कराये बिना उनको ऐसे  हास्यास्पद काम से दूर नहीं रखा जा सकता. सुबह और शाम आरती जो लोग पहले करते थे उसे फिजूल मानकर अब छोड़ दिया गया है पर आदमी के मन में संस्कार भरने का काम उसके  द्वारा किया जाता था वह अनमोल था.  कभी बच्चे को मंदिर ले जाया जाता था तो कभी तीज-त्यौहार   पर बडों के चरण स्पर्श कराये जाते थे. अब सब बातें  छोड़ उसे अपना काम सिद्ध करने का ज्ञान दिया जाता है और फिर जब वह छोड़ कर बाहर चला जाता है तो अकेलेपन के साथ केवल उसकी यादें रह जातीं हैं. </p>
<p>संस्कारों और संस्कृति के नाम पर वह फसल हम लहलहाते देखना चाहते हैं जिसके बीज हमें बोये ही नहीं. आखिर हमारे संस्कारों और संस्कृति की कौनसी ऐसी फसल खड़ी है जिसे बचाने के लिए हम हवा में लट्ठ घुमा रहे हैं. अपने आध्यात्म से परे होकर हमें ऐसी आशा नहीं करना चाहिए. याद रखना पूरी दुनिया भारत की आध्यात्मिक शक्ति का लोहा मानती है पर अपने देश में कितने लोग उससे परिचित हैं इस पर विचार करना चाहिए. </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[फ़िर भी लिखता रहूँगा]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=16</link>
<pubDate>Thu, 07 Feb 2008 14:31:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=16</guid>
<description><![CDATA[अब धीरे-धीरे यह समझ में आ रहा है कि ब्लॉ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अब धीरे-धीरे यह समझ में आ रहा है कि ब्लॉग बनाना और लिखना वैसे ही है जैसे किसी शो के लिए एस.एम् एस. करना. जिस तरह टीवी चैनल पर शो होते हैं उनके लिए लोग आत्म मुग्ध होकर एस.एम् एस करते हैं कि हमने अपनी जोरदार भूमिका अदा की. इसी तरह रेडियो पर भी ज़रा-ज़रा से प्रश्नों पर जवाब के लिए एस.एम्. एस कराया जाता है. कुछ लोगों को विजेता बनाकर उनकी आवाज वहाँ सुनाई जाती है ताकि सब लोग उससे प्रेरित हों.<br />
उससे किसका फायदा होता है सब जानते हैं. अलबता बड़े शहर के लोगों के लिए अपना नाम कमाने का खूब यहाँ अवसर हैं पर छोटे शहरों के ब्लॉग लेखकों को तो केवल भीड़ ही माना जायेगा. </p>
<p>इधर अब देश में भी ब्लॉग पर लिखने वालों को प्रोत्साहित किया जा रहा है. मैंने एक वर्ष पूर्व जब ब्लॉग लिखना शुरू किया तो मुझे लगा कि शायद कुछ पढने वाले मिल जायेंगे. यहाँ उस समय नारद करके एक फॉरम था जिस पर सब हिन्दी के ब्लॉग दिखते थे. उसके बाद तीन अन्य फॉरम  भी खुल गए. वैसे वर्डप्रेस स्वयं भी अपने आप में एक फॉर्म चला रहा है पर ब्लागस्पाट.कॉम के लिए यह सभी  हिन्दी  फॉरम बहुत उपयोगी हैं क्योंकि उसके हिन्दी ब्लॉग एक साथ  देखने के लिए कोई अन्य जगह नहीं है. बहरहाल मैंने अन्य लोगों के आग्रह पर वहाँ अपना ब्लॉग पंजीकृत कराया. शुरू में ऐसा लगा कि शायद कोई बहुत अच्छी जगह है पर अब लगाने लगा कि वहाँ अपनी रचना दिखाने का मतलब है कि उसको बाजार में बेचना. वहां ग्राहक आपकी  चीज पर कोई प्रतिकूल कमेन्ट भी कर सकता है. </p>
<p>पर अब उसका दूसरा रूप भी सामने आ रहा है. मैंने एक वर्ष तक जमकर लिखा कि शायद पाठक संख्या बढे पर ऐसा हुआ नहीं उल्टे ऐसा लगा कि ब्लॉग लेखकों  संख्या बढाकर कुछ लोग अपनी भीड़ बढाना चाहते हैं. पुराने ब्लोगर जिनके वेब साईटों में अपने संपर्क लगते हैं अपने लिए खूब प्रचार जुटा रहे हैं. मीडिया में ऐसे लोगों को प्रचार मिल रहा है जिनकी पढने की दृष्टि से हिन्दी ब्लॉग जगत में अधिक मान्यता नहीं है. इन लोगों ने पुरस्कार बांटे और फ़िर उनका अखबारों में खूब प्रचार किया.  मुझे हैरानी हुई  कि किसी ने भी मेरे नाम का उल्लेख नहीं किया जब कि मैंने  १२ सौ से अधिक पोस्टों को लिखा. हद तो इस बात की हो गयी कि ब्लोगों के विषयों का उल्लेख करते हुए उन महत्वपूर्ण विषयों-चाणक्य,कबीर, रहीम, मनु स्मृति, और कौटिल्य, विदुर नीति श्री गीता-का उल्लेख तक नहीं किया जाता क्योंकि इसे मैं लिखता हूँ. इतना भयभीत लोग हैं मैं समझता नहीं था. बड़े शहरों के लोगों के दो समूह बन गए हैं जिनका लिखने से अधिक इस बात पर यकीन है कि आत्मप्रचार किया जाए. वैसे मैं इन  विषयों पर लिखते हुए किसी सम्मान की आशा करता भी नहीं क्योंकि इसके लिए कोई प्रायोजक नहीं मिल सकता. उल्टे अपमानित  किए जाने पर कोई पुरस्कार जरूर पा सकता है ऐसी मैं आशा नहीं करता था. </p>
<p>छोटे  शहरों के ब्लोगरों के लिए नाम,नामा और इनाम जैसी अभी कोई संभावना नहीं बनती दिखती. अब तो यही सोच रहा हूँ कि हिन्दी फोरमों पर जो ब्लॉग हैं उन पर अधिक नहीं लिखा जाए क्योंकि वहाँ सम्मान न मिले पर अपमानित कर कुछ लोग पुरस्कृत जरूर हो सकते हैं. जैसे-जैसे यह संख्या बढेगी मुझे अपने  आत्म सम्मान के बचाव के लिए अधिक मानसिक संघर्ष करना पड़ेगा और ऐसे में मेरी रचनाधर्मिता प्रभावित होगी. मैंने किसी से कुछ नहीं माँगा-न नाम, न नामा न इनाम पर इससे वह संतुष्ट नहीं है. क्योंकि मेरे विषय अगर कुछ लोगों को प्रिय हैं तो कुछ लोग उनको अपमानित कर अपने लिए सम्मान भी जुटा सकते हैं. एक तो विषय है फ़िर छोटे शहर का और फ़िर लिखकर उसका पीछा न करने की आदत मुझे कहीं पुरस्कृत कराएगी यह तो मैं सोचता भी नहीं पर अपमानित करने पर कुछ लोग पुरस्कृत हों क्या मैं यह स्वीकार कर लेता. बहरहाल फ़िर भी इन फोरमों पर लिखूंगा ताकि कुछ और कहानियाँ यहाँ पर मिल सकें.  वैसे मैं धर्म भीरू इन्सान हूँ और श्रीगीता का संदेश नए संदर्भों में प्रस्तुत करने का मन है, उस पर मैं लिखता भी रहा हूँ पर जिस स्वरूप में लिखने का विचार है उसे शुरू नहीं कर सका. देखता हूँ कि आगे भगवान् की क्या मेहरबानी होती है.</p>
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<title><![CDATA[कभी कभी खामोशी भी बहुत भली]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=15</link>
<pubDate>Mon, 04 Feb 2008 15:12:07 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[जब कभी में चौपालों पर लिखता हूँ तो ऐसा ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>जब कभी में चौपालों पर लिखता हूँ तो ऐसा लगता है कि कुछ लोग नहीं चाहते कि मैं वहाँ कुछ लिखूं.<br />
कल एक चिट्ठाकार मेरे चिट्ठे पर बदतमीजी भरी कमेन्ट लिख गया और सुबह मैं जल्दी में था इसलिए उसका कोई जवाब नहीं दे सकता था पर थोडा गुस्से में उसका ब्लोग देखकर आया और फिर अपने ब्लोग से उसके कमेन्ट डीलीट कर दिए और अब उसका पता ढूंढ रहा हूँ. हालांकि मैं उसका कडा जवाब दे सकता था पर इसके पीछे उसी यह चाल भी लगती है कि वह मेरे द्वारा अपने ब्लोग की प्रसिद्धि चाहता हो. क्योंकि अक्सर कोई भी बदतमीजी करता है तो छद्म नाम से करता है, पर उसका ब्लोग और ईमेल पता मेरे ब्लोग पर दिख रहा था. इसका मतलब यह है कि वह कुछ प्रचार की उम्मीद कर रहा होगा. बहरहाल उसका पता मुझे भले ही याद न हो पर उसका ब्लोग जब मेरे सामने आयेगा तब समझ जाऊंगा. </p>
<p>वह मेरी एक कविता से बौखलाया हुआ लगता था जबकि उसके साथ मेरा कोई संपर्क नहीं है. अगर उसको कविता से विरोध था तो उसमें कुछ नहीं था और उसने के नहीं तीन कमेन्ट दिए थे. मुझे शक है कि वह पिए हुए था. अगर मेरे अन्य ब्लोग और रचनाओं को उसने पढा होता तो शायद वह ऐसा नहीं करता. ऐसा भी हो सकता है कि कुछ भद्र ब्लोगर जो मेरे लिखे से ग्रसित हैं उसे इसलिए तैयार किया हो कि वह मुझे आतंकित करे. उसने ब्लोग पर कुछ लिखा है, और कुछ वरिष्ठ ब्लोगर के उस पर कमेन्ट भी थे. बाकी पीछे की  पोस्ट पर कोई कमेन्ट नहीं था. आज मैंने एक ब्लोग देखा पर उस पर ऐसा नहीं लग रहा कि वह सज्जन ऐसे भी हो सकते हैं.<br />
मैंने अभी इस बारे में खामोशी अख्तियार करने का फैसला लिया है क्योंकि इससे वह लोग बहुत खुश होंगे जो मुझे अपमानित करना चाहते हैं. वैसे भी मैंने चौपालों पर अधिक लिखने का इरादा छोड़ दिया है क्योंकि वहाँ लिखने का मतलब है कि अपनी पोस्ट मछली बाजार में ले जाना.</p>
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<title><![CDATA[हिन्दी के ठेकेदार- हास्य-व्यंग्य  कविता]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=13</link>
<pubDate>Mon, 28 Jan 2008 17:19:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[अंतर्जाल पर एकछत्र राज्य की
कोशिश ने क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>अंतर्जाल पर एकछत्र राज्य की<br />
कोशिश ने कुछ लोगों को अंधा बना दिया<br />
अपने दोस्त लेखकों  की भीड़ जुटाकर<br />
सम्मान की एक  दुकान को   सजा दिया </p>
<p>एक लेखकनुमा ब्लोगर जो<br />
लिख नहीं पाता था कविता<br />
पसंद भी नहीं था पढ़ना<br />
चुन लाया कहीं से तीन सर्वश्रेष्ठ<br />
और अपना फैसला सुना दिया<br />
कवियों के  ब्लोग दूर ही रखे गए<br />
तकनीकी वाले जरूरी थे सो पढे गए<br />
लो मैंने अपना फैसला सुना दिया </p>
<p>मच गया शोर<br />
बरसी कहीं से हास्य कवितायेँ<br />
उसके इस काम पर<br />
आ गया वह बचाव पर<br />
देने लगा पुराने वाद और नारे पर बयान<br />
कर रहा था मैं भी वर्ग में बांटकर<br />
ब्लोग लेखकों का सम्मान<br />
पर लोगों ने अनसुना कर दिया </p>
<p>अब आया एक नेतानुमा ब्लोगर<br />
कर लाया कहीं से बीस का जुगाड़<br />
पुराने दोस्तों को सजाया थाली में<br />
जैसे कोई पकवान<br />
इनके लायक ही है सर्वश्रेष्ठ का सम्मान<br />
लोकतंत्र है सो करो मतदान<br />
मैंने तो बीस का थाल सजा दिया </p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
अभी शुरू भी नहीं हुई<br />
इंटरनेट पर हिन्दी के आने की प्रक्रिया<br />
पहुंच गए हैं धंधेबाज पहले ही<br />
और अपना दुकान सजा दिया<br />
हैरान है लोग<br />
जो हिन्दी की ठेकेदार<br />
 हर जगह  हैं<br />
सन्देश देते हैं<br />
यहाँ हिन्दी का अपमान हुआ है इस पर लिखो<br />
जमकर विरोध करते दिखो<br />
तुम लिखो जैसा हमने सन्देश दिया </p>
<p>क्या ब्लोग तुम्हारी जागीर है<br />
जो थाल सजाये घूम  रहे हो<br />
अपनी वीरों को ही क्यों नहीं झोंकते<br />
तुम्हारी फौज में दम नहीं है<br />
जो हिन्दी का अपमान नहीं रोकते<br />
फिर काहे उनको सम्मान दिया<br />
ग़लतफ़हमी मत पालो<br />
नारों और वाद पर हम नहीं भड़कते<br />
लिखते हैं अपने ख्याल खुद<br />
तुम तो पूजते हो<br />
अपने महल सजाते हो दूसरों के सम्मान से<br />
हिन्दी की दुर्दशा पर रोने वालों<br />
लिखने वालों तो जीते हैं अपमान से<br />
फिर भी दमदार लिखते हैं<br />
वह और होंगे जो तुम्हारे  सम्मान पर बिकते हैं<br />
हिन्दी लिखने वाले तो दिल से लिखते हैं<br />
उन्हें परवाह नहीं सम्मान तुमने<br />
दिया कि  नहीं दिया<br />
---------------------------</p>
]]></content:encoded>
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