विनय wrote 1 year ago: यक़ीनन तुम्हारे हुस्न पे लाखों मरते होंगे मगर जो तुम पर मिट गया वह ‘नज़र’ है मेरी इब्तिदा … more →
विनय wrote 1 year ago: कितने दिन हुए कोई टूटता सितारा नहीं देखा मेरे हश्र को एक यह बुनियाद और सही… क्या तू अब भी मुझे … more →
विनय wrote 1 year ago: मैं अत्यन्त अकेला था अनन्त शून्य था मेरे अन्दर यूँ ही विचार आया मन में अपना भी हो एक सुन्दर घर कुछ न … more →
विनय wrote 1 year ago: धीरे-धीरे उतरती है साँस सीने में यह दर्द बड़ा बेदर्द है सीने में लुत्फ़ जीने क सब ख़त्म हो गया … more →
विनय wrote 2 years ago: सौंधी हुई एक खु़शबू मेरी आँखों में आकर सो गयी है कभी भर जो आती है आँख सारा मंज़र महका देती है… … more →