Blogs about: Enternment

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पैसे के साथ इश्क में भी आ सकता है मंदी का दौर - हास्य व्यंग्य

दीपक भारतदीप wrote 3 weeks ago: क्वीसलैंड यूनिवर्सटी आफ टैक्लनालाजी के प्रोफेसर कि अनुसार इस मंदी के दौर में लोगों के दाम्पत्य जीवन … more →

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वैलंटाईन डे का एक दिन में शोर थमा (हास्य-व्यग्य)

दीपक भारतदीप wrote 4 months ago: कल वैलंटाईन डे बीत गया। पिछले प्रदंह दिन से उसका प्रचार जोरदार ढंग से हुआ। आज अनेक खबरें इस बारे म … more →

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एक दिन क्या पूरा महीना है मज़े लेने का - व्यंग्य

दीपक भारतदीप wrote 4 months ago: वैलंटाईन डे की चर्चा आजकल सुर्खियों में हैं। इसका कुछ लोग विरोध करते हैं तो कुछ नारी स्वतंत्रता के न … more →

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उपेक्षासन सीख लो तो तनाव नहीं रहेगा-व्यंग्य 1 comment

दीपक भारतदीप wrote 4 months ago: हम कपड़े क्यों पहनते हैं? इसके चार जवाब हो सकते हैं 1.सभी कपड़े पहनकर घूमते हैं। 2.हम बिना कपड़े पहन … more →

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मधुशाला पसंद है पर मद्यपान नहीं -व्यंग्य

दीपक भारतदीप wrote 4 months ago: हिंदी भाषा के महान कवि हरिबंशराय बच्चन ने मधुशाला लिखी थी। अनेक लोगों ने उसे नहीं पढ़ा। कई लोग ऐसे ह … more →

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मंदी का दौर:नया उपभोक्ता वर्ग कहां से आयेगा-आलेख

दीपक भारतदीप wrote 4 months ago: अमेरिका के उद्योगपति बिल गेट्स ने कहा है कि वर्तमान मंदी अगले चार साल तक चल सकती है। बिल गेट्स विश् … more →

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आजाद होकर भी गुलाम खड़े मालिकों की कृपा के इंतजार में -हास्य व्यंग्य कविताएँ

दीपक भारतदीप wrote 5 months ago: परदेस में पुजने से ही देश में भगवान बनेंगे कैसा यह उनका भ्रम है। देश के लोगों से मिले मान से क्या गौ … more →

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सभी पियक्कड़ हो जाते, जो पहुंचे मधुशाला-व्यंग्य

दीपक भारतदीप wrote 5 months ago: हिंदी भाषा के महान कवि हरिबंशराय बच्चन ने मधुशाला लिखी थी। अनेक लोगों ने उसे नहीं पढ़ा। कई लोग ऐसे ह … more →

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बाज़ार में खौफ का अफ़साना-हिन्दी शायरी

दीपक भारतदीप wrote 5 months ago: <strong>कुछ हकीकत कुछ ख्वाव बन जाता है  यूँ ही अफसाना सुर्खियों में बने रहें अख़बारों की  चर्च … more →

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मानव सभ्यता पर वाद-विवाद-आलेख

दीपक भारतदीप wrote 5 months ago: आज एक समाचार में एक इतिहासकार द्वारा इतिहास में अयथार्थ से भरे तथ्यों को शैक्षणिक पाठ्यक्रमों से हटा … more →

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रौशनी ने भी अपने रूप बदले हैं-हिंदी शायरी

दीपक भारतदीप wrote 5 months ago: निकले थे अंधेरे में माटी के चिराग ढूंढने पर कांच के बल्ब के टुकड़े लग गये पांव में रौशनी ने भी अपने … more →

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भक्तिकाल और अध्यात्मिकता -आलेख

दीपक भारतदीप wrote 5 months ago: शायद वह लोग सही कहते हैं कि ‘हिंदी सिखाने के लिये रहीम,तुलसी और कबीर की रचनाओं को नहीं पढ़ाना चाहिय … more →

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कतरनों में मनोरंजन -हास्य कविताऐं1 comment

दीपक भारतदीप wrote 6 months ago: बेच रहे हैं मनोरंजन कहते हैं उसे खबरें भाषा के शब्दकोष से चुन लिए हैं कुछ ख़ास शब्द उनके अर्थ की बन … more →

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फरेबी भी बदनाम होकर नाम तो पा जाते हैं-व्यंग्य कविता

दीपक भारतदीप wrote 6 months ago: अपनी काबलियत पर न इतना इतराओ इनाम यहां यूं ही नहीं मिल जाते हैं भीख मांगने का भी होता है तरीका लूटने … more →

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अध्यात्म ज्ञान के बिना धर्म को समझना कठिन-चिंत्तन

दीपक भारतदीप wrote 6 months ago: धर्म क्या है यह समझे बिना उसकी आलोचना करना गलत है। किसी भी धार्मिक विद्वान् ने अपने विचार से धर्म क … more →

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कुछ पल आंसू बहाने के बाद सब भूल जाते हैं-हिंदी शायरी

दीपक भारतदीप wrote 7 months ago: अच्छा लगता है दूसरों की जंग की बात सुनकर पर आसान नहीं है खुद लड़ना दूसरों के घाव देखकर भले ही दर्द उ … more →

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इससे तो उनकी यादें ही बेहतर थीं-हिंदी शायरी

दीपक भारतदीप wrote 8 months ago: उनके साथ गुजरे दिनों की याद पल पल सताती रही ख्वाबों में कई बार चेहरा आता और जाता रहा जब वह सामने आये … more →

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सुविधाओं के गुलाम-व्यंग्य

दीपक भारतदीप wrote 9 months ago: 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ था या एक राष्ट्र के रूप में स्थापना हुई थी। परंतत्र देश स्वतंत्र हुआ … more →

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योगासन के लिये समय तो निकालना ही होगा-आलेख

दीपक भारतदीप wrote 10 months ago: इस बात को कई लोग मानने लगे है कि योगासन, प्राणायाम और ध्यान से तन,मन और विचारों के विकास शरीर से निक … more →

Tags: abhivyakti, adhyatm, अध्यात्म, अनुभूति, अभिव्यक्ति, आलेख, दीपक भारतदीप, मस्तराम, संपादकीय


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