गिरना चढ़ना तो कुद्रत का नियम है… बाज़ार गिरते है, सरकारें गिरती है, दाम गिरते हैं, इज़्ज़त गिरती है, उमीदें गिर जाती है… तो एक ‘पुल’ गिर गया तो क्या हो गया? साथ में कुछ लाशें गिरी होंगी, कुछ आँसू गिर… more →
There goes a thought..theregoesathought wrote 4 months ago: गिरना चढ़ना तो कुद्रत का नियम है… बाज़ार गिरते है, सरकारें गिरती है, दाम गिरते हैं, इज़्ज़त गिरती है … more →
विनय wrote 1 year ago: वह जो मेरे ज़ख़्म गिनता है तो कहता है बस इतने ही! ख़िज़ाँ आयी बहार लौट गयी निशान रह गये इतने ही उसने न … more →
विनय wrote 1 year ago: तन्हाई यूँ ढूँढ़ती है मुझे जैसे मेरी सदा तुम्हें जो दीवारें ख़ुद-ब-ख़ुद गिरती हैं मैं कैसे चुनावाऊँ … more →
विनय wrote 1 year ago: ख़िज़ाँ मुस्कुराने लगी सूखे पत्ते उड़ाने लगी दरख़्त की शाख़ों पर धूप की बूँदें नहीं सूरज का दरिया है … more →
विनय wrote 1 year ago: वह बारिश की छीटें वह बारिश की बूँदें फिर याद आने लगीं, ख़ामोशी तेरी आँखों की हलचल तेरे होंटों की फिर … more →
विनय wrote 1 year ago: तुझे देखा तू ही मेरी हमनशीं तुझे चाहा तू ही मेरी जान-सी तुझे देखा मैंने तुझे चाहा तुझे सिर्फ़ तू ही म … more →
विनय wrote 1 year ago: कोंपलें हर शाख़ बनी पत्तियाँ अब दामने-ग़म में लौट गयी ख़िज़ाँ अब देखो उस रात पर शिगाफ़ आने लग गये असरका … more →
विनय wrote 2 years ago: मैं खा़क़सार था उसने मुझको माटी समझा मुझे उम्मीद रही वो मुझको सोने की तरह छूकर देखेगा… उसने कुछ … more →